दिसम्बर, 2018 में जब पांच राज्यों में हुए चुनाव में से सभी राज्यों में भाजपा को हार मिली, तभी से उसका माथा ठनक गया है. इस हार से 2019 में होने वाले लोक सभा चुनाव में उसको अपनी हार का अहसास हो गया है. इसी बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोकदल का आपस में गठबंधन हो गया. उत्तर प्रदेश जनसँख्या के हिसाब से देश का सबसे बड़ा प्रदेश है, जिसमे सपा और बसपा का एक अच्छा खासा जनाधार है. इन तीनो दलों के साथ आने से पूरे देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है.

अभी हाल ही में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उपाध्यक्ष तेजस्वी यादव लखनऊ में मायावती जी से मिले. इससे बिहार में राजद और बसपा के साथ आने की संभावना बढ़ी हैं. पूरे देश में भाजपा के खिलाफ एक व्यापक एकता बन रही है. सभी दलों का मानना है कि जन विरोधी भाजपा को रोकने के लिए एक व्यापक गठबंधन होना चाहिए. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी सपा – बसपा गठबंधन पर प्रसन्नता ज़ाहिर की है.

सपा – बसपा – रालोद गठबंधन के बाद तीसरी शक्ति के तौर पर के उभरने की सम्भवना प्रबल है. देश में कई प्रदेशो में पहले से गैर भाजपा और गैर कांग्रेस सरकारें हैं, जिसमे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तेलंगाना में  तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) आंध्र प्रदेश में तेलगु देशम और तमिलनाडु में आल इंडिया द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam/ AIADMK) प्रमुख हैं.

तीसरे शक्ति में से अभी प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह स्पष्ट नहीं है. अखिलेश यादव जी ने प्रधान मंत्री बनने से साफ़ इंकार कर दिया है. ऐसे में मायावती जी तीसरी शक्ति की तरफ से प्रधान मंत्री की प्रबल दावेदार हो सकती है. वे देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रही हैं और उनका राजनीति का लम्बा अनुभव भी है. तेजस्वी यादव ने भी अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दे दिया है कि वे मायावती जी को समर्थन करने में कोई संकोच नहीं करेंगे. सपा – बसपा का गठबंधन और आपसी समझदारी और ठोस रूप ले रही हैं.

भाजपा विधायक साधना सिंह द्वारा मायावती जी पर भद्दे कमेंट के विरोध में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में हर जिले में प्रदर्शन करने जा रही है.

तृणमूल कांग्रेस, तेलगु देशम, TRS, वामपंथी पार्टियाँ भी मायावती जी के लिए प्रधान मंत्री पद के लिए तैयार हो जायेगे. तणमूल कांग्रेस कह चुकी है कि वह प्रधान मंत्री पद के लिए राहुल गाँधी का समर्थन नहीं करेगी. तृणमूल कांग्रेस गैर भाजपा और गैर कांग्रेस दलों में से ही किसी का समर्थन करेगी.

2019 में होने वाले लोक सभा चुनाव में भाजपा की बुरी तरह हार होगी. कांग्रेस की हालत में सुधार होगा किन्तु 150 सीटों से ज्यादा शायद वह नहीं ला पायेगी. इस प्रकार कांग्रेस और भाजपा – प्रत्येक को इस चुनाव में 150 के आसपास ही सीटें मिलेगी. वही उत्तर प्रदेश में सपा – बसपा – रालोद गठबंधन को उत्तर प्रदेश में लगभग 60 -70 सीटें  प्राप्त हो सकती हैं. और यह कोई कठिन काम भी नहीं है. उत्तर प्रदेश में शायद ही कोई ऐसी सीट हो, जहाँ सपा और बसपा के प्राप्त वोट से भाजपा का वोट अधिक हो. लोक सभा के तीन उपचुनाव में यह सिद्ध भी हो चुका है. ये तीनो पार्टी उत्तर प्रदेश में किसी भी सीट पर भाजपा को हरा सकती है. गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनाव में इन्होने मिलकर भाजपा को हराया है. गोरखपुर सीट तो भाजपा का परम्परागत गढ रहा है, जिस सीट पर वह 1989 से लगातार जीतती चली आ रही थी, उस सीट पर भी भाजपा हार गयी. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में कोई भी सीट इनसे नहीं बचेगी, बशर्ते इनका वोट एक दुसरे उम्मीदवार को ट्रांसफर हो जाये.

यदि चुनाव परिणाम इस प्रकार रहे, जिसकी बहुत अधिक संभावना है, तो मायावती जी प्रधानमंत्री पद की मजबूत उम्मीदवार होगी. दलित समुदाय से आने के कारण कोई भी पार्टी नहीं चाहेगी कि उसे दलित विरोधी टैग मिले. इस कारण से भी न चाहते हुए भी बाकी पार्टी जैसे कांग्रेस मायावती जी को समर्थन करने को मजबूर होंगे.

एक तर्क से कांग्रेस और भाजपा के लिए यह लाभप्रद होगा कि मायावती प्रधान मंत्री बन जाये. अम्बेडकरवादी आंदोलन का मानना है कि हमारी समस्याएं तभी हल होगी जब सत्ता हमारे पास होगी. हम शासक वर्ग होंगे. बाबा साहेब अंबेडकर ने कभी कहा था कि अपने घर की दीवारों पर लिख दो हमे इस देश का हुक्मरान बनना है. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम का भी कहना था कि मेरा सपना इस देश के बहुजन समाज को हुक्मरान बनाना है.

मा. कांशीराम ने यह काम करके भी दिखाया था. उन्होंने तो सत्ता प्राप्ति के लिए भाजपा से भी समर्थन लेने में कोई गुरेज नहीं किया था. भाजपा के समर्थन से ही पहली बार उत्तर प्रदेश में बसपा को सत्ता मिली थी, और उत्तर प्रदेश में यह पहली बार था जब दलित समुदाय को कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बना था.

भाजपा भी मायावती जी को प्रधान मंत्री पद से रोकने के लिए सीधा विरोध नहीं कर पायेगी. दूसरी तरफ कांग्रेस भी यही नीति अपनाएगी.

कांग्रेस और भाजपा ऐसा इसलिए भी चाहेंगे कि एक बार मायावती प्रधान मंत्री बन जाये तो गठबंधन में प्रधानमंत्री बनी मायावती बहुजन समाज के लिए उतना काम नहीं कर पायेगी, क्योकि बाकी दल उनको ऐसा करने से रोकेंगे. ऐसे में भाजपा – कांग्रेस यह कह सकेंगे कि हमने एक दलित को प्रधान मंत्री भी बनाया. दूसरी तरफ, कांग्रेस- भाजपा का दलित नेता भी यह चाहेंगे कि एक बार मायावती प्रधानमंत्री बन जाये तो वे फिर दलित वोट को उनकी पार्टी की तरफ खींच सकें.

मायावती जबतक प्रधानमंत्री नहीं बनती हैं, दलित वोट मायावती जी के साथ रहेगा. यदि मायावती प्रधान मंत्री बन गयीं तो फिर दलित उनके पास से खिसक सकता है. इस उम्मीद में कांग्रेस या भाजपा मायावती को समर्थन करेंगे.