आज दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (Delhi University Teachers Association/ DUTA) के नेतृत्व में मंडी हाउस से पार्लियामेंट स्ट्रीट तक विरोध प्रदर्शन मार्च का आयोजन किया गया. इस विरोध प्रदर्शन के बारे में ज्यादा जानने के लिए DUTA के अध्यक्ष प्रो. राजीब रे (Rajib Ray) और अकादमिक फोरम फॉर सोशल जस्टिस (Academic Forum for Social Justice/ AFSJ) के अध्यक्ष डॉ. केदार कुमार मंडल से द नेशनल प्रेस ने बात की.

इसके प्रमुख मांगे थी कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रस्तावित “अत्यावश्यक सेवा अनुरक्षण कानून” (Essential Service Maintenance Act/ ESMA/ एस्मा) लागु न किया जाए. शिक्षकों का कहना था कि शिक्षा को अन्य सेवाओं की तरह नहीं लिया जा सकता है.

शिक्षक समाज दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU), जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) और अन्य यूनिवर्सिटीयों में केंद्रीय नागरिक सेवा नियम (CCS) 1964 के लाने का भी विरोध कर रहा था. उनका कहना था कि इससे शिक्षकों के बोलने, लिखने, शोध करने, आलोचनात्मक होने के अधिकारों का हनन होगा.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्वायत्तता पर हमले का विरोध किया गया साथ ही यह कहा गया कि आज दिल्ली यूनिवर्सिटी सहित उच्च शिक्षा संस्थानों पर स्वायत्तता के नाम पर खिलवाड़ किया जा रहा है. स्वायत्तता के नाम पर शिक्षा का व्यापारीकरण किया जा रहा है. फंड में कटौती की जा रही है, शिक्षण और अन्य शुल्क बढ़ाये जा रहें हैं. तथा ऐसे कई सहमति पत्रो पर हस्ताक्षर किए जा रहें हैं जो यूनिवर्सिटी के हिट में नहीं है. शिक्षकों कहना है कि शिक्षा को बाजार के हवाले किया जा रहा है, शिक्षा को बेचा जा रहा है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी सहित देश के सभी यूनिवर्सिटीयों में आरक्षण व्यवस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है. विरोध प्रदर्शन और मार्च की यह प्रमुख माँगो में से एक मांग है कि यूनिवर्सिटी में 200 पॉइंट रोस्टर लागू हो.

आरक्षण और 200 पॉइंट रोस्टर पर AFSJ के अध्यक्ष डॉ. केदार कुमार मंडल ने कहा कि उनका संगठन शुरू से ही इसके लिए लड़ रहा है. उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरक्षण पूरा करने के लिए उन्होंने सड़क से लेकर अदालत तक इसकी लड़ाई लड़ी है और बहुत कुछ हासिल किया है. AFSJ ने डॉ. केदार कुमार मंडल के नेतृत्व में 2006 में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा घोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class/ OBC/ ओबीसी) के विद्यार्थी और शिक्षक दोनों को 27% आरक्षण को लागु कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 

डॉ. केदार कुमार मंडल के नेतृत्व में AFSJ ने ST SC OBC समुदायों के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और नामांकन में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की कई लड़ाइयां लड़ी और जीती गई. शिक्षकों के बहाली में भी प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की लड़ाई लड़ी और जीती गई. लेकिन प्रसाशन के नए-नए पैतरे के करण यह लड़ाई अब भी जारी है. उच्च शिक्षा में आरक्षण का आधार कॉलेज और यूनिवर्सिटी की जगह विभाग करने से अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe/ ST) अनुसूचित जाति (Scheduled Caste/ SC) OBC सबको हुआ है. आरक्षण के लिए 200 पॉइंट रोस्टर किये जाने से सबसे ज्यादा फायदा ST फिर SC और उसके बाद OBC को होगा। 

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिछले पंद्रह सालो से प्रमोशन नहीं हुआ है. शिक्षकों की मांग थी की यूनिवर्सिटी सेवा शर्तो के अनुसार उनको प्रमोशन दिया जाए. विरोध प्रदर्शन में पेंशन को ख़त्म करने का भी विरोध किया.

शिक्षा के निजीकरण, और अम्बानी रिपोर्ट का विरोध किया गया.

यहाँ यह ध्यान देने योग्य  कि शिक्षा का निजीकरण के लिए सिर्फ मोदी सरकार/ भाजपा सरकार को दोष दिया जा रहा था जिसमें कोंग्रेसी भी शामिल थे. लेकिन सच यह है कि शिक्षा का निजीकरण कांग्रेस की देन है. उसका विरोध वामपंथी पार्टयों ने तब भी किया था और आज भी कर रहें हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में 5,500 से ज्यादा पदों पर एड हॉक (Ad Hock) के रूप में शिक्षक पड़ा रहें हैं उनको नियमित करने या नियमित शिक्षकों की बहाली का मुद्दा भी उठाया गया. क्योंकि इससे शिक्षा का स्तर गिर रहा है. इसके साथ ही जितने भी शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक पद हैं उनपर नियमित बहाली की मांग उठाई गई.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में आजतक सातवें वेतन आयोग के अनुमोदन को लागू नहीं किया गया है. इसे लागु करने तथा, पुराने पेंशन व्यवस्था की मांग की गई.

पूरा विरोध प्रदर्शन और मार्च जंतर मंतर पर बिना किसी के सम्बोधन के समाप्ति की घोषणा की गई. इसमें लगभग एक सौ लोगो ने हिस्सा लिया. हिस्सा लेने वालो में स्थाई शिक्षकों के साथ-साथ अस्थाई शिक्षको ने भी हिस्सा लिया.

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