भारत की सामाजिक संरचना विश्व में एकदम अनूठा हैं. एक ओर जहाँ विश्व में वर्ग-आधारित सामाजिक संरचना है, वहीँ दूसरी ओर भारत में यह इतिहास की वस्तु बना दी गई है. भारतीय समाज का इतिहास वर्ग आधारित समाज और इकाई का रहा है, जबकि इसे जाति आधारित सामाजिक इकाई के रूप में प्रस्तुत किया गया.

मेरा यह लेख बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की किताब ऐन्हीलेशन ऑफ़ कास्ट (जाति का विनाश) से प्रेरित है इसलिए पाठको से अनुरोध करना चाहूंगा कि वे इस किताब को एक बार जरूर पढ़ें.

इस किताब की प्रामाणिक हिंदी अनुवाद डॉ. आंबेडकर के आवश्यक लेखो सहित फॉरवर्ड प्रेस और द मार्जिनलाइज़ड पब्लिकेशंस ने छपा है. इसे निचे दिए गए लिंक से खरीद सकतें हैं. – संपादक, द नेशनल प्रेस

भारत में जाति की उत्पत्ति की चर्चा करने से पहले यह जान लेना जरुरी है कि प्राचीन काल में भारत में सिर्फ एक ही प्रकार की जाति या वर्ग पाई जाती थी. बाद में समाज के आवश्यकता के अनुरूप ही समाज में विभन्न वर्गों या जातियों का उदय हुआ. इसका क्रम इस प्रकार का था – (१) सामान्य वर्ग और विशिष्ट वर्ग, (२) राजा या शासक वर्ग और (३) बाद में पुजारी वर्ग का उदय हुआ.

साधारण शब्दों में कहें तो – एक ही जाति या वर्ग से विभिन्न वर्गों या जातियों का उदय और विकास हुआ. इसे बाद में हिन्दू धर्म के श्रुति ग्रन्थ ऋग्वेद में धार्मिक तौर पर इस प्रकार व्याख्या प्रस्तुत की गई –

“ब्राह्मणोंsस्य मुखामासीद्वादाहू राजन्यः कृतः ! ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्व्याम शूद्रों अजायत।”

इस श्लोक में कहीं नहीं कहा गया है कि – एक वर्ण या वर्ग का व्यक्ति दूसरे से विवाह नहीं कर सकता है. इसका अर्थ है – भारत में वर्ण को वर्ग के ही समरूप देखा जाना चाहिए. ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, और शूद्रों के बीच आपसी वैवाहिक सम्बन्ध रहें हैं, यानी कि विभिन्न वर्णों के बीच में  विवाह के नियम प्रचलन में थे.

भारत के लिए सजातीय या स्वजातीय विवाह विदेशी धरती से आयातित है.

भारत में विभिन्न सपिंड, गौत्र और टोटम को मानने लोग अपने सामाजिक समूह में विवाह नहीं करते है. यानी भारत में विजातीय विवाह एक आस्था का भी मामला है जिस कारण ही भारत में विजातीय विवाह के कारण ही बाहर से आई हुई प्रजातीय नश्ले परस्पर घुल मिल गई. यही भारत की संस्कृति है.

विजातीय विवाह का अर्थ ही है की परस्पर घुलना-मिलना. इस प्रकार विजातीय विवाह पर सजातीय विवाह का आरोहण ही भारत में जातियों की उत्पातिओं का जनक है, जो बाद में पुजारी वर्ग (ब्राह्मण) का अनुकरण और संक्रमण के कारण अन्य सामाजिक समूहों और वर्गों में फैलता गया.

भारत में पहली बार सजातीय विवाह के पक्ष में पहला साक्ष्य मनुस्मृति में मिलता है. जहाँ मनु ने ब्राह्मण को अपने वर्ण और तीन वर्णों में यानी चार विवाह, क्षत्रीय को अपने वर्ण और दो नीचे के तीन वर्णों यानी तीन विवाह, वैश्य को अपने और शूद्र वर्ण में यानी दो विवाह और शूद्रों को सिर्फ अपने ही वर्ण में एक विवाह करने की बात कही गई है.

मनुस्मृति में पहली बार विवाह को वर्ण के आधार पर चिरस्थाई बनाने का प्रयास किया गया. मनुस्मृति के अनुसार वर्णो में इस प्रकार से विवाह करने के सलाह दी गई थी लेकिन उस समय तक यह व्यवस्था प्रचलन में नहीं आयी थी.

