वर्ष 2018 पीछे छूट रहा है और हम 2019 के स्वागत की मानसिक प्रस्तुति ले रहे हैं. किन्तु वर्ष 2018 में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक-सांस्कृतिक, खेल-कूद और मनोरंजन जगत में कई ऐसी घटनाएँ हुईं है, जिनकी अनुगूँज आने वाले वर्षों में भी सुनाई पड़ेगी.

भीमा कोरेगांव का शौर्य दिवस!

आने वाले दिन-महीने ही नहीं, अगले कुछ वर्षों तक कौन भूल पायेगा इस साल के पहले दिन की पूणे के कोरेगाँव वाली घटना. उस दिन ऐतिहासिक कोरेगांव युद्ध, जिसमें 500 महारों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से युद्ध करते हुए पेशवा के 28000 सैनिकों को शिकस्त दिया था, की याद में बने भीमा कोरेगांव स्तम्भ को देखने के लिए लाखों लोग पहुंचे थे. ऐसा इसलिए कि जिस युद्ध की याद में यह स्तम्भ बना था,उसके 200 साल पूरे हुए थे.

31 दिसंबर, 1818 को कोरेगांव युद्ध हुआ था जो अगले दिन अर्थात 1 जनवरी, 1818 तक चला था. यह उस पेशवाई के खिलाफ दलितों के अनुपम शौर्य का दृष्टान्त था, जिस पेशवाई ने उनको तमाम मानवीय अधिकारों से शून्य कर, उन्हें विशुद्ध नर-पशु में तब्दील कर दिया था. ऐसे बेनजीर अमानवीय सत्ता को उखाड़ फेंकने में वीर महारों ने जिस शौर्य का प्रदर्शन किया, उसकी प्रतीक बने कोरेगांव स्तभ से प्रेरणा लेने खुद बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर भी पूणे आया करते थे.

भीमा कोरेगांव के इतिहास से अवगत होने के बाद यहाँ साल दर साल आंबेडकरवादियों की भीड़ बढती गयी, जो इस वर्ष शौर्य दिवस के 200 साल पूरे होने के कारण लाखों में पहुँच गयी.

किन्तु वर्तमान हिन्दू-राज में पेशवाई मानसिकता से पुष्ट लोगों को लाखों की तादाद में दलितों का वहां पहुंचकर अपने योद्धा पुरुखों को स्मरण करना रास नहीं आया, लिहाजा उन्होंने निहत्थे आंबेडकरवादियों पर हमला कर कोरेगांव को युद्ध-स्थल में परिणत कर दिया. इस घटना की अनुगूँज पूरे देश में सुनाई पड़ी. शहर-शहर में दलितों ने इसके प्रतिवाद में जुलुस निकाल कर पेशवावादियों के होश उड़ा दिए. इस घटना ने बहुजनों की साईक में बड़ा बदलाव ला दिए.

बाद में शौर्य दिवस की महत्ता को म्लान करने के लिए अगस्त-28 को देश के कुछ नामचीन वामपंथी विचारक-एक्टिविस्टों को गिरफ्तार कर घटना को भिन्न मोड़ देने की कोशिश हुई. यह मामला अब भी कोर्ट के विचाराधीन है.

इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान मुंबई पुलिस ने भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार करने के कुछ घंटे बाद आजाद कर दिया है. इस घटना को भी लोग भीमा कोरेगांव की घटना से जोड़कर देख रहे हैं.

ऐतिहासिक 2 अप्रैल: दलितों का स्वतःस्फूर्त अभूतपूर्व भारत बंद!

