आज दिनांक 24 अक्टूबर 2018 को महर्षि वाल्मीकि जयंती है.

महर्षि वाल्मीकि जिन्हें कई जगह भगवान वाल्मीकि भी कहा जाता है, के जन्मदिन के अवसर पर, हर साल लगभग पुरे भारत में शोभा यात्रा निकाल कर जन्मदिन मनाई जाती है.

महर्षि वाल्मीकि रामायण के रचियता हैं. इन्होने श्री राम का चित्रण किया,सीता का चरित्र हमारे समक्ष रखा. रामायण जो शायद हर हिन्दू मंदिर में पाई जाती है, और कई जगह तो लोगो के घरों तक मे यह धार्मिक स्थली पर ही वास करती है।

सन 1947 के आज़ादी के बाद हमें हर त्यौहार पर्व मनाने की आज़ादी है, वैसे भी विभिन्न कलाकृति से लिप्त हमारा देश आज भी ढेर सारे पर्व त्यौहार बड़े ही उत्साह व हर्ष से मनाता है. यह बड़ी ही विचित्र सी बात है कि हर त्योहार को मनाने के पीछे कोई न कोई कथा छुपी होती है. जितनी बढ़िया कथा उतना भी बढ़िया और उल्लासपूर्ण त्यौहार।

दीवाली आने वाली है, दीवाली पर श्री राम के घर आगमन पर ढेर सारा भारतवर्ष हर्षोउल्लास से दीपोउत्सव मनाता है, पर जब बात श्रीराम के रचयिता की की जाए तो हम कुछ औऱ ही पाते हैं।

आखिर क्या वजह है कि आजादी के इतने सालों बाद भी आज भी वाल्मीकि समाज से लोग भेद-भाव, पक्षपात, और घृणा करते हैं? लोग उनसे कटे-छंटे रहते हैं. यह उस समाज के साथ है जिसके पूर्वज महर्षि वाल्मीकि ने रामायण लिखें थें. लोग उसके लिखे रामायण और राम को तो पूजतें हैं लेकिन उसे समाज के साथ भेद-भाव करतें हैं, जिसने इसे लिखा.

कई सालों से देख रहीं हूँ कि वाल्मीकि समाज के लोग बेहद ही खूबसूरत झांकी के साथ वाल्मीकि जयंती मनातें हैं. लेकिन वाल्मीकि समाज और वाल्मीकि जयंती में लोगो का व्यवहार वैसा ही नहीं होता जैसा कि बाकि के जयंतियों में होता है.

अम्बेडकर जयंती, गणेश जयंती, बालाजी जयंती आदि … लगभग सभी जयंतीयों पर लोग दौड़-दौड़ कर प्रसाद ग्रहण करने को आगे आगे आते हैं.

किंतु क्या वजह है कि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर, जयंती स्थल और झांकी/ शोभा यात्रा  में शामिल बच्चा-बच्चा घर के बाहर खड़े लोगो को बेहद इज़्ज़त से प्रसाद देता है, पर तब भी कोई प्रसाद लेने को तैयार ही नहीं होता!

यह दृश्य मैंने अपनी आँखों से देखा है. यह सब देखकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मुझसे रहा नहीं गया. और मैं खुद आगे आकर उनसे प्रसाद ग्रहण किया।

पहली बार मुझे इसका एहसास चार साल पहले हुई थी, जिसने मुझे बुहत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था. सालों-साल यही हाल देखती आयी हूँ। इस साल भी ऐसा ही होगा.

उस घटना के एहसास के बाद से मैं वाल्मीकि समाज के लिए चिंतन भी करती रही हूँ. साथ ही खुद से एक सवाल भी की, कि क्या आज भी देश में जाति व्यवस्था का वही ढर्रे नहीं है जो सदियों पहले थी.

अपने शोध के समय मैनें पाया कि कई वाल्मीकि साथी को सिर्फ उनकी जाति के कारण ही  उसे पीएचडी करने के अयोग्य करार दिया गया. या फिर पीएचडी करने के लिए उसे कोई गाइड ही नहीं मिला अर्थात, कोई शिक्षक उसका पीएचडी गाइड बनने के लिए ही तैयार नहीं हुआ. और इनमें वे शिक्षक भी शामिल थें, जिनके चैम्बर तक मे रामायण रखी रहती थी, जो भगवान श्रीराम का नाम लेते न थकते थे.

आज भी यदि आकंड़ा उठा कर देखे की वाल्मीकि समाज से कितने लोग पीएचडी शोध कर रहें हैं तो हमारे सामने बेहद ही चौकाने वाले तथ्य सामने आयेंगे।

एक तरफ पवित्र ग्रन्थ लिखने वाले महर्षि वाल्मीकि जो वाल्मीकि समाज/ जाति से थें तो दूसरी तरफ आखिर क्या वजह है कि यह मिहनती कौम सीवर में मृत पाती जाती है?

आखिर कब तक इनके साथ इसतरह के भेदभाव होता रहेगा?

इनके साथ औऱ कितना तिरस्कार होगा? और कितना अपमान होगा?

