मित्रों,

तेरहवें डाइवर्सिटी डे का राष्ट्रीय या राज्यों की राजधानी के बजाय एक जिला मुख्यालय, उत्तर प्रदेश के मऊ में आयोजित होना कईयों को विस्मित किया. कारण, अबतक के सभी आयोजन दिल्ली के अतिरिक्त सिर्फ पटना, लखनऊ, मुंबई, रांची, जयपुर इत्यादि राजधानियों में ही हुए थे. किन्तु बहुत सोच समझ कर इस बार बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से जुड़े लोगों ने मऊ का चयन किया. हालांकि इस स्थान का चयन  करने पहले कई बार यह बात जेहन में उभरी थी कि यहाँ पहुँचने में अतिथियों को दिक्कत हो सकती है, जो सही साबित हुई.

कार्यक्रम में ‘डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द इयर’ का सम्मान ग्रहण करने के लिए महेंद्र नारायण सिंह यादव और डॉ. लाल रत्नाकर सर तक न आ सके. वह तो गनीमत थी कि सत्येन्द्र पीएस पहुँच गए, नहीं तो डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द की घोषणा करने से परहेज ही करना पड़ता.

थोडा दुरूह रुट पर होने के कारण नहीं आ पाए पटना से बुद्ध शरण हंस,मुंबई से सुरेश केदारे, लखनऊ से फ्रैंक हुजुर, झारखण्ड से उमेश और गणेश रवि, मुरादाबाद से निर्देश सिंह व अन्य कई अतिथि भी नहीं आ पाए. कुछ अतिथि, मसलन भागलपुर से इक़बाल अंसारी और बनारस से डॉ.राहुल पहुंचे भी तो तब, जब प्रोग्राम शेष चरण में था. किन्तु इन दिक्कतों का इल्म होने के बावजूद मऊ में आयोजित करने के पीछे एकमेव कारण यह था कि धन –दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे के मुद्दे झारखण्ड और बिहार के बाद यूपी में कानपुर के जिन जिलों में लोगों से संवाद किया गया था, उनमें बेस्ट लोकेशन यही था. यहाँ देवरिया, बलिया, गाजीपुर और बनारस के साथी बहुत आसानी से पहुँच सकते थे.


बहरहाल बलिया के जिन चार व्यक्तियों- डॉ.रामबिलास भारती, डॉ. सीपी आर्या, लालचंद राम और आरके यादव- पर इसको सफल बनाने की जिम्मेवारी लेने का अनुरोध किया, उनके निरंतर आश्वस्त किये जाने के बाद मैं बहुत संतुष्ट भाव 3 नवम्बर 2018 की दोपहर अपनी मिसेज मेवाती दुसाध और बेटे डॉ. कविश कुमार के साथ मऊ उतरा. डॉ. सीपी आर्या अपनी गाड़ी के साथ इलाके के बेहद सक्रिय शेषनाथ रावत को हमें  रिसीव करने के लिए भेंज दिए थे. वे लेकर हमें उनके भव्य हास्पिटल के दूसरे तल पर पहुंचे, जहां हमारे ठहरने की थ्री स्टार होटल जैसी व्यवस्था की गयी थी. डॉ, आर्या से इससे पूर्व मिलने का अवसर नहीं मिला था. उनके विषय में जो बताया गया था,उसके आधार पर मेरी धारणा बनी थी कि वे बेहद सज्जन और सफल डॉक्टर हैं, जो खुलकर मिशनरी लोगों का सहयोग करते हैं. किन्तु 3 नवम्बर 2018 की दोपहर हुई मुलाकात के बाद जाना वे सफल डॉक्टर से भी बहुत आगे की चीज है.


तेरहवें डाइवर्सिटी डे को सफल बनाने में अन्यतम महती भूमिका अदा करने वाले डॉ. आर्या एक सफल डॉक्टर से आगे की चीज हैं, इसकी उपलब्धि वही कर सकता है, जिसे उनके जीवन संघर्ष जानने और विशेष लाइफ स्टाइल को निकट से देखने का अवसर मिला हो. तेरहवें डाइवर्सिटी डे ने मुझे वह अवसर दिया. उनके संघर्षों की दास्ताँ सुनकर जिस एक खास व्यक्ति का चेहरा मेरे जेहन में उतरा, वह थे दलसिंह सराय के डॉ. राजीव, जिनका डाइवर्सिटी मुव्हमेंट (आंदोलन) को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय योगदान है. गत अप्रैल में जब धन के न्यापूर्ण बंटवारे के अभियान के सिलसिले में बिहार का दौरा किया, 2010 में  भी समस्तीपुर में लोगों से संवाद करा चुके डॉ. राजीव ने अपने पेशे के बहुमूल्य समय में से लगभग एक पूरा दिन ही निकाल कर दलसिंह सराय और समस्तीपुर के छात्र और गुरुजनों के मध्य मुझे अपनी बात रखने का अवसर सुलभ कराया था.

