8-14  जनवरी, 2019, ये सात दिन भारत के बहुसंख्य वंचित आबादी के लिहाज से जितने घटना बहुल रहे, उसकी मिसाल नयी सदी में दुर्लभ है. सबसे पहले जिस तरह मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के अपने प्रस्ताव को, संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए दो दिनों के अंदर ही संसद में पारित कर लिया, उससे आरक्षण पर संघर्ष बिलकुल सतह पर आ गया.

हालाँकि जिस तरह मंडलवादी आरक्षण की घोषणा के साथ विशेषाधिकारयुक्त तबका आत्म-दाह से लेकर राष्ट्र की संपदा-दाह इत्यादि जैसी गतिविधियों में संलिप्त होकर अपना रोष प्रकट किया था, उस तरह की कोई उग्र प्रतिक्रिया वाचित वर्गों की ओर से नहीं हुई.

किन्तु जिस वर्ग का राज-सत्ता, धर्म-सता, ज्ञान-सत्ता के साथ-साथ अर्थ-सत्ता पर प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा है, उस वर्ग के लोगों की गरीबी का बिना कोई ठोस अध्ययन किये जिस तरह संविधान में संशोधन कर 48 घंटों में आरक्षण सुलभ कराया गया, उससे असंख्य जातियों में बंटा वंचित वर्ग रातो-रात एक दूसरे के निकट आकर संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण की वह मांग बुलंद करने लगा.  

इन दो दिनों में वंचना के कॉमन अहसास से इनमें ऐसा भावांतरण हुआ कि परस्पर शत्रुता से लबरेज हजारों जातियां भ्रातृ-भाव लिए एक दूसरे के निकट आने लगीं. और विगत 25 सालों को कटुता भुलाकर जब 12 जनवरी, 2019 को सपा-बसपा एक दूसरे के निकट आयीं.

देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर-प्रदेश के हजारों जातियों में बंटे वंचितों में होली-दीवाली जैसा जश्न का माहौल पैदा हो गया. कहीं लोग आँखों में ख़ुशी के आंसू लिए एक दूसरे के गले मिले तो कहीं मिठाई बांटकर एक दूसरे का मुंह मीठा किये.

इस घटना के दो ही दिन बाद जब बिहार के तेजस्वी यादव मायावती जी  का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने के बाद खुद वह तस्वीर अपने ट्विटर पर डाले, बहुजनों को  प्रायः दो दशक पुराना आना सपना पूरा होता नजर आया.

जी हाँ! बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, और राष्ट्रीय जनता दल जैसे स्थापित बहुजनवादी दल एक दूसरे के निकट आयें, इसका सपना आम से लेकर खास बहुजन प्रायः दो दशकों से ही देख रहा था.

इसकी कई बार सम्भावना भी उजागर हुई, फिर धूमिल हो गयी. किन्तु 8 से 9 जनवरी, 2019 के बीच जो हालात बने – मायावती, अखिलेश और तेजस्वी यादव सारे असमंजस दरकिनार कर एक दूसरे के निकट आ गए.

आज अतीत की कटुता भुलाकर इस त्रिमूर्ति के मिलन से वंचित जातियों में लोकतान्त्रिक क्रांति का सपना तैरने लगा है. और अगर वंचित तबकों के लोग ऐसा सपना देखने लगे हैं तो खूब गलत भी नहीं कर रहे हैं. कारण, वर्तमान भारत में जो स्थितियां और परिस्थितियां बन या बनाई गयी हैं, उससे आज की तारीख में देश में दुनिया की विशालतम वंचित आबादी के वोट के जोर से लोकतान्त्रिक क्रांति मंच सज चुका है.

