यह पोस्ट एक विक्टिम के रूप में कभी नहीं लिखना चाहता था। हमेशा संघर्ष और लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास करता आया हूं। संविधान में अटूट विश्वास है। पर इतने वर्षों से देखता आ रहा हूं कि संवैधानिक संस्थाओं और निकायों पर यदि एक ग़लत आदमी बैठ जाए तो वह संविधान को बेबस बना देता है।

अभी देश की सर्वोच्च संस्थाओं पर ऐसे ही लोगों का जमावड़ा दिख रहा है जिसकी वजह से उच्चतम नैतिकता, ईमानदारी और निष्पक्षता के मूल्यों से निर्देशित होते हुए सालों में अर्जित की गई छवि जनता के सामने बिखर रही है जो किसी भी रूप में लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। न्यायालय से लेकर उच्च स्तरीय जांच एजेंसियों तक, शिक्षा से लेकर रक्षा तक हर जगह से गंदगी और दूषित छवि लोग रोज देख रहे हैं।

मैं भी देख रहा हूं पर मेरे साथ यह और ज्यादा दुखदाई है क्यों कि शिक्षा जगत के एक विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद (कुलपति) पर बैठे व्यक्ति की घृणित आपराधिक मानसिकता और कृत्य का शिकार हुआ मैं लगातार खुद को बचाने का संघर्ष कर रहा हूं।

लेकिन वर्तमान में तो ऐसा लग रहा है कि हर महकमे में ही भांग पड़ी है। पूरी दाल ही काली है। कहां गुहार लगाऊं?? 

हिम्मत जवाब दे रही है। 

मुझे पहली बार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से वर्ष 2007 में आजीवन निष्कासित किया गया था।

उस समय मुझ पर तीन आरोप थे।

पहला, खुद को छात्र संघर्ष समिति का संयोजक बताना जो (समिति) रजिस्टर्ड नहीं है।

दूसरा, विश्वविद्यालय विरोधी गतिविधि करना और तीसरा, जो तथ्य या मुद्दे मैं उठाता रहा हूं वह सही नहीं है।

(तीसरा) लेकिन इसके पीछे जो बात थी वह यह थी कि मैंने राष्ट्रपति कलाम का विश्वविद्यालय में आने का विरोध किया था। तात्कालिक मुद्दा था कि वि वि ने गैर कानूनी तरीके से यूजीसी के एक बड़े अधिकारी के बेटे की नियुक्ति सेक्शन आफिसर के रूप में कर दी थी बिना उस पद पर उसकी योग्यता के। दूसरी तरफ इस पद पर जिस व्यक्ति का चयन हुआ था और जिसे नियुक्ति पत्र भी मिल चुका था, जब वह पुणे की अपनी नौकरी छोड़कर यहां सपरिवार नियुक्त होने आया तो उसके पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। उसपर पहाड़ टूट चुका था। क्योंकि किसी और को पहले ही नियुक्त कर दिया गया था।

काफी भागदौड़ के बाद भी जब उसकी सुनवाई नहीं हुई तब किसी स्टाफ ने ही उन्हें सुझाव दिया कि छात्र संघर्ष समिति के पास जाइए। फिर मैंने कुछ साथियों के साथ उनके मुद्दे को विश्वाविद्यालय की कार्य परिषद में प्रतिवेदन दिलवाया जिसकी बैठक दिल्ली के किसी होटल में हो रही थी, उस समय कार्य परिषद के एक सदस्य कमला प्रसाद का नंबर था जिन्हें हमने फोन पर मुद्दा बताया और मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने तत्काल होटल के फैक्स पर आवेदन मंगवाया और फिर कार्य परिषद ने भी इस व्यक्ति को नियुक्त करने और दूसरे को हटाने का निर्णय दिया। लेकिन उस समय के कुलपति ने इस निर्णय को ठंडे बस्ते में रख दिया। तब हमने मीडिया में इस मुद्दे को रखा और उसी दौरान राष्ट्रपति कलाम का दौरा था जिन्हे छात्र संघर्ष समिति ने विश्व विद्यालय में नहीं आने देने का निर्णय यह घोषणा करते हुए की थी कि दो साल की बच्ची के पिता को जबतक न्याय नहीं मिलेगा तबतक विरोध जारी रहेगा। छात्र संघर्ष समिति ने कलाम साहब को विवि परिसर में नहीं आने के तर्क रखे —

चूंकि विपिन चन्द्र कमिटी की रिपोर्ट विश्विद्यालय के भ्रष्टाचार, अनियमितता और अनेक अवैध नियुक्तियों के खिलाफ आ चुकी थी। इसमें तत्कालीन कुलपति के खिलाफ बहुत ही गंभीर आरोप थे। चूंकि राष्ट्रपति विश्विद्यालय के कुलाध्यक्ष (विजिटर) थे और वह रिपोर्ट उनके यहां पेंडिंग पड़ी थी ऐसी स्थिति में उनका परिसर में आना कुलपति को एक तरह की वैधता देना होता। दूसरे जो व्यक्ति अपने चयनित होने के बावजूद भी नियुक्ति पत्र लेकर दर दर भटक रहा था, उसे जब तक न्याय नहीं मिलता तबतक छात्र संघर्ष समिति राष्ट्रपति के वि वि में आने का विरोध जारी रहेगी।

