आज जब पूरी दुनियाँ में हर जगह नस्लवादी भेदभाव, नस्लवादी टिपण्णीयाँ, नस्लवाद के नाम पर मारपीट, हिंसा और यहाँ तक की हत्याएं हो रही हैं, ऐसे में पूरी दुनियाँ में नक्शलवाद के खिलाफ मुहीम चल रही है. यूरोप, अमरीका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, इजराइल, भारत समेत दुनियाँ भर में आये दिन नस्लवादी भेदभाव, नस्लभेदी टिपण्णीयाँ, मारपीट, हिंसा और हत्याओं की घटनाएँ देखने को मिलती हैं. ऐसे समय में एकजुट होकर इसके खिलाफ लड़ना जरुरी हो गया हैं. इस मुहीम में इतिहास के साथ-साथ इतिहासिक व्यक्ति को भी खंगाला जा रहा है.

13 अप्रैल 2015 को जिस दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जर्मनी में महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण कर रहे थे ठीक उसी दिन साउथ अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में कुछ लोगों नें महात्मा गांधी की प्रतिमा पर सफ़ेद पेंट फेककर गाँधी का विरोध कर रहें थें. 

उनके हाथों में तख्तियां थीं जिसपर लिखा था – “नस्लवादी गांधी की प्रतिमा को यहाँ से हटाया जाए”.

14 जून 2016 को भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने घाना विश्वविद्यालय में महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण किया। अनावरण के बाद से ही वहाँ लगातार विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों द्वारा गांधी की प्रतिमा को विश्वविद्यालय से हटाये जाने की माँग की जा रही थी. 

यह विरोध गाँधी के नश्लवादी विचारो का विरोध है, जिससे घाना के लोग आहत हैं. उनकी माँग है कि गाँधी की जगह अफ़्रीका के नायकों की प्रतिमा लगाईं जाए.

विश्वविद्यालय के छात्रों का मानना था कि गांधी अफ्रीकियों के लिए बेहद अपमानजनक शब्द जैसे “काफ़िर” आदि का इस्तेमाल करते थे. वे अफ़्रीकी लोगों की तुलना में भारतीय लोगो को बहुत ज़्यादा श्रेष्ठ मानते थे. इस अर्थ में गांधी की सोच अश्वेतों के प्रति नस्लवादी थी.

12 दिसंबर 2018 को नश्लवादविरोधी आंदोलन  कारण अन्ततः गांधी की प्रतिमा घाना विश्वविद्यालय परिसर से हटा दी गयी.

घाना विश्वविद्यालय के छात्र नेता – नाना अदोमा असारे अदेई ने बीबीसी को बताया कि “गांधी की प्रतिमा का यहाँ होने का मतलब था कि वह जिन विचारो के प्रतीक हैं, हम उनका समर्थन करते हैं. साथ ही अगर वे कथित रूप से नस्लभेदी रवैया का समर्थन करते थे तो मुझे नहीं लगता कि उनकी प्रतिमा विश्वविद्यालय परिसर में होनी चाहिए.”

 

घाना विश्वविद्यालय परिसर से महात्मा गांधी की प्रतिमा को हटाते हुए Removing Gandhi Statute from Ghana University 14-12-2018 Credit Kompas.com

 

 

घाना यूनिवर्सिटी में महात्मा गाँधी के मूर्ति हटाने के बाद जश्न मनाते स्टूडेंट्स

1893-1914 तक 21 वर्षो तक महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रहें और कहा जाता है कि है कि वहाँ से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक अहिंसक आंदोलन “सत्याग्रह” की शुरुआत की और पूरी दुनियाँ को अहिंसा का पाठ पढाया. मार्टिन लूथर किंग जूनियर से लेकर नेल्सन मंडेला तक गांधी के अहिंसावादी विचारों के मुरीद हुए. अभी तक जितनी भी किताबें महात्मा गांधी पर लिखी गयीं उन सभी किताबों में दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद और रंगभेद के खिलाफ गांधी के योगदान को सराहा गया हैं.

