आज 19/10/2018 को पूरे भारत में अशोक विजयादशमी मनाई गई. अशोक विजयादशमी मनाने का प्रमुख कारण यह है कि आज के ही दिन सम्राट अशोक कलिंग युद्ध पर विजय प्राप्त करने के बाद खून-खराबा से विरक्त होकर धम्म की दीक्षा ली थी और बौद्ध धर्म अपना लिया था.

इस अवसर पर प्रशिद्ध भाषा वैज्ञानिक प्रो. राजेंद्र प्रसाद सिंह कहतें हैं –
जो जीता वह सिकंदर है!
जो सिकंदर को जिताया वह सिल्यूकस है!!
जो सिल्यूकस को भी जीता वह मौर्य है!!!
और जो मौर्य को भी जीता वह धम्म है!!!!
बधाई धम्म विजय दिवस!!!!!

वे आगे लिखतें हैं, अशोक का कलिंग विजय इतिहास है, लेकिन कलिंग – विजय के मौके पर अशोक के मन में उठे भावों का तूफान साहित्य है. तूफान का यह इलाका इतिहास का नहीं बल्कि साहित्य का है, जहाँ इतिहास अपनी सीमा को गवाँ बैठता है।

सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध में विजयी होने से दस दिन तक मनाये जाने के कारण इसे अशोक विजयादशमी कहते हैं। यहाँ यह ध्यान योग्य यह है कि इसे कलिंग विजय या युद्ध विजयी नहीं कहतें हैं, बल्कि इसे अशोक विजयादशमी कहतें हैं. सम्राट अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त की थी लेकिन उस युद्ध के विनाश को देख कर उनके दिल को बहुत पीड़ा हुआ था. इसी कारण उसने आज के दिन ही बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। और दीक्षा लेकर सम्राट अशोक ने अपने ऊपर विजयी प्राप्त की थी. इसीलिए विजय दशमी बौद्धों का पवित्र और प्रसिद्ध त्यौहार है। यह किसी और पर नहीं बल्कि खुद पर विजयी प्राप्त करना था. 

बौद्ध दीक्षा लेकर उसने घोषणा की थी कि “आज के बाद मैं कभी हथियार से विजय नहीं करूँगा , मैं हथियार को त्यागता हूँ, आज के बाद केवल धम्म विजय करूँगा”। इस तरह उसने अपने ऊपर भी विजयी प्राप्त किया और इसे अशोक विजयादशमी के रूप में जाना जाने लगा.

इसके बाद इस दिन को भारत में ही नहीं बल्कि अन्य बौद्ध राष्ट्रों में भी परस्पर मैत्री और मातृ भाव विकसित करने के लिए इसे त्यौहार के रूप में मनाया जाना लगा. सम्राट अशोक ने धम्म विजय को ही सबसे बड़ी विजय कहा। इस दिन सम्राट ने धम्म विजय का संकल्प लिया। इसी सिलसिले में उसने बौद्ध स्थलों की यात्राओं पर गए। तथागत गौतम बुद्ध के जीवन को चरितार्थ करने तथा अपने जीवन को कृतार्थ करने के निमित्त हजारों स्तूपों शिलालेखों व धम्म स्तम्भों का निर्माण कराया।

सम्राट अशोक के इस धार्मिक परिवर्तन से खुश होकर देश की जनता ने उन सभी स्मारकों को सजाया संवारा तथा उस पर दीपोत्सव किया। दिवाली मनाने की ऐतिहासिकता भी सम्राट अशोक से जुडी हुई है.

यह आयोजन हर्षोलास के साथ 10 दिनों तक चलता रहा, दसवें दिन महाराजा ने राजपरिवार के साथ पूज्य भंते मोग्गिलिपुत्त तिष्य से धम्म दीक्षा ग्रहण की थी. धम्म दीक्षा के उपरांत महाराजा ने प्रतिज्ञा की, कि आज के बाद मैं शास्त्रों से नहीं बल्कि शांति और अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त करूँगा। इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजय दशमी के रूप में मनाता है।

समाज में आज के दिन को “विजय दशमी” के रूप में भी जाना जाता है लेकिन इसका सही नाम “अशोक विजयदशमी” है। जैसा कि पहले ही कहा जा चूका है कि सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध में विजयी होने के दसवें दिन तक मनाये जाने के कारण इसे अशोक विजयदशमी कहते हैं। इसी दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी।

लेकिन ब्राह्मणो ने इसे काल्पनिक राम की रावण पर विजय बता कर हमारे इस महत्त्वपूर्ण त्यौहार के साथ-साथ हमारे जनमानस के दिमाग पर भी कब्ज़ा कर इसे विकृत कर दिया है.