मेडिकल प्रोफेशन से पर्याप्त धन-और यश अर्जित करने वाले डॉ. राजीव ने उस दौरे पर जब यह बताया कि उनके पिताजी रिक्सा चलाते थे और एक बार उन्हें 12-13 साल की उम्र में अपने बीमार पिता को रिक्सा चलाकर पटना से दलसिंह सराय लाना पड़ा था तो सुनकर मैं स्तब्ध हुए बिना न रह सका था. व्यक्तित्व और कृतित्व में काफी हद तक डॉ.राजीव के ही समान डॉ. आर्या के संघर्ष की दास्ताँ सुनकर मैं एक बार फिर स्तब्ध हुआ. लेकिन डॉ आर्या एक मायने में अबतक मिले परिचित डॉक्टरों से भिन्न लगे कि उन्होंने छोटी उम्र में ही चिकित्सा-विज्ञानं से जुड़ी छोटी-बड़ी दस किताबें लिख डाली हैं. यही नहीं यह जाकर और विस्मित रह गया कि यूपी के एक छोटे से जिले में कार्यरत डॉ. आर्या की किताबों के पाठक सौ से अधिक देशों में फैले हुए हैं. लेकिन वह सिर्फ पेशे तक सीमित न रहकर दलित-वंचितों के प्रति कुछ करने में भी बहुत आगे हैं.

उस दिन शाम को मुझे एक बौद्ध विहार ले जाया गया. वहां पहुँचते ही याद आ गया कि गत 2 जून 2017 को  इसी में डॉ. रामबिलास भारती ने मेरा प्रेस कांफ्रेस करवाया था. तब उस बौद्ध विहार का मेंटेनेंस और उसमे लगी तथागत गौतम बुद्ध की मूर्ति अलग से मेरा ध्यान आकर्षित किया था. 3 नवम्बर 2018 की शाम जब वहां पहुंचकर यह जाना कि वह मूर्ति डॉ. साहेब के सौजन्य से स्थापित हुई है तो मैं सुखद आश्चर्य में डूबे बिना न रह सका.

लेकिन अम्बेडकरी मिशन के लिए अपने स्तर पर उल्लेखनीय योगदान करने वाले डॉ. आर्या को शायद उनके इलाके के लोग अम्बेडकरवादी नहीं मानते होंगे. कारण, वह सुपर पॉवर में विश्वास करते हैं और साईं के अन्यन्य भक्त हैं. उन्होंने अपने हॉस्पिटल परिसर में साईं की मूर्ति स्थापित कर रखी है. पर, चूँकि आम आंबेडकरवादियों के लिए वह व्यक्ति ही मिशनरी है, जो देवी-देवताओं  की तस्वीरें अपने घरों से निकाल दिया है. आप माने या न मानें, मैंने यही पाया है कि कोई दलित-पिछड़ा समाज के लिए भले ही पाई भर का योगदान न करता हो, पर , यदि वह देवी-देवताओं की मूर्तियाँ अपने ड्राइंग रूम से निकल दिया है, बड़े मिशनरी के रूप में देखा जाता है. इस लिहाज से मेरी धारणा है कि समाज के लिए रत्न सरीखे डॉ. आर्या स्थानीय लोगों में मिशनरी के रूप में शायद वह सम्मान नहीं पाते होंगे, जिसके वे हक़दार हैं. बहरहाल  मेरे लिए भारी अफ़सोस की बात यह रही कि वह डाइवर्सिटी डे आयोजन में शिरकत न कर सके. उन्हें 4 नवम्बर 2018 की सुबह ही अपने बच्चो को लाने के लिए बनारस निकल जाना पड़ा था.

डॉ.साहेब के यहां पहुंचकर मैं लंच इत्यादि से फारिग हुआ ही था कि डॉ. रामबिलास भारती आ गए.वैसे मऊ पहुंचकर भारती जी से भले ही कुछ बिलम्ब से मुलाकात हुई, किन्तु हम कई दिनों से लगातार संपर्क में थे. वह तैयारियों से नियमित रूप से मुझे अवगत करते रहे. वैसे उनके जैसे मिशनरी और संगठनकर्ता के ऊपर जिस दिन मैं मऊ में डाइवर्सिटी डे आयोजित करवाने का बोझ डाला, उसी दिन से आश्वस्त हो चुका था. यूपी पूर्वांचल के बेहतरीन चिन्तक-एक्टिविस्टों में से एक डॉ. भारती को जानने वाला कोई भी व्यक्ति या संगठन उनपर मिशन के काम का बोझ डाल दे,तो उसके बाद मेरी ही तरह आश्वस्त हो सकता है. गत जून माह में जिस तरह मऊ के मेरे कुछ हद औचक दौरे पर घोसी के बुद्धिजीवियों से संवाद कराने के अगले दिन ही उन्होंने मऊ में एक सफल प्रेस कांफ्रेंस करवाया, तभी से यकींन हो गया था कि यदि वह जिम्मेवारी ले लेते हैं तो सफल आयोजन के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हुआ जा सकता है. बहरहाल उस दिन डॉ. साहेब के घर ज्यादा बिलम्ब न कर मैं भारती जी के साथ सभागार की तैयारियों का जायजा लेने के लिए निकल पड़ा. उनके साथ पालिका कम्युनिटी हाल का परिसर देख कर तो मुग्ध हुआ,पर जब हॉल देखा, मन ही मन चिंतित हो गया,किन्तु  भारती जी के समक्ष इजहार नहीं किया. हॉल इतना विशाल था कि मेरे मन में यह आशंका बुरी तरह घिर गयी कि कल हॉल खाली-खाली नजर आएगा: इतने बड़े हॉल को भरने के लिए लोग आयेंगे कहाँ से! लेकिन अगले दिन हॉल तो नहीं भरा, पर खाली-खाली भी नजर नहीं आया.


