महापंडित सुरेश नाग अपने इस लेख में बतातें हैं कि भारत में जातियों की उत्पति समाज के स्वाभाविक विकास के क्रम में हुआ है. यह समाज में श्रम का विभाजन है. श्रम के विभाजन के बिना जटिल समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है. महापंडित सुरेश नाग अनुसार श्रम का विभाजन जन्म से न होकर कर्म के आधार पर था. कोई भी व्यक्ति किसी भी पेशा को अपनाने के लिए स्वतन्त्र था. बाद में पुरोहित वर्ग और श्रुतिकार लेखकों ने इसे जन्म के आधार पर घोषित कर दिया ताकि उनका समाज और बच्चे श्रम से बच जाएँ फिर भी समाज में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करें. महापंडित सुरेश नाग ने पुरुषशुक्त के दशवें श्लोक का जिक्र किये बिना इसे लिखा है, लेकिन भविष्य में द नेशनल प्रेस इसपर भी लेख प्रकाशित करने का प्रयास करेगा. इस लेख पर आप अपनी प्रतिक्रिया दें.आप भी अपना लेख द नेशनल प्रेस को भेजें – संपादक

इतिहास पर नजर डालने पर पता चलता है कि न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में सिर्फ शारीरिक व्यवस्था के आधार पर ही स्त्री और पुरुष दो वर्ग ही देखने को मिलते हैं. बाद में दूसरे वर्गों का निर्माण हुआ इन दो वर्गों में सामान्य कार्य करने वाले और विशिष्ट कार्य करने वाले दो वर्ग उत्पन्न हुए. दो वर्गों के निर्माण के बाद ही राजा के पद का विकास हुआ जो जानवरों से सुरक्षा और बाद में अन्य सामाजिक समूहों से सुरक्षा का कार्य करता था. इस प्रकार भारत में तीन वर्गों का क्रमिक विकास हुआ, (1) शारीरिक व्यवस्था पर आधारित वर्ग (स्त्री और पुरुष), (2) विशिष्ट कार्य करने वाले वर्ग (चमार, अहीर, गड़रिया, काछी, धीमर, कोइरी, खटीक, बुनकर, नाइ, सफाई कार्य करने वाले आदि), और (3) शासक-प्रशासक-राजा प्रशासक वर्ग।

इस प्रकार राजा के पद का विकास विशिष्ट कार्यों को करने बाले वर्ग के बाद में हुआ. अर्थात इन्हीं आमजन और विशिष्ट कार्य करने बालों से तीसरे वर्ग राजा का उदय हुआ. इस प्रकार भारत में तीन वर्ग ही समाज के संचालन का आधार हुए. 

समाज के तीन वर्गों के बाद ही चोथा और नवीनतम वर्ग पुरोहित वर्ग का विकास हुआ.

प्रारंभिक दौर में पुरोहित का कार्य समाज में सबसे सरल और निम्न दर्जें का माना जाता था बाद में इस कार्य को करने वाले समाज की नैतिकता का मार्गदर्शन करने लगे.

इसलिए राजा भी पुरोहित वर्ग से सलाह मशविरा आदि के कार्य करने लगे और समाज में इस वर्ग की धाक बनने लगी.

इस प्रकार भारत में चार वर्गों का उदय हुआ.

लेकिन अब तक इसे धार्मिक रूप नहीं प्रदान किया गया था. इस चार वर्गीय व्यवस्था को सबसे पहले धार्मिक सिद्धांत के तौर प्रस्तुत करने का ऋग्वेद में साक्ष्य मिलते हैं.

इस प्रकार चार और फिर कई अन्य वर्गों का जन्म समाज में श्रम विभाजन और विशेषीकरण के आधार पर हुआ है.

भारत में सबसे नवीनतम और आधुनिक चार वर्गीय व्यवस्था/ वर्णीय व्यवस्था पर करीब 2000 साल से विमर्श चल रहा है.

पुरोहित वर्ग का विकास आमजन, विशिष्ट कार्य करने वाले, कबीलाई राजा का पद के विकास के बाद में हुआ. क्योकि इसकी आवश्यकता समाज में बाद में महसूस हुई.

