1 मई 2018 को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी/ UGC) ने देश के सभी सेंट्रल यूनिवर्सिटी को एक पत्र लिख कर सभी कुलपति को एक अप्रत्याशित निर्देश दिया. यह निर्देश एक तरफ सरकार के घबराहट को दिखा रही थी तो दूसरी ओर यह माना जा रहा था कि इस निर्देश से देश में सदा सर्वदा के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा/ BJP) की सरकार बनाये रखने में कोइ सहायता मिलेगी. या फिर देश में सदा के लिए भजपा की सरकार रहेगी. इसी सोच के कारन यूनिवर्सिटी फैकल्टी को सरकार की आलोचना के अधिकार से वंचित कर दिया गया.

यूजीसी और भाजपा सरकार का यह कदम ज्ञान सृजन, यूनिवर्सिटी और लोकतंत्र के मूल दर्शन के खिलाफ है.

स्रोत ट्विटर – शिहाबुदीन कुंजु एस  [1]

UGC ने ऊपर के निर्देश पत्र को सेंट्रल यूनिवर्सिटी के सभी VC को भेजा। यह पत्र इस प्रकार है –

The Registrar,  Dated 01 May 2018
All Central Universities (as per list attached)

Sub: Adaptation of Government of India/ UGC rules for various administrative, finance, establishment and service matters till framing of relevant Statutes, Ordinance, and Regulations of the University – reg.

Sir,

UGC is receiving reference from some of the Central Universities for seeking clarification on adoption of Government of India/ UGC rules for various administrative, finance, establishment and service matters till framing of relevant Statutes, Ordinance and Regulations of the University.

In this regard the undersigned is directed to inform you to expedite the framing of Statutes / Ordinances and Regulations. However, till such time the Statutes / Ordinances / Regulations are framed the University may adopt the following rules / instructions of Govt. of India / UGC/

i) University may strictly follow the General FInancial Rules, 2017 as circulated by the UGC vide letter No. 13-2/2017 (CU) dated 27th May 2017.

ii) University must ensure the instructions of MHRD as articulated in the guidelines for financial management in Central Universities and procedure to maintain financial propenetry and no deviation from the procedure be allowed as circulated by MHRD vide letter No F 61-19/2005-Desk-U dated 3rd March 2018.

iii) University may follow the instructions of Central Vigilance Commission (CVC) dated 11.02.2011 on “Transparency on Tendering System” and dated 17.02.2011 regarding “Mobilization-Advances”

iv) For service matters, the University should follow the Govt. of India Rules/ orders as applicable to Central Govt. Civilian employees.

Your faithfully,
(Sushma Rathore)
Under Secretary

यूजीसी का उपर्युक्त निर्देश पुनः यह साबित करता है कि भाजपा सरकार भारत का अबतक का सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी विरोधी के साथ-साथ यह अपने आप में बुद्धि विरोधी भी है. यह याद करना समीचीन कि सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी, लेखक, शिक्षक, पत्रकार पर हमले भाजपा से सम्बंधित लोगो ने ही कराएं हैं. और भाजपा के नेता खुले आम ऐसे लोगो का साथ देतें हैं और समर्थन करतें हैं.

यही कारन है कि इंटरनेशनल सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन (International Sociological Association/ ISA) के कार्यकारिणी ने भाजपा नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार को अभूतपूर्व बुद्धिजीवी विरोधी (Unprecendented Anti-Intellectual) कहा है [2]. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने दो मौको पर भाजपा सरकार को बुद्धिजीवी विरोधी कहा.  पहली बार उन्होंने 6 दिसंबर 2015 को बंगलौर में कहा कि “हमने जितने भी सरकारे देखें हैं उनमें यह सबसे ज्यादा बुद्दिजीवी विरोधी सरकार है [3]. दूसरी बार 15 मार्च 2016 को नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू/ JNU) के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि भाजपा सबसे बड़ी बुद्धिजीवी विरोधी राजनीतिक दल है [4].

यूनिवर्सिटी मूल रूप में सरकार के नीतियों को सही कहने वाला संसथान नहीं है. इसके शिक्षक सरकार की नीतियों से हाँ में हाँ  मिलाने के लिए नहीं है. ऐसा करना समाज में ज्ञान सृजन और आलोचनात्मक बौद्धिकता को कुचलना होगा. यूनिवर्सिटी के शिक्षक को सरकार के नीतियों का सजग प्रहरी कहा जाता है. शिक्षक लोकतान्त्रिक समाज में बौद्धिक विपक्ष की भूमिका निभाता है. साथ ही वह शोषित, वंचित, गरीब असहाय, समाज से बेदखल कर दिए गए लोगो का आवाज होता है. यह आवाज स्वाभाविक ही सत्ताधारी दल के खिलाफ होता है.

भारत का इतिहास गवाह रहा है कि यूनिवर्सिटी से जो सरकार विरोधी आवाजे उठी उसने अंततः लोकतंत्र को ही मजबूत किया है.

यूनिवर्सिटी के शिक्षक और स्टूडेंट्स सरकार के प्रति आलोचना का भाव नहीं रखेंगें तो कौन रखेगा?

यूजीसी ने 1 मई 2018 को सभी केंद्रीय कुलपतियों को भेजे अपने पत्र में कहा है कि “For service matters, the University should follow the Govt. of India Rules/ orders as applicable to Central Govt. Civilian employees” [1].

अर्थात यूनिवर्सिटी के शिक्षकों के सेवा शर्तो को केंद्रीय सरकार नागरिक कर्मचारी के अनुसार किया जाए.

इसे कुछ यूनिवर्सिटीयों ने अपने वेबसाइट पर भी लगा दिया है जैसे भारतीय प्रधोगिकी संसथान, कानपूर (Indian Institute of Technology (IIT), Kanpur) [5], तो हम कह सकतें हैं कि उन यूनिवर्सिटीयों ने इसे लागू भी किया होगा।  

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत भारत सरकार (Department of Personnel and Training, Government of India) के अनुसार “केंद्रीय नागरिक सेवा (आचरण) नियम 1964 (Central Civil Services (Conduct) Rules, 1964) [6] के अनुसार निम्नलिखित नियम  फैकल्टी पर भी लागु होगा जो अंततः ज्ञान सृजन के स्वतंत्रता और लोकतंत्र ख़तम कर उसे प्रभावित करेगा.

ये सम्बंधित नियम इस प्रकार हैं –

CENTRAL CIVIL SERVICES (CONDUCT) RULES, 1964

3 (1) Every Government servant shall at all times– (vii) maintain political neutrality

5. Taking part in politics and elections

(1) No Government servant shall be a member of, or be otherwise associated with, any political party or any organisation which takes part in politics nor shall he take part in, subscribe in aid of, or assist in any other manner, any political movement or activity.

(2) It shall be the duty of every Government servant to endeavour to prevent any member of his family from taking part in, subscribing in aid of, or assisting in any other manner any movement or activity which is, or tends directly or indirectly to be, subversive of the Government as by law established and where a Government servant is unable to prevent a member of his family from taking part in, or subscribing in aid of , or assisting in any other manner, any such movement or activity, he shall make a report to that effect to the Government.

7. Demonstration and strikes No Government servant shall –

(i) engage himself or participate in any demonstration which is prejudicial to the interests of the sovereignty and integrity of India, the security of the state, friendly relations with foreign States, public order, decency or morality, or which involves contempt of court, defamation or incitement to an offence, or

(ii) resort to or in any way abet any form of strike or coercion or physical duress in connection with any matter pertaining to his service or the service of any other Government servant.

9. Criticism of Government No Government servant shall, in any radio broadcast, telecast through any electronic media or in any document published in his own name or anonymously, pseudonymously or in the name of any other person or in any communication to the press or in any public utterance, make any statement of fact or opinion –

(i) which has the effect of an adverse criticism of any current or recent policy or action of the Central Government or a State Government: Provided that in the case of any Government servant included in any category of Government servants specified in the second proviso to sub-rule (3) of rule 1, nothing contained in this clause shall apply to bonafide expression of views by him as an office-bearer of a trade union or association of Government servants for the purpose of safeguarding the conditions of service of such Government servants or for securing an improvement thereof; or

(ii) which is capable of embarrassing the relations between the Central Government and the Government of any State; or (iii) which is capable of embarrassing the relations between the Central Government and the Government of any foreign State; Provided that nothing in this rule shall apply to any statements made or views expressed by a Government servant in his official capacity or in the due performance of the duties assigned to him.