इन परिस्थियों में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति की छवि नश्लभेद विरोधी की गढ़ी है थी, आज उसे नस्लवादी कैसे कहा जा रहा है?

महात्मा गाँधी नस्लवादी थे या नहीं इसका विश्लेषण करने के लिए हमें उनके दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान उनके क्रियाकलापो का अधययन और विश्लेषण करना पड़ेगा.

भारतीय मूल के दो दक्षिण अफ्रीकी लेखक अश्विन देसाई और गुलाम वाहिद ने महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका में बिताये गए 21 वर्षों की जटिल जिन्दगी की गहन जाँच-पड़ताल की और एक किताब “The South African Gandhi: Stretcher-Bearer of Empire” लिखकर दावा किया कि गांधी नस्लभेदी और नस्लवादी (racist) थे. अश्विन देसाई जोहान्सबर्ग यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी के प्रोफेसर हैं और गुलाम वाहिद नटाल यूनिवर्सिटी में हिस्ट्री के प्रोफेसर हैं.

यह किताब गांधी के अफ्रीका छोड़ने के लगभग 100 साल बाद आया. इस किताब ने इतिहासकारों को गांधी के दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्षों के प्रवास के दौरान उनके क्रियाकलापों पर एक बार फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया.

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प्रोफेसर देसाई और वाहिद कहते हैं कि उन्होंने इस किताब में केवल वही लिखा हैं जिसका जिक्र गांधी ने खुद अपने डॉक्यूमेंट और ऑटोबायोग्राफी में किया है.

प्रोफेसर देसाई और वाहिद के अनुसार गांधी न केवल नस्लभेदी थें बल्कि वे अंग्रेजों के पिछलग्गू भी थें.

गांधी अफ़्रीकी लोगों के लिए बर्बर, जंगली, गंवार और काफिर जैसे निकृष्ट और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते थे.

गांधी ब्रिटिश शासकों से हमेशा कहा करते थे कि भारतीयों और अफ्रीकियों को एक ही तरह से नहीं देखा जाना चाहिए.

अभी तक भारतीय लेखक महात्मा गांधी की तुलना नेल्सन मंडेला से करते रहें हैं और नेल्सन मंडेला को “दक्षिण अफ्रीका का गांधी” कहते रहें हैं. इतना ही नहीं बल्कि भारतीय लेखक नेल्सन मंडेला को गांधी के विचारों से प्रभावित भी बनातें हैं.

महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला में जो समानता हैं वह हैं- अहिंसा का सिद्धांत. हालाँकि नेल्सन मंडेला स्वयं गांधी के अहिंसावादी विचार और संघर्ष को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति की समाप्ति में एक मत्वपूर्ण योगदान माना और कहा कि उनके सिद्धांतों के बल पर ही दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति समाप्त हो पाया.

यह सच हैं कि नेल्सन मंडेला आरंभिक दिनों में अहिंसावादी थे, लेकिन 1960 के बाद वे अहिंसावादी नहीं रहे. साथ ही नेल्सन मंडेला यह बात भूल जाते हैं कि गांधी अफ्रीकियों के बारे में क्या सोचते थे? या फिर उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती है.

प्रोफेसर देसाई और वाहिद, नेल्सन मंडेला को दक्षिण अफ्रीका का गांधी कहे जाने पर सवाल खड़ा करते हैं. वे लिखते हैं कि “मंडेला को शायद इस बात का एहसास नहीं रहा होगा कि जिसे वे श्वेतों के खिलाफ जंग का हीरो मान रहे हैं, वह गांधी अफ्रीकियों को पसंद नहीं करता था”.

शुरूआती दिनों में गांधी का व्यवहार अफ्रीकियों के प्रति गोरों की तरह ही था क्योंकि गांधी अभी अभी लन्दन से बेरिस्टर की पढाई करके लौटे थें और एक मुकदमें के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका आना हुआ था. उन्होंने ने लन्दन में गोरों द्वारा वैसा भेदभाव नहीं देखा था जैसा की उन्हें भारत और दक्षिण अफ्रीका में देखने को मिला.

जब गांधी ट्रेन से फर्स्ट क्लास का टिकट लेकर डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे तब वे  खुद को गोरों से कम नहीं समझ रहें थें. इसलिए गांधी काले अफ़्रीकी लोगों के साथ यात्रा नहीं करना चाहते थे. लेकिन जब अंग्रेजो ने उन्हें जबरन बीच स्टेशन में ही उतार दिया तब गांधी ने इसका विरोध करना शुरू किया.

प्रोफेसर आश्विन देसाई और गुलाम वाहिद लिखते हैं कि – गांधी के दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान भारतीयों के संघर्ष को अफ्रीकियों और दुसरे अश्वेत लोगों के संघर्ष से अलग रखा.

गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में केवल भारतीय समुदाय पर अपना ध्यान केन्द्रित किया. दक्षिण अफ्रीका में गांधी का आन्दोलन केवल भारतीय समुदाय के हितों की रक्षा के लिए था, जिनमें से अधिकांश गुजरती व्यापारी थे. उनका आन्दोलन दक्षिण अफ्रीका में रह रहे सभी अश्वेतों (काले, मिक्स और भारतीय) के लिए नहीं था.

गांधी चाहते तो सभी अश्वेतों के लिए आन्दोलन कर सकते थे, क्योंकि शोषण और अत्याचार तो सभी अश्वेतों के साथ एक जैसा ही हो रहा था, लेकिन गांधी ने ऐसा नहीं किया.

बल्कि गांधी अंग्रेजों के विरुद्ध अफ़्रीकीयों और भारतीयों की एक सांझी लड़ाई के भी खिलाफ थे.

प्रोफेसर देसाई और वाहिद लिखते हैं कि गांधी ने 1895 में एक लीगल पिटीशन दायर किया था जिसमें लिखा था कि “भारतीय अफ्रीकियों की तुलना में ज्यादा सिविलाइज्ड हैं और यह बात उसकी आदतों से पता लगाया जा सकता हैं”.

महात्मा गांधी ने अफ्रीकियों और भारतीयों के लिये एक जैसे कानून इस्तेमाल किये जाने का भी विरोध किया.

 

महात्मा गाँधी का कहना था कि जैसा व्यवहार श्वेतों द्वारा अफ्रीकन अश्वेत लोगों के साथ किया जा रहा हैं वैसा व्यवहार भारतीयों के साथ न किया जाया.

महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में पृथक्करण (segregation) और अलगाव को समाप्त करने के बजाय इसको बढ़ावा ही दिया. 1894 में गांधी द्वारा “नटाल इंडियन कांग्रेस” (एन.आई.सी.) की स्थापना भारतीयों और दक्षिण अफ्रीकी अश्वेत मूलनिवासी के बीच असमानता को बढ़ावा देने के लिए किया गया था.

महात्मा गांधी अश्वेत अफ्रीकन को भारतीय हिन्दू उच्च जाति की आबादी से उसी रूप में पृथक रखना चाहते थे, जैसा कि भारत में निम्न जाति और दलितों को हिन्दुओं के उच्च जाति से अलग रखा गया था.

इसमें गांधी और एन.आई.सी. को पहली सफलता डरबन डाकघर में भारतीयों और अफ्रीकन अश्वेतों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार के रूप में मिली. इससे पहले डाकघर में दो प्रवेश द्वार थे- एक श्वेतों के लिए दूसरा अश्वेतों (अफ्रीकन, मिक्स और भारतीय) के लिए.

गांधी ने अफ्रीकन अश्वेतों के साथ डाकघर में प्रवेश करने से इंकार कर दिया और भारतीयों के लिए अलग से तीसरे प्रवेश द्वार की मांग की जिसमें वह सफल भी रहा.

इस बात का जिक्र गांधी स्वयं अगस्त 1895 में ‘नेटाल इंडियन कांग्रेस की रिपोर्ट’ शीर्षक के अपने एक पत्र में किया हैं. गांधी द्वारा डाकघर में अलग प्रवेश द्वार की मांग करना और अफ्रीकन अश्वेतों के साथ डाकघर में प्रवेश से इंकार कर देना गांधी की नस्लवादी और संकीर्णवादी मानसिकता को ही दर्शाता हैं.

ब्रिटिश-बोअर युद्ध (1899) के दौरान गांधी ने 11 हजार भारतीयों का (Voluntary Ambulance Unit) बनाकर अंग्रेजों की सहायता की. जब 1906 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए नए कर के खिलाफ जुलू (दक्षिण अफ्रीकी मूलनिवासी) का विद्रोह शुरू हुआ तो गांधी ने एक बार फिर जुलू विद्रोहियों के खिलाफ के स्वेच्छा से ब्रिटिश सेना को सहयोग करने का फैसला लिया. गांधी ने कहा कि भारतीयों को अपनी नागरिकता के दावों को वैध करने के लिए इस युद्ध में इन काफिरों (जुलू) के खिलाफ ब्रिटिश सरकार समर्थन करना चाहिए. गांधी द्वारा ब्रिटिश-बोअर युद्ध और जुलू विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध में ब्रिटिश सरकार की सहायता करना और दक्षिण अफ्रीकी मूलनिवासी (जुलू) को काफिर कहना इस बात की  पुष्टि करता हैं कि गांधी दक्षिण अफ्रीकी मूलनिवासी और बोअरों के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता कर रहे थे.

देसाई का मानना हैं कि यह बात कितना हास्यास्पद लगता हैं कि गांधी ने दक्षिण अफ्रीकी मूलनिवासी (जुलू) पर और अधिक टैक्स लगाने का समर्थन किया और उनके ऊपर हो रहे अत्याचार को अनदेखा किया था. देसाई कहते हैं कि गांधी भारतीय बंधुआ मजदूरों (Indentured Labour) की बुरी हालत की भी अनदेखी करते रहें.

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बीबीसी के रिपोर्ट के अनुसार गांधी 1904 में जोहान्सबर्ग के स्वास्थ्य अधिकारी को लिखा कि परिषद् काफिरों को कुली लोकेशन झुग्गियों से बाहर निकाले जहाँ अफ्रीकी मूल के लोग बड़ी संख्यां में भारतीयों के साथ रहते हैं.

गांधी ने कहा कि मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं काफिरों और भारतीयों के मेल जोल को पसंद नहीं करता.

1905 में डरबन में जब प्लेग फैला तो गांधी ने लिखा कि यह समस्या तब तक बरकरार रहेगी जब तक अस्पतालों में भारतीयों और अफ्रीकियों को साथ रखा जायेगा (http://www.bbc.com/hindi/india /2015/09/150916_was_gandhi_racist_pm).

1908 में गांधी ने अपने जेल अनुभव के बारे में लिखा कि “हमें काफिरों के साथ क्यों रखा जाता हैं और हमें भी वही कपड़े क्यों दिए जाते हैं जिसपर N (एन) लिखा होता हैं. (इस N का मतलब अफ्रीकियों से था). हम मेहनत करने के लिए तैयार हैं लेकिन यह सब सहन नहीं कर सकते. अफ्रीकियों के साथ भारतीयों को रखा जाना ज्यादती हैं”.

प्रोफेसर आश्विन देसाई और गुलाम वाहिद गांधी पर भारतीय इतिहास लेखन को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं।

बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार प्रेटरिक फ्रेंच ने 2013 में लिखा था कि “अफ्रीकियों को नजरंदाज करने वाले गांधी के विचार संत बनाने वाले उनसे जुड़े मिथकों के बीच ब्लैक होल की तरह हैं”(http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/ 150916_was_gandhi_racist_pm).

मशहुर लेखिका और समाजसेवी अरूंधती रॉय ने प्रोफेसर आश्विन देसाई और गुलाम वाहिद का समर्थन करते हुए लिखती है – “हमें जिस तरह से गांधी को पढ़ना सिखाया गया हैं, यह किताब उन्हें गंभीर चुनौती देती हैं. यह किताब इस बात का मिशल हैं कि किस तरह से बारीक रिसर्च के बाद बिना किसी डर के बाद इतिहास लिखा जा सकता हैं. यह किताब उस कहानी को सामने लाती हैं जो हमारे आँखों से ओझल थी”.