कोई भी व्यक्ति पुरोहिती का कार्य कर सकता था. भारत के पुरोहित वर्ग में भिक्कु, साधू-संत और आदिवासी पुजारी वर्ग में बैगा आदि शामिल थे.

इस प्रकार यह पुरोहिती का कार्य कोई भी आमजन कर सकता था यानी राजा स्वयं भी पुरोहित हो सकता था. इस प्रकार कोई भी आमजन पुरोहित हो सकता था. इस अवस्था में भारतीय समाज अपने समस्त कार्य करने में सक्षम था और बाद में आमजन वर्ग से कृषक समुदाय वर्ग का उदय हुआ और फिर कृषक समुदाय से व्यापारी वर्ग का विकास का क्रमिक विकास हुआ.

इस प्रकार विभिन्न समुदाय के लोग विभन्न वर्गों में विभक्त होते चले गए. जिनमें सफाईकर्ता (भंगी), चमार, अहीर, लोधी, काछी, धीमर, कहार, सुनार, लोहार, अन्य आदि शामिल रहे है. यह विशिष्ट वर्ग समाज की श्रम विभाजन और विशेषीकृत अवश्यकताओं की पूर्ति के कारण ही बने हैं न कि की पैदा किये गए.

विशेषीकृत वर्गों का समाज में उच्च स्थान माना जाता था यहाँ तक राजा के बाद इस विशिष्ट वर्ग की सामाजिक हैसियत आमजन से अधिक होती थी.

पुजारी वर्ग का स्थान तीसरे स्थान पर था. क्योकि पुजारी का काम बहुत ही सरल था और सरल काम करना भारतीय समाज में निम्न स्थान की हेसियत से देखा जाता है. जबकि विशेषीकृत वर्गों का समाज में ज्यादा महत्त्व था क्योकिं यह काम प्रत्येक व्यक्ति नहीं कर सकता था.

बड़े मजे की बात तो यह भी है कि कोई भी पुजारी कभी चमार का कार्य, नई का कार्य, सफाई का कार्य और सब्जी उगाने का कार्य कर सकता था और अपनी रक्षा का कार्य भी करता है.

इसलिए यह नहीं जा सकता था कि चमार पुजारी नहीं हो सकता था या अहीर सिर्फ दूध गाय और भैसों के पालन कार्य करते थे. अहीर पुजारी, राजा और वैश्य वर्ग के कार्य भी कर सकता था अर्थात कोई भी व्यक्ति कोई काम करने के लिए स्वत्रंत था और किसी भी विवाह कर करने के लिए स्वतंत्र था. यही भारत की सामाजिक व्यवस्था कई सदियों तक रही है.

एक काछी/ नाई सब्जी उगाने का साथ वह पुजारी और राजा का काम भी कर सकता था तो उसी प्रकार एक सुनार और लोहार भी पुजारी, या राजा और व्यापार जैसे कार्यों को अंजाम दे सकता था. यह कहना कि कि भारत में वर्ण-व्यवस्था का पालन होता रहा है – पूर्णतः मूर्खतापूर्ण और भारतीय समाज का मजाक उड़ाना है.

भारत में गुप्तकाल तक इस प्रकार के समाज की संरचना को आप देख सकते हैं जहाँ कहीं वर्णव्यवस्था का स्थिर रूप देखने को नहीं मिलता है. सामाजिक व्यवस्था की यह विभिन्नता कई वर्गों में बदलती रही है यानी परिवर्तनीय रही है. जिन्होंने भारत की भूमि को अपने खून पसीने से सीचा है. भारत में गुप्तकाल तक श्रम का बहुत महत्त्व था. ऐसा नहीं कहा जा सकता था कि भारत में श्रम का समाज कोई महत्व नहीं था. भारत में श्रम ही ईस्वर है, श्रम ही भगवान है. तथागत गौतम बुद्ध के समय से लेकर गुप्तकाल तक स्पष्ट रूप से चार वर्ग की सामाजिक संरचना का स्वरूप स्पष्ट देखने को मिलते है. मौर्यकाल तक प्रवर्तनीय वर्गीय समाज के साक्ष्य मिलते हैं.

