लोकसभा चुनाव की तिथियों की औपचारिक घोषणा करीब है. राजनीतिक पार्टियाँ अपना-अपना समीकरण दुरुस्त करने में जुट गयी हैं. इस बीच जो उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का दिशा तय करता है, वहाँ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (सपा-बसपा) में सीटों का बंटवारा हो चुका है. सपा-बसपा गठबंधन की इस प्रगति से यूपी के सामाजिक न्याय समर्थकों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है. इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अनुप्रिया पटेल के अपना दल के रिश्तों में आई खटास के चरम बिंदु पर पहुचने की खबरों से उनकी खुशियों में कुछ और इजाफा हो गया है.

काबिले गौर है कि पिछले कुछ महीनों से अपना दल की अनुप्रिया पटेल और भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के बीच रह-रहकर अनबन की खबरे मीडिया में आ रही थीं. अनुप्रिया पटेल ने दिसंबर,  2018  में कहा था कि बीजेपी छोटे दलों के सहयोगियों को उचित सम्मान नहीं दे रही है. इसका उसे खामिआजा भुगतना पड़ सकता है. अनुप्रिया का कहना रहा है कि उनकी पार्टी को यूपी में बीजेपी के साथ कुछ समस्याए हैं. उन्होंने उन समस्यायों से भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व को अवगत कराते हुए, उसके निराकरण के लिए 20 फ़रवरी, 2019 तक का समय दिया था, जो  निकल चुका है. समय सीमा पार होने के बाद अख़बार कह रहे हैं कि देश में आगामी आम चुनाव से पहले केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है.

अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने संकेत दे दिए हैं कि पार्टी अब अपना रास्ता खुद चुनेगी. उन्होंने 28 फ़रवरी, 2019 को लखनऊ में पार्टी पदाधिकारियों और बड़े नेताओं की बैठक बुलाई है जिसमें यह तय किया जायेगा कि पार्टी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स (एनडीए/ NDA) के साथ रहेगी या कोई और रास्ता चुनेगी. इसके साथ ही मीडिया में यह भी खबर आ रही है कि अनुप्रिया कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारियों प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाकात कर चुकी हैं और वह उनके संपर्क में हैं. कुल मिलाकर मीडिया में जो ख़बरें आ रही हैं,उससे लग रहा है कि अनुप्रिया पटेल बीजेपी का साथ छोड़ सकती हैं. इससे एकाधिक कारणों से इस लेखक जैसे असंख्य सामाजिक न्यायवादियों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है.  

अनुप्रिया पटेल बहुजन राजनीति की बड़ी ही नहीं, शायद सबसे बड़ी युवा प्रतिभा हैं. कम उम्र में सामाजिक न्याय की जो समझ उनमें विकसित हुई है, वह हैरंतगेज है.

अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओँ में समान रूप से सक्षम अनुप्रिया पटेल सामाजिक न्याय के प्रति जितनी समर्पित हैं, वह उन्हें बाकी बहुजन नेताओं की भीड़ से अलग श्रेणी प्रदान करता है. सामाजिक न्याय के प्रति उनका समर्पण दिखावा नहीं, है यह बात उन्होंने एनडीए सरकार में रहने के दौरान अनेकों बार प्रमाणित किया है.

इस लेखक को उन्हें सुनने का पिछला अवसर 2018 में छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती के असवर पर किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में मिला था. उसमें मुख्य अतिथि राम नाइक थे, किन्तु अनुप्रिया का अंदाज सबसे जुदा था. उन्होंने सामाजिक न्याय के मुद्दे पर जिस तरह मोदी सरकार को घेरा, जिस तरह आरक्षण पर बढ़ते खतरे से श्रोताओं को आगाह किया, वह चौकाने वाला था. उन्होंने श्रोताओं को ललकारते हुए कहा था-

“हमें सभी क्षेत्रों में संख्यानुपात में हिस्सेदारी चाहिए, यह मांग अच्छी है, लेकिन इसके लिए त्याग करने के लिए सामने आना होगा जो आप नहीं करते. “

उनका वह संबोधन सुनने के बाद यह यकीन और पुख्ता हुआ कि उनकी रग-रग में सामाजिक न्याय की धारा प्रवाहमान है, वह शायद इस मामले में कभी भी बहुजनों को निराश नहीं कर सकतीं.

