दिवाली भारत का एक प्रमुख पर्व है. दिवाली का इतिहास गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक और बलि राजा से जुड़ा हुआ है. इस पर्व की तैयारी लगभग पंद्रह दिन पहले से शुरू हो जाती है. इसके लिए घर के सामान की सफाई, मरम्मत से लेकर पशुओ और खेती-किसानी, व्यवसाय में काम आने वाले साजो-सामान की भी सफाई और मरम्मत की जाती है. और दिवाली के दिन दिया जलाकर इन सबकी पूजा की जाती है. राम से इस पर्व का कोई सम्बन्ध नहीं है.

लेकिन आजकल के अंधआधुनिकता और दिखावे की संस्कृति ने इसकी सादगी, सफाई और पर्यावरण की चिंता को भुला दिया है. शहरों में यह पटाखों के कारन ध्वनि प्रदुषण, जल प्रदुषण, मृदा प्रदुषण का पर्याय बन चूका है. इसके कारन दिल्ली में लोगो का रहना दुरभ हो रहा है. यह सब हमारी गलती है. कहीं न कहीं पर्यावरण की चिंता में कमी है. और इसमें यह भाव भी निहित है कि सफाई करना दुसरो का काम है.

सफाई की सभ्यता सिखाते चर्च के युवा साथी

कल 07/11/2018 को दिवाली थी. रात 3 AM तक मैं काम कर रहा था और उस समय तक कोई न कोई पटाखे चला रहा था. इसलिए सुबह थोड़ी देर से उठा. अचानक मोहल्ले में मेरे घर के निचे हिंदी और अंग्रेजी में सफाई करने और कूड़ा उठाने की आवाज सुनाई दी. आवाज से मुझे वे सफाई कर्मचारी नहीं लगें. आँचल ने जब बालकोनी से निचे देखा तो कुछ युवा नजर आएं जो पटाखों से फैली गन्दगी और पारम्परिक गन्दगी को साफ़ कर रहें थें. फिर मैं बालकनी से ही एक फोटो खींचा लेकिन आँचल ने कहा कि मुझे निचे जाकर उनसे मिलना चाहिए.

निचे देखा तो कॉलेज के कुछ युवा पटाखों से फैली गन्दगी और पारम्परिक कूडो को साफ़ कर रहें थें. उनमें भारतीय युवा के साथ-साथ एक अफ़ग़ानिस्तान, दो ऑस्ट्रेलिया, और तीन  अमेरिका से थें. जब उनसे द नेशनल प्रेस की तरफ से अनिल कुमार ने बात की तो उन्होंने कहा कि वे चर्च की तरफ से पटाखों से फैली गन्दगी को साथ करने आये हैं. फिर अचानक से मेरी नजर दुसरो पर पड़ी. उन्होंने कहा कि वे ऑस्ट्रेलिया से हैं. फिर बाकि लोगो से भी मिला.

उनका उद्देश्य था कि दिवाली सादगी, स्वक्षता और प्रकाश का पर्व है, इसलिए कल पटाखों से जो गन्दगी फैली है उसकी सफाई की जाए.

उन्होंने बताया कि कई दल में वे लोग दिल्ली के विभिन्न इलाको में जाकर सफाई कर रहें हैं.

वे लोगो को सफाई और पर्यावरण के प्रति जागरूक करना चाहतें थें. यह इसलिए भी कि भारत सहित दुनियाँ के कई इलाके प्रदुषण के कारण रहने लायक नहीं रह गया है. भारत की राजधानी दिल्ली भी उनमें से एक है.

दिवाली के बाद के गन्दगी और प्रदुषण को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायलय को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा है.

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी भी राज्य में दिवाली के अवसर पर अधिकतम दो घंटे के लिए पटाखे चलाने की अनुमति दी जा सकती है. समय के निर्धारण के लिए राज्य सरकार स्वतन्त्र है. जबकि क्रिसमस और नव वर्ष के पूर्व संघ्या पर यह समय 11.45 PM से 12.45 AM के बिच होगा.

ए. के. शिकरी और अशोक भूषण का बेंच, ने 28 अगस्त 2018 को जजमेंट सुरक्षित कर लिया था जिसे 23 ऑक्टूबर 2018 को सुनाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला अर्जुन गोपाल, आरव भंडारी और ज़ोया राव के जनहित याचिका पर सुनाया। इनकी मांग थी कि पर्यावरण प्रदुषण को देखते हुए पटाखों के बिक्री, खरीद और लाने-लेजाने पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया जाए.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने से इंकार कर दिया.

पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पारम्परिक पटाखों की जगह “ग्रीन पटाखे” इस्तेमाल किये जाए. साथ ही किसी भी प्रदेश में अधिकतम दो घंटे से ज्यादा पटाखा नहीं चलाये जा सकतें हैं. दिवाली पर दिल्ली में 8-10 PM और तमिलनाडु में सुबह 4-5 AM और 9-10 PM तक पटाखे फोड़े जा सकतें हैं. मूल आदेश में यह समय 10-12 PM था लेकिन देश के विविधता और स्थानीय समय और जरूरतों को देखते हुए समय का निर्धारण राज्यों पर छोड़ दिया, लेकिन इसके अधीन की समय दो घंटे से ज्यादा नहीं हो सकता है.

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हालाँकि पुलिस असमंजस में है कि आदेश के अवहेलना करने वालो को किन धाराओं में केस दर्ज किए किए जाएँ। लेकिन एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सम्बंधित शिकायत को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code/ IPC) की धारा 188, सरकार के अधिकारी के आदेश की अवहेलना, धारा 285, गलत तरीके से आगजनी, और धारा 342, गलत तरीके से किसी को किसी काम करने से रोकना या बढ़ा पहुँचाना, के तहद केस दर्ज किया जा रहा है. तमिलनाडु में सबसे ज्यादा लगभग 1500 केस दर्ज किया गया है.

हालाँकि एक सवाल यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह क्यों नहीं कहा कि पटाखे चलाना धर्म संगत नहीं है चाहे वह हिन्दू धर्म हो या बौद्ध धर्म या फिर क्रिस्चियन धर्म या इस्लाम धर्म. पटाखों से प्रदुषण को देखते हुए यह समीचीन होगा कि देश में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिए जाएँ.