छात्र संघर्ष समिति के इस रवैए का असर ये हुआ कि स्थानीय पुलिस बहुत सक्रिय हुई और काफी जद्दोजहद के बाद वहां दो निर्णय हुए।

पहला था विश्वविद्यालय में उस सेक्शन अोफिसर की नियुक्ति और दूसरा जिला प्रशासन द्वारा छात्र संघर्ष समिति के पांच लोगों के प्रतिनिधिमंडल को राष्ट्रपति कलाम से वर्धा अतिथि गृह में मिलने और अपने मुद्दे रखने का समय दिलवाना। हमने अपनी बात राष्ट्रपति के सामने रखी और राष्ट्रपति ने भी सहमति जताई। 

लेकिन जो तीसरा निर्णय कुलपति ने राष्ट्रपति के जाने के बाद अपने पहले कार्यालयीन दिवस पर लिया वह था मेरा आजीवन निष्कासन।

यह दिन था सोमवार 18 जुलाई 2007। तब से लेकर अबतक लगातार एक के बाद एक शिकार होता रहा। 

इस निष्कासन के खिलाफ मैंने विश्विद्यालय के कानून के तहत अपील की जिसपर कोई सुनवाई नहीं हुई।

मैं नागपुर उच्चन्यायाल गया जहां से मैं यह आदेश लाने में सफल रहा कि छह सप्ताह के भीतर इन्हे विश्विद्यालय के कानून की धारा 33(2) के तहत ट्रिब्युनल ऑफ आर्बिट्रेशन के माध्यम से मामले का निष्तारण किया जाए। लेकिन यह छह सप्ताह लगभग महीनों और फिर सालों हो गए।

कारण था विश्विद्यालय में ट्रिब्युनल की व्यवस्था नहीं थी और इसके गठित होने में कई कानूनी अड़चने थी और उससे भी ज्यादा विश्विद्यालय का रवैया। जबतक ट्रिब्युनल तैयार हुआ तब तक पुराने कुलपति जा चुके थे और उनके जाने के 9 महीने बाद नए कुलपति विभूति नारायण राय का आगमन हुआ।

इनके बारे में हमें और हमारे बारे में इन्हें काफी कुछ नियुक्ति से पहले ही पता हो चुका था। क्योंकि
विश्विद्यालय की अनियमितताओं को लेकर कई बार तब के मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह से हमारा प्रतिनिधि मंडल मिला था, दिल्ली के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, संगठनों और बुद्धिजीवियों के साथ। 

खैर उस दिन हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था जब विभूति नारायण राय ने ज्वाइन करते ही हमें फोन किया और शाम को मिलने के लिए अपने निवास पर बुलाया। तब वे राष्ट्र भाषा प्रचार समिति के गेस्ट हाउस में ठहरे थे।

करीब सात बजे मैं और संजीव उनसे मिले। काफी लंबी बात हुई। पूरे विश्विद्यालय को समझा। स्थानीय लोगों, उनकी राजनीति, और पूरे विश्विद्यालय समीकरणों पर बात की। बाद में उन्होंने दो बातें कही। तुमलोग लड़ते हुए “टैकटिकल” नहीं हुए। दूसरा कि वह छह महीनों तक “क्लीन स्लेट” रहेंगे। लेकिन छह महीने तो दूर 2-3 महीनों में ही अपना पुलिसिया रंग दिखाना शुरू कर दिया।

एक बात उन्होंने मजेदार कही कि इतने सालों की पुलिस की नौकरी में मैं एक डंडे वाले को नियुक्त नहीं कर पाया लेकिन इस विश्विद्यालय के कानून ने तो मुझे असीमित पावर दिया है।

यह बात उन्होंने आने के कुछ ही दिनों बाद तब कही जब एक प्रोफेसर को अपने यहां बुलाकर सत्तर हजार की नौकरी दे दी। बिना किसी विज्ञापन के, बिना किसी प्रक्रिया के।

इसके बाद तो उन्होंने यूपी को भर दिया खानसामा से लेकर नाई तक। दूसरी तरफ एक दलित प्रोफेसर को मेमो दिया। फिर दूसरा, फिर तीसरा मेमो। उन्हें ही।

पहले मेमो का कारण था उस दलित प्रोफेसर का बाबा साहब की जयंती पर कैंडिल मार्च में शामिल होना। दूसरी तरफ दलित छात्रों के साथ उनके फेलोशिप और पीएचडी को लेकर प्रशासन का नकारात्मक रवैया जिससे लड़कों में गहरी नाराजगी थी।

हमने कुलपति राय से अपनी पहली ही मुलाकात में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का खाका बता दिया था — अम्बेडकराइट लेफ्ट।

मैं और संजीव दोनों इन मुद्दों पर मिलने गए। कारण था एक दलित जेआरएफ (JRF) छात्र का पीएचडी (Ph.D.) में नामांकन न होना, जबकि साक्षात्कार आदि में नम्बर ठीक था। स्पष्ट था गड़बड़ी प्रशासन की तरफ से था।

इसी दौरान हमदोनों (मेरे और संजीव चंदन) के निष्कासन को रद्द करने की बात भी चल रही थी। मैंने उनसे कहा कि आपकी छवि दलित विरोधी हो रही है.. वो विफर पड़े। बोला कैसे?

