दिल्ली यूनिवर्सिटी के क्रांतिकारी छात्र संगठन “भगत सिंह छात्र एकता मंच” की अध्यक्ष राजवीर कौर 26 नवंबर 2018 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर है. राजवीर कौर दिल्ली यूनिवर्सिटी के पंजाबी विभाग में M.Phil. की छात्र है. उनका भूख हड़ताल, पंजाबी विभाग के अलोकतांत्रिक रवैये के खिलाफ है.

भगत सिंह छात्र एकता मंच अपने उन लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लड़ रहा है जिसे संविधान द्वारा नागरिको को दिया गया है. यह अधिकार दिल्ली यूनिवर्सिटी में गैर-नागरिको को भी है. पंजाबी विभाग अपने छात्रों के अभिव्यक्ति के अधिकार पर हमला कर रहा है. यूनिवर्सिटी के मूल उद्देश्यों में में बहस और विचारो का प्रवाह है लेकिन पंजाबी विभाग सूचनापट पर दिवार पत्रिका या कोई भी साहित्य सम्बन्धी कार्य नहीं करने दे रहा है. ऐसा करने वालो को विभाग निशाना बनाकर उसे उत्पीड़ित कर रही है. उनका औपचारिक शैक्षणिक भविष्य बर्बाद किया जा रहा है.

यह सब देश के केंद्र में सत्तासीन दल और विचारधारा के निर्देश में किया जा रहा है. जिसे आज के हर उस व्यक्ति से खतरा है जो प्रगतिशील है, जो लिखता-बोलता है, और एक बेहतर समाज का सपना रखता है. इस सरकार में लेखकों, शिक्षकों, पत्रकारों और स्टूडेंट्स को निशाना बनाया जा रहा है. और यह पुरे देश में हो रहा है. देश गौरी लंकेश, डाभोल, प्रोफेसर गुरु, प्रो. जी. एन. साईबाबा, कांचा इलैया, फॉरवर्ड प्रेस आदि पर हमले और हत्या को भुला नहीं है, लेकिन यह लिस्ट काफी लम्बी है और अलगतार लम्बी हितो जा रही है.

पाश और भगत सिंह को किसी भाषा और भौगोलिक क्षेत्र में नहीं बाँटा जा सकता है. उन्होंने जो कुछ किया और लिखा वह पुरे मानवता के लिए है. दोनों को पूरी दुनियाँ पढ़ती है और उनसे प्रेरणा लेती है.

लेकिन फिर भी पाश और भगत सिंह दोनों पंजाब से हैं और उन्होंने पंजाबी भाषा में लिखा है. इसलिए जब भी पंजाबी भाषा की बात होगी दोनों का नाम लिया जाएगा. इन दोनों की रचनाएँ दूसरे भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है और उसकी पढाई होती है. ऐसे में पंजाबी विभाग में इनकी रचनाये लगाना और चर्चा करने से किसी को ऐतराज है तो यह गंभीर मामला है.

इसकी गंभीरता को समझने के लिए हमें पाशा और भगत सिंह के विचारधारा को समझना होगा. दोनों की विचारधारा एक प्रगतिशील समाज की कल्पना करता है. लेकिन आज जो हुक्मरान बैठा है वह फांसीवादी, सांप्रदायिक, जातिवादी और धार्मिक उन्माद फैलाने वाला है. ऐसे में उन्हने पंजाबी विभाग तो चाहिए लेकिन उसमें पाशा नहीं चाहिए, भगत सिंह की पंजाबियत नहीं चाहिए.

विश्व हिन्दू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भारतीय जनता पार्टी के रूप में चल रही सरकार पुरे देश में प्रगतिशील संगठनो और व्यक्तियों को निशाना बना रही है. लेकिन कुछ लोग मुखर होकर सामने आतें हैं तो कुछ की आवाजे दब जाती हैं या वे चुप रहतें हैं. लेकिन भगत सिंह छात्र एकता मंच और राजवीर कौर ने हिम्मत दिखाई है.

यही कारण है कि राजवीर कौर को व्यक्तिगत तौर पर भी परेशान किया जा रहा है. पाश, भगत सिंह के विचारो के प्रसार करने के लिए पर्चे बांटने के “जुर्म” में उन्हें जानबूझकर फेल कर दिया गया, जबकि वे एक बहुत अच्छी स्टूडेंट है. किसी की राजनीतिक समझ और कार्यो से हर कोई सहमत हो यह कोई जरुरी नहीं है. यही बात राजवीर कौर पर भी लागु होती है. किसी का राजवीर कौर या भगार सिंह छात्र एकता मंच से राजातिनिक रूप से असहमत होने का अधिकार है. लेकिन इसका जबाब बहस और तर्क से देना चाहिए. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि व्यक्तिगत निशाना बनाकर संगठन के बाकि लोगो को एक संदेस दिया। आज भाजपा सत्ता में है और भगत सिंह उसके छात्र इकाई अखिल भारतीय छात्र परिषद् (अभाविप/ ABVP) के आइकॉन हैं. क्योकि उनको भगत सिंह के फोटो से प्यार है उनके विचारो से नहीं.

