मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. लेकिन जन्म से वह एक जैविक प्राणी होता है. जैविक से सामाजिक प्राणी होने की प्रक्रिया को समाजीकरण कहतें हैं. समाजीकरण एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा बचपन में हो पूरा हो जाता है. वहीँ यह तय हो जाता है कि हम क्या और कैसे सोचेंगें? हम किसी खास परिस्थिति में हम कैसे प्रतिक्रिया करेंगें. ऐसा नहीं है कि यह बाद में यह मानसिक स्थिति नहीं बदलता है लेकिन इसकी प्रक्रिया बहुत धीमी होती है.

समाज में समाजीकरण की प्रक्रिया कुछ ऐसी है कि देश की शोषित वंचित समाज उन्हें भी भूल जाता है जिन्होंने उसके लिए अपना जीवन लगा दिया है. इसे मैं तीन घटनाओं से समझना चाहूंगी.

6 दिसंबर का दिन ऐसे ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा है जो दुखद है-
1- बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का परिनिर्वाण
2- पसमन्दा आंदोलन के जनक मौलाना असीम बिहारी का देहावसान
3- बाबरी मस्जिद का ढाह दिया जाना

Dr. B. R. Ambedkar and Maulana Asim Bihari 

आज के ही दिन हुए तीनों घटनाओं का समय जरूर अलग अलग था लेकिन तीनों का डिस्कोर्स इंटरकनेक्टेड अर्थात तीनो का विमर्श एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, और पूरे समाज को प्रभावित करता है.

सबसे ज्यादा रोचक यह है कि यह समाज हमेशा कुछ न कुछ ऐसा करती रहती है जिससे आप बाबासाहेब, मौलाना असीम बिहारी, बाबरी मस्जिद को भूल न पाएं – जैसे- बाबासाहेब की मूर्तियों में संसद की तरफ इशारा करता हाथ, चश्मा या पूरी मूर्ति ही तोड़ देगी, सरकार पसमन्दा (पिछड़े मुस्लिम) से वादा करके अपना वादा ही भूल जाएगी, धर्म के नाम पर दंगे और हत्या करा देगी.

जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं तो तुरंत हमें बाबासाहेब, मौलाना असीम बिहारी, और बाबरी मस्ज़िद का ढाह देना याद आ जाता है.

Babari Masjid Demolition 

यह तो हुई समाज की बात कि डॉ. अम्बेडकर, मौलाना असीम बिहारी और बाबरी से एक खास तबका इतना डरता है कि इन हस्तियों और इन मुद्दों को रोज मारने की कोशिश करता है, लेकिन कमबख्त तीनों जिंदा बचे रहतें हैं और हमारे आपके जैसे लोग अम्बेडकर जिंदा,असीम जिंदा, बाबरी जिंदा के नारे लगाते रहते हैं.

अब आते हैं कि हमारे लिए क्यों ये तीनों जिंदा हैं? हमारे लिए ये क्या मायने रखते हैं और अपने समाजीकरण के प्रक्रिया में हमने कब कितना और कैसे इन्हें जाना है.

मैं अगर अपनी बात करूँ तो मेरे दरवाजे के ठीक सामने बाबासाहेब की मूर्ति थी जिसमें वो संविधान लेकर खड़े थे.

मैंने बचपन में जब भी इस मूर्ति के बारे में जाना तो बस इतना ही कि जो किताब उनके हाथ में है वो इस देश का संविधान है और इस आदमी ने देश का संविधान लिखा है, इसलिए मूर्ति लगायी जाती है.

लेकिन इसके साथ ही जानकारी का विरोधाभास देखिये, इसी उम्र में मुझे मार्क्स, लेनिन, रूस की क्रांति, चीन का समाजवाद, भारत का मार्क्सवाद ये सबका आईडिया था क्योंकि घर के कुछ लोग कम्युनिस्ट थे.

धीरे-धीरे उच्च शैक्षणिक संस्थानों में और कम्युनिस्टों में जातिवाद महसूस करते हुए मुझे लगा कि मेरे समाजीकरण  में मैंने बहुत कुछ खोया है. और भी बहुत सी बातें है, लेकिन फिलहाल इतना ही.

मौलाना असीम बिहारी के बारे में मैंने अपने रिसर्च के दौरान जाना और बहुत दुख के साथ यह महसूस किया कि हम लोगों के लिए जो लोग आजीवन लड़ते रहें उनके बारे में हमें देर से पता चला, वह भी उच्च शिक्षा में आने के बाद. मौलाना असीम बिहारी का नाम आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, महिला अध्ययन, अंतराष्ट्रीय सम्बन्ध आदि के किताबों से गायब है. इससे स्पष्ट जाहिर है हमारी आने वाले कई और पीढ़ियाँ मौलाना असीम बिहारी को नहीं जानेंगी.

Dr. B. R. Ambedkar and Maulana Asim Bihari 

बाबरी मस्जिद को लेकर मेरी समझ पहली बार धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक समझ के परिधि में तो नहीं थी लेकिन इलाहबाद कोर्ट का फैसला आने वाला था, बहुजन समाज पार्टी (बसपा/ BSP) की सरकार थी और बहन मायावती जी मुख्यमंत्री थीं. पुलिस का इतना जबरदस्त बंदोबस्त था कि कोई दंगे जैसी हालात नहीं हुई.

शाम तक मैंने ऑब्जर्व किया कि लोग बात कर रहे थे कि मायावती ने कड़ी व्यवस्था की थी तो कोई दंगा नहीं हुआ. उसके बाद मैंने बाबा जी से पूछा तो उन्होंने सारी घटना बताई और जस्टिस लिब्रहान की रिपोर्ट के बारे में बताया जिसमें 68 लोग दोषी पाए गए थे और सारे इस समय भाजपा के बड़े नेता हैं.

इन तीन शख्शियतों, घटनाओं से मेरा एक बच्चे के तौर पर परिचय कैसे हुआ इसके पीछे सिर्फ यही मकसद है कि समाजीकरण (एक बच्चा समाज से कैसे रूबरू हो रहा है, समाज की विभिन्न गतिविधियों से उसका परिचय कैसे हो रहा है) के महत्व को समझना. क्योंकि बहुत हद तक समाजीकरण ही यह तय करता है कि हम आगे कैसे पॉलिटिक्स करेंगे, किसको आदर्श मानेंगे, किसका मजाक उड़ाएंगे, जेंडर के मामले में क्या सोचेंगे आदि. 

हमारे समाजीकरण से अम्बेडकर, मौलाना असीम बिहारी, बाबरी भले ही भुला दिए गए हो, लेकिन हम सभी को यह जिम्मेदारी लेनी है और तय करना है कि आगे आने वाली पीढ़ियों का हम कैसे समाजीकरण करेंगे. साथ ही सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हमें समाजीकरण के प्रक्रिया को बिना किसी पूर्वाग्रह के समानता के साथ पूरा करना है.

(फोटो क्लेक्शन:फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी, खालिद अनीस अंसारी, और गुरमीत क़ाफ़िर के फेसबुक से)