भारत में लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था है. भारत का लोकतंत्र बहुत हद तक सफल भी है लेकिन इसे अंतिमजन के अपेक्षाओं पर भी खरा उतरना होगा. देश के शोषित-वंचित जातियों विशेषकर आदिवासी समाज को सरकारी तंत्र से कुछ मिला है तो वह है विस्थापन या इसके विरोध करने पर गोली. शोषित-वंचित जातियों के सरकारी तंत्र में हिस्सेदारी-भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान है, जिससे देश चलता है, लेकिन आज सरे आम उसी संविधान को जलाया जा रहा है. सरकार निरंकुश होती जा रही हैं. इन परिस्थितियों में लोकतंत्र के इतिहास और मतदाता के जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाल रहें हैं – सुरेश प्रसाद, पीएचडी स्कॉलर, जेएनयू। उनके मूल लेख में “अवर्ण मतदाता” शब्द का प्रयोग किया गया था, लेकिन द नेशनल प्रेस ने इसके जगह “भारतीय मूल के जातियों/ जाति का मतदाता” शब्द का प्रयोग किया है. . सुरेश प्रसाद के लेख पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें. – संपादक

लोकतंत्र और निरंकुशता: मतदाता ही लोकतंत्र में किसी विचारधारा और सरकार को निरंकुश होने से बचाता है – सुरेश प्रसाद

भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली की आहट गण-पद्धति में सुनाई देती है जो आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली से अलग होती थी. मौर्यकाल के पहले बौद्ध संघों में, निर्वाचन के निश्चित नियमों का पालन किया जाता था . शाक्यों में  मतदान की तीन प्रविधियों का उल्लेख मिलता है: (१) गुप्त मतदान, (२) कान में कहकर मत प्रकट करने की प्रविधि, तथा (३) खुला मतदान.

गुप्त मतदान के लिये बौद्ध संघ मत-परिपत्र के रूप में रंगीन काष्ठ शलाकाओं का प्रयोग करते थे. शलाकाओं का संग्राहक मतदाताओं को रंगों के अर्थ समझाकर उनके मत संग्रह करता था और बहुमत का निर्णय मान्य होता था.

शाक्य और कोलियों के बीच संघर्ष को सिद्धार्थ की समझ बुझ के द्वारा ही टाला जा सका था. यह प्रारंभिक इतिहास का एक ऐसा उद्धरण हैं जो आज भी प्रासंगित है.

इसके बाद भारत में राजतन्त्र स्थापित होने के प्रमाण मिलते हैं और राजतन्त्र में किसी भी प्रकार का निर्णय लेने में आमजन की भूमिका संदिग्ध ही रही है. आधुनिक काल में लोकतांत्रिक प्रणाली स्थापित होने के बाद ही निर्णय लेने में आमजन को शामिल किया गया.

आजादी के बाद, भले ही उस समय के सामाजिक अभिजात वर्ग ने देश के लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में सभी वर्गों के भागीदारी का विरोध किया था लेकिन उसके बाद भी देश के संविधान निर्माताओं ने 21 वर्ष की आयु प्राप्त सभी युवाओं को मतदान का अधिकार दिया. (बाद में राजीव गाँधी ने 61वें संविधान संसोधन विधेयक 1988 द्वारा इसे 18 वर्ष कर दिया.)  इस प्रकार वे मतदान के अधिकार का उपयोग करते हुए देश के निर्णय लेने की प्रक्रिया और देश के शासन-प्रशासन में भागीदारी देने लगा. सामान्यतः मतदाता के बारें में सोचा जाता है कि मतदाता का कार्य सिर्फ वोट देना ही है. लेकिन व्यवहार में मतदाता की भूमिका मतदान करने से ज्यादा बड़ा है. वास्तव में वह लोकतंत्र का सबसे सशक्त और सक्रीय इकाई है.

मतदाता के मत से ही नई सरकारें चुनी जाती है. निरंकुश होती जा रही सरकार को हटाने का कार्य भी मतदाता ही करती है.

भारत में सामाजिक व्यवस्था की इकाई जाति और धर्म दोनों है, अतः यहाँ धार्मिक और जातिगत मतदाता दोनों हीं मिलते हैं.

लेकिन भारत में धार्मिक मतदाता की अपेक्षा जातिगत मतदाता ज्यादा शक्तिशाली है. जातिगत मतदाता सवर्ण जाति और भारतीय मूल जाति में बंटा हुआ है. भारत में, भारतीय मूल जाति का मतदाता अशिक्षित, कमजोर, गरीब, लाचार और जातिगत अत्याचार से पीड़ित है.

