दलितों का हनुमान मंदिर पर कब्जा: ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल

हाल ही में एक चुनावी सभा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (पूर्व नाम अजय बीस्ट) ने घोषणा किया कि हनुमान दलित थे. प्राख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव द्वारा हनुमान को विश्व का पहला आतंकवादी घोषित किये जाने के वर्षों बाद रामदास हनुमान को लेकर योगी द्वारा की गयी टिपण्णी सबसे ज्यादा चांचल्य सृष्टि की है. उनके बयान के बाद हिन्दू देवी-देवताओं की जाति चिन्हीकरण का एक नया दौर शुरू हो गया है. इसे लेकर योगी खुद अपनी जमात अर्थात साधु –संतों के निशाने पर आ गए हैं.

दूसरी ओर उनके बयान के जारी होने के बाद आगरा, उत्तर प्रदेश के एक हनुमान मंदिर पर दलितों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है. दलितों द्वारा मंदिर पर कब्जे ज़माने के बाद यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि जिस जाति के जो देवता है, उस जाति देवता के मंदिरों का पूजा- पाठ सहित सम्पूर्ण का नियंत्रण उस जाति से सम्बद्ध समुदायों को सौंप दिया जाय.

इस क्रम में विश्वकर्मा मंदिर लोहारों को, कृष्ण मंदिर यादवों को, राममंदिर क्षत्रियों इत्यादि को सौपने की बात सोशल मीडिया में उठ रही है. इससे उन लोगों में हर्ष की लहर दौड़ गयी है, जो मंदिरों पर ब्राह्मणों के एकाधिकार के ध्वस्त होने का वर्षों से सपना देख रहे थे.

किन्तु भारी आश्चर्य की बात यह है कि मंदिरों पर गैर-ब्राह्मणों के कब्जे को लेकर सर्वाधिक आपत्ति ब्राह्मणों में नहीं, उन दलितों में है, जिनके लिए सदियों से देवालयों के द्वार बंद रहे हैं और आज भी हैं.

इसलिए इस समुदाय के बुद्धिजीवी मंदिरों पर कब्ज़ा ज़माने के लिए आमादा जातियों, खासकर दलितों को हतोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया पर तरह-तरह की युक्ति खड़ी करते हुए प्रचारित कर हैं कि बाबा साहेब ने मंदिरों पर, नहीं संसद पर कब्ज़ा करने का निर्देश दिया था.

इनके इस अभियान में गैर-दलित बहुजनों के साथ प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का भी खासा सहयोग मिल रहा है.  

बहरहाल गैर-ब्राह्मण जातियों द्वारा मंदिरों पर कब्जे के अभियान को हतोत्साहित करने जुटे बहुजन और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने बता दिया है कि वे क्यों अबतक भारत में सामाजिक परिवर्तन तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़े और आधी आबादी के सशक्तिकरण में अबतक व्यर्थ रहे हैं. वे अपनी बौद्धिक दारिद्र्ता के चलते यह जान ही नहीं पाए कि दुनिया के दूसरे वंचित समुदाय अश्वेतों, महिलाओं इत्यादि की भांति ही भारत के वंचितों की दुर्दशा व अ-शक्तिकरण का एकमेव कारण शासकों द्वारा उनका शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) बहिष्कार है और बिना शक्ति के समस्त स्रोतों में इनकी वाजिब हिस्सेदारी सुलभ कराये इनका मुकम्मल सशक्तिकरण हो ही नहीं सकता.

वे यह समझने में व्यर्थ रहे हैं कि समाज के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे से ही आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की सृष्टि होती है. अगर इसकी थोड़ी उपलब्धि किया भी तो वे धर्म को शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत समझने में पूरी तरह व्यर्थ रहे. धर्म को विषमता का बड़ा कारक न मानने के कारण ही अधिकांश संगठन वंचितों को मात्र आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में हिस्सेदारी दिलाने तक अपनी गतिविधियों को महदूद रखे.  

शक्ति के स्रोत के रूप में धर्म की उपेक्षा दुनिया के तमाम चिन्तक, जिनमें मार्क्स भी रहे, ही किये और आज भी किये जा रहे हैं.