सवाल तो यह भी है कि मनु “पहले” के तीनों वर्णों को विजातीय विवाह करने के स्वीकृति दे रहे हैं और सिर्फ शूद्र वर्ण को सजातीय विवाह यानी अपने ही वर्ण में विवाह के लिये कह रहे थे.

यह शोध का विषय है कि मनु सवर्ण हिन्दुओं के विजातीय विवाह और शूद्रों को सजातीय विवाह की चिरस्थाई संस्था में बंद करने का भरसक प्रयास कर रहे थे. मनु का सिद्धांत कि सभी सवर्ण सवर्ण आपस में विवाह करें के विरुद्ध ब्राह्मण समाज अपने सामाजिक समूह और वर्ग में सजातीय विवाह करना करना शुरू कर दिया. वहीं दूसरी ओर समय-समय पर आवश्यकता अनुसार विजातीय विवाह भी करते रहें लेकिन विजातीय विवाह पर रोक नहीं लगा सके.

भारत में विभिन्न प्रजातियों के समिश्रण के फलस्वरूप विभिन्न पुजारी वर्गों का जन्म हुआ. कुछ पुजारी वर्ग पूजा या कर्मकांड में पशु बलि, यज्ञों में पशुबलि, लोक के प्रति मिथ्या धारणाओं एवं सामाजिक नैतिकता की कमी आदि कारणों के कारण दूसरे पुजारी वर्ग जो लौकिक सामाजिक नैतिकता, अहिंसा, करुणा, प्रज्ञा और शीलों को प्रधान मानते थे, उन्हें निम्न व हेय द्रष्टि से देखता था.

अतः अलोकिकता में विश्वास रखने वाले पुजारी वर्ग ने सामाजिक निम्नता के कारण से उत्पन्न हेय द्रष्टि से बचने के लिए सबसे पहले अपने स्वजाति विवाह को प्रधानता दी. यह प्रक्रिया मौर्यकाल के पतन और भारत में बौद्ध धम्म का समाज द्वारा अनुशीलन बंद करने के कारण संभव हो सका और बाद में इसी सिद्धांत को अन्य वर्गों/समूहों ने भी अनुकरण करना शुरू कर दिया और विभिन्न वर्गों में इसका संक्रमण हुआ.

इस प्रकार भारत में विभिन्न वर्ग विभिन्न जातियों में तब्दील हो चले गए. इसके बाद बंद वर्ग के नियमों का जिस स्त्री या पुरूषों ने अनुपालन नहीं किया उन्हें उन वर्गों की सदस्यता से बाहर का रास्ता दिखाया गया. इस प्रकार भारत में विभिन्न वर्ग स्वतः ही विभिन्न जातिओं में दब्दील होतें चलें गये.

यह कह देना की हिंदुओं में पहले से ही बंद वर्ग के रूप में जातियाँ रहीं है, इतिहास को एकदम से झुठाने जैसा ही है.

भारत की जातियाँ खुली वर्ग रही है जो बाद में स्वेच्छा से बंद वर्ग में बदलती गई . जब हिन्दुओं में सपिंड विवाह निषेध है, टोटम विवाह निषेध है तो स्वजातीय विवाह किस आधार पर जायज ठहराएँ जा सकते हैं? मानवशास्त्रियों ने स्पष्ट  किया है कि विजायीय विवाह से संताने ज्यादा योग्य और प्रकृति से संघर्ष करने के योग्य होती है. जब सपिंड विवाह से रक्त अशुद्ध होता है तो स्वजातीय विवाह से रक्त में आनुवांशिक विरक्ति को नहीं रोका जा सकता है.

स्वजातीय विवाह की इमारत इन प्रमुख कारणों पर खड़ी की जा सकी- स्वजातीय अनुवांशिकता में विश्वास, पुनर्जन्म का सिद्धांत, सती प्रथा, विधवा विवाह का निषेध और बाल विवाह को प्रचलन में लाया गया.

इस प्रकार  स्वजातीय विवाह की ईमारत खड़ा करने में मनु से लेकर शंकराचार्य तक की बहुत महत्पूर्ण भूमिका रही है. यानी ईसा पूर्व की दूसरी सदी से लेकर आठवी सदी तक लगातार भारतीय सामाजिक वैवाहिक संस्था पर हमला जारी रहा.