कोरेगांव की घटना से दलितों की साईक में जो बड़ा बदलाव आया, उसका जबरदस्त प्रतिबिम्बन 2 अप्रैल, 2018 को हुआ. उस दिन एससी/ एसटी एक्ट को कमजोर करने के सरकार के कदम के खिलाफ देश के तमाम के अंचलों में लाखों की तादाद में दलित स्वतःस्फूर्त रूप से सड़कों पर उतरे. इसके पीछे न तो किसी नेता और न ही किसी राजनीतिक दल व संगठन की विशेष भूमिका रही. स्वाधीन भारत के इतिहास की यह अभूतपूर्व  घटना थी, जिसके प्रभाव से परवर्तीकाल में केंद्र सरकार को एससी/ एसटी अपराध निवारण एक्ट को पूर्ववत बनाये रखने का आश्वासन देना पड़ा.

हिंदुत्ववादियों से मोह-मुक्त हुआ: ओबीसी समुदाय!

2 अप्रैल, 2018 के अभूतपूर्व भारत-बंद की सफलता में पिछड़े वर्ग की लोगों की भी भूमिका था, यह बात चर्चा में जरुर आई, किन्तु इसका प्रमाण मिला 6 सितम्बर, 2018 को सवर्णों के भारत बंद से. उस दिन सवर्णों के 35 संगठनों ने उस एससी/ एसटी एक्ट के खिलाफ भारत बंद का आह्वान किया, जिस एक्ट की जद में पिछड़े भी आते हैं.

सवर्णों को पूरा भरोसा था इस बंद में ओबीसी के लोग भी उनके साथ सड़कों पर उतरेंगे. किन्तु वह बंद पूरी तरह फ्लॉप रहा, जिसके पृष्ठ में रही पिछड़ा वर्ग की उदासीनता. सवर्णों के सोशल पुलिस के रूप में जाने जानेवाले पिछड़े उनके साथ सड़कों पर न उतर कर यह साबित कर दिए कि 2 अप्रैल, 2018 के ऐतिहासिक बंद में उनकी भूमिका को लेकर जो चर्चा समाज विज्ञानियों में हो रही थी, वह गलत नहीं थी.

पिछड़े वर्ग की मानसिकता में निर्विवाद रूप से बदलाव आ गया है, इस बात का दावा कोई चाहे तो 25 नवम्बर, 2018 को विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा आहूत धर्म-सभा की विफलता के आधार द्विधा-मुक्त होकर कर सकता है. आयोजकों को उम्मीद थी की राम-मंदिर निर्माण के लिए आयोजित धर्म-सभा में लाखों की भीड़ जुटेगी. उनकी उम्मीद के केंद्र था पिछड़ा वर्ग.किन्तु इस वर्ग ने उसे पूरी तरह नकार कर एक ऐसा सन्देश दे दिया है, जिसे देश धर्मोन्माद की आग में झोंकने की परिकल्पना करने वाले लम्बे समय तक याद रखेंगे.
मॉब लिंचिंग की विश्व राजधानी बनता भारत

वर्ष 2018 दलित-पिछड़ों का हिंदुत्ववादियों से दूरी बनाने के लिहाज से जितना ही खास रहा, उतना ही इस देश के लोगों का जानलेवा भीड़ में तब्दील होना चिंता का विषय भी रहा. आज मोदी-योगी राज में गौरक्षा, लव जिहाद, बच्चा चोरी इत्यादि के नाम पर भारतीय कानून को हाथ में लेने के जिस तरह अभ्यस्त बनते जा रहे हैं, उससे यह देश मॉब लिंचिंग के लिहाज से दुनिया की राजधानी के रूप कुख्यात हो चला है.

यूं तो इस मॉब लिंचिंग के निशाने पर मुख्यतः मुस्लिम और दलित समुदाय के लोग हैं, किन्तु कभी-कभी खुद सवर्ण भी इसकी जद में आ जा रहे हैं,जैसे कि 3 दिसंबर, 2018 को बुलंद शहर में कोतवाल सुबोध कुमार सिंह आ गए. 2018 के शेष महीने की इस घटना ने मॉब लिंचिंग से लोगों की चिंता में और इजाफा कर दिया है.            

चंद्रशेखर की रिहाई

 सितम्बर के दूसरे सप्ताह में हुई भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर आजाद की रिहाई एक ऐसी घटना रही, जिसे सहज नजरंदाज नहीं किया जा सकता. सहारनपुर के आसपास के अंचलों में प्रभुत्वशाली जातियों के खिलाफ दलित प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में उभरे चंद्रशेखर को बेवजह गलत मामले में बेहद कड़ी और काली धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था.

लेकिन हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी जिस तरह से जबरन नयी-नयी धाराएँ लगाकर उन्हें साल भर से ज्यादा जेल में बनाये रखा गया था, उससे दलित समाज, विशेषकर दलित युवाओं में उनके प्रति सहानुभूति और सरकार के प्रति आक्रोश पनपते जा रहा था. अंततः योगी सरकार को सद्बुद्धि आई और उसने सितम्बर में रिहा कर दिया. उनकी रिहाई से दलित युवाओं में अच्छा-खास उत्साह का संचार हुआ है.

दलित राष्ट्रपति तक हिन्दुओं के लिए अस्पृश्य!

हिन्दू समाज अब अस्पृश्यता की पुरातनपंथी सोच से उबर चुका है, इस अवधारणा की पूरी के जगन्नाथ मंदिर में राष्ट्रपति के साथ हुए दुर्व्यवहार ने धज्जियां विखेरकर कर दिया.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपनी पत्नी सविता के साथ 18 मार्च, 2018 को ओड़िसा के विश्वविख्यात जगन्नाथ पूरी मंदिर के दर्शन के लिए गए थे. मंदिर में कोविंद दंपत्ति को लेकर भारी सुरक्षा व्यवस्था तैनात की गयी थी, लेकिन उनके मंदिर दर्शन के दौरान कुछ सहायक सुरक्षा प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए उनके करीब पहुँच गए और उन्होंने इस वीवीआईपी दंपति के साथ न सिर्फ धक्का-मुक्की की, बल्कि कोहनी से उन्हें टक्कर भी मारी.

बाद में घटना के प्रकाश में आने पर इसे लेकर बौद्धिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुआ. इस घटना ने बता दिया कि अस्पृश्यों के प्रति उच्च वर्णीय हिन्दुओं की मानसिकता में कोई खास फर्क नहीं नहीं आया है.

जब वे देश के नंबर एक पद पर आसीन दलित के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हैं, तो आम दलितों के साथ क्या कर सकते हैं, इसका प्रमाण दुनिया ने देख लिया.

अब आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है

विश्व के सर्वाधिक विषमतामूलक भारत समाज में गैर-बराबरी के खात्मे का सबसे प्रभावी माध्यम है आरक्षण. अगर कार्ल मार्क्स के अनुसार दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है तो भारत में वह वर्ग-संघर्ष आरक्षण में क्रियाशील रहा, जिसमें 7अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया.

उसके बाद शासक वर्ग 24 जुलाई, 1991 को नवउदारवादी नीति को हथियार बनाकर आरक्षण के खात्मे की दिशा में अग्रसर हुआ. उसे ऐसा करते देख आरक्षित वर्गों के लोग आरक्षण बचाने की लड़ाई में कूद पड़े. किन्तु कामयाब रहा शासक वर्ग. उसने उदारीकरण, निजीकरण, विनिवेशीकरण इत्यादि के जरिये आरक्षण को महज कागजों की शोभा बनाने की जो परिकल्पना की, उसमें वह सफल हो गया.

इसका प्रमाण 5 अगस्त, 2018 को वर्तमान केन्द्रीय सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी से मिल गया. उस दिन उन्होंने खुला एलान कर दिया, “चूँकि सरकारी नौकरियां नहीं है, इसलिए अब आरक्षण का भी कोई अर्थ नहीं रह गया है”.

इसे लेकर आरक्षित वर्गों में कोई हलचल पैदा होती, उसके पहले ही 26 सितम्बर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण के मसले पर एससी/एसटी के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुना दिया. कोर्ट बारह साल पहले के अपने फैसले को बदलते हुए पदोन्नति में आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया. इसके साथ ही लम्बे समय से चली आ रही कानूनी अड़चनों और अटकलबाजियों पर विराम लग गया.

बहरहाल जब सरकारी नौकरियां ही ख़त्म प्राय हो चुकी है तब एससी/ एसटी को इसका कोई बड़ा सुफल मिलने से रहा.बावजूद इसके ढेरों दलितों ने इसे अपनी विजय के रूप में देखा है.

दलित शब्द को निषेध करने का सरकारी फरमान!

महाराष्ट्र हाई कोर्ट के एक निर्णय के बाद, सितम्बर, 2018 के पहले सप्ताह में केंद्र सरकार की ओर से निर्देश जारी हुआ कि टीवी चैनल, सरकारी अधिकारी और अख़बार शेडयूल्ड कास्ट के लोगों के लिए “दलित” शब्द का इस्तेमाल न करें. दलित स्वाभिमान और आक्रोश का प्रतीक बने इस खास शब्द के निषेध के खिलाफ बहुजन साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई. इस वर्ग के लोगों ने “मैं दलित हूँ”, “मैं दलित हूँ” … के उद्घोष से सोशल मीडिया को भर दिया. इसी निर्देश का बहाना बनाकर दिल्ली यूनिवर्सिटी ने कांचा इलैया सहित कई चिंतको का किताब अपने सिलेबस से हटा दिया कि इसमें दलित शब्द का इस्तेमाल हुआ है.

फिल्म इतिहास की अभूतपूर्व कृति: काला!

फिल्म काला का पोस्टर

भारतीय फिल्मोद्योग के लिये यह वर्ष खास रहा. बेहद विवादों से घिरी ‘पद्मावत’ फिल्म ने साल की शुरुआत में बॉक्स ऑफिस पर जो कमाल दिखाया, उसे संजू और खास कर रजनीकांत की 2.0  ने शिखर पर पहुंचा दिया. किन्तु बहुजन समाज के लोगों की जेहन में चिरकाल के लिए जिस फिल्म की जगह बनी, वह रही रजनीकांत की ही ‘काला’. इसे बहुजन बुद्धिजीवियों ने सौ साल के इतिहास में पहली ऐसी फिल्म करार दिया, जिसमे  विशेषाधिकारयुक्त तबकों की सामाजिक व्यवस्था और प्रभुत्व के खिलाफ विद्रोह का खुला उद्घोष हुआ है. जय श्रीराम की जगह जय भीम बोलने वाले काला के चरित्र में कईयों को पेरियार की झलक दिखी.

छाए रहे श्रमजीवी जातियों के खिलाड़ी  

क्रिकेट को धर्म समझने वाले भारत के लिए निश्चय ही यह वर्ष भारी संतोषजनक रहा. इस वर्ष विराट कोहली के नेतृत्व में भारतीय टीम में अपनी उपलब्धियों में और इजाफा किया. पर, अगर टीम के रूप में हमारी क्रिकेट टीम में गर्वित और हॉकी टीम ने शर्मसार किया तो व्यक्तिगत स्पर्धाओं में उत्पादक जातियों में जन्में पहलवान बजरंग पुनिया, बॉक्सर मैरोकोम, जिमनास्ट दीपा कर्मकार, हिमा दास और प्रभात कोली ने देश का मान बढाया.

इनमें हिमा दास और प्रभात कोली ने अलग से ध्यान खींचा.

असम के एक अवर्ण समाज के खेतिहर परिवार में जन्मी हिमा दास ने जहां जुलाई में फ़िनलैंड के टेम्पेयर शहर में 400 मीटर की दौड़ में गोल्ड मैडल जीतकर पहली भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया, वही महाराष्ट्र के एक मछेरे परिवार में जन्मे प्रभात कोली ने लम्बी दूरी की तैराकी में कई नए कीर्तिमान स्थापित कर हैरत में डाल दिया. मिहिर सेन और बुला चौधरी की पंक्ति में जगह बनाने की सम्भावना जगाने वाले कोली ने जहां जुलाई में जर्सी से फ़्रांस तक इंग्लिश चैनल की 25 किमी की दूरी 6 घंटे 54 मिनट में पूरा कर पहला एशियाई होने गौरव प्राप्त किया,वहीं अगले महीने 4 अगस्त, 2018 को आयरिश चैनल के 34 किमी की दूरी 10 घंटे 41 मिनट में तय कर हिस्ट्री के सबसे युवा तैराक के रूप में नाम दर्ज करा लिया.

बहुसंख्य आबादी बनने जा रही है आर्थिक रूप से गुलाम!  

बहरहाल 2018 ढेरों खट्टी-मिट्ठी यादें छोड़कर विदा ले रहा है, किन्तु जिस कारण से यह वर्ष आने वाले दिनों में देश को प्रभावित करता रहेगा, वह है धन-दौलत का असमान बंटवारा.

वर्ष के पहले ही महीने अर्थात 22 जनवरी, 2018 को आई ऑक्सफाम की रिपोर्ट ने बतला दिया कि भारत जैसा धन-दौलत का असमान बंटवारा दुनिया में कही और नहीं है. रिपोर्ट से पता चला कि भारत की जिस टॉप की 1% आबादी का सन 2000 में 37% धन-संपदा पर पर कब्ज़ा, वह 2017 के अंत में 73% तक पहुँच गया है. इसमें सबसे चौकाने वाली बात यह थी कि इस वर्ग का 2016 में 58.5% पर ही कब्ज़ा था जो, आश्चर्यजनक रूप से एक साल में लगभग 15% बढ़कर 73% तक पहुँच गया. अगर क्रेडिट सुइसे की 2015 की रिपोर्ट को ध्यान में रखा जाय तो पता चलेगा यह साल टॉप 10% आबादी के 90% से अधिक धन-संपदा पर कब्जे का एलान कर गया है. इस वर्ष की कई रिपोर्टों से यह तथ्य भी सामने आ चुका है कि नीचे की 60% आबादी सिर्फ 4.7% धन-संपदा पर गुजर-बसर करने के लिए अभिशप्त है.

बहरहाल विभिन्न रिपोर्टों में धन-दौलत के भयावह असमान बंटवारे का जो चित्र उभरकर आया है, उससे स्पष्ट हो गया है कि बहुसंख्य आबादी आर्थिक रूप से गुलामी के दलदल में फँस चुकी है.

दलित संगठनों ने शुरू किया धन-दौलत के असमान बंटवारे के खिलाफ आन्दोलन!  

2018 में धन-दौलत के भयावह असमान बंटवारे का जो चित्र उभरकर आया, उससे मार्च, 2018 से बहुजन लेखकों के संगठन ’बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे का अभियान छेड़ दिया. इसके तहत यह संगठन देश के डेढ़ दर्जन जिलों में धन-दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए जागरूकता का सघन कार्यक्रम चला रहा है. इस असमान बंटवारे से त्रस्त होकर अखिल भारतीय आंबेडकर महासभा के बैनर तले विद्या गौतम ने सरकारी और निजीक्षेत्र की नौकरियों, सप्लाई, डीलरशिप ठेकेदारी,पार्किंग-परिवहन  इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिबिधियों का, सभी प्रमुख समाजों के संख्यानुपात बंटवारा कराने के लिए 8 अगस्त, 2018 से भूख हड़ताल किया जो चालीस दिनों से अधिक चला, जिसमें 4000 से अधिक लोग लगातार साथ दिए.

आज अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों का विभिन्न समाजों के मध्य वाजिब बंटवारा कराने के लिए दलितों के नित नए-नए संगठन सामने आ रहे हैं.

वर्ष 2018 के विदा लेते-लेते धन का न्यायपूर्ण बटवारा सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है, जिससे आने वाले साल प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते.