लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पारदर्शी होना, लोकतंत्र के लिए आवश्यक शर्त है, EVM मुद्दे पर प्रो. विवेक कुमार, JNU

अनिल कुमार

देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम/ EVM) को लेकर अब एक नए स्तर की बहस की शुरुआत हुई है. न्याय भूमि और दलित दस्तक द्वारा 3 ऑक्टूबर 2018 को कंस्टीटूशन क्लब, नई दिल्ली में “मतदान के लिए EVM कितना लोकतान्त्रिक – कितना पारदर्शी” विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया. अपने तरह का यह पहला आयोजन होने का दावा किया गया जबकि वामन मेश्राम के नेतृत्व में “बहुजन क्रांति मोर्चा” “EVM हटाओ, बैलेट पेपर लाओ: लोकतंत्र, संविधान और देश बचाओ” सेमिनार का आयोजन पुरे देश में किया जा रहा है, जिसमें बुद्धिजीवी और नेता अपनी बात रख रहें हैं.

सेमिनार का विषय वस्तु ईवीएम हैक हो सकता है या नहीं से परे था. मूल विषय था कि चुनावी प्रक्रिया में ईवीएम का प्रयोग कितना लोकतान्त्रिक और कितना पारदर्शी है. 1945 से 1950 के बीच जितने भी देश गणतंत्र हुए उसमें से भारत को छोड़कर कहीं भी लोकतंत्र सतत कायम नहीं रह सका. हमने स्वतंत्र की जगह गणतंत्र शब्द का प्रयोग जानबूझकर किया है क्योंकि कुछ देश कुछ शर्तो के साथ स्वतंत्र हुए और वे गणतंत्र की श्रेणी में नहीं आतें हैं. लेकिन यह यहाँ मौलिक मुद्दा नहीं है.

इस विषय पर समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार के साथ-साथ, उर्मिलेश, दिलीप मंडल, कुर्बान अली, हरभजन सिंह सिद्धू, सुशुल स्वतंत्र आदि ने भी अपनी बात रखी.

सभी वक्ताओं ने ईवीएम का विरोध यह कहकर किया कि चूँकि विकसित देशो में यह प्रचलन में नहीं है इसलिए भारत में इसका प्रचलन प्रश्न खड़ा करता है. साथ ही यह तर्क भी दिया गया कि चूँकि ईवीएम में इस्तेमाल होने वाला चिप भारत में नहीं बनता है, इसलिए वे इसका विरोध करतें हैं. मैं समझता हूँ कि दोनों वैध तर्क नहीं हो सकता है. दिलीप मंडल ने कहा कि विश्व के सिर्फ चार देशों में ही ईवीएम का प्रयोग होता है और इन चारो देशो में लोकतंत्र ठीक से नहीं चल रहा है. ये चार देश हैं – ब्राजील, वेनुजुएला, भूटान और भारत हैं, इसलिए भी वे ईवीएम का विरोध करतें हैं.

कुर्बान अली और उर्मिलेश ने जोर दिया कि ईवीएम पर सबसे पहला सवाल भाजपा के नेता जी. वी. एल. नरसिंहा राव ने अपनी किताब “Democracy at Risy! Can we Truct Our Electronoc Voting Machines? (2010)” में उठाया था जिसकी भूमिका भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी ने लिखी थी. उर्मिलेश के दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट भी मानता है कि ईवीएम हैक हो सकता है. मेरी जानकारी में उनका यह दावा तह्यात्मक रूप से गलत है. यह सही है कि भाजपा के ही सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गएँ थें और सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को पारदर्शी बनाने के लिए वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल मशीन (वीवीपीटी मशीन) लगाने की बात कही थी इसे वेरिफिएबल पेपर रिकॉर्ड मशीन (वीपीआर मशीन) भी कहतें हैं. इस मशीन में वोट देने के बाद एक पर्ची निकलती है कि आपने किसको वोट दिया, जो स्वतः एक दूसरे डब्बे में चली जाती है।

भारत में सभा, सेमिनार, गोष्ठी में यह सामान्य बात है कि लोग तैयारी के साथ नहीं आतें हैं इसलिए वे विषय पर केंद्रित होकर नहीं बोल पातें हैं. विषय को केंद्र में रखकर सिर्फ प्रो. विवेक कुमार ने अपनी बात रखी.

प्रो. विवेक कुमार ने लोकतंत के मूलभूत प्रश्न को उठाया। किसी भी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र से कोई एक व्यक्ति ही चुनाव जीतेगा. लेकिन चुनाव में हारने वाला को भी यह यकीन होना चाहिए कि चुनाव में उसे विजयी होने लायक जनसमर्थन नहीं मिला है. मतदाता को भी विश्वास होना चाहिए कि उसने जिस उम्मीदवार को समर्थन किया था, उसे अधिकतर लोगो ने समर्थन नहीं किया है. चुनावी प्रक्रिया का लोकतांत्रिकरण और  पारदर्शिता होना ही इस व्यवस्था में लोगो का विश्वास बनाये रखता है. चुनावी प्रक्रिया में विश्वास लोकतंत्र का बुनियाद है. यह किसी भी हालत में डगमगाना नहीं चाहिए. चुनावी अल्पमत के भी मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना उसकी रक्षा करना और विश्वास होना कि इसे बहुमत के द्वारा भी नहीं छिना जा सकता है लोकतंत्र की सफलता के लिए यह दूसरी शर्त है.