मैंने कहा कि अभी जो घटनाएं लगातार हो रही हैं वह सब दलित शिक्षकों और विद्यार्थियों के ऊपर ही हुई हैं। आपने आते ही सबसे पहले एकमात्र दलित प्रोफेसर को अकारण मेमो दे दिया…..! खैर, उस लड़के के पीएचडी का मामला सुलझ गया। लेकिन उसदिन हमारी प्रतिबद्धता को उन्होंने नोटिस किया..भीतर ही भीतर कुछ चला भी शायद उनके मन में।

अपने आने के बाद उस प्रोफेसर की नियुक्ति के बाद उन्होंने किसी बैंक कर्मी को रजिस्ट्रार के रूप में नियुक्त कर दिया। प्रो वीसी (Pro Vice Chancellor) के रूप में प्रो नदीम हसनैन साहब को ले आए और ओ एस डी (OSD) के रूप में किसी प्राइवेट में काम करने वाले नरेंद्र सिंह को। साथ ही, अनेक शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक नियुक्तियों के अलावा विवि के परिसर में भवन निर्माण आदि के ठेके भी यूपी के लोगो को। यह एक अलग ही अध्याय होगा जिसपर कैग ने गंभीर अनियमितताओं और घोटालों की ओर संकेत किया है। इस संबंध में कैग की विशेष अनुशंसा कि एक “स्पेशल आडिट” की आवश्यकता है, को लेकर पीआईएल भी कर रखा है हमने जो अपने मरणासन्न अवस्था में पड़ा है नागपुर कोर्ट में।

खैर, मैंने ट्रिब्युनल के तहत अपनी सुनवाई केलिए कुलपति को फिर निवेदन किया कि कोर्ट के आदेश का अनुपालन किया जाए। मुझे श्री राकेश (रजिस्ट्रार) ने बुलाया और कहा कि यार क्यों चिंता करते हो राय साहब सब ठीक कर देंगे। वैसे भी ट्रिब्युनल में इतना समय लग चुका है और फिर इसमें सुनवाई आदि में लंबा वक्त लग जाएगा। उन्होनें यह भी कहा कि विश्विद्यालय ने गलती की है। हम ऐसे ही तुम्हारा निष्कासन रद्द कर देंगे। बस एक आवेदन इस आशय का लिख दो कि तुम्हे ट्रिब्युनल नहीं चाहिए। मैंने ऐसा ही किया। और मेरा निष्कासन रद्द कर दिया गया। शायद 2009 में।

लेकिन मैं काफी ठगा हुआ तब महसूस करने लगा जब इसका कोई लाभ मुझे नहीं मिला। लाभ का अर्थ सिर्फ इतना ही कि बिना शर्त इस निष्कासन के रद्द होने के बावजूद भी मुझे “स्टेटस को” नहीं मिला।

वर्ष 2007 में मैं जब आजीवन निष्कासित किया गया था उस समय मैं एम. फिल. (M.Phil.) में था और लिखित परीक्षा पास कर चुका था। साथ ही पीएचडी में मेरा चयन हो चुका था। मेरा वाईवा होना बाकि था। अतः जब मेरा निष्कासन रद्द हुआ तो मेरी एम फिल की मौखिकी के बाद मुझे पीएचडी में नामांकन देना चाहिए था। लेकिन मेरा सिर्फ एम फिल का रिजल्ट दिया गया। मैं लगभग दस महीनों तक अपनी पीएचडी में नामांकन के लिए कभी रजिस्ट्रार, कभी डीन और कभी प्रो वीसी के दफ्तर का चक्कर काटता रहा। किसी ने कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया कि मुझे क्यों नहीं दाखिला दिया जा रहा है पीएचडी में।

अंततः हारकर मैंने कुलपति राय को अपने साथ हुए इस विश्वासघात का एक पत्र लिखा जिसका जवाब नहीं मिला।

विश्वासघात इसलिए कि मुझसे ट्रिव्यूनल वापस ले लिया गया। विश्वासघात इसलिए कि एम. फिल तो राय के पहले वाले कुलपति भी दे रहे थे। 

खैर, अपने साथ हुए इस अन्याय के साथ ही साथ विश्विद्यालय के अंदर अन्य कई गड़बड़ियां जारी रही। हमने इन सब गड़बड़ियों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाते भी रही। सीबीआई (CBI) को भी भेजा। लेकिन संज्ञान लेने के बाद अचानक बिना सूचना के सीबीआई ने जांच बंद कर दी। सी वी सी (CVC) में भी जांच अब भी पेंडिंग है।

इन सब घटनाक्रमों के बीच ही राय का वह साक्षात्कार भी नया ज्ञानोदय नामक पत्रिका में छपा जिसमें इनके स्त्रियों के प्रति सोच की स्पष्ट झलक मिलती है। उस साक्षात्कार में इन्होंने हिंदी साहित्य की लेखिकाओं को “निंफोमैनियक कुतिया” कहा था। इस असह्य टिप्पणी को लेकर वर्धा की कुछ महिलाओं ने विरोध भी किया था और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हसीना गोर्डे, स्त्रीकाल संपादक के रूप में संजीव चंदन और मैंने मिलकर वर्धा थाने में कुलपति राय के खिलाफ मामला भी दर्ज करवाया था। 

पुलिस में दर्ज कराए इस रिपोर्ट से तिलमिलाए राय ने हमें धमकी दी कि “तुम्हारे बापों को उठवा लूंगा और यूपी के इतने जिलों के इतने थानों में एफआईआर (FIR) करवाऊंगा, जिन जिलों का कभी नाम भी नहीं सुना होगा।” इस धमकी की रिपोर्ट भी मैंने वर्धा थाने में कर दी। 