जहां तक दशहरे का सवाल है तो इससे जुड़ा तथ्य दूसरा है –

चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य तक कुल दस सम्राट हुए। अंतिम सम्राट बृहद्रथ मौर्य की उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने हत्या कर दी और “शुंग वंश” की स्थापना की। पुष्यमित्र शुंग को ब्राह्मण माना जाता है. इस समाज ने इस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया। जिस दिन बृहद्रथ मौर्य की हत्या पुष्यमित्र शुंग ने की थी उस दिन वह अशोक विजयदशमी का ही दिन था। और उनलोगो ने “अशोक” शब्द को हटा दिया और जश्न मनाया। इस जश्न में मौर्य वंश के 10 सम्राटों के अलग-अलग पुतले न बनाकर एक ही पुतला बनाया और उसके 10 सर बना दिए और उसका दहन किया। 2500 साल के सम्राट अशोक के विरासत से जोड़ते हुए 14 अक्टूबर1956 को अशोक विजयदशमी के दिन ही बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी।

सम्राट अशोक की धम्मविजय मैत्री का उत्सव है – 

इस दिन सब लोग नए काम की शुरुआत करते थे। इस दिन राजा और प्रजा अपने अस्त्र-शस्त्र की मरम्मत साफ-सफाई करते थे. आवस्यकता अनुसार इसे सुसज्जित और सुरक्षित रखते थे।

इस दिन धम्म देसना के बाद सभी राजा और प्रजा धम्म विजय पर जाते थे। इस दिन सभी लोग अपने पिछले लड़ाई-झगड़े वैर-भाव भूल कर गले मिलते थे और एक दूसरे को उपहार देते थे। एक दूसरे को खाने की वस्तियों का का दान करतें थें. प्रतीकात्मक रूप में गहरी मैत्री भाव के लिए कचनार की पत्ती देने का भी प्रचलन में था. इसकी पत्ती जुडी होती है जो  कि दोस्ती जुडी रहे. कहैं कहीं कचनार को सोना जाता था. पहले ये पर्व इसी रूप में मनाया जाता था आज भी दूर दराज के गावों में ये पर्व इसी रूप में मनाया जाता है।

इस अवसर पर विचारवान राजनीतिक व्यक्ति, सम्यक दल के सस्थापक और अध्यक्ष, सम्यक सेवा दल के  संस्थापक एवं अध्यक्ष तपेंद्र शाक्य ने एक कविता लिखी है –

धम्म विजय दशमी पर सभी को शुभकामनाओं के साथ  प्रस्तुत है आदरणीय
तपेंद्र शाक्य की एक लघु रचना:-

पुकारती है फिर ,शिला अशोक की,
जय हो,जय हो,जय हो धम्म घोष की।
इस धरा पे , हर मनुज समान हो,
सब सुखी हों, हर किसी का मान हो।
भिन्न भिन्न मत यहाँ, धर्म औ विचार हैं,
बंधुता औ प्रेम से रहें, ये धम्म-सार है।
हर शिला में गूंज है, इस महासंदेश की।
जय हो, जय हो , जय हो, धम्मघोष की,
पुकारती है फिर शिला अशोक की।
बुध्द ने जो भी कहा, सुखद कहा,
लोकहित से बढ़ के ,बात है कहाँ।
कर्म जो करें, हो मंगलाचरण,
शील औ समाधि, राष्ट्र का चलन।
ये हैं अपनी मंजिलें,इस महान देश की।
जय हो, जय हो,जय हो धम्मघोष की,
पुकारती है फिर, शिला अशोक की।
क्रूरता,विनाश, द्वेष छोड़ दो,
राजनीति प्राणिहित से जोड़ दो।
पंचशील से बना, सुराज हो
बुध्द, धम्म, संघ का ही राग हो,
चल पड़ो कि ,फिर अशोकराज हो।
विश्व वंदनीय हो, फिर धरा स्वदेश की।
जय हो , जय हो, जय हो धम्मधोष की,
पुकारती है फिर, शिला अशोक की।
धम्म राज की स्थापना विचार को कर्म में बदलने से होगा।

धम्म यानी सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक मानवीय मूल्यों: करुणा, मैत्री, समता, सर्वमंगल, लोकहित और प्राणिमात्र के कल्याण पर आधारित मानवीय सम्बन्धों की निरंतर रचना और अभ्यास एवं इन मूल्यों पर आधारित सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना हेतु सतत संघर्ष और पराक्रम।

इसके लिए किसी की बुराई या आलोचना की नहीं, निर्माण और क्रिया की आवश्यकता है। महान अशोक की इस शिक्षा का ध्यान रखना होगा कि जो दूसरे पाषंड यानी सम्प्रदाय की निंदा करता है ,अपने सम्प्रदाय की क्षति की क्षति पहुंचाता है।

आइये, अशोक धम्म विजय दशमी के महान राष्ट्रीय एवं वैश्विक पर्व पर मानवता और राष्ट्र निर्माण का संकल्प लें और प्रतिबद्धता और पराक्रम से उस दिशा में साधनारत हों।

साभार – https://www.facebook.com/tshakya1/posts/2403110559729495 , 19 10 2018

सम्यक पार्टी ने धम्म विजयी दशमी के महान राष्ट्रीय पर्व पर शुभकामनाएं दी है. सम्यक  पार्टी ने श्रावस्ती में अशोक धम्म विजय दशमी महोत्सव दिनांक 17 से 19 अक्टूबर 2018 तक मनाई। इस महोत्सव में श्रावस्ती, बहराइच, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोण्डा और बलरामपुर के बौद्ध अनुयायी उत्साह और उल्लास से भाग लेते हैं।