8 जनवरी, 2018 के बाद जो राजनीतिक हालात बन या बनाये गए हैं, उसे देखते हुए कांग्रेस को बहुजनवादी दलों के साथ महागठबंधन बनाने की नए सिरे से पहलकदमी करनी पड़ेगी, जरुरत पड़ने पर कुछ झुककर भी.
 
भाजपा द्वारा सवर्ण आरक्षण की पहलकदमी के बाद मेरे हिसाब से 2019 में कांग्रेस की सम्भावना  में कमसे कम 20 % कमी आ गयी है.इस पहलकदमी ने नए सिरे से भाजपा को सवर्णों की फेवरिट पार्टी बना दिया है. ऐसे में कांग्रेस को सवर्णों के पर्याप्त समर्थन से निराश हो जाना चाहिए, 90% सवर्ण भाजपा को ही वोट करेंगे.

लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि अगले चुनाव के आरक्षण अर्थात सोशल जस्टिस पर केन्द्रित होने की प्रबल सम्भावना उजागर हो गयी है. एक ओर चैम्पियन सवर्णवादी  भाजपा तो दूसरी और सामजिक न्यायवादी दल होंगे.

सवर्ण आरक्षण के कारण कांग्रेस बहुजनवादी और सवर्णवादी भाजपा के बीच सैंडविच  बनकर रह गयी है. किसानों की कर्जमाफी और रफायल जैसे घिसे-पिटे मुद्दे विराट आकार ले रहे आरक्षण की आंधी में उड़ जायेंगे.

अतः 8 जनवरी, 2018 के बाद जो राजनीतिक हालात बन या बनाये गए हैं, उसे देखते हुए कांग्रेस को बहुजनवादी दलों के साथ महागठबंधन बनाने की नए सिरे से पहलकदमी करनी पड़ेगी: जरुरत पड़े तो झुककर भी.