साथ ही, अपने अकादमिक भविष्य की चिंता में मैं और संजीव कहीं और से पीएचडी करने की सोचने लगे। हम दोनों ने भागलपुर के तिलका मांझी विश्विद्यालय में जेआरएफ कैंडिडेट के रूप में गांधी विचार विभाग में आवेदन किया और हमें पीएचडी करने की स्वीकृति उस विभाग ने दे दी।

लेकिन राय को यह बात पता चल गई। उसने रजिस्ट्रार केजी खामरे द्वारा भागलपुर विश्विद्यालय के कुलपति को हमारे खिलाफ पत्र भिजवाया जिसकी वजह से हम दोनों वहां पीएचडी में एडमिशन नहीं ले सके। उल्टे हमारे कारण उस विभाग के विभागाध्यक्ष को सस्पेंड होना पड़ा……! 

हामदोनो वापस वर्धा आ गए। इधर धमकी वाला केस और नाल प्रकरण केस विभूति के लिए मुसीबत हो रहा था। राय ने अपने बिचौलिए छोड़े उसमें एक मनोज राय था जो वहीं शिक्षक था पर कुलपति राय के समय अधिकतर दिल्ली एमएचआरडी में विश्विद्यालय के फाइलों की लायजनिंग करता था। दूसरा था विजय झा नाम का एक पीएचडी छात्र। इसके अलावा दिल्ली के जेएनयू के प्रोफेसर मैनेजर पांडेय।

विभूति का इन सबके माध्यम से पैगाम था कि ये केस वापस ले लो और बदले में यहां से माइग्रेशन लेकर दूसरी जगह चले जाओ। इसी पृषठभूमि में हमारी मुलाकात हुई कुलपति राय से उनके घर पर। मनोज राय की बाइक के पीछे बैठकर। सिर्फ इन दो केसों को वापस लेने पर सहमति बनी। बदले में पुराने फार्मेट में ही माइग्रेशन देने की बात हुई।

वरना विभूति नारायण राय का कहना था कि मैंने तुमदोनो के लिए ही नए फार्मेट में माइग्रेशन सर्टिफिकेट तैयार करवाया है जिसमें अनुशासनात्मक कारवाई का कॉलम है। तुम दोनों का कहीं एडमिशन नहीं होने देता। 

बातचीत के मुताबिक मैंने दोनों केस वापस ले लिए और बदले में माइग्रेशन निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी। बकायदे हम दोनों ने “अदेयता प्रमाण पत्र” आदि की प्रकिया पूरी करवाकर फीस जमा कर दिया माइग्रेशन सर्टिफिकेट के लिए। जब हम माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेने गए तो दो बार बहाना करके लौटा दिया गया। दूसरी बार के के त्रिपाठी द्वारा यह कहा गया कि कुलपति खुद आपलोगों को अपने हाथों से माइग्रेशन सर्टिफिकेट देना चाहते हैं इसलिए जब वो आएंगे तब माइग्रेशन सर्टिफिकेट आपको मिलेगा। खैर, तीसरी बार हमें कुलपति के कक्ष में बुलाया गया। हम गए। कुलपति ने हम दोनों को बैठने को कहा। थोड़ी बातें हुई। भविष्य को बेहतर बनाने की। यह आश्वासन भी दिया कि दूसरी जगह अगर मेरी मदद की जरूरत हो तो नि:संकोच बताना। इसके बाद उन्होंने के के त्रिपाठी को बुलवाया और अपने हाथों से हम दोनों की तरफ माइग्रेशन सर्टिफिकेट बढ़ाया। कहा – देख लो पुराने फॉर्मेट में ही दे रहा हूं। फिर के के त्रिपाठी से कहा कि फॉर्मलिटी के लिए इनसे रिसीविंग ले लो। के. के. त्रिपाठी ने किसी फाइल के ऊपर रखे फोल्डेड पेपर को हमारे आगे कर दिया। हमने उसपर रिसीविंग दे दी….! 

कुछ महीनों बाद संजीव चंदन ने दिल्ली के अम्बेडकर विश्विद्यालय में पीएचडी में दाखिला ले लिया। मैंने भी कई जगह पीएचडी के लिए फार्म डाला था। उसमें गुजरात विश्विद्यालय में मेरा चयन हुआ लेकिन एम फिल कोर्स इंटीग्रेटेड होने की वज़ह से मैंने दुबारा एम फिल करना उचित नहीं समझा और लौट आया। इसी समय वर्धा विश्विद्यालय के ही दलित एंड ट्राइबल स्टडीज सेंटर से पीएचडी के फार्म निकले और उसमें मैंने आवेदन कर दिया। साक्षात्कार के बाद मेरा चयन हो गया और मैंने फिर इसी विश्विद्यालय में उक्त विभाग में पीएचडी में नामांकन करा लिया। मेरे पीएचडी में प्रवेश की तारीख थी 12-7-2011