देश में आवाज उठाने वालो को फेल करना कोई नई बात नहीं है. ऐसी ही मामला वर्धमान महावीर हॉस्पिटल और मेडिकल कॉलेज में भी आया था, जहाँ 25 स्टूडेंट्स फेल कर दिए गए थे. लेकिन बाद में सभी अच्छे नंबर से उत्तीर्ण हुए. यह कमिटी थोराट कमिटी के नाम से चर्चित हुई. पटना के एक मेडिकल छात्र बाद में टॉपर निकला.

संदर्भित आपबीती –
वर्धा के राजीव सुमन ने भी छात्र के रूप में VC के खिलाफ संघर्ष किया था जिसका परिणाम यह हुआ कि आज में कोर्ट का चक्कर काट रहें हैं और उनकी PhD लगभग 10 सालो से रुकी हुई है. उनकी आप बीती यहाँ पढ़ें – http://www.thenationalpress.in/2018/10/an-appeal-by-a-research-scholar-who-is-victim-of-an-institutional-conspiracy/

संदर्भित आपबीती –
दिल्ली यूनिवर्सिटी के कानून के स्टूडेंट उज्जवल और रवि को भी राजनीतिक विचारधारा के कारन इसी तरह परेशान किया गया था और उन्हें परीक्षा नहीं देने दिया गया था. उनकी छोटी से इंटरव्यू यहाँ देखें। https://www.youtube.com/watch?v=ORQEOvsbopE

भगत सिंह छात्र एकता मंच ने यह भी आरोप लगाया है कि वे लड़कियों के व्यक्तिगत मामलों पर टिपण्णी करती है. वे कहती है कि M.Phil./ Ph.D. करने से क्या फायदा है? दूसरी ओर (लड़कियों की) उम्र 21-25 वर्ष हो गई है शादी कब करोगी? वे यह टिपण्णी विशेष रूप से उन लड़कियों के लिए करती हैं जो ग्रामील और शोषित वंचित समाज से आती है. इसलिए भगत सिंह छात्र एकता मंचा का मनना है कि पंजाबी विभाग की विभागाध्यक्ष (HOD) महिला विरोधी, वंचित समाज के विरोधी, अभिवयक्ति की आजादी के विरोधी है इसलिए उन्हें डिपार्टमेंट के पद से हटाया जाए. उनके नेतृत्व में विभाग तरक्की नहीं कर सकता है.

भूख हड़तान पंजाबी भाषा के सम्मान और अंग्रेजी के अनावश्यक वर्चस्व के भी खिलाफ है. सभी भाषाओं के विभागों के साइन बोर्ड उनके अपने भाषा में होता है उसके कोर्स अपने भाषा में होतें हैं लेकिन पंजाबी भाषा के साथ है सा नहीं है. यह भेद-भाव क्यों?

एक बार सुनने में अटपटा लगे लेकिन छात्र इसलिए भी संघर्षरत हैं कि विभाग में पिने की पानी नहीं है. ऐसी ही आंदोलन राजधानी के दूसरे यूनिवर्सिटी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू/ JNU) में भी इस साल हुए कि कुछ डिपार्टमेंट में पिने के पानी नहीं है. इसी बिच पिछले सप्ताह JNU में लाइब्रेरी की बजट में 90% की कटौती कर दी.

ऐसा लगता है कि इस देश के शासक वर्ग को बुद्धिवाद से खतरा है.

भगत सिंह छात्र एकता मंच की प्रमुख मांगें इस प्रकार है –

  1. राजवीर और मनप्रीत के रिजल्ट में भेदभाव की जांच के लिए एक स्वतन्त्र समिति बनाई जाए.
  2. दिवार पत्रिका या पर्चे के माध्यम से अपने विचारो को छात्रों के सामने रखने की आजादी का लिखित आश्वासन दिया जाए.
  3. पंजाबी विभाग की प्रधान अपने किए गए व्यव्हार के लिए सार्वजनिक माफ़ी मांगे या उन्हें अपने पद से बर्खास्त किया जाए.
  4. पंजाबी भाषा विभाग में पंजाबी भाषा का सम्मान दिया जाए. विभाग के सभी साइन बोर्ड, सूचना पत्र और पाठ्यक्रम पंजाबी भाषा में हो.
  5. पंजाबी भाषा विभाग में पिने के पानी और लाइब्रेरी की उचित व्यवस्था जल्द से जल्द उपलब्ध कराई जाए.

द नेशनल प्रेस भगत सिंह छात्र एकता मंच के साथ है. आप सभी से भी निवेदन है कि आप इन आंदोलन में उनका साथ दें.