प्रो. विवेक कुमार ने ईवीएम के कार्यप्रणाली के आधार पर चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता का सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुसार भारतीय चुनाव आयोग का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह चुनावी प्रक्रिया के पारदर्शिता को सुनिश्चित करे. अगर यह मान भी लिया जाए कि इसे हैक नहीं किया जा सकता है तब भी यह सवाल है कि ईवीएम अपना काम कैसे करता है?

ईवीएम मशीन अपने आप काम नहीं करता है. हर इलेक्ट्रॉनिक मशीन अपने सॉफ्टवेयर के कोडिंग के अनुसार काम करता है. इसी कोडिंग के अनुसार मशीन प्रतिक्रिया देता है. छापे हुए मतपत्र में उम्मीदवार और मतदाता को साफ़-साफ़ दिखता है कि कहाँ क्या छपा है और उसकी गणना कैसे की जानी है. उन्होंने सवाल किया कि क्या कोडिंग के समय उम्मीदवार या उसका प्रतिनिधि मौजूद होता है? अगर उनके इस दलील में आगे यह जोड़ दिया जाए कि अगर उम्मीदवार या उसका प्रतिनिधि वहां उपस्थित भी रहे तो क्या तब भी वह सॉफ्टवेयर कोडिंग को समझ सकता है? इसका जबाब होना नहीं समझ सकता है, क्योंकि सॉफ्टवेयर कोडिंग की समझ होना एक प्रोफेशनल स्किल है.

वहीँ दूसरी ओर जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुसार अगर मतगणना में कोई गड़बड़ी की शिकायत हो तो दुबारा मतगणना का भी प्रावधान है. दुबारा मतगणना का प्रावधान इसलिए है कि लोकतंत्र में विश्वास बनी रहे. जबकि मशीन में यह संभव नहीं है. पिछले चुनावो में शिकायत मिलाने के बाद भी चुनाव आयोग ने दुबारा मतगणना नहीं किया है.

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वीवीपीटी मशीन तो खरीद लिए हैं, लेकिन अभी तक चुनाव आयोग ने किसी भी विवाद में ईवीएम के परिणामो को वीवीपीटी मशीन से निकले प्रिंट से मिलान नहीं किया है. इससे संदेह बढ़ जाता है साथ ही पारदर्शिता और भरोसा टूट जाता है.

प्रो. विवेक कुमार को इलाहबाद की अपूर्वा वर्मा के अनुभवों से भी बल मिला. उन्होंने अपना अनुभव को साझा करते हुए कहा कि उनके बूथ पर उन्होंने अपना मत दिया था उनके परिवार वालो ने मत दिया था, लेकिन वोट शून्य दर्ज हुआ. वे कोर्ट गई लेकिन चुनाव आयोग और अदालत ने उनकी एक नहीं सुनी. न ईवीएम की जांच की गई और न वीवीपीटी मशीन से निकले प्रिंट से उसका मिलान किया गया. जबकि यह सवाल अहम् था कि किसी उम्मीदवार को शून्य वोट कैसे आ सकतें हैं? और इसका मिलान वीवीपीटी से मिलान क्यों नहीं किया गया.

ईवीएम से वोटिंग न कोलतांत्रिक रही और न पारदर्शी इसलिए समाज के कुछ लोगो का इससे भरोषा उठ गया है. सवाल यह नहीं है कि उसे हैक किया जा सकता है या नहीं। मूल सवाल लोकतंत्र में विश्वास बनाये रखने का है. प्रो. विवेक कुमार ईवीएम के हैक होने या न होने से परे इसी विश्वास और भरोसे का सवाल उठा रहें हैं. मतदान स्थल और मतगणना स्थल पर उम्मीदवारों के प्रतिनिधि सिर्फ इसीलिए मौजूद होतें हैं कि चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं रखा जाए और ऐसा होता हुआ भी दिखे, ताकि लोकतंत्र में लोगो का भरोसा बना रहे. यह पारदर्शिता ईवीएम में नहीं दिखता है, इसलिए कुछ लोगो का इसपर से भरोसा टूट गया है. यह सवाल ईवीएम के हैक होने न होने से परे, पारदर्शिता, भरोसे और विश्वास का है. मतदान और मतगणना प्रक्रिया में देश के सभी तबके का विश्वास बना रहें इसके लिए देश को गंभीरता पूर्वक सोचना पड़ेगा.