मैं न तो कभी अच्छा वक्ता रहा और न ही साहित्यिक रूप से रचनात्मक। लेकिन एक अच्छा शिक्षक होने की चाहत हमेशा रही। शायद आज भी है। मैंने पूरी तरह से स्वयं को अपने विभाग तक सीमित कर लिया था। यहां तक कि मैं केंद्रीय पुस्तकालय भी नहीं जाता था। अपने विभाग की छोटी लाइब्रेरी में ही रहता था। मुझे जेआरएफ के नाते कुछ क्लास एम.ए. (M.A.) वालों की लेनी होती थी। मुझे बहुत सुखद अनुभव हो रहा था। मैं प्रतिदिन तीन से चार कक्षाएं लेता था। छात्रों की मुझसे कोई शिकायत नहीं थी बल्कि उन्हें मेरे क्लास पसंद आता था। विभाग भी मेरे साथ बहुत सकारात्मक था। पर यह सब ज्यादा दिन नहीं चला। 

तीन चार महीने के बाद एक दिन अचानक मेरे मोबाईल पर अकादमिक विभाग से फोन आया कि आपने पीएचडी के प्रवेश के समय जमा दस्तावेजों पर सेल्फ अटेस्ट नहीं किया है। इसलिए जल्द से जल्द यहां आकर सेल्फ अटेस्ट कर दें। अगले दिन जब मैं अपने विभाग गया तो विभाग की क्लर्क पद्मा ने भी बताया कि जिन लोगों ने सेल्फ अटेस्ट नहीं किया है उन्हें अकादमिक विभाग, स्थापना में जाकर सेल्फ अटेस्ट करना है। मैं कादर नवाज़ खान के पास गया। वही अकादमिक विभाग के उप कुलसचिव थे।

उन्होंने मुझे बैठने को कहा और अपने सामने ही सेल्फ अटेस्ट करवाने लगे। उन्होंने बैक डेट में सेल्फ अटेस्ट करने को कहा। जब मैंने उनकी तरफ देखा तो कहा डेट ऑफ एडमिशन के समय का डेट डालना है। इसमें मुझे कुछ ग़लत नहीं लगा। मैं सेल्फ अटेस्ट करने लगा। लेकिन मुझे याद है कि पहले या दूसरे दस्तावेज पर मैंने उसी दिन की तारीख़ डाल दी थी। मतलब जिस दिन मैं वहां गया था सेल्फ अटेस्ट करने।

पर तुरंत ही उन्होंने मुझे रोका और मुझे भी ध्यान आया कि अरे मैंने तो आज की ही तारीख डाल दी है। मैंने तुरंत पेन से उस डेट को कट कर दिया लेकिन उन्होंने अपने टेबल के ड्रावर से व्हाइटनर निकाला और उस कटे हुए तारीख पर लगाने को कहा। मुझे मन में थोड़ा अटपटा लगा। पर मैंने व्हाइटनर लगा दिया। उसके बाद अन्य दस्तावेजों पर पुराने डेट में ही सेल्फ अटेस्ट कर दिया। अंत में जो दस्तावेज था वह कुलपति राय द्वारा दिया हुआ पुराने फॉर्मेट का माइग्रेशन सर्टिफिकेट था जिसे मैंने पीएचडी में प्रवेश लेते समय अन्य दस्तावेजों के साथ जमा कर किया था।

जहां तक मेरी जानकारी थी मूल दस्तावेज को अटेस्ट नहीं किया जाता। तो मैं उसे छोड़ रहा था। पर उन्होंने मुझसे कहा कि इसपर भी करना है। मैंने प्रतिवाद किया तो उन्होंने दोहराया कि सब पर करना है। मैंने कोई विवाद करना उचित नहीं समझा। मैंने कर दिया। जब मैं अपने दस्तावेजों पर सेल्फ अटेस्ट कर रहा था उसी दौरान मेरे विभाग की एक और लड़की अाई थी जो पीछे बैठकर सेल्फ अटेस्ट कर रही थी और करने के बाद चली गई थी। मै भी वापस आया पर मन में एक खटका सा बना रहा। क्यों मूल पर सेल्फ अटेस्ट करवाया?

खैर, मैं फिर अपने विभाग, क्लास और पुस्तकालय में रम गया। पर तीन चार दिनों बाद ही मुझे फिर कादर नवाज़ के ऑफिस से सेक्शन आफिसर ब्रजेश पाटिल का फोन आया और मुझसे कहा गया कि आपने जो माइग्रेशन सर्टिफिकेट जमा किया है वह ओरिजनल नहीं है। ओरिजिनल जमा कीजिए। मुझे किसी गलत की आशंका आकार लेती नजर आ रही थी।

मैं भागता हुआ कादर नवाज़ के ऑफिस में गया । कादर नवाज़ ने मेरी फाइल निकाली, वह माइग्रेशन दिखाया जिसपर चार दिन पहले ही मैंने सेल्फ अटेस्ट किया था। कादर नवाज़ ने कहा, देखिए कहां है इसपर स्टांप, ये रजिस्ट्रार का सिग्नेचर भी ओरिजिनल नहीं लग रहा … फिर ब्रजेश पाटिल से बोलकर दूसरों का माइग्रेशन दिखाया और बोला अब नए फॉर्मेट में माइग्रेशन सर्टिफिकेट दिया जाता है।

मैं अन्दर से हिल चुका था लेकिन मैंने प्रतिवाद किया कि मुझे जो दिया गया है वही मैंने जमा किया। अभी यह बातें कर ही रहा था कि इतने में कुलपति ऑफिस का चपरासी मनोज वहां आया और मुझसे बोला कि चलिए आपको कुलपति साहब बुला रहे हैं। तब तक बात मुझे समझ में आ चुकी थी। 