भारत में सामाजिक अन्याय की शिकार विश्व की विशालतम आबादी को आज जिस तरह विषमता का शिकार होकर जीना पड़ रहा है, उससे यहां विशिष्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन पनपने की ‘निश्चित दशाएं’ साफ़ दृष्टिगोचर होने लगीं हैं. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतःसामाजिक असंतोष, अन्याय, उत्पादन के साधनों का असमान बंटवारा तथा उच्च व निम्न वर्ग के व्याप्त खाई के फलस्वरूप होता है.

सरल शब्दों में ऐसे आन्दोलन आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की कोख से जन्म लेते हैं और तमाम अध्ययन साबित करते हैं कि भारत जैसी भीषणतम गैर-बराबरी पूरे विश्व में कहीं है ही नहीं.

जनवरी 2018 में आई ऑक्सफाम की रिपोर्ट बताती है कि देश की टॉप की 1 प्रतिशत आबादी का 73 प्रतिशत धन-दौलत पर कब्ज़ा हो गया है, जबकि 2015 की क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट का अनुसरण करने पर  पता चलता है आज टॉप की 10 प्रतिशत आबादी का प्रायः 90 प्रतिशत धन-दौलत पर कब्ज़ा हो चुका है. वहीं विभिन्न रिपोर्टो से यह तथ्य सामने आया है कि नीचे की 60 प्रतिशत आबादी महज 4.7 प्रतिशत धन पर गुजर-वसर करने के लिए विवश है.

भारत में जो बेनजीर गैर-बराबरी पनपी है, उसके लिए मुख्यरूप से जिम्मेवार है, नवउदारवादी नीति, जिसे आरक्षण को कागजो की शोभा बनाने के मकसद से नरसिंह राव ने 24 जुलाई,1991 को ग्रहण किया था. बहुजनों के खिलाफ इस हथियार को इस्तेमाल करने में राव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ.मनमोहन सिंह ने भी होड़ लगाया, किन्तु इस मामले में जिसने सबको छोटा बनाया, वह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं.

इन्होने अणि सवर्णपरस्त नीतियों से  विगत साढ़े चार में आरक्षित वर्गों को गुलामी की ओर ठेल दिया है . इनकी नीतियों से बहुजन समाज उन स्थितियों के सम्मुखीन हो गया है, जिन स्थितियों में विवश होकर विभिन्न देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए.

क्रान्तिकारी आन्दोलनों में बहुसंख्य लोगों में पनपता ‘सापेक्षिक वंचना’ का भाव आग में घी का काम करता है, जो वर्तमान भारत में दिख रहा है. क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़,’दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें!’

सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा,जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ,जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना. दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना का अहसास ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमे भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाही सत्ता. दक्षिण अफ्रीका में जिन 9-10 प्रतिशत गोरों का शक्ति के समस्त स्रोतों में 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा था, वे आज प्रत्येक क्षेत्र में ही अपने संख्यानुपात में सिमटते जाने के कारण वहां से पलायन करने लगे है.

लेकिन आज भारत में हजारों साल के जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के प्रत्येक क्षेत्र में असीमित प्रभुत्व से यहाँ के वंचितों को अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के वंचितों से भी कहीं ज्यादा सापेक्षिक वंचना के अहसास से भर दिया है. इसके कारणों की तह में जाने पर दिखाई पड़ेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमे 89-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्ही के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकाने इन्ही की है. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं.

देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद विधान सभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है. मंत्रिमंडलों मंत्रीमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्ही वर्गों से हैं.शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सुविधाभोगी वर्ग जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में नहीं है, लिहाजा भारत के बहुजनों जैसा सापेक्षिक वंचना का अहसास भी कहीं नहीं है.

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हजारों साल के विशेषाधिकारयुक्त तबकों के शक्ति के तमाम स्रोतों पर ही 80-90 प्रतिशत कब्जे ने बहुजनों में सापेक्षिक वंचना के अहसास को धीरे-धीरे जिस तरह विस्फोटक बिन्दु के करीब पहुंचा दिया है, उससे बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित होने लायक पर्याप्त सामान जमा हो गया है.