3 नवंबर 2018 की शाम तक पता चला कि गढ़वा से पांच -छः नहीं, अठारह लोग आ रहे हैं. इससे रात में उन्हें ठहराने की व्यवस्था के साथ सबसे बड़ी चिंता इस बात की थी वे बनारस से आयेंगे कैसे! 3 नवंबर 2018 को शनिवार था और दिवाली की छुट्टियाँ मनाने के लिए गाँव पहुचने वालों के कारण ट्रेनों में तिल रखने की जगह नहीं थी. इसका असर मुंद्रिका सर की अगुवाई में गढ़वा से आने वाले लोगों पर पड़ा. उन्हें 3 की रात 12-1 बजे तक मऊ पहुचना था. लगातार उनकी खबर हमलोग लेते रहे. भीड़ की वजह से वे दो-दो ट्रेने छोड़ने के लिए बाध्य हुए. और कोई उपाय न देखकर 4 नवंबर 2018 की सुबव वे लोग मिनी बस रिजर्व कर रवाना हुए और मऊ पहुंचे दस बजे,जो कार्यक्रम का समय था. गढ़वा वालों के साथ ही मैं कानपूर से आने वाले के.नाथ साहब के लिए चिंतित था.खैर वह सुबह 5 बजे पहुंचे और जिस होटल में उनके ठहरने की व्यवस्था की गयी थी, वहां पहले भी वे आ चुके थे. लिहाजा वे आराम से होटल पहुँच गए.उसी ट्रेन  से विद्या गौतम भी आयीं,किन्तु होटल में न ठहरकर, अपने एक परिचित के घर चली गयीं.


4 नवंबर 2018 को मैं सुबह 9 बजे जब हॉल में पहुंचा, कोट-टाई में सजा एक नौजवान आगे बढ़कर सामने आया. परिचय पाकर मैं उसे गले लगा लिया. वह और कोई नहीं फुल ऑफ़ कॉन्फिडेंस राजवंशी जे.ए. आंबेडकर थे. अपनी रोमांचक टिप्पणियों से मुग्ध करते रहने वाले राजवंशी जी को फेसबुक पर रोज-रोज देखता रहा. फेसबुक पर देखते हुए उनकी जो छवि मेरे जेहन में बनी थी, उन्हें सामने देखकर छिन्न-भिन्न हो गयी. रूबरू मिलने पर उन्हें फेसबुक से बहुत बेहतर पाया. प्राय छः फीट के हैण्डसम और स्मार्ट राजवंशी के शानदार व्यक्तित्व की तारीफ में कुछ कसीदे काढने से मैं खुद को रोक नहीं पाया.

बहरहाल कार्यक्रम का समय तो दस बजे था, किन्तु साढ़े-ग्यारह  के बाद ही स्टार्ट हो सका. और स्टार्ट के साथ लोगों की उपस्थिति से धीरे-धीरे हॉल की रौनक भी बढ़ने लगी जो अंत तक बरक़रार रही.


2006 में पहली बार डाइवर्सिटी डे के आयोजन का जो सिलसिला शुरू हुआ, तबसे बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के बैनर तले तीन-दर्जन के करीब बड़े आयोजन हो चुके हैं. किन्तु मैं किसी भी आयोजन से कभी संतुष्ट नहीं हुआ. हर बार आयोजन की कमियों को लेकर कई-कई दिनों तक चिंतित रहा. किन्तु लोगों के द्वारा हर बार आयोजन को सराहे जाने के बाद धीरे-धीरे कमियों को भूलते गया. इस बार भी संतुष्ट नहीं हुआ.अब भी इसकी कमियों को लेकर मन भारी है.हाँ, इसके विषय में लोगों की पॉजिटिव राय धीरे-धीरे इसमें हुई कमियों की ग्लानि से उबरने में कुछ मदद कर रही है. किन्तु मैं नहीं भूल पा रहा हूँ कि दूर-दूर से आये कई खास विद्वानों को अपनी बात रखने अवसर मुहैया नहीं कर सका; इस बात को भी नहीं भूल पा रहा हूँ कि कितनी तकलीफें  उठाकर दूर-दूर से लोग आये,खासकर गढ़वा के. बहरहाल तेरहवां डाइवर्सिटी डे जैसा भी रहा, इसे संपन्न करने में डॉ.रामबिलास भारती, डॉ. सीपी आर्या, लालचंद राम और आरके यादव साहब ने जो योगदान किया, उसके लिए हमेशा आभारी रहूँगा.