कुछ महीने पहले से ही अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के वर्गीकरण के समानांतर एक मसला उठाया गया है जो पिछड़ी जातियों की जनगणना से सम्बंधित है। इंडिया टुडे के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल जी ने भी एक लेख लिखा जिसमें तमाम तर्कों के आधार पर यह जाहिर किया गया कि आपको जातियों के वर्गीकरण से पहले ठहरना है और बहुत कुछ सोचना समझना है।

इसतरह का लेख क्यों लिखा गया मुझे नहीं पता है, लेकिन मेरी समझ से यह स्पष्ट तरीके से किसी के प्रतिनिधित्व रोकने का अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष तरीके से एक नया ब्राह्मणवादी तरीका है. आप किन आधारों पर लाखों लोगों के प्रतिनिधित्व को 2021 तक या आगे के वर्षों तक ठहरने की बात करते हैं, जब आप खुद ओबीसी, अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) का आरक्षण वर्ष 1931 की जनगणना के आधार पर पा रहें हैं? या फिर आप इस बात पर राजी होईये कि जब तक जनगणना नहीं होता है कोई भी ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं लेगा। क्या आप तैयार है? यह तो वही मामला हो गया कि अंगूर खाइये और दूसरे को बताईये की अंगूर खट्टे हैं!

मै बिल्कुल मानती हूं कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए, आरक्षण लागू होना चाहिए और भी कई तमाम चीज होनी चाहिए लेकिन जो भी चीज होगी वह अतिपिछड़ा और पासमंदा के प्रतिनिधित्व के कीमत/ देरी पर नहीं होनी चाहिए। कुछ लोग जो घर की दुहाई देते हैं कि अतिपिछड़ा और पसमन्दा के आरक्षण मिलने से उनका “घर” टूट जाएगा तो वो ये पहले तय कर लें कि घर का मतलब क्या है और उनके घर में कौन कौन से जातियाँ शामिल हैं क्योंकि जब एससी, एसटी ओबीसी का आरक्षण मिला था तो सवर्णों ने भी “घर” टूटने का इल्जाम लगाया था।

स्टेट ने जो केटेगरी (जातियों का वर्ग) तय की है वो आपका निजी क्षेत्र यानी घर कैसे हो गया? ये पोलिटिकली इंकरेक्ट (राजनीतिक रूप से गलत) बात है। दक्षिण भारत के राज्यों और और बिहार सहित कई राज्यों में अतिपिछड़ा और ओबीसी का वर्गीकरण है लेकिन वहाँ तो पिछड़े जाति के लोग यूपी से और बेहतर राजनीति कर रहे हैं. फिर ऐसा क्यों दिखाया जा रहा है कि पहली बार उत्तर प्रदेश में ही अतिपिछड़ा और पसमंदा नामक प्राणी पाया गया है, जो खतरनाक है?

विशेष: (१) महाराष्ट्र में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) को बेहतर तरीके से समाज में लागु करने के लिए जातियों को छः भागो में बांटा गया है. (२) उत्तर प्रदेश में पहले पिछड़ा और अति पिछड़ा का वर्गीकरण था जिसे बाद में समाप्त कर दिया गया था. – संपादक

अगर बहुजनों के बीच से कुछ जातियाँ अपने प्रतिनिधित्व को कम बता रही हैं तो हम सभी को उनका ध्यान रखते हुए डिमांड और प्रोटेस्ट करना चाहिए, तभी  बहुजन चेतना विकसित होगी और तब एक इमेजिनरी घर बन पाएगा।

जो लोग अतिपिछड़ा, पासमंदा आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, और जिनका घर टूटा जा रहा है क्या उन लोगों ने अतिपिछड़े पासमंदा पर कोई रिपोर्ट,डॉक्यूमेंट,आर्टिकल पढ़ा है? क्या तथ्यत्मक रूप से सोचने का प्रयास किया है? अगर नहीं किया है तो मेरा विनम्र निवेदन की दोस्त अतिपिछड़ा पसमन्दा पर कुछ पढो और तथ्यत्मक विचार ले आकर वैचारिक न्याय करो।

इसी संदर्भ में जेएनयू के शोधछात्र धर्मराज कुमार का एक स्टेटमेंट है कि, जो खुद ही समाज के सबसे निचले पायदान पर शोषित है वो जब भी किसी पद पर जाएगा तो वो तुलनात्मक रूप से जमींदारों से तो कम ही शोषण करेगा और भाई भतीजावाद की भी कम संभावना रहेगी।

ये तो वही हाल हो गया है कि बिना आरक्षण को पढ़े जैसे सवर्णों को लगता है कि आरक्षण ही देश को ले डूबा है और उनका भी “घर” टूट गया है, ऐसे ही बहुजनों में कुछ लोगों को बिना कुछ इस मामले में पढ़े लगता है कि, उनका “घर” तोड़ने की साजिश चल रहे हैं। उम्मीद है मेरे समझदार,बहुजन हितैषी दोस्त उन रिपोर्ट्स ,आर्टिकल को पढ़ेंगे। आर्टिकल, रिपोर्ट जिन साथियों के पास इससे संबंधित दस्तावेज हों वो भी जानकारियां साझा करेंगे।

दोनों चित्रों में क्रमशः दो अखबारों (फ्री प्रेस जनरल, 2-8 फरवरी, 1986 एवं सन्डे मेल 2-8 मार्च, 1986) के स्टेटमेंट हैं। मान्यवर कांशीराम साहब भी पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण को मानते थे और साथ ही यह भी मानते थे कि पिछड़ा वर्ग एक समजातीय (होमोजीनीयस) कैटेगरी नहीं है। उन्होंने अपने वाक्यों में, “आगे बढ़े हुए पिछड़े” और “पहला ऊपरी तबका” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है. अभी भी समझ जाईये और ओबीसी वर्गीकरण की मांग को आगे बढाईये तभी हम समतामूलक समाज की स्थापना में अपना-अपना योगदान दे पाएंगे।