यह एकमात्र बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर थे जिन्होंने जोर गले से कहा था कि धर्म भी शक्ति का एक स्रोत होता है और शक्ति के रूप में ‘धर्म की शक्ति’ का महत्त्व ‘आर्थिक शक्ति’ से ज्यादा नहीं तो किसी प्रकार कम भी नहीं. प्रमाण देते हुए उन्होंने बताया था कि प्राचीन रोमन गणराज्य में प्लेबियन बहुसंख्य होकर भी अगर अपने अधिकारों से वंचित रहे तो इसलिए कि धार्मिक शक्ति डेल्फी के मंदिर के पुजारी के पास होती थी, जो शासक पैट्रीशियन जाति का होता था. भारत में धार्मिक शक्ति की महत्ता प्रमाणित करते हुए उन्होंने कहा था –  ‘क्यों बड़े से बड़े लोग साधु-फकीरों के पैर छूते हैं? क्या कारण है कि भारत के लाखों लोग अंगूठी-छल्ला बेंचकर काशी व मक्का जाते हैं? भारत का तो इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां पुरोहित का शासन, मजिस्ट्रेट के शासन से बढ़कर है.’

बहरहाल जो धर्म शक्ति के स्रोत के रूप में आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, सारी दुनिया में ही उसका लाभ पुरोहित वर्ग जरुर उठाता रहा है, किन्तु एक सामाजिक समूह के रूप इसका लाभार्थी वर्ग केवल भारत में ही विकसित हुआ.

शेष धर्मों में पुरोहितों को इसका लाभ व्यक्तिगत रूप से मिलता रहा. कारण, हिन्दू धर्म को छोड़कर बाकी धर्मों में पुरोहित बनने के दरवाजे सभी समूहों के लिए मुक्त रहे, सिवाय उनकी महिलाओं के. हालांकि 1886 भागों में बंटे ब्राह्मणों में सभी को पौरोहित्य का अधिकार कभी नहीं रहा. पर, चूँकि भारत के विभिन्न अंचलों में फैले छोटे-बड़े असंख्य मंदिरों के पुजारी वहां के कुछ खास ब्राह्मण ही हो सकते थे, इसलिए असंख्य भागों में बंटे ब्राह्मण पुरोहित वर्ग में तब्दील हो गए. इससे जिन ब्राह्मणों को पौरोहित्य का अधिकार नहीं रहा, वे भी आम लोगों में पुरोहित ब्राह्मणों के समान ही सम्मान पाने लगे. पौरोहित्य के अधिकार ने ही ब्राहमणों को ‘भूदेव’ के आसन पर बिठा दिया: हिन्दू समाज में सर्वोच्च बना दिया.  

इस अधिकार से वंचित होने के कारण ही क्षत्रिय ‘जन-अरण्य का सिंह’ होकर भी दस वर्ष तक के बालक ब्राह्मण को पिता समान सम्मान देने के लिए विवश रहे. इस क्षेत्र का अनाधिकारी होने के नाते ही सदियों से भारतीय नारी हर जुल्म सहते हुए पति के चरणों में, पति चाहे लम्पट व कुष्ठ रोगी ही क्यों हो, स्वर्ग तलाशने के लिए ही अभिशप्त रही. वैसे तो पौरोहित्य के अधिकार से वंचित रहने के कारण तमाम अब्राह्मण जातियों की हैसियत ब्राह्मणों के समक्ष निहायत ही तुच्छ रही, किन्तु सर्वाधिक बदतर स्थिति दलितों की हुई. पुरोहित बनना तो दूर उन्हें मंदिरों में घुसकर ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करने तक का अधिकार नहीं रहा.

अगर ब्राह्मणों की भांति दलितों को भी अबाध रूप से मंदिरों में प्रवेश और पौरोहित्य का अधिकार रहता तब क्या वे मानवेतर प्राणी में तब्दील होते? क्या तब भी हिन्दू उनके साथ अस्पृश्यता मूलक व्यवहार करते? सच तो यह है कि धार्मिक सेक्टर से सम्पूर्ण बहिष्कार ही दलितों के प्रति अस्पृश्यतामूलक व्यवहार का प्रधान कारण है.

हिन्दू सोचते है जब दलित देवालयों से ही अछूत के रूप में बहिष्कृत हैं तो हम उनसे सछूत जैसे व्यवहार क्यों करें!

बहरहाल कल्पना किया जाय कोई चमत्कार घटित हो जाता है और समस्त आर्थिक गतिविधियों, राजनीति की संस्थाओं तथा ज्ञान के क्षेत्र मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रातिशूद्र और उनकी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिल जाति है. पर, अगर पौरोहित्य पर ब्राह्मणों का एकाधिकार पूर्ववत रहता है, क्या हिन्दू समाज में समता आ पायेगी? हरगिज नहीं! हिन्दू समाज को समतावादी बनाने के लिए पौरोहित्य का प्रजातंत्रीकरण करना ही होगा.