मैंने कुलपति के केबिन का दरवाजा अभी खोला ही था कि कुलपति राय ने अपनी दाहिने हाथ से चुटकी बजाते हुए अजीब लहजे में कहा — “तुम तो अब गए बेटा”! उनके टेबल पर दो पन्ने पड़े थे। मैं बतला नहीं सकता कि उस समय उनके चेहरे पर कितनी कुरूपता थी। उनकी चुटकी और यह बात खत्म होते होते मैं उनके सामने था। उन पन्नों की तरफ इशारा करते हुए मैंने कहा, “यह करने की जरूरत नहीं थी। आप कह देते तो मैं खुशी – खुशी जेल चला जाता। लेकिन जिस पद और कुर्सी पर बैठे हैं उसका लिहाज करना चाहिए था।” उन्होंने कहा, “कौन विश्वास करेगा?” मैंने तपाक से जवाब दिया — “यह बात आप किसी तीसरे को समझाएगा। मुझे और अपने आप को कैसे समझाएंगे। मैं जानता हूं कि मैंने यह नहीं किया है और आप जानते हैं कि आपने यह किया है।”

उनका सर नीचा हो गया। मैंने बोलना जारी रखा — “मेरे पिता अपने खानदान में पहले व्यक्ति थे जो गांव से बाहर आए। तभी हम भाई बहन पहली पीढ़ी बने पढ़ने वालों में।”

आज भी मेरे गांव के अधिकांश लोग अनपढ़ हैं। आज भी अठारह उन्नीस साल के लड़के गुजराज, पंजाब, लुधियाना की तरफ रुख करते हैं।

मैंने आगे कहा, “फिर भी मेरे पिता ने ऐसे संस्कार नहीं दिए। मैंने सुना है आपके पिता जज थे। फिर भी ऐसा घृणित काम, ऐसे संस्कार !!!” उनका सर थोड़ा और नीचे की ओर हो गया था। मैंने कहना जारी रखा, “आपको जो अच्छा लगा आपने किया। आप जो कर सकते थे वही आपने किया, लेकिन अब मुझे जो करना है वह मैं करूंगा।” इतना बोलकर मैं निकल आया। मेरे पांव कमजोर पड़ रहे थे, बहुत कुछ धुंवा हो रहा था, घुट रहा था, छूट रहा था, पर एक विचार मजबूत होता जा रहा था कि संघर्ष करूंगा। आखिर तक करूंगा। अंत तक करूंगा। झुकूंगा नहीं और न ही इतना “टैक्टिकल” होऊंगा जीवन में कभी। पर एक आगत भय भी था। क्या होगा अब..!

वहां से निकलने के बाद माजरा साफ था। हमें फॉर्जरी में फंसाया जा चुका था। मैंने संजीव को बताया, आरपीआई (RPI) के विदर्भ सचिव अशोक मेश्राम जी को खतरा बताया। बसपा के जिला अध्यक्ष को बताया। कुछ और लोगों से भी चर्चा की । तय हुआ कि वर्धा एसपी को मिला जाए और सारी बातें कही जाए।

मैं अपने वर्धा के चार पांच पत्रकार साथियों के साथ एसपी ऑफिस पहुंचा। एसपी थे अविनाश कुमार। दुर्योग से विभूति के सजातीय और मूल रूप से बिहारी। उनको पूरी बात बताई और गिरफ्तारी की संभावना पर भी बात की। पर एसपी ने आश्वस्त किया कि ऐसी कोई बात नहीं होगी। लेकिन एसपी अपनी बात पर कायम नहीं रह सके। संजीव चंदन की गिरफ्तरी के पत्र पर उनकी ही लेखनी थी। अगले ही दिन वर्धा में हम लोगों की दफ्तरनुमा जगह पर पुलिस की धमक हुई और चंदन के बारे में पूछा।

संजीव चंदन को पुलिस स्थानीय नेताओं के हस्तक्षेप के दवाब में ज्यादा देर थाने में नहीं रख सकी। तुरंत संजीव चंदन को सुरक्षित जगह पर किया गया और फिर अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की गई। कोर्ट से पंद्रह दिन की राहत मिली।

इधर मैंने सेवाग्राम थाने में विश्विद्यालय के अधिकारियों के खिलाफ फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी करने की शिकायत दर्ज की 1-1-2012 को।

लेकिन एफआईआर नहीं लिखा गया।

मैंने एसपी को एफआईआर दर्ज करवाने का अनुरोध किया। कोई कार्रवाई नहीं हुई।

मैंने फिर वर्धा कोर्ट में कम्पलेंट केस किया। अंततः वर्धा कोर्ट ने प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर पुलिस को विश्वविद्यालय के चारों आरोपी — कुलपति विभूति नारायण राय, रजिस्ट्रार केजी खामारे, उप कुलसचिव कादर नवाज़ खान और परीक्षा प्रभारी के के त्रिपाठी के खिलाफ दो अप्रैल 2012 को 420, 468, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश सुनाया और चार अप्रैल 2012 को एफआईआर संख्या 90/2012 थाना सेवाग्राम, वर्धा में दर्ज कर लिया गया।