सामाजिक न्याय के प्रति अनुप्रिया पटेल की प्रतिबद्धता का पहली बार सबूत 2013 में मिला, जब वह उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय आरक्षण को लेकर उभरे बहुजन छात्र आन्दोलन में अपनी सबल उपस्थिति दर्ज करायी. जुलाई 2013 में इलाहाबाद में शुरू हुआ वह बहुजन छात्र आन्दोलन, सवर्णों के 50% अघोषित आरक्षण के खिलाफ हिंदी पट्टी में पहला प्रभावशाली आन्दोलन था.

अगर अखिलेश सरकार सवर्ण छात्रों के दबाव में त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था वापस नहीं ली होती, सामाजिक न्याय के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया होता. तब त्रिस्तरीय आरक्षण के खिलाफ सवर्ण छात्र इतने उग्र हो गए थे कि वे यादव जाति से समबद्ध मानकर जहाँ गाय- भैंसों को देखते ही पिटाई शुरू कर देते, वही दूधियों को देखते ही उनके दूध- दही से भरे बर्तन उड़ेल देते.

उनकी नफरत के चपेट में आने से भगवान कृष्ण भी नहीं बच पाए थे. वे उनकी तस्वीरें फाड़ देते और मूर्तियाँ तोड़ कर पैरों से रौंदते. वैसे दहशत भरे माहौल में कोई और बड़ा नेता नहीं, सिर्फ अनुप्रिया पटेल बहुजन छात्रो के बीच आने का साहस जुटा पाई .

त्रिस्तरीय आरक्षण के विरोध में सवर्ण समुदाय ने उत्तर प्रदेश चयन आयोग के गेट पर यादव आयोग लिख दिया था.

इस आन्दोलन में उनकी भूमिका हताश-निराश बहुजन में एक नए उत्साह का संचार किया, जिसका सन्देश पूरे देश में गया. उस दौर में अखिलेश सरकार द्वारा उनपर दायर कराया गया मुकदमा आज भी चल रहा है. बाद में जब मैंने बोधिसत्व डॉ. भीमराव आंबेडकर महासभा के अध्यक्ष डॉ. लालजी निर्मल के साथ मिलकर त्रि-स्तरीय आरक्षण पर “मंडल- 3:50% अघोषित आरक्षण के खिलाफ एक महाविस्फोट” नामक एक पुस्तक तैयार की, हमने उसे अनुप्रिया पटेल को इन शब्दों में समर्पित किया- “समर्पित, मंडल-3 की महानायिका अनुप्रिया पटेल को”.

बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली और “डॉ. भीमराव आंबेडकर महासभा” द्वारा तैयार उस किताब का विमोचन हमने आठवे डाइवर्सिटी डे के अवसर पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू), नई दिल्ली  में किया, जिसमें अनुप्रिया पटेल को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया. प्रो. वीरभारत तलवार, सुरेश पंडित, प्रो. चमनलाल, अरुण कुमार त्रिपाठी, डॉ. उदित राज, डॉ. लाल निर्मल जी प्रसाद जैसे मनीषियों और वरिष्ठजनों के मध्य अनुप्रिया पटेल मुख्य अतिथि बनने में झिझक रही थी. भारी कोशिशों के बाद ही वह इसके लिए तैयार हुईं. बहरहाल जब उस आयोजन में उनके संबोधित करने की बारी आई, श्रोताओं में उत्कंठा इस बात को लेकर थीं, वह इतने बड़े बुद्धिजीवियों के बीच अपनी बात कैसे रखती हैं.

और जब उनका भाषण समाप्त हुआ तब हॉल तालियों से गूँज उठा. विषय पर पकड़ और आत्म-विश्वास से भरा उनका संबोधन इतना गजब का रहा कि उपस्थित विद्वान अतिथि मुग्ध हुए बिना न रहे सके. 2013  में जेएनयू में मैंने जिस अनुप्रिया पटेल को देखा और सुना, वह अनुप्रिया मुझ जैसों को उत्तरोत्तर विस्मित करती गयी. 26 नवंबर, 2015 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “संविधान दिवस” घोषित किया, उस अवसर पर संविधान पर हुई दो दिवसीय चर्चा में, अनुप्रिया पटेल का संबोधन तमाम नेताओं की भीड़ में अलग से ध्यान खींचा.

सामाजिक न्याय की प्रखर हिमायती अनुप्रिया पटेल सर्वप्रथम 2012 में वाराणसी के रोहनिया से विधायक बनी. बाद में 2014  में जब सौ दिन के अन्दर प्रत्येक के खाते में 15 लाख जमा कराने तथा युवाओं को हर साल दो करोड़ नौकरिया दिलाने के वादे साथ कथित नीची जाति के नरेंद्र मोदी ने जब सोशल इंजीनियरिंग का कमाल दिखाते हुए उपेन्द्र कुशवाहा, रामकृपाल यादव, डॉ.उदित राज जैसी बहुजन प्रतिभाओं के साथ अपना दल की अनुप्रिया को जोड़ा, शायद अच्छे दिन आने की उम्मीद में वह भी उनके साथ हो ली.

मोदी की प्रचंड आंधी में अपना दल के भी दो लोग संसद में पहुँच गए, जिनमे सरकार के चौथे साल में अनुप्रिया पटेल को स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद.

किन्तु एनडीए का सहयोगी व मंत्री बनकर भी अनुप्रिया पटेल ने सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कभी समझौता नहीं किया. वह दलित-पिछड़ों के आरक्षण और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर इतना मुखर रही कि उनके समक्ष विपक्ष में बैठे बहुजनवादी दलों के बड़े–बड़े मुखर नेता भी निष्तेज बने रहे.

उन्होंने न्यायपालिका, उच्च शिक्षा व अन्यान्य क्षेत्रों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (एससी, एसटी, ओबीसी) के आरक्षण की बात मुखरता से उठाई. जाति जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित न करने के लिए सरकार पर सवाल उठाये. कुल मिलाकर सत्ता-पक्ष के साथ होकर भी सामाजिक न्याय के प्रति उनकी अपार प्रतिबद्धता ने उन्हें विपक्षी नेता जैसी छवि प्रदान  कर दी. गत 7 जनवरी, 2019 के बाद जब मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को आरक्षण दिलाने की दिशा में प्रयास शुरू किया, तब कई नेताओं ने उसकी प्रतिक्रिया में संख्यानुपात में आरक्षण की मांग उठाया.

किन्तु अनुप्रिया पटेल शायद पहली नेता थीं, जिन्होंने खुलकर कहा था, ‘आरक्षण का आधार, जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी होना चाहिए.’

सामाजिक न्याय की ऐसी मुखर शख्सियत का भाजपा जैसी चरम सामाजिक न्याय विरोधी पार्टी के खेमे में होना, इस लेखक जैसे लाखों-करोड़ों लोगों को बराबर खलता रहा, इसीलिए जब अख़बारों में यह खबर छपी कि अनुप्रिया भाजपा को झटका दे सकती हैं, मुझ जैसों को काफी राहत मिली.

बहरहाल जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने में नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह को मीलों पीछे छोड़ते हुए अपने कार्यकाल के स्लॉग ओवर में संविधान की धज्जियां बिखेरते हुए राज-सत्ता, ज्ञान-सत्ता, धर्म-सत्ता के साथ अर्थ-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा जमाये जन्मजात सुविधाभोगी कथित गरीब सवर्णों को आरक्षण सुलभ कराया है.

जिस तरह मोदी-राज के शेष दिनों में “सवर्णपालिका” में तब्दील न्यायपालिका ने विभागवार आरक्षण लागू कर बहुजनों को उच्च –शिक्षा से आउट करने का षडयंत्र किया है एवं जिस तरह सुप्रीम  कोर्ट ने 20 फ़रवरी, 2019 को लाखों आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने का अमानवीय काम अंजाम दिया है,उससे  उम्मीद करनी चाहिए 28 फ़रवरी, 2019 को अनुप्रिया पटेल एनडीए के परित्याग का ही निर्णय लेंगी। वह किसी भी सूरत में भाजपा के साथ नहीं जाएँगी. ऐसे में जबकि यह साफ़ दिख रहा है कि बहुजन राजनीति की एक विरल प्रतिभा भाजपा छोड़ने का मन बना रही है.

क्या बेहतर नहीं होता सपा-बसपा बहुजन समाज के वृहत्तर हित में अनुप्रिया पटेल को अपने साथ रखने की गुंजाईश निकालते.

अनुप्रिया पटेल ही क्यों भाजपा खेमे में शामिल डॉ. उदित राज, सावित्री बाई फुले इत्यादि जैसी अन्य प्रतिभाओं को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।

कारण, जिस तरह मोदी सरकार ने दलित, आदिवासी,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का पूरी तरह सर्वनाश किया है, उससे उसे राजनीतिक रूप से नए सिरे से