शंकराचार्य और उसके पूर्व वेदान्तियों के बौद्धों के खिलाफ लगातार आन्दोलन ने भारत में जातियां का एक बंद महल खड़ा किया. मध्यकाल तक भारत में ब्राह्मण और क्षत्रीय राजाओं के मुसलमान राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध रहे हैं. विभिन्न जातियों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध भारत के मध्यकाल तक जारी रहे हैं. भंगी, बसौर और चमारों के बीच, अहीर, गडरिया, लोधी, घोषी के बीच, खंगार, कुम्हार और धोबी के बीच, काछी ढीमर,माली, कुशवाहा के बीच नाई,लोहार, सुनार, कलार, तेली और तमोली के बीच आपसी वैवाहिक सम्बन्ध रहे. लेकिन आधुनिक भारत में आते-आते जाति एक स्वेच्छा से बंद वर्ग में तब्दील होती गई.

इस किताब की प्रामाणिक हिंदी अनुवाद डॉ. आंबेडकर के आवश्यक लेखो सहित फॉरवर्ड प्रेस और द मार्जिनलाइज़ड पब्लिकेशंस ने छपा है. इसे निचे दिए गए लिंक से खरीद सकतें हैं. – संपादक, द नेशनल प्रेस

स्वजातिय विवाह का एक कारण धार्मिक भी है. भारत के लोगों ने स्वेच्छा से पूजा करने का अधिकार छोड़ दिया और धार्मिक कार्यों के लिए ब्राह्मण वर्ग पर आश्रित हो गया. इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है कि किसी वर्ग की स्वेच्छा और अनुमति के बगैर यह संभव नहीं हो सकता था.

इस प्रकार अखंड भारतीय समाज जातिओ के टुकड़ों में बंटता चला गया. आज हर जाति के व्यक्ति को उसकी जाति पर गर्व होता है. इसे धार्मिक तौर पर सही ठहराया जा रहा है.

लेकिन अब यह कहा जा सकता है कि स्वजातिय विवाह के कारण ही भारत में आविष्कारक, वैज्ञानिक व चिन्तक आदि  पैदा नहीं हो सकें जो कुछ हद तक सही भी है.

भारत में विजातीय विवाह ही भारत की वैवाहिक संस्था रही है, जिसे बाद में सजातीय विवाह पद्धति में बदला गया.

भारत के अधिकतर आम जनता के शोषण का आधार सजातीय विवाह प्रणाली है. लेकिन आज भी भारत सजातीय विवाह प्रणाली को गर्व और प्रमुखता के साथ ढो रहा है. भारतीय समाज और विशेषकर हिन्दुओं को यदि संगठित समाज में परिवर्तित होना है तो उन्हें विजातीय विवाह कठोरता से लागू करना होगा.

भारत यदि अपना गौरव पुनः वापस प्राप्त करना चाहता है तो सबसे पहले  उसे विजातीय विवाह प्रणाली को पुनः बहाल करना होगा. आज भारतीय संविधान अंतरजातीय विवाह (विजातीय विवाह) करने के अनुमति देता है, लेकिन भारतीय समाज अपना ऐतिहासिक गौरव भूलने के कारण वह सिर्फ सजातीय विवाह को प्राथमिकता दे रहा है. सजातीय विवाह महिला शोषण, सती प्रथा, बलिप्रथा, विधवा विवाह का विरोधी, दहेज़, छुआछूत, बलात्कार, बेमेल विवाह और समाजिक अमानुषता, जातीय दंगे, पुजारी वर्ग के वर्चस्व को कायम रखने वाला, हिन्दुओं को कमजोर करने वाला और अखंड भारत को तोडना वाला, विदेशियों की गुलामी का कारण और सामाजिक अनैतिकता का प्रतीक सिद्ध हुआ है. इस तरह हम पातें हैं कि प्राचीन भारत में जो वैवाहिक पद्धति थी वह उत्तम थी. वह विजातीय विवाह प्रथा थी. एक ही गोत्र, सम्पिण्डक विवाह की मनाही थी. वह दूसरे जातियों में विवाह को प्राथमिकता देती थी. लेकिन बाद में सजातीय विवाह का प्रचलन हुआ जिससे देश के एकता में कमी आई और देश कमजोर हुआ. अतः देश को पुनः मजबूत बनाने और खोये हुए गौरव को पुनः वापस प्राप्त करने के लिए जरुरी है कि देश पुनः अपने पुराने संस्कृति अंतर्जातीय या विजातीय विवाह की ओर लौटे.