सुप्रीम कोर्ट ने 23 ऑक्टूबर 2018 को पर्यावरण के हित में “ग्रीन पटाखे” (Green Crackers) चलाने की बात कही है? लेकिन यह ग्रीन पटाखे क्या है? इसकी बहुत काम लोगो की जानकारी है. और लोग सोशल मीडिया पर आलू, बैगन, कद्दू आदि में सुतली लगाकर फोटो पोस्ट करके इसका मजाक बना रहें हैं.

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार इसे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिक अनुसन्धान संसथान (National Environmental Engineering Research Institute/ NEERI),  वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संगठन (Council of Scientific and Industrial Research/ CSIR) ने आठ अन्य सरकारी अनुसन्धान संस्थानो के साथ मिलकर इसे बनाया है.

इसमें जो रसायन इस्तेमाल किया गया है वह जल अणु (water molecules) पर आधारित है जो कम धुआँ और प्रदुषण करता है.

दावे के अनुसार यह पारम्परिक पठाखो से 30% कम प्रदुषण करता है. इसलिए यह कम प्रदुषण फैलाता है लेकिन पूरी तरह पर्यावरण मित्र (eco-friendly) नहीं है.

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2018 के दिवाली (7 ऑक्टूबर) तक व्यापारिक स्तर पर “ग्रीन पटाखे” नहीं बनाया जा सका है. यह भी कहा जा रहा है कि “ग्रीन पटाखे” की अनिवार्यता सिर्फ दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (Delhi- National Capital Rigion/ NCR) तक ही सिमित है.

लेकिन सवाल उठता है कि देश  क्षेत्रो के लिए हम तबतक नहीं सोचेंगें जबतक स्थिति काबू से बाहर न हो जाए? या फिर दिल्ली में रहने वालो की स्वास्थ्य देश के अन्य हिस्सों से ज्यादा कीमती है?

रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी भी राज्य में दिवाली के अवसर पर अधिकतम दो घंटे के लिए पटाखे चलाने की अनुमति दी जा सकती है. समय के निर्धारण के लिए राज्य सरकार स्वतन्त्र है. जबकि क्रिसमस और नव वर्ष के पूर्व संघ्या पर यह समय 11.45 PM से 12.45 AM के बिच होगा.

इस आदेश के अवहेलना पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सम्बंधित शिकायत को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code/ IPC) की धारा 188, सरकार के अधिकारी के आदेश की अवहेलना, धारा 285, गलत तरीके से आगजनी, और धारा 342, गलत तरीके से किसी को किसी काम करने से रोकना या बढ़ा पहुँचाना, के तहद केस दर्ज किया जा रहा है.

देश के पर्यावरण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह अपील की गई थी कि देश में पातको के उत्पादन, बिक्री, खरीद, परिवहन पर पूरी तरह पावंदी लगा दिया जाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि यह काम विधायिका और कार्यपालिका की थी/है न कि सुप्रीम कोर्ट की.