भारत में सापेक्षिक वंचना का भाव क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक और शर्त पूरी करता दिख रहा है और वह है ‘हम-भावना’ का तीव्र विकास. कॉमन वंचना ने बहुजनों को शक्तिसंपन्न वर्गों के विरुद्ध बहुत पहले से ही ‘हम-भावना’ से लैस करना शुरू कर दिया था, जिसमे सवर्ण आरक्षण की घोषणा के साथ लम्बवत उछाल आ गया है. क्रान्तिकारी बदलाव में दुनिया के प्रत्येक देश में ही लेखकों ने प्रभावी भूमिका अदा किया है. मंडल के दिनों में वंचित जातियों में बहुत ही गिने-चुने लेखक थे: प्रायः 99 प्रतिशत लेखक ही विशेषाधिकारयुक्त वर्ग से थे, जिन्होंने मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ सुविधाभोगी वर्ग को आक्रोशित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी. तब उसकी काट करने में वंचित वर्गों के लेखक पूरी तरह असहाय रहे. लेकिन आज की तारीख में वंचित वर्ग लेखकों से काफी समृद्ध हो चुका है, जिसमे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है. सोशल मीडिया की सौजन्य से इस वर्ग में लाखों छोटे-बड़े लेखक -पत्रकार पैदा हो चुके हैं, जो देश में व्याप्त भीषणतम आर्थिक और सामाजिक विषमता का सदव्यवहार कर वोट के जरिये क्रांति घटित करने लायक हालात बनाने में निरंतर प्रयत्नशील हैं.

बहरहाल आज भारत की लोकतांत्रिक क्रांति के उभार की प्रायः सारी स्थितियां और परिस्थितियां तैयार है. लेकिन ऐसे आंदोलनों के लिए जरुरत होती है योग्य नेतृत्व की, जो आन्दोलन के लिए पूंजीभूत हुईं आदर्श स्थितियों का सदव्यवहार कर सके. बहुजनों के दुर्भाग्य है कि इन आदर्श स्थितियों के सदव्यवहार करने लायक कोई उपयुक्त नेतृत्व दिख नहीं रहा था. नेता ढेरों थे, किन्तु इन परिस्थितियों के सदव्यवहार करने की मानसिकता से पुष्ट नहीं दिख रहे थे. नेतृत्व की इन्ही कमियों का लाभ उठाकर चैम्पियन सवर्णवादी भाजपा ने बैलेट बॉक्स के जरिये एक प्रतिक्रान्ति कर सुविधाभोगी वर्ग की तानाशाही सत्ता कायम कर ली है .

लेकिन आज जिस बदली हुई सोच और मानसिकता के साथ देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले यूपी और बिहार के मायावती, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव साथ आये हैं, उससे बैलेट बॉक्स के जरिये 2019 में लोकतांत्रिक क्रांति की प्रबल सम्भावना उजागर हो गयी है. ये तीनो ही बहुजनों के ह्रदय सिंहासन पर राज करते हैं.

इनका असर यूपी-बिहार ही नहीं, पूरे देश में हैं. जिस तरह सवर्ण आरक्षण घोषित होने के बाद वंचित वर्गों में रातो-रात ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ की चाह पनपी है, उस चाह का अनुमान लगाते हुए यदि ये प्रत्येक क्षेत्र में संख्यानुपात में भागीदारी के मुद्दे पर चुनाव लड़ते हैं तो बहुजनों की तानाशाही सत्ता कायम होने की सम्भावना अवश्य ही उजागर हो जाएगी. चूँकि जिस मायावती जी के नेतृत्व यह त्रिमूर्ति 2019 की निर्णायक चुनावी जंग लड़ने जा रही है, उस मायावती जी पार्टी का मूलदर्शन ही जिसकी जितनी संख्या है. ऐसे में उम्मीद करनी चाहिए 2019 का चुनाव इसी पर केन्द्रित होगा.