एफआईआर दर्ज होते ही चारों आरोपी ने अग्रिम जमानत की याचिका दायर की लेकिन फिर पता नहीं किसके आश्वासन के बाद उनके वकील एडवोकेट टावरी ने “नॉट प्रेस” कहते हुए याचिका वापस ले ली और अबतक बिना किसी गिरफ्तारी के बे खौफ बिना किसी जमानत के ये चारों अपनी जगह पर बने हुए हैं। 

इधर मुझे पहले सस्पेंड किया गया और फिर आजीवन निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद मेरे ऊपर भी एफआईआर किया गया और मुझे तुरंत अग्रिम याचिका दायर करनी पड़ी।

लेकिन ये पंद्रह दिन की मोहलत के बाद मेरी जमानत उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक से खारिज कर दी गई। संजीव चंदन पहले ही सांप सीढ़ी के इस खेल में पहले ही लुढ़क चुके थे।

मैं इस मामले में उनके पीछे पीछे ही था। अब कोई चारा नहीं था। कई वकीलों ने सुझाया कि सरेंडर कर के जमानत ले ली जाए। लेकिन, एक वकील डी एस बडियार ने सरेंडर के लिए मना किया और कहा कि जबतक कानून में कोई रिमेडी बचा हुआ है तब तक सरेंडर नहीं करेंगे।

फिर संजीव ने एफआईआर खारिज करने की याचिका नागपुर बेंच में दाखिल की। याचिका स्वीकृति हुई और साथ ही “नो कोअर्सिव एक्शन टेकन टिल द डिस्पोजल ऑफ केस” के आदेश के साथ मिली । यह बहुत बड़ी राहत थी। मुझे भी वहीं से यही राहत मिली और अबतक हम दोनों गिरफ्तारी से बचे हुए हैं। पर तलवार तो लटकी हुई है ही। 

लेकिन विभूति नारायण राय व्यक्तिगत तौर पर भी गंदा आदमी साबित हुआ।

वह इतना गन्दा आदमी था कि मेरी पत्नी जिस अस्पताल में काम करती थीं वहां जान बूझकर दो पुलिसवालों को भेजता था जो मेरी पत्नी के विभाग की एच ओ डी (HOD) से मेरी पत्नी के बारे में पूछताछ करते थे और उसी क्रम में कहते थे कि वो डॉक्टर कहां है? कहां रहती है? हमें उनसे पूछताछ करनी है। उसने अपने घर में दो फरार मुजरिमों (मेरे और संजीव चंदन के बारे में) को पनाह दे रखा है। इन सब वजहों से मेरी पत्नी को काफी ओकवार्ड परिस्थिति का सामना करता अपने सीनियर्स के सामने।

विभूति नारायण राय इससे भी गंदा व्यक्ति था सामाजिक तौर पर।

वह दूसरों से कहता चलता कि “देखता हूं उसकी शादी कितने दिन चलती है। जेआरएफ तो बंद ही हो गया। पत्नी कितने दिन कमाकर खिलाएगी। देखना यह शादी छह महीने से ज्यादा नहीं चलेगी….” यह सब सुनकर मुझे बहुत शर्म और घिन्न आती थी कि कोई आदमी इतना टुच्चा भी हो सकता है!!!

उसने हमारे आर्थिक स्रोतों को काटने की ठानी। उसे उड़ती सूचना थी कि हमारे पास लाखों रुपए की मदद आती है। साथ ही, विश्विद्यालय के कर्मचारी भी हमारी मदद करते हैं। उसने विश्विद्यालय  में मुनादी करवा दी थी कि जो कोई भी हमारी मदद करेगा या हमसे मिलेगा उसे वो तत्काल सस्पेंड कर देगा। पर सच्चाई इससे कोसों दूर थी। हमारे पास कोई पैसे नहीं होते थे सिर्फ एक जुनून था, जोश था। हमारे पास कहीं से 500 रुपए आते तो हम खाने या अन्य चीजों की जगह बाइक में तेल भरवाने का विकल्प चुनते थे, ताकि नागपुर जाकर अपने वकील से मिलकर पीआईएल (PIL) की तैयारी की जा सके। लेकिन उसके दूसरी बात में दम था। विश्विद्यालय के अधिकांश कर्मचारी रात के अंधेरे में हमसे मिलते थे …. वो अब बिल्कुल बंद हो गया।

लेकिन उसकी टुच्चई दिन – प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी, आए दिन अलग — अलग लोगों के माध्यम से अलग – अलग प्रकार की धमकियां। एक भाई ने तो बड़े प्यार से कहा कि “कोई जरूरी थोड़े ही है कि ट्रक के नीचे आ जाने से लोगों की मौत ही हो जाए। स्थाई अंग भंग हो सकता है। फिर हमारी बहुओं का क्या होगा…!”

दूसरी तरफ, वे बे खौफ हैं। इसलिए कभी – कभी लगता है कि कानून हमेशा प्रभाव शाली लोगों की तरफ होता है वरना बिना किसी जमानत के कानूनी प्रावधानों का मनमुताबिक प्रयोग कर उन्हें बचाया जा सकता था भला? 