अर्थात जिस समाज की जितनी संख्या है, उस अनुपात में पौरोहित्य में उसके स्त्री और पुरुषों को भागीदारी सुनिश्चित करनी ही होगी.

अगर ऐसा नहीं किया गया तो तमाम तरह की बराबरी हासिल करने के बादजूद तमाम गैर-ब्राह्मण जातियां ब्राह्मणों के कदमों में लोटती रहेगी. ऐसे में हर हाल में धार्मिक शक्ति का बंटवारा जरुरी है. अगर भारतीय समाज धार्मिक शक्ति के बंटवारे के लिए मन बनाता है तो इसमें डॉ. आंबेडकर का यह सुझाव काफी कारगर हो सकता है,जो उन्होंने अपनी बेहतरीन रचना ‘जाति का विनाश’ में सुझाया है.

‘हिन्दुओं के पुरोहिती पेशे को अच्छा हो कि समाप्त ही कर दिया जाय, लेकिन यह असम्भव प्रतीत होता है. अतः यह आवश्यक है कि इसे कमसे कम वंश-परम्परा से न रहने दिया जाय.

कानून के द्वारा ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वही व्यक्ति पुरोहिताई कर सकेगा, जो राज्य द्वारा निर्धारित परीक्षा पास कर ले. गैर-सनदयाफ्ता पुरोहितों द्वारा कराये गए कर्मकांड क़ानून की दृष्टि में अमान्य होने चाहिए, और बिना लाइसेंस पुरोहिताई करना अपराध माना जाना चाहिए. पुरोहित राज्य का कर्मचारी होना चाहिए और उस पर राज्य सरकार का अनुशासन लागू होना चाहिए. आई.सी.एस.अधिकारियों की तरह पुरोहितों की संख्या भी राज्य द्वारा निर्धारित होनी चाहिए. भारतवर्ष में लगभग सभी व्यवसाय विनियर्मित हैं. डॉक्टरों, इंजीनियरों व वकीलों को अपना पेशा आरम्भ करने से पहले अपने विषय में दक्षता प्राप्त करनी पड़ती है.  

इन लोगों को अपने जीवन में न केवल देश के नागरिक व अन्य कानूनों के पाबंद रहना पड़ता है, वरन अपने विशिष्ट पेशे से सम्बंधित विशिष्ट नियम व नैतिकता का पालन भी करना पड़ता है. .. हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग न किसी कानून की बंदिश में है न किसी नैतिकता में बंधा हुआ है. वह केवल अधिकार व सुविधाओं को पहचानता है, कर्तव्य शब्द की उसे कोई कल्पना ही नहीं है. यह एक ऐसा परजीवी कीड़ा है जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है.

अतः इस पुरोहित वर्ग को मेरे द्वारा सुझाई गयी नीति से कानून बनाकर नियंत्रित किये जाना आवश्यक है. कानून इस पेशे का द्वार सबके लिए खोलकर इसे प्रजातान्त्रिक रूप प्रदान कर देगा. ऐसे कानून से निश्चय ही ब्राह्मणशाही समाप्त हो जायेगी. इससे जातिवाद, जो ब्राह्मणवाद की उपज है, समाप्त करने में सहायता मिलेगी.’

बहरहाल सदियों की भांति स्वाधीन भारत में भी ब्राह्मणशाही से त्रस्त अ-ब्राह्मण जातियों के बुद्धिजीवियों ने डॉ. आंबेडकर से ब्राह्मणशाही के खात्मे का अचूक मन्त्र पाकर भी कभी ‘पौरोहित्य के पेशे के प्रजातांत्रिकरण की मांग नहीं उठाया ,इसलिए ब्राह्मण आज भी आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक शक्ति पर कुंडली मारे बैठे हैं. किन्तु आज जबकि दलितों ने हनुमान के मंदिर पर कब्ज़ा जमाकर, ब्राह्मणशाही के खात्मे की अभिनव पहल की है, हमें उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सामने आना चाहिए. ऐसा होना पर दूसरी जातियां भी अपने-अपने जातियों के देवताओं के मंदिरों पर कब्ज़ा जमाने के लिए आगे आएँगी. इससे ऐसे दिन आ सकते हैं, जब हम पाएंगे कि रावण-परशुराम के मंदिरों को छोड़कर शेष मंदिर ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त हो चुके हैं.

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.संपर्क:9654816191