लेकिन ब्राह्मणी अकादमिक तौर पर जिसे हिन्दू धर्म का पहला ग्रन्थ माना जाता है – ऋग्वेद में पहली बार चार वर्गीय (वर्णीय) व्यवस्था को धार्मिक तौर पर अपरिवर्तनीय व्यवस्था के तौर पर  उल्लेख मिलता है. यह समाज में प्रचलन में ही नहीं था बल्कि एक नया अकादमिक विमर्श समाज में पैदा करने के उद्देश्य से अपरिवर्तित वर्ग/ वर्णव्यवस्था की नई परिकल्पना समाज के सामने प्रस्तुत की गई.

यह सामाजिक व्यवस्था का यह एकदम नवीनतम रूप अलौकिकता पर आधारित है, जिसे बाद में राजतन्त्र ने मजबूत किया और मनु जैसे स्मृति के लेखकों ने अपना योगदान दिया और चार वर्णीय व्यवस्था को पुनः परिभाषित किया. पुराने स्वरूप को बदलने का प्रयास किया.

ऋग्वेद का यह कथन सही है या सुनने वालों ने कोई गलती की है. कल्पित, अलौकिक और दिव्यता के कारण जो सुना जा गया है उसे पूर्ण विश्वासनीय माना जाए, इस प्रकार की बाध्यता को ऋग्वेद के माध्यम से पिरोया गया और यह तर्क दिया गया है की वेद सीधे तौर पर भगवान् के व्दारा रचित हैं, ताकि उस सामाजिक व्य्वाव्स्था पर कोई नया अकादमीशियन कोई प्रशन ही नहीं पूछ सके.

इस नये अकादमिक विमर्श में अब हर सामाजिक बिंदु की व्याख्या अलौकिकता और दिव्यता को ध्यान में रखकर व्याख्या की जानी लगी.

इसे भारत के एक ज्ञान के स्कूल के रूप में देख सकते हैं, जिसे भारतीय समाज में ब्राह्मण व्यवस्था या  आश्रम व्यवस्था के नाम से जाना जाता है.

इस नयें स्कूल में भौतिकता और नैतिकता को ताक पर रखकर घोर अलौकिकता के आधार पर समाज, धर्म, राज्य व्यवस्था की व्यवस्था की जानी लगी. स्रुतिकारों के गलती करने की सम्भावना से नहीं नकारा जा सकता है. ब्रह्म के मुख को ब्रह्मण, हाथों को क्षत्रिय, उदर को वैश्य और पैर को शूद्रों की उत्पत्ती का कारण माना गया. ऋग्वेद सही है या गलत है यह सवाल ही नहीं है. ऋग्वेद के इस श्लोक की गलत व्याख्या की सम्भावना को नहीं टाला जा सकता है. ऋग्वेद का उद्देश सही हो लेकिन सुनने वाले (स्रुतिकारों) के गलत सुनने की सम्भावना से ऋग्वेद को गलत ठहरने के औचित्य से गलत व्य्वाख्या कर दी हो ऐसी पूरीं सम्भावना बनती है. “भगवान” का उद्धेश्य एक दम सही हों कि  ब्रह्म का मुख ब्रह्मण है, हाथ क्षत्रीय है, उदर वैश्य है और ब्रह्मा का पैर ही शूद्र है – यानि एक मानव शरीर पूरा ब्रह्मय है. प्रत्येक शरीर ही ब्रह्मय है. अलग-अलग शरीर में ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र नहीं है, बल्कि एक ही शरीर में, ब्रह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, और शूद्र तत्व समाहित है, अर्थात एक ही शरीर में चारों तत्त्व समाहित हैं. इस प्रकार, क्योकि पूरी प्रकृति ही ब्रह्मय है इसलिए चार वर्गीय व्यवस्था में ही पूरे शरीर का अस्तित्व है. कोई एक भाग अलग होने पर या ख़राब होने पर ब्रह्म की कल्पना भी नहीं के जा सकती है और इसी व्यवस्था को समाज पर भी लागू किया जाना चाहिए था. मानव शरीर ही चार वर्गीय है, लेकिन उसका रूप एक ही है.