मूल नियम अंग्रेजी में उपलब्ध है लेकिन हम साधारण शब्दों में कहें तो अब नियमतः  यूनिवर्सिटी का शिक्षक सरकार के नीतियों की आलोचना नहीं कर सकतें है. वे सत्ताधरी दल या सत्ता के के नीतियों के खिलाफ न लिख सकतें हैं और न बोल सकतें हैं. यह एक  प्रकार से सोचने समझने, बोलने, लिखने के लोकतान्त्रिक अधिकार पर हमला है. यह बौद्धिकता और बौद्धिकता के विकास पर है.

सरकार में शामिल भाजपा के लोग नौकरशाह और शिक्षक में भेद करने में असफल रहें हैं या फिर उनलोगो ने जानबूझ कर ऐसा किया है? यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है. भाजपा के लोगो को  बौद्धिकता से कोई लेना-देना नहीं होना है. साथ ही इन्हें यह भी नहीं मालूम है कि बौद्धिकता और भक्ति में अंतर होता है. इसलिए हम सकतें हैं कि यह उनकी बौद्धिकता की सीमा है.

IIT कानपुर के वेबसाईट [5] पर पहले से ही यह सर्कुलर मौजूद है. इसलिए कहा जा सकता है कि वहाँ यह नियम पहले से ही लागू है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ने अपने 05 अक्टूबर 2018 के अकादमिक कौंसिल के मीटिंग में UGC के 01 मई 2018 के उस सर्कुलर को पारित कर दिया था जिसमें कहा गया कि “the University should follow the Govt of India rules/orders as applicable to Central Government civilian employees” अर्थात “यूनिवर्सिटी के (शिक्षकों) के  वही होगी जो केंद्रीय नागरिक सेवा (आचरण) नियम है”. इसे साधारण शब्दों में केंद्रीय सेवा नियम/ शर्त (Central Service Rules/ CCS) कहतें हैं.

इस लागु करने पर जवाहरलाल नेहरू  शिक्षक संघ (JNUTA) और जवाहरलाल नेहरू छात्र संघ (JNUSU) ने इसकी आलोचना की थी और अभी भी विरोध कर रहें हैं. JNUSU ने 31 जुलाई 2018 को JNU VC के खिलाफ  हड़ताल में शामिल 48 शिक्षकों को CCS के तहद नोटिश थामने पर अपना विरोध जताया है. उसने इसे अलोकतांत्रिक और संविधान विरोधी बताया है.

यूनिवर्सिटी की कल्पना उन्मुक्त विचार की प्रवाह के रूप में  जाती है. जहाँ विभिन्न विचारधारायों का पल्ल्वन, टकराव, संघर्ष, एवं प्रसार होता है. यह विचारधरा समाज के जरूरतों के अनुसार विकसित होता है, यह समाज का दर्शन भी होता है और समाज को एक नई दर्शन भी देता है. लेकिन जब विचारो पर सरकार का पहरा हो और सरकार का समर्थन करने को बाध्य हो तो हम कह सकतें हैं कि उन परिस्थितियों में यूनिवर्सिटी अपना वजूद खो देगा।

सन्दर्भ:

[1] ट्विटर https://twitter.com/skunjus/status/1053274985731506176
[2] Economic and Political Weekly, Vol. 51, Issue No. 14, 02.04.2016,  https://www.epw.in/node/146821/pdf and https://www.epw.in/journal/2016/14/web-exclusives/unprecedented-anti-intellectualism.html , लिंक विजिट 20/10/2018).
[3]  देखें टाइम्स ऑफ़ इंडिया https://timesofindia.indiatimes.com/india/This-is-most-anti-intellectual-government-we-have-ever-had-Guha/articleshow/50060328.cms )
[4] देखें आउटलुक https://www.outlookindia.com/newswire/story/bjp-the-most-anti-intellectual-party-ramchandra-guha/933618 , लिंक विजिट 20/10/2018)
[5] https://www.iitk.ac.in/wc/data/CCS_CONDUCT_RULES.pdf
[6] https://dopt.gov.in/ccs-conduct-rules-1964 , और https://dopt.gov.in/download/acts