क्या इन बातों से कल की राजनीति बेअसर रहेगी?

कल लोकसभा में सवर्ण आरक्षण पर चर्चा के दौरान देश के कुछ विशिष्ट नेताओं ने ऐसी बातें कही हैं, जिनका दूरगामी असर हो सकता है.कल सामाजिक न्याय के पुराने योद्धा रामविलास पासवान फुल फॉर्म दिखे. उन्होंने न सिर्फ सरकार का बचाव किया,बल्कि अपना पक्ष भी प्रभावी तरीके से रखते हुए सरकारी ही नहीं निजी क्षेत्र में भी 60 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग उठाई. वे यही नहीं रुके, उन्होंने इस बिल को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की, ताकि सुप्रीम कोर्ट भी इसमें कोई अडंगा न डाल सके. सपा के प्रखर वक्ता धर्मेन्द्र यादव ने जाति जनगणना की मांग उठाई ही, लेकिन सबसे बढ़कर यह कहा कि आरक्षण व्यवस्था सौ फीसदी होनी चाहिए जो सभी जातियों के बीच उनके अनुपात में बाँट दिया जाय .इससे आरक्षण को लेकर उठने वाला सारा विवाद ही ख़त्म हो जायेगा.


राष्ट्रीय जनता दल के सांसद जय प्रकाश यादव ने कहा कि अब दलित-पिछड़ों को 85% आरक्षण चाहिए. अब वह 50 % संतुष्ट नहीं वाले हैं.

 

तेज तर्रार बहुजन नेत्री अनुप्रिया  ने एनडीए का सहयोगी होने के नाते उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के आरक्षण के प्रति उदासीनता दिखने के लिए सापा पर जरुर तंज कसा. किन्तु यह मांग नहीं भूलीं कि एससी/ एसटी और ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण की उनकी आबादी के हिसाब से करने की समीक्षा हो. कल संसद में तो नहीं, किन्तु सोशल मीडिया पर देखा कि यूपी के पूर्व मुख्यमत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि हम सत्ता में आयेंगे तो हिन्दू समाज कि एससी/ एसटी, ओबीसी जैसी पिछड़ी जातियों को 85% आरक्षण देंगे.
मित्रों, क्या ऐसा नहीं लगता कि दलित पिछड़े समाज के मुखर नेताओं ने जो उपरोक्त बाते कही हैं, उनका इम्पैक्ट दूरगामी हो सकता है?


दिल थाम लीजिये सवर्ण आरक्षण को राज्य  सभा में भी ग्रीन सिग्नल मिलने जा रहा है.

बहरहाल जो कुछ हो रहा है, उसे वर्ग संघर्ष में उस वर्ग की वर्गीय  चेतना का कमाल मानें, जो अपने समाज के हित में देश को बर्बाद करने से भी नहीं हिचकता. वह अपने वर्गीय हित के प्रति इतना प्रतिबद्ध है कि कुछ भी कर सकता है.


इस वर्ग संघर्ष में आप अगर पराजय के एहसास में डूबे हैं तो उसके लिए जिम्मेवार आपका नेतृत्व है, जिसकी प्राथमिकता में वर्गीय नहीं,स्व-हित है.आज अगर आज जन्मजात शोषक वर्ग ,वर्ग-संघर्ष में एक नया अध्याय जोड़ने में सफल हो गया है तो,उसमे  उसकी शातिराना योग्यता तो है ही, सबसे बढ़कर आपके नेतृत्व निकम्मापन है

बहरहाल शोषको की यह जीत स्थाई नहीं है. यदि आप नेतृत्व-भक्ति छोड़कर बहुजन हित के लिए उस पर दक्षिण अफ्रीका के मंडेला-जैकब जुमा की भूमिका में आने के लिए तैयार कर लें जश्न मना  रहे शोषक वर्ग की स्थित दक्षिण अफ्रीका के गोरों जैसी भी हो सकती है.


याद रहे दक्ष्ण अफ़्रीकी मूलनिवासियों ने तानाशाही सत्ता की जोर से ऐसा व्यवस्था कर लिया है कि आज 80-90% अवसरों का भोग करने वाले गोरे वहां से  भाग रहे हैं तो बहुजन मित्रों वर्ग संघर्ष में अपनी ताजी पराजय को भूलकर अपने निकम्मे नेताओं को मंडेला-जुमा बनाने में जुट जाओ.


रोना-धोना छोड़कर  अपनी तानाशाही सत्ता कायम करने में जुट जाओ !

संविधान के साथ जो कुछ हो गया , उसके लिए आंसूं मत बहाइये. यह सब सवर्णों की तानाशाही सत्ता का कमाल है. परुआ बैल जैसे अपने नेताओं को दुरुस्त कर दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की भांति तानाशाही सत्ता कायम करने के लिए दबाव बनाये.जब आपकी तानाशाही सत्ता कायम हो जाएगी, तब आप भी संविधान में मनचाहा संशोधन कर सभी प्रकार की नौकरियों, सप्लाई,डीलरशिप, ठेकों, शेक्षण संस्थाओं सहित शक्ति के समस्त स्रोतों में उन अल्पजनों को उनकी संख्यानुपात पर ला सकते हैं. तो इसे अपनी स्थाई हांर न मानें.,हार के आगे जीत है !

इस देश में जबतक मंडेला और जैकब जुमाँ जैसे इस्पाती इरादे वाला बहुजन नेता नहीं उभरता: हम गुलामी के  दलदल में डूबते ही जायेंगे .

गालियों और लानतों से सराबोर कर दें, अपने  निकम्मे नेतृत्व को!

साहब के निम्न बयान  से कितना सहमत हैं !

Comment by I.D. Paswan on H. L. Dusadh

मित्रो,
आरक्षण की 50% की सीमा अब नहीं रहेगी। पिछड़ा का आरक्षण 27% से अधिक करने की राह निकलेगी। जाट आरक्षण, गुजर आरक्षण, गुजरात एवं अन्य राज्यों में आरक्षण के लिए संघर्ष करने वाले के लिए आरक्षण के पक्ष में सवर्ण आरक्षण एक ताकत बनेगी।


सवर्ण आरक्षण का सभी पार्टी ने तुष्टीकरण के लिए सपोर्ट किया है यानि सवर्ण का 15-20% वोट सभी पार्टियों में बटेगी, परन्तु दलित, पिछड़ा, ओबीसी एवं अल्पसंख्यक का 80-85% वोट शायद अब संघ और भाजपा को नहीं मिलेगा। संघ और भाजपा के लिए सवर्ण आरक्षण कितना फायदा पहुॅचाता है या नुकसान वो तो अगला लोकसभा चुनाव में दिखेगा। संघ और भाजपा के लिए 2004 के चुनाव का परिणाम “साईनिंग इण्डिया” से बहुत बत्तर होगा ।


सवर्ण आरक्षण का दायरा गरीबी की सीमा से बाहर है इसलिए ऐसा नहीं लगता है कि किसी गरीव सवर्ण को इस आरक्षण से हित होगा परन्तु इतना जरूर होगा कि अगला लोक सभा चुनाव (2019) में अवर्ण (दलित, पिछड़ा, ओबीसी, अल्पसंख्यक) एवं सवर्ण का वोट में सीधा पोलराईजेशन होगा और संघ और भाजपा का बहुत अधिक अहित होगा ।

H.L. Dusadh Reply

आजाद भारत की हिस्ट्री में सवर्णों की सबसे बड़ी जीतों की फेहरिस्त में आज का यह  दिन टॉप के कुछ दिनों के रूप में याद किया जायेगा.

 

कांग्रेस सहित विपक्ष के कई नेता कह रहे हैं कि इससे गरीब सवर्णों को कोई लाभ नहीं होगा. सत्य होने के बावजूद वे ऐसा करके भाजपा के प्रति सवर्णों का झुकाव और बढ़ा  रहे हैं.

 

क्या आज फुले-शाहूजी-पेरियार-बाबा सहेब-कांशीराम-राम स्वरूप वर्मा-जगदेव बाबू इत्यादि की आत्माएं हम पर आंसू बहा रहा होंगी?