प्यारे संग्रामी साथियों!
मानव जाति का इतिहास: वर्ग-संघर्ष का इतिहास है!
यह एक अप्रिय सचाई है कि आज 21वीं सदी में बहुजन समाज उन स्थितियों और परिस्थितियों के सम्मुखीन है, जिन स्थितियों में सारी दुनिया में ही क्रांतियां हुईं: स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए. ऐसे में जरुरी है कि हम अपने इतिहास, खासकर नयी सदी के संघर्षों का सिंहावलोकन कर लें. इस क्रम में सबसे जरुरी है महान समाज विज्ञानी मार्क्स के नजरिये से इतिहास को समझना, जिसे अबतक नजरंदाज कर हमने ऐतिहासिक भूल की है.

मार्क्स ने कहा है अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात मेरी भाषा में जिसका शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक –पर कब्ज़ा है, और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है.

मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमे कभी भी समझौता नहीं हो सकता. नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है. प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है.’

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आरक्षण में क्रियाशील : भारत में वर्ग संघर्ष!

मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या एक मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिससे कोई देश या समाज न तो अछूता रहा है और न आगे रहेगा. जबतक धरती पर मानव जाति का वजूद रहेगा, वर्ग-संघर्ष किसी न किसी रूप में कायम रहेगा. किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि जहां भारत के ज्ञानी-गुनी विशेषाधिकारयुक्त समाज के लोगों ने अपने वर्गीय हित में, वहीं आर्थिक कष्टों के निवारण में न्यूनतम रूचि लेने के कारण बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा मार्क्स के कालजई वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की बुरी तरह अनदेखी की गयी, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही .ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है,जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है.

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जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों (सामाजिक समूहों) के पेशे/कर्म तय रहे तथा इन पेशे/ कर्मों की विचलनशीलता (professional mobility) धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध (prohibited) रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली, जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है.

वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन. वर्ण-व्यवस्था में वर्ग-संघर्ष की विद्यमानता को देखते हुए ही 19 वीं सदी में महामना फुले ने वर्ण-व्यवस्था के वंचित शूद्र-अतिशूद्रों को ‘बहुजन वर्ग’ के रूप में जोड़ने की संकल्पना की जिसे 20वीं सदी में मान्यवर कांशीराम ने बहुजन-समाज का एक स्वरूप प्रदान किया.

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बहरहाल प्राचीन काल में शुरू हुए ‘देवासुर –संग्राम’ से लेकर आज तक बहुजनों की ओर से जो संग्राम चलाये गए हैं, उसका प्रधान लक्ष्य शक्ति के स्रोतों में बहुजनों की वाजिब हिस्सेदारी रही है. वर्ग संघर्ष में यही लक्ष्य दुनिया के दूसरे शोषित-वंचित समुदायों का भी रहा है. भारत के मध्य युग में जहां संत रैदास, कबीर, चोखामेला, तुकाराम इत्यादि संतों ने तो आधुनिक भारत में इस संघर्ष को नेतृत्व दिया फुले – शाहू जी – पेरियार – नारायणा गुरु – संत गाडगे और सर्वोपरी उस आंबेडकर ने, जिनके प्रयासों से वर्णवादी – आरक्षण टूटा और संविधान में आधुनिक आरक्षण का प्रावधान संयोजित हुआ. इसके फलस्वरूप सदियों से बंद शक्ति के स्रोत सर्वस्वहांराओं (एससी/ एसटी) के लिए खुल गए.

मंडल उत्तर काल में वर्ग-संघर्ष का अभीष्ट!

हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज: दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर. मंडलवादी आरक्षण ने परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित एवं राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया. मंडलवादी आरक्षण से हुई इस क्षति की भरपाई ही दरअसल मंडल उत्तरकाल में सुविधाभोगी वर्ग के संघर्ष का प्रधान लक्ष्य था.

कहना न होगा 24 जुलाई ,1991 को गृहित नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर भारत के शासक वर्ग ने, जो विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी वर्ग से रहे, मंडल से हुई क्षति का भरपाई कर लिया. मंडलवादी आरक्षण लागू होते समय कोई कल्पना नहीं कर सकता था, पर यह अप्रिय सचाई है कि आज की तारीख में हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग का धन-दौलत सहित राज-सत्ता, धर्म-सत्ता, ज्ञान-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो गया है, जिसमें पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह की विराट भूमिका रही. किन्तु इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ववर्तियों को मीलों पीछे छोड़ दिया है. इनके ही राजत्व में मंडल से हुई क्षति की कल्पनातीत रूप से हुई भरपाई. सबसे बड़ी बात तो यह हुई है कि जो आरक्षण आरक्षित वर्गों, विशेषकर दलितों के धनार्जन का एकमात्र स्रोत था, वह मोदी राज में लगभग शेष कर दिया गया है, जिससे वे बड़ी तेजी से विशुद्ध गुलाम में तब्दील होने जा रहे हैं.

आरक्षण पर संघर्ष के इतिहास में आज के लोकतांत्रिक युग में परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग की इससे बड़ी विजय और क्या हो सकती है!

बहुजन संगठन और एक्टिविस्ट नौकरियों में आरक्षण से आगे सोच न सके !

बहरहाल भारत में वर्ग-संघर्ष के इतिहास के जिन बहुजन महानायको- मध्य युग के संत रैदास, कबीर, चोखामेला, तुकाराम इत्यादि संतों तथा आधुनिक भारत के फुले – शाहू  जी – पेरियार – नारायणा गुरु – संत गाडगे इत्यादि और सर्वोपपरि डॉ. आंबेडकर – से प्रेरणा लेकर हमने बहुजन-मुक्ति आन्दोलन में योगदान किया, आज की तारीख में उसकी उपलब्धियों का आंकलन करें तो पाएंगे हमारी कमियों के कारण विशेषाधिकार युक्त सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर अभूतपूर्व रूप से कब्ज़ा कायम हो चुका है, जो दर्शाता है कि हम वर्ग-संघर्ष की लड़ाई में बुरी तरह व्यर्थ रहे हैं. सबसे बड़ी व्यर्थता हमारी आर्थिक मोर्चे पर हुई.

मंडल के बाद जो वर्ग संघर्ष शुरू हुआ, उसमे शासकों का एकमेव लक्ष्य था, जिस आरक्षण के सौजन्य से बहुजन सरकारी नौकरियां पाकर मुख्यधारा से जुड़ते जा रहे थे, उस आरक्षण को कागजों की शोभा बना देना और शासक वर्ग इस मकसद में कामयाब हो चुका है. इस आशय की घोषणा मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने 5 अगस्त, 2018 को कर दिया. उन्होंने उस दिन कहा सरकारी नौकरियां ख़त्म हो चुकी हैं, लिहाजा आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है. गडकरी की बात शतप्रतिशत सही है. इस पर अविश्वास करना बहुजन समाज के साथ छल होगा. वर्ग-संघर्ष की निर्भूल रणनीति के तहत शासक वर्ग ने राजसत्ता का सद्व्यवहार करते हुए जो काम अंजाम दिया है, उसके फलस्वरूप आंकड़ो में यह तथ्य उभर कर आया है कि देश के टॉप की 1% आबादी का धन-संपदा पर 73%, जबकि टॉप की 10% आबादी का 90% धन-संपदा पर कब्ज़ा हो चुका है.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह जानते हुए भी कि हमारा विरोधी वर्ग नवउदारवादी नीति को हथियार बनाकर नौकरियां ख़त्म कर देगा, हमारे संगठनों ने सारी उर्जा आरक्षण बचाने तथा निजी क्षेत्र की नौकरियों आरक्षण बढाने में लगाया: इससे आगे वे सोच भी न सके. आज भी जबकि आरक्षण कागजों की शोभा बन चुका वे आरक्षण बचाने का वही पुराना राग अलापे जा रहे हैं.

डाइवर्सिटी आन्दोलन की उपलब्धियां!
बहरहाल जिन दिनों आरक्षण के खात्मे से त्रस्त होकर तमाम बहुजन नेता/ एक्टिविस्ट “आरक्षण बचाने और निजी क्षेत्र में आरक्षण बढ़ाने” की लड़ाई में एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे, उन्ही दिनों 12-13 जनवरी, 2002 को महान दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद के नेतृत्व में डाइवर्सिटी केन्द्रित एक सम्मलेन हुआ, जो इतिहास में भोपाल सम्मलेन के नाम से जाना जाता है.

भोपाल सम्मलेन में शामिल बुद्धिजीवियों ने एकमत से स्वीकार किया कि जिस तरह टेक्नॉलाजी आगे बढ़ रही है तथा जिस तरह भारत का शासक वर्ग नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बना रहा है, भविष्य में नौकरियां ख़त्म हो जाएँगी. ऐसे में वहां से मांग उठी, –

“नौकरियों से आगे बढ़कर समस्त क्षेत्रों में भागीदारी अर्थात आरक्षण की लड़ाई शुरू हो!”

उसके बाद डाइवर्सिटी समर्थकों ने आरक्षित वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के कालों की भांति न्यायपालिका, मिलिट्री, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, मीडिया इत्यादि में सर्व-व्यापी आरक्षण की लड़ाई की शुरुआत किया. बहरहाल भोपाल कांफ्रेंस से सिर्फ एससी/ एसटी के लिए तमाम  क्षेत्रों में हिस्सेदारी की मांग उठी थी. किन्तु बाद में ‘डाइवर्सिटी आन्दोलन’ को मंद पड़ते देख जब 15 मार्च, 2007 को लेखकों का संगठन ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ वजूद में आया, तब इसकी ओर से शक्ति के समस्त स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विवधता लागू करवाने अर्थात तमाम क्षेत्रों में अवसरों का बंटवारा भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों-सवर्ण,ओबीसी, एससी/ एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों- के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में कराने की लड़ाई शुरू की गयी. आज बहुजन डाइवर्सिटी मिशन ही डाइवर्सिटी मूवमेंट को लीड कर रहा है.

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बहरहाल डाइवर्सिटीवादियों के प्रयासों के फलस्वरूप 27 अगस्त, 2002 को मध्य प्रदेश की कुछ वस्तुओं की सप्लाई में एससी/ एसटी को 30 प्रतिशत आरक्षण मिला, जिसे भाजपा की उमा भारती सरकार ने सत्ता में आने बाद के साथ ही ख़त्म कर दिया. बाद में 25 जून, 2009 को यूपी की माया सरकार ने एससी/ एसटी को सरकारी ठेकों में 23 प्रतिशत आरक्षण दिया, जिसे अखिलेश सरकार ने मई 2012 में ख़त्म कर दिया. ठेकों में आरक्षण का सपना बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने 1942 में देखा था, जिसे 2009 में मायावती सरकार ने पूरा किया.

आज केंद्र सरकार के कुछ खरीदारी, ठेका, और डीलरशिप में आरक्षण लागू हो चुका है. बिहार के नितीश कुमार सरकार ने 1 नवंबर, 2017 को कैबिनेट में फैसला लिया था कि बिहार के सरकारी ठेकों के बाद आउटसोर्सिंग जॉब में भी आरक्षण लागू होगा. इसके अंतर्गत बिहार सरकार में ठेका लेने वाले कंपनी को अपने यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों को आरक्षण का लाभ देना होगा.  लेकिन बिहार सरकार के इस निर्णय को अभी तक अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है.

लेकिन डेढ़ दशक पूर्व नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापारादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में आरक्षण की जो वैचारिक लड़ाई डाइवर्सिटीवादियों द्वारा शुरू की गयी ,उसके फलस्वरूप आज आरक्षित वर्गों में सर्वव्यापी आरक्षण की चाह पैदा हो चुकी है. डाइवर्सिटी अर्थात सर्वयापी आरक्षण को मुद्दा बनाकर 2015 में सामाजिक न्याय के महान योद्धा लालू प्रसाद यादव ने अप्रतिरोध्य दिख रही भाजपा को बिहार में गहरी शिकस्त दे दिया.

शासकों द्वारा सरकारी नौकरियां ख़त्म किये जाने के बाद आज बहुजन आन्दोलन सर्वव्यापी आरक्षण की दिशा में छलांग लगा दिया है, इसका प्रमाण  विद्या गौतम के नेतृत्व में अखिल भारतीय आंबेडकर महासभा के बैनर तले 8 अगस्त, 2018 से शुरू किया गया ‘भीख नहीं, भागीदारी’ आन्दोलन है, जो 40 दिनों से अधिक चला. इस आन्दोलन के तहत अर्थोपार्जन की सभी गतिविधियों में सभी प्रमुख समाजों के संख्यानुपात में बंटवारे के लिए कई प्रदेशों में कई हजार लोग लगभग डेढ़ महीनों तक  से अनवरत भूख हड़ताल पर रहे.

मानवता के मुक्ति की लड़ाई मुख्यतः ज्ञान के द्वारा ही लड़ी गयी है!

सारी दुनिया में मानव जाति को शोषकों-दुष्टों से मुक्त कराने की जो लड़ाई लड़ी गयी, वह मुख्यतः ज्ञान के द्वारा ही लड़ी गयी है, जिसकी शुरुआत प्राचीन विश्व में तथागत गौतम बुद्ध से हुई. गौतम बुद्ध ने बहुसंख्य लोगों को जिस वर्ण-व्यवस्था के अमानवीय प्रावधानों से निजात दिलाने के लिए ज्ञान को हथियार बनाया था, वे अमानवीय प्रवधान भी विदेशागत वैदिक मनीषियों ने ज्ञान के जोर से ही रचा था.

बुद्धा, कार्ल मार्क्स और आंबेडकर

गौतम बुद्ध के बाद मध्य युग में बहुजनों के मुक्ति की जो लड़ाई संतों (कबीर, रैदास, गुरु नानक इत्यादि) ने लड़ी, वह ज्ञानाधारित रही. आधुनिक विश्व में वर्ग संघर्ष का ऐतिहासिक विचार देने वाले कार्ल मार्क्स ने जो लड़ाई लड़ी, वह ज्ञानाधारित ही थी, जिसके सहारे लेनिन – माओ, चे गुयेवरा इत्यादि ने सत्ता परिवर्तन कर शोषकों का अंत किया. आधुनिक भारत में महात्मा फुले ने जो लड़ाई शुरू की एवं जिसे पूर्णता प्रदान किया डॉ. आंबेडकर ने, वह लड़ाई भी ज्ञानाधारित है, जिसके आलोक में असंख्य संगठन बहुजनों की मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं. लेकिन बाबा साहेब के बहुजन-मुक्ति का चिंतन ज्ञान का महासागर है, जिसमें गोते लगाकर मोती निकालना सबके बूते की बात नहीं है.

आज बहुजनों को लिबरेट करने के लिए जो हजारों संगठन काम कर रहे हैं, उनके संचालक मुख्यतः सरकारी कर्मचारी और अंशकालिक सोशल एक्टिविस्ट करते हैं.

इनके लिए आंबेडकरवाद रूपी ज्ञान के समंदर से मोती निकालना मुमकिन नहीं रहा, इसलिए बहुजनों की समस्या की सही पहचान करते हुए, 21वीं सदी के अनुरूप रणनीति अख्तियार करने में विफल रहे.

यह काम सफलता से अंजाम दिया डाइवर्सिटीवादी लेखकों ने, जिसकी शुरुआत 2002 में महान चिन्तक चंद्रभान प्रसाद ने “भोपाल दस्तावेज तथा भोपाल-घोषणापत्र” से की. बाद में इस सिलसिले को आगे बढाया बुद्ध शरण हंस, डॉ. विजय कुमार त्रिशरण, दिलीप मंडल, शीलबोधि, सुदेश तनवर, विपिन बिहारी इत्यादि ने, जिनमें यह लेखक भी शामिल है. आज अनगिनत बहुजन चिन्तक अपने-अपने तरीके से डाइवर्सिटी अर्थात सर्व-व्यापी आरक्षण की लड़ाई को आगे बढा रहे हैं.

वर्ग संघर्ष में हारी बाजी पलटने के लिए भारत को बनाना होगा : आज का दक्षिण अफ्रीका!

स्मरण रहे भारत में जैसे अल्पजन जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का राज-सत्ता, ज्ञान-सत्ता, धर्म और अर्थ-सत्ता पर 80-90% कब्ज़ा है, ठीक वही स्थिति दक्षिण अफ्रीका में दो सौ सालों तक सत्ता में रहे गोरों की थी. किन्तु 1994 में रंगभेदी सत्ता से मुक्ति पाने के बाद मंडेला के लोगों ने जो संविधान बनाया, उसमें ऐसा प्रवधान किया कि जिस नस्लीय समुदाय का जो संख्यानुपात है, उसी अनुपात में उनको अवसर मिलेगा. इस प्रावधान के कारण विगत दो दशकों से गोरे महज 9-10% अवसरों पर सिमटने के लिए बाध्य हैं. इससे उनके हिस्से का 70-80% अतिरिक्त (surplus) अवसर मूलनिवासियों के हिस्से में आने शुरू किये और आज गोरे  दक्षिण अफ्रीका छोड़कर दूसरे देशों में पलायन करने लगे हैं. दक्षिण अफ्रिका में यह काम वहां के मूलनिवासियों ने बन्दूक की जोर पर नहीं, वोट के सहारे मिली तानाशाही सत्ता के जरिये अंजाम दिया है. भारत में भी दक्षिण अफ्रीका का वह इतिहास सफलता के साथ दोहराया जाय, इसे ध्यान में रखते हुए ही बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर से भारी मात्रा में किताबें तैयार की गयी हैं. वैसे बहुजन डाइवर्सिटी मिशन द्वारा प्रकाशित सभी किताबें ही शक्ति के स्रोतों में बहुजनों की वाजिब हिस्सेदारी का सूत्र सुझाने में सक्षम हैं, जिनमें चंद्रभान प्रसाद लिखा “भोपाल घोषणापत्र”, डॉ. विजय कुमार त्रिशरण की “आरक्षण बनाम डाइवर्सिटी” और एच. एल. दुसाध की “बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का घोषणापत्र” प्रमुख है. इनमे “बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के घोषणापत्र” की प्रभावकारिता का आंकलन करते हुए चर्चित बहुजन चिन्तक डॉ. विजय कुमार त्रिशरण ने लिखा है-

“एच. एल. दुसाध द्वारा लिखा गया बहुजन डाइवर्सिटी मिशन (बीडीएम) का घोषणापत्र बहुजन समाज के उत्थान और उद्धार का एक मात्र संहिता है. इस बहुजन मुक्ति-संहिता में कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र  से कहीं ज्यादा आग है. यदि गहरी निद्रा में सुषुप्त हमारे समाज के लोगों में थोड़ी भी गर्माहट पैदा हुई तो मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि बीडीएम का घोषणापत्र एक दिन कार्ल मार्क्स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पर भारी पड़ेगा.”

संग्रामी साथियों, पुनः याद दिलाना चाहता हूँ की मुख्यतः (ज्ञान) नॉलेज के द्वारा ही मानवता के मुक्ति की लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाया गया है: परिवर्तन की लड़ाई में विचार (idea) ही प्रमुख रहा है. भारत को यदि आज का दक्षिण अफ्रीका बनाना एवं  बहुजनों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिलाना है तो संगठित होने के साथ आपको डाइवर्सिटी साहित्य पढ़ना और पढ़ाना होगा. याद रहे वर्ग संघर्ष में सुविधासंपन्न शासक जमात को शिकस्त देने की लड़ाई दो-चार नहीं,शायद कुछ दशकों तक चलने वाली है, जिसके लिए सही विचारों और स्ट्रेटजी से लैस होना बेहद जरुरी है. बिना इसके जैसे फूटे बर्तन में पानी रखने से बह जाता है, वैसे ही हमारे आन्दोलनकारियों की उर्जा भी व्यर्थ होती रहेगी. इस कार्य में सहायक बन सकता है सिर्फ डाइवर्सिटी साहित्य जो बाबा साहेब के समतावादी विचारों की मोती चुनकर तैयार किया गया है. और शेष में में इस अपील का  प्राख्यात थिंकर डॉ.एम.एल.परिहार के निम्न सुझाव के साथ अंत करता हूँ –

 

“वैचारिक युद्ध में किताबें ही आपके हथियार हैं. इसलिए साहित्य द्वारा वैचारिक जागृति का मिशन आप बिना शोर मचाये शांति से कर सकते हैं यही दुनिया का सबसे बड़ा काम है। इसके लिए आपको सड़कों पर न रैलियां निकालने की जरूरत है और न झंडे थाम कर नारे लगाने की. इसे तो अपने घर, परिवार, गांव, कोलोनी में शांति से कर अपनी ऊर्जा के सदुपयोग करने की जरूरत है. खास बात यह कि सामाजिक परिवर्तन के इस असली काम में सरकार, कानून या किसी भी संगठन को कोई एतराज नहीं होगा. यह सबसे सुरक्षित और सबसे कारगर काम है जिसे कम धन और कम समय में किया जा सकता हैं.आप शुरू करें तो यह बहुत कम समय में एक आन्दोलन बन सकता है, आपको साथ देने वाले सामाजिक सोच के कई साथी मिल जाएंगे, लोग जुड़ते जाएंगे और कारवां आगे बढते जाएगा.”