खैर, फिर से मैंने विश्विद्यालय से अपने आजीवन निष्कासन को चुनौती दी।

लेकिन विश्विद्यालय ने विश्विद्यालय के कानून के अनुरूप मुझे ट्रिब्युनल के तहत सुनवाई का मौका नहीं दिया। मेरे आवेदन पर ध्यान तक नहीं दिया।

इसके लिए मुझे फिर से नागपुर उच्च न्यायालय जाना पड़ा और छह महीने के भीतर ट्रिब्युनल ऑफ आर्बिट्रेशन के तहत सुनवाई कर फैसला देने का आदेश मैं कोर्ट से ला पाने में सफल हुआ। पर, दो साल से ऊपर होने को हैं। ट्रिब्युनल में सुनवाई भी लगभग पूरी हो गई है। अगले महीने तक फैसला भी आ जाएगा।

लेकिन इस बार संकट गहरा और चौतरफा है। ट्रिब्युनल से हारूंगा तो पीएचडी ही केवल नहीं जाएगी, बल्कि यदि पुलिस ने जांच नहीं की सही से तो मैं जाऊंगा जेल!! 

इन सब चक्करों में सपने तो कब के मुझमें आशा न देख फुर्र हो गए हैं। पर, सिर्फ एक ही बात से विचलित हूं कि मेरी बेटी से जब उसके हमउम्र यह कहकर उसे परेशान करेंगे कि तुम्हारे पापा तो फ्राड और चिटर हैं तो वह मासूम तब क्या जवाब देगी????????

सामाजिक और सांस्कृतिक पूंजी से संपन्न और खास तरह के पारिवारिक व्यवस्था से सुरक्षित हमारी न्याय व्यवस्था और इसके इतर हर प्रकार के व्यवसाय से लेकर नौकर शाही या नेताओं का यह शास्त्रीय प्रभु वर्ग या अन्य ऐसे समूहों में गजब की वैचारिक साम्यता है। गजब की समझ है।

इस मामले में किसी थाने का अदना – सा सिपाही हो या किसी उच्च न्यायालय का सेवा मुक्त हुआ न्यायधीश हो, सत्ता के प्रति, शासक वर्ग के प्रति एक ही भाव रखता है। 

मेरे इस फॉर्ज माइग्रेशन मामले में साक्ष्य, दस्तावेज, परिस्थितियां भले चीख -चीख कर कह रही हों कि ये रसूखदार, सत्तासीन, सफेदपोशों ने ही फोरजरी की है पर न तो थाने का वो सिपाही, ना पुलिस के उच्च अधिकारी और न ही वो उच्च न्यायालय का रिटायर्ड जज यह देख पाने में सक्षम हैं। क्योंकि एक ख़ास तरह का चश्मा उन सब को इन चीज़ों को साक्ष्यों को देखने से रोक रही हैं।

सबके चेहरे अलग हैं पर उनके दिलो दिमाग एक चीज स्थायी रूप से बैठी हुई है कि कुलगुरु (कुलपति) ऐसा क्यों करेगा?

इसके लिए वो मेरी मोटी होती जाती फाइलों को पलटने की भी जहमत नहीं उठाते।

बल्कि उनके पास मेरे सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि मैं ऐसा क्यों करूंगा??

वहीं विश्वविद्यालय का चपरासी से लेकर प्रोफेसर तक जान रहें हैं कि सच्चाई क्या है?

लेकिन किसी प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर या एसोसियेट प्रोफेसर में न तो इतनी बौद्धिक और न ही इतना नैतिक साहस है कि वो गलत को गलत कहने की हिम्मत जुटा सकें।

मैंने दो महीने पहले ही विश्वविद्यालय के तमाम शैक्षणिक गैर शैक्षणिक संघों को ईमेल के जरिए मदद की गुहार लगाई थी कि इस आपराधिक साजिश और कृत्य में लिप्त लोगों की भर्त्सना की जाए।

लेकिन न तो किसी शिक्षक ने और न ही किसी शिक्षक संघ ने कोई आवाज़ बुलंद की।

यह कैसा विश्वविद्यालय है जहां पांच लड़कियों को इसलिए सस्पेंड कर दिया जाता है कि उन पर कुछ धाराएं लग गईं हैं।

दूसरी तरफ नॉन बेलेबल धाराओं के आरोपी सालों से अपनी सत्ता का आनंद ले रहे हैं।

मैं फिलहाल परीक्षा विभाग के कर्मचारी भालचंद्र जी से क्षमा चाहता हूं कि उनसे हुई बात -चीत के ऑडियो को सार्वजनिक कर दिया। इसके आलावा मेरे पास चारा ही नहीं था।

अगर विश्विद्यालय के कर्मचारी या शिक्षक थोड़ी हिम्मत कर देते तो यह नौबत नहीं आती बल्कि अपराधिक षडयंत्र करनेवाला सलाखों के पीछे होता। मैं इस ऑडियो टेप के माध्यम से विश्विद्यालय के बाहर के लोगों को बताना चाहता हूं कि मेरे साथ क्या हुआ था!!!

इन सब बातों की एक ही बात है। मैं आसान शिकार हूं। क्योंकि न तो मेरे पास कोई सांस्कृतिक – सामाजिक पूंजी है और ना ही मैं किसी शासक “जाति” से ताल्लुक रखता हूं।

पता नहीं फेसबुक अपना-सा लगता है। लगता है कि इस क्षैतिज समंदर में कई ऐसे मिल ही जाएंगे जिनके पास भी मेरे जैसा ही दुख होगा।

हर कोई तो रोहित बेमुला नहीं हो सकता। उतनी हिम्मत भी नहीं……………

राजीव सुमन, फेसबुक, शुक्रवार, 26/10/2018, 10:43 AM
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