लेकिन बाद के स्मृतिकारों ने जिनमें मनु शामिल है  इस चार वर्गीय शारीरिक व्यवस्था की व्याख्या को ही अलग-अलग मानव शरीर की उत्पत्ति मानकर गलत व्याख्या कर कर बैठें. ब्रह्म के एक शरीर के सदृश्य मानव शरीर का जन्म हुआ, इसे न मानकर – ब्रह्मा के शरीर के अलग-अलग हिस्से से अलग-अलग शरीरों की उत्पत्ती हुई है, की गलत व्याख्या की.

यही गलती मनु और बाद के स्मृतिकार करते चले गए और ब्रह्मा की व्याख्या को ही बदल दिया।

इस प्रकार की व्याख्या ऋग्वेद के श्लोक लेखन में की गई गलती को या श्रुतिकारों के बताने में हुई गलती की सम्भावना आगे बढती चली गई. उदहारण के लिए मनु ने ब्रह्म के एक ही शरीर से उत्पन्न अलग-अलग शरीरों की अलग-अलग वर्णों के उत्पन्न हुई ऐसी व्याख्या करने की कोशिश की. बाद इसे सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तम्भ मानने के लिए बाध्य किया जाने लगा.

इतिहास का अध्ययन करने पर निष्कर्ष निकलता है कि चार वर्गीय व्यवस्था में कोई भी मानव किसी भी वर्ग में शामिल हो सकता था.

जैसे एक मानव शरीर प्रवाचक, भिक्कु या साधू हो सकता था, वह राजा भी बन सकता था और और राजा होने के बाद खेती जैसे कार्य भी स्वं भी कर सकता है. अतः यह ब्रह्म का शरीर सभी कार्य करने में सक्षम रहा है. किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव भगवान अपने ही शरीर के साथ क्यों करेगा? ब्रह्मा के शरीर की तुलना मानव शरीर से की जा सकती है. एक मानव के शरीर का कपाल या सर, प्रवाचक या शिक्षण का कार्य करेगा, हाथ रक्षा और श्रम का कार्य करेगे, उदर पूरें शरीर के लिए पोषण कार्य करेगा और पैर पूरे शरीर को गतिमान बनाये रखने का कार्य करेगें.  

इस प्रकार शायद प्रारंभिक स्रुतिकारों का उद्धेश्य यही रहा हो, लेकिन गलतीवश या जानबूझकर स्म्रतिकारों ने अपने संतानों को श्रम कार्य से बचाने के लिए इसे जन्म पर आधारित और पूर्वजन्मों के कर्मों के आधार पर सामाजिक व्यवस्था को बनाने के रूप में प्रस्तुत किया. स्म्रतिकाल में ही पुरोहित वर्ग को पूजनीय बनाने का कार्य किया गया. इसी समय इसे जन्म के आधार पर स्थिर करने का प्रयास किया गया है. यहीं से भारतीय समाज का अन्धकार का युग शुरू हुआ. इसका परिणाम यह हुआ कि श्रम करने वाले वर्ग को निंदनीय और हेय दृष्टि से देखा जाने लगा. राजा वर्ग पुरोहित वर्ग का गुलाम बन गया और पुरोहित वर्ग बौद्धिक तौर पर अमानवीय और निरंकुश होता चला गया, जिसने समाज को जन्म पर आधारित बताना शुरू किया. यह कार्य ब्रह्म की व्यवस्था को पलटकर किया गया. अपने स्वार्थ के लिए सारा लांछन ब्रह्म पर लाद दिया. यह कार्य स्रुतिकारों व स्मृतिकारों के द्वारा किया गया. समाज में विभिन्न वर्गों का होना बुरा नहीं है बल्कि जन्म के आधार पर स्थिर कर जो अलौकिकता और पुनर्जन्म के आधार पर व्याख्या करने का प्रयास किया गया.यह दुखद रहा है.