इसके विपरीत भारत में सवर्ण जाति का मतदाता बहुत चतुर है चालाक है. यह शिक्षित है और अपने अच्छे बुरे के बारें में बहुत अच्छी तरह से जानता है. सवर्ण मतदाता अपनी जातिगत वर्चस्व को स्थापित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता है. सवर्ण मतदाता कभी भी अपना वोट भारतीय मूल जाती के उम्मीदवार या विपरीत विचारधारा वाली की पार्टियों को नहीं देता है. यह भारतीय मूल जाति के उम्मीदवारों को तभी अपना वोट तभी देता है जब भारतीय मूल जाति का उम्मीदवार उनकी विचारधारा का समर्थक हो. भारत में जातिगत भारतीय मूल जाति का मतदाता ही राजनीति  का खेलबिंदु है. यहाँ राजनीतिक दल उसे प्रलोभन देकर जैसे – शराब, मटन, मीट, पैसा, साड़ी कपडा, डराकर धमकाकर या जातिगत उत्पीडन का डर दिखाकर उसका वोट लेने की होड़ लगी होती है.

अभी तक भारतीय मूल जाति का मतदाता वास्तव में सिर्फ मतदाता है, इसलिए इस मतदाता को राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक होने की आवश्यकता है. अगर इस मतदाता को राजनीति की थोड़ी और समझ पैदा हो जाए तो देश की आधी से अधिक समस्याओं का हल आसानी से तुरंत किया जा सकता है. लेकिन साथ ही साथ सवर्ण जाति मतदाता को भी अपनी जाति और विचारधारा के ऊपर आकर सोचना होगा तभी देश का लोकतंत्र मजबूत होगा.

लोकतंत्र में मतदाता को सजग और जागरूक रहना बहुत जरुरी है. यह उसका कर्तव्य है कि चुनाव के समय वह सजगता, सामाजिक हित और विचारधारा को ध्यान में रखकर मतदान करे. यह उसका कर्तव्य है कि अगर सरकार सामाजिक हित और उसके विचारधारा के हिसाब से नहीं चल रही है तो वे उस सरकार को बदल दे. सरकार को चुनना और बदलना लोकतंत्र का एक पवित्र कार्य है. इससे किसी राजनीतिक विचारधारा या सरकार या पार्टी को निरंकुश होने से बचाया जा सकता है. क्योंकि राजनीतिक पार्टियाँ एक बार सरकार/ सत्ता में आने के बाद बार-बार, येन-केन-प्रक्रेन सरकार में ही बनें रहना चाहती है. यह मनोवृति देश और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.  

देश की राजनीतिक पार्टियाँ लोकतंत्र की धरोहर हैं, अतः यह उनकी जिम्मेदारी भी बनती है कि वे मतदाता को प्रलोभन देने से बचें. साथ ही वैसे वादा न करें जिसे वे पूरा नहीं कर सकतें हैं, वैसे वादा करने से उन्हें बचना चाहिए. ऐसी प्रवृति भारत में ज्यादा देखने को मिल रही है जिसके लिए एक नए शब्द “राजनीतिक जुमला” गढ़ा गया है. राजनीतिक पार्टियों को इस “राजनीतिक जुमलेबाजी” से बचाना चाहिए।

इसलिए भारत के मतदाताअों की यह जिम्मेदारी है कि वे एक सशक्त, जागरूक, और सामाजिक हितो को समझने वाले  मतदाता बने, और राजनीतिक जुमलों न फंसकर देश और राष्ट्र के बारे सोंचें और वास्तविक मुद्दों – शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सद्भाव और संविधान में विश्वास करने वाली राजनीतिक पार्टी को वोट देकर उसकी सरकार बनाएँ. मतदाता को हमेशा राजनीतिक पार्टियों के विचारधारा को ध्यान में रखकर मतदान करना चाहिए, क्योंकि उनका यही मतदान सरकार बनाती है. यही सरकार फिर उनपर शासन करती है और सरकारी तंत्र के माध्यम से बहुत से चीजों को नियंत्रित करती है. इसलिए लोकतंत्र में एक मतदाता ही है जो अपनी सक्रियता और शक्ति से  राजनीतिक विचारधाराओं, राजनीतिक दल और सरकार को निरंकुश होने से रोक सकती हैं. इसलिए यह जरुरी है कि भारतीय मूल के जातियों और समाजो का राजनीतिकरण हो, उन्हें राजनीतिक राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण मिलें.