गाली तक के रूप में इनकी ही जात को निशाना बनाया जाता है।  

कोई यदि कोई रंग से काला और इसतरह तथाकथित कुरूप  लग रहा है या कपड़े सलीके से न पहने तो हमारे ही समाज के कई गणमान्य लोग कहतें हैं कि “भंगी सा लग रहा” या “भंगन सी लग रही है”.

यह सिर्फ उस समाज की बेइज्जती नहीं है बल्कि उन्हें इंसान ही नहीं समझने का प्रतिक है.

इन्हीं कई सवालो से आज घिरी हुई हूँ।

हम आकाश में उड़ जाते हैं, दूसरे ग्रह की कल्पना करते हैं, चाँद पर कदम रख चुके हैं पर आज भी मैला ढोने वालो का दर्द समझ ही नही पा रहे हैं।

कबीर कहते हैं कि सभी का खून लाल है, यह बात मेडिकल साइंस ने भी मानती है, तो फिर ऐसा पक्षपात क्यों?

क्या यह उनकी कौम का अपमान है या जो वह काम करते हैं उनके श्रम का अपमान?

समाज के कड़वी सच्चाई ढेर सवाल हमारे सामने रखती है, हमनें से कुछ सब कुछ जानते हुए भी अपनी आंखें बंद ही करे रहते हैं.

तो मेरा सवाल है कि आखिर वाल्मीकि/ वाल्मीकि समाज के इतना बैर, इतना छुआ-छूत क्यों?

ओम प्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा जूठन में जो अपनी पीड़ा लिखते हैं वह सोचनीय है. आज भी बहुत ही कठिन संघर्ष के बाद यदि वाल्मीकि समाज से कोई अपनी पीड़ा का एक लेख भी यदि लिखता है तो उसे भी ठीक से समाज के सामने लाया ही नहीं जाता है. आखिर क्या वजह है कि एक खास तमगे का पाठक ही इनके लेख पढ़ता है, व रुचि रखता है?

यह समाज हाशिये से भी परे हाशिये पर है. जाति व्यवस्था से निकल पाना इतना आसान नहीं है, जाति यदि खत्म हो गई तो शायद इस देश से लोगों की जात के नाम पर राजनीति भी खत्म हो जाएगी।

किंतु मेरा सवाल है कि कब इन्हें इंसान माना जायेगा?

भाषा सिंह अपनी किताब अदृश्य भारत में वाल्मीकि स्त्रियों की भी बात करते हैं।

वाल्मीकि समुदाय उन कुछ समुदायों में से है जहाँ स्त्रियां पुरुषों के बराबर या शायद उनसे भी ज़्यादा कार्य कर अपने घर-परिवार चलाने में सहयोग करती है.

प्रसिद्द ब्रिटिश कवि अल्फ्रेड लार्ड टेन्नीसन (Alfred Lord Tennyson, 1809-1892) [1] ने महिलाओं को दोयम दर्जे का मिहनत के लिए उपयुक्त न होने की बात कही थी, यह उस समाज की वतर्मान दर्शन भी था [2]. उनकी प्रसिद्द कविता है – द प्रिंसेस (The Princess) [3]. उस कविता की पंक्ति है –

“Man for the field, woman for the hearth;
man for the sword, and for the needle she;
man with the head, and woman with the heart;
man to command, and woman to obey;
all else confusion.”

लेकिन वाल्मीकि महिलायों पुरुषो के बराबर काम करते हुए उस ब्रिटिश कवी और भातीय मानसिकता को झुठलाती है.

पर अफसोस की बात है कि स्त्रीवादी चिंतकों का, जो स्त्री को बराबरी का हिस्सेदारी की बात करते हैं,वो भी बहुत ही कम इस ओर ध्यान दिए कि कौन सा समाज आर्थिक रूप से मजबूत न होकर भी अपनी स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देता है।

ढेरो सवालो के बीच भी मैं आज भी वाल्मीकि जयंती के हिस्सा होने/ बनने जा रही हूँ इसी उम्मीद के साथ कि कभी तो इस मेहनती कौम का इनके हिस्से का हक़/ इज़्ज़त और मानवीय पहचान मिलेगी.

जय वाल्मीकि, जय भंगी।

सन्दर्भ
[1] https://en.wikipedia.org/wiki/The_Princess_(Tennyson_poem)
[2] https://19thcenturywomen.weebly.com/place-in-society.html
[3] http://www.everypoet.com/archive/poetry/Tennyson/tennyson_contents_the_princess_5.htm

नोट: लेखिका राम या रामायण को प्रमोट नहीं करती है. लेकिन लेख में राम रामायण और उसके पत्रों को भी महत्व यह दर्शाने और साबित करने के लिए दिया गया है कि जो लोग राम को रामायण को पवित्र धार्मिक ग्रन्थ, राम भगवान, और महर्षि वाल्मीकि को रामायण के रचयिता मानते हैं वे कैसे उस समुदाय से भेद-भाव करतें हैं. यह भेद-भाव यहाँ तक है कि वाल्मीकि समाज को मानव ही नहीं माना जाता है.