कनकलता यादव दिल्ली में 29-30 नवंबर, 2018 को हुए किसान मुक्ति मार्च और अन्य आंदोलनों ने सन्दर्भ में बता रहीं हैं कि कैसे समाज के तथाकथित संभ्रांत, बुद्धिजीवी और सवर्ण समाज आपके साथ होने का दिखावा करते हुए आपके साथ छल करता है. इस समाज के प्रकृति और व्यवहार को वे तीन उदाहरणों से समझाने की कोशिश के साथ सवाल भी उठा रहीं हैं.  इस लेख के साथ उन्होंने स्पस्टीकरण भी भेजा है कि वे किसान मुक्ति मार्च का पूरी तरह सम्मान करती हैं और उसमें शामिल किसानों और किसानों के बच्चों को सलाम पेश करती हैं. उनका आग्रह है कि लेख के बारे में कोई भी राय बनाने से पहले इसे पूरा पढ़ा जाए और उनसे सवाल जबाब किया जाए. आप लेख पर कमेंट कर अपनी प्रतिक्रिया दें – संपादक

पिछले दो दिन (29-30 नवंबर, 2018) दिल्ली में रहने वाले लोग किसान और किसानों की पीड़ा से रू-ब-रू होने के लिए किसानो के समर्थन में उनके रैली में गए थे, जिसमें बड़े पत्रकार, प्रभुत्व वर्ग के लोग, शोधार्थी, प्रोफेसर भी शामिल थे, जो कि तारीफ के काबिल है।

मैं यहाँ तीन बातें ऑब्सर्व (अवलोकन) कर रही थी कि एक विशेष वर्ग के लोग (१) किन प्रोटेस्ट में जाना अपना  प्रिविलेज समझते हैं, (२) किन प्रोटेस्ट (विरोध प्रदर्शन) में सचमुच जाना चाहते हैं, और (३) किन विषयो पर प्रोटेस्ट होने मात्र को ही खारिज कर देते हैं.

इस संदर्भ में मुझे कई प्रोटेस्ट याद आ रहें हैं –
पहला आंदोलन: अलोकतांत्रिक शिक्षा विरोधी UGC का राजपत्र, 25 मई, 2016

मुझे, इनमें से विश्विद्यालय अनुदान आयोग (University Grant Comission/ यूजीसी/ UGC) के राजपत्र (गजट) के खिलाफ हुए आंदोलन मुझे विशेष रूप से याद आ रहा है.

सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे इस आंदोलन में शामिल लोगो में से M.Phil. और Ph.D. कर रहे 9 शोधार्थियों को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू/ JNU) ने निलंबित कर  दिया और तमाम अन्य छात्रों को लागातर कई नोटिस भेजकर पडताडित किया गया और कई लोगो को हॉस्टल ट्रांसफर किया गया.

2016 में UGC गजट के खिलाफ लड़ने वाले जिनमें बर्खास्त किए गए 9 स्टूडेंट भी शामिल हैं सभी भी किसान, मजदूर, बेरोजगार, जाति-बहिष्कृत, जातिगत भेदभाव से पीड़ित समाज के परिवारों से ही थे. ऐसे में आप एक मार्मिक और द्विभाजित मोड ऑफ प्रोटेस्ट, मोड ऑफ बेहवीयर ऑब्सर्व करेंगे या उनके लिए लड़ेंगें. क्या वही दिल्ली और वही जेएनयू कैम्पस उन्ही किसानों, मजदूरों के बच्चों के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं रखता था? या आज भी कोई उत्तरदायित्व नहीं है?

इसी दिल्ली में और इसी जेएनयू में उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है. चंदा मांगकर, मदद मदद मांग कर, घर से पैसा लेकर, कर्जा लेकर सभी आंदोलनकारी स्टूडेंट्स ने अपना फाइन भरा, कोर्ट गए और अंततः 70% लिखित और 30% का साक्षात्कार का आंदोलन जीतकर आएं और अपना पीएचडी भी लिखे.

इसे रविश कुमार जैसे पत्रकारों ने खबर का मुद्दा नहीं समझा और न ही दिल्ली में बैठे लोगों ने यह दावा किया कि, किसान मजदूरों के बच्चों के बर्खास्तगी के खिलाफ हम लड़ेंगे या कम से कम संसद मार्च या अन्य तरीके से विरोध या कुछ करेंगे.

नोट: UGC के 25 मई, 2018 के नोटिफिकेशन के अनुसार M.Phil. और Ph.D. में एडमिशन व्यावहारिक रूप से 100% साक्षात्कार पर निर्भर करता। – संपादक 

दूसरा आंदोलन: ST, SC एक्ट में बदलाव के खिलाफ 2 अप्रैल, 2018 का आंदोलन

दूसरा आंदोलन 2 अप्रैल, 2018 का है, जिसमें वही चीजें पुनः दोहराई गई.

यह आंदोलन, एक जन आंदोलन था. इसमें देश भर के साधारण लोगो ने बच्चे से लेकर बूढ़े तक, थर्ड जेंडर सहित स्त्री से लेकर पुरुषो तक, ने अपनी प्रतिभागिता दर्ज कराई. यह देश के साधारण लोगो का आंदोलन था.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ST SC एक्ट पर निर्णय का विरोध होना चाहिए, इसके लिए भी संसद मार्च होना चाहिए इसका एहसास दिल्ली के विद्वानों को नहीं हुआ.

तीसरा आंदोलन: बाबासाहेब के मूर्तियाँ तोड़ने का विरोध

आज़ादी के बाद से यह आंदोलन देश के हर गांव-शहर में हो रहा है. आज सामाजिक जागरूकता के कारण गाँव से लेकर शहर तक बहुजन समाज के प्रतिक (आइकॉन) के मूर्तियां लग रहीं है. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की भी मूर्तियां लग रहीं है. लेकिन साथ ही उनकी मूर्तियां तोड़ी भी जा रही है.  इसके खिलाफ स्थानीय स्तर पर लोग विरोध कर रहें हैं. अपने आइकॉन के लिए लड़ाई लड़ रहें हैं. लेकिन दिल्ली को इसपर एक बार भी सोचने को मन नहीं करता है. वह इसके खिलाफ संसद मार्च करने की नहीं सोचता है.

ऊपर के तीन छोटे उदाहरणों द्वारा यह आसानी से समझा जा सकता है कि समाज के बुद्धिजीवी माने जाने वाला वर्ग की समझ कैसी और क्या है?

भारत में तोड़कर गिरा दी गई आंबेडकर की मूर्ति। Credit: http://www.sgrhf.org.pk/tension-prevails-in-parts-of-madurai-district-after-miscreants-damage-ambedkar-statue/ 

इसमें एक छुपा हुआ भेद-भाव भी है कि किसान का हक मारा जाएगा तो संसद चले जायेंगे लेकिन किसान का बेटी-बेटे को जब किसी ऊँचे संस्थान में जाने से रोका जाएगा या तमाम बाधाओं के बिच संघर्ष करते हुए वह ऊँचे संस्थान में पहुँच भी गया लेकिन उसे सिर्फ इसलिए बर्खास्त कर दिया गया कि वह सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहा था तब कोई विरोध नहीं करेंगे.

बल्कि एक स्टेटमेंट देंगे कि रिजर्वेशन (ज्यादातर बहुजन ही छोटी जोतों के किसान हैं या भूमिहीन हैं तो मजदूरी करते हैं) लागू होने से यूनिवर्सिटी का स्टैंडर्ड गिर रहा है. लेकिन दूसरी और लिखित में किसान मजदूर का बेटी बेटा कितना भी अच्छा नम्बर क्यों न लाये उसे 30 में से 0 से 5 नम्बर ही देंगे ताकि उसका चयन हो तो सिर्फ आरक्षित श्रेणी में या फिर उसका चयन न हो और वह यूनिवर्सिटी सिस्टम से से बाहर हो जाये.

अब आप बताइए इस प्यार को क्या समझा जाए?

इस देश का किसान क्या करेगा? किसान का लड़की लड़का मेहनत करके, शोषण सहते हुए, तमाम बाधाओं से लड़ते हुए, अगर किसी तरह पीएचडी कर भी लिया तो उसे नौकरी ही नहीं मिलेगा क्योंकि चयन में शामिल सवर्ण समाज के लिए वह “नॉट फाउंड सूटेबल फॉर द पोस्ट” अर्थात वह “पद के लिए योग्य नहीं पाया गया” की श्रेणी में है. निष्कर्ष यह है कि किसान का लड़की-लड़की किसी तरह पीएचडी कर भी लिया तब भी वह किसान ही रहेगा क्योंकि उसे नौकरी नहीं मिलेगी तो वह खेती ही करेगा. लेकिन बाकी दुनिया उसके लिए संसद मार्ग पर धरना प्रदर्शन करेगी, और नारा देगी कि “दुनिया के मजदूरों एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है”.

विशेष: UGC Gazette पर बापसा का विरोध प्रदर्शन  – संपादक 

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