कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए तीन चीजों का होना ज़रूरी है – पार्टी, प्रोग्राम और रणनीति। जिसमे संगठन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। पार्टी एक राजनैतिक  संगठन के रूप में प्रोग्राम बनाती है, और उस पर रणनीतिक रूप से अमल करती है। एक प्रभावशाली संगठन और कुशल रणनीति के आभाव में कम्युनिस्ट आंदोलन सफल नहीं हो सकता। कम्युनिस्ट आंदोलन के असफलता का प्रमुख कारण संगठन और रणनीति के मोर्चे पर विफलता है।

संगठन और रणनीति के अभाव में मार्क्सवाद ‘अकादमिक डिसिप्लिन’ मात्र बन कर रह जाता है। आजकल सबसे ज्यादा मार्क्सवादी विश्वविद्यालयों में पाए जाते है, और मार्क्सवाद को एक विषय के रूप में अध्ययन करते है। मार्क्सवाद एक विषय के रूप में सर्वव्यापक और सर्वग्राही होता जा रहा है, किन्तु रणनीति के अभाव में इसका क्रन्तिकारी पक्ष खोता जा रहा है। इस ट्रेंड को ‘फ़्लोरिसिंग मार्क्सिस्म एंड दिमिनीसिंग रेवोलुशन’ (Flourishing Marxism and Diminishing Revolution) कहा जाता है।

आज इस बात पर जोर देने की जरूरत है कि मार्क्सवाद कोई ‘अकादमिक डिसिप्लिन’ नहीं है जिसमे शोध या एक्सपर्टाइज हासिल की जाए।  मार्क्सवाद एक जीवंत दर्शन और क्रांतिकारी वैचारिकी है। अकादमिक मार्क्सवाद और क्रांतिकारी मार्क्सवाद दोनों बिलकुल दो अलग चीजे है। दोनों का दृष्टिकोण और विषयवस्तु अलग-अलग है।

संपादक की टिपण्णी
अभिषेक आज़ाद का यह लेख एक नए बहस की संभावनाएं तलासते हुए एक रास्ता भी दिखाने की कोसिस भी करता है. यह सवाल “अकादमिक क्षेत्र” से लेकर आम जन तक पूछतें हैं कि यह पढाई, शोध, परिचर्चा, सेमिनार, संगोष्ठी आदि किसलिए और किसके लिए होता है? इस लेख को माओ-त्से तुंग के समय बनी चीनी फिल्म ब्रेकिंग विथ ओल्ड आइडियाज/ Breacking with Old Ideas (1975) के साथ देखे जाने की जरुरत है. इस फिल्म को यहाँ देखें – https://www.youtube.com/watch?v=VYI181SVbDk

अकादमिक मार्क्सवाद से वर्तमान व्यवस्था को कोई खतरा नहीं है। इसे डर क्रांतिकारी भावना (Revolutionary Spirit) से लगता है। यह अकादमिक मार्क्सवाद को प्रोत्साहन देती है और क्रांतिकारी मार्क्सवाद का बर्बरतापूर्वक दमन करती है। क्रांतिकारी मार्क्सवादी ही सच्चे अर्थो में मार्क्सवादी है। अकादमिक मार्क्सवादियों पर दक्षिणपंथ या वामपंथ कोई भी ध्यान नहीं देता। अकादमिक मार्क्सवाद पूरी तरह से महत्वहीन और निरर्थक है।

रणनीति और युक्ति (Strategy and Tactics) विहीन मार्क्सवाद निष्प्रभावी है। एक मार्क्सवादी के लिए ‘स्ट्रेटेजी और टेक्टिक्स’ की समझ सबसे ज्यादा जरूरी है। दुर्भाग्यवश, मार्क्सवादियों ने वैचारिकी/ सिद्धांत पर बहुत अधिक जोर दिया और स्ट्रेटेजी/ टेक्टिक्स के महत्व को नहीं समझ सके जिसके कारण क्रांतिकारी मार्क्सवाद अकादमिक मार्क्सवाद में परिणित होकर महत्वहीन, निरर्थक और निष्प्रभावी हो गया।

वामपंथ जनवाद की राजनीती है। इसके पास वैचारिकी, मुद्दे, समर्पित और ईमानदार नेता-कार्यकर्ता सबकुछ है। आमजन आश्चर्य से पूछते है कि इतना सबकुछ होने के बाद भी वामपंथी पार्टियां सत्ता से बाहर क्यों है? इसका एक बहुत ही सीधा और सरल सा जवाब है कि इनके पास ठोस रणनीति का अभाव है। दक्षिणपंथी पार्टियां रणनीति में वामपंथी पार्टियों से बहुत आगे है। उनके पास कुछ भी नहीं है फिर भी वे मात्रा रणनीति के बल पर जनवाद-बहुजन की राजनीती को मात दे देती है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वामपंथी रणनीति में बहुत से लोग रणनीति के इस्तेमाल से कतराते है। वे रणनीति या युक्ति के इस्तेमाल को नैतिक नहीं मानते। उनका मानना है कि केवल सिद्धांतों और वैचारिकी से क्रांति हो सकती है। (Author ID: Author.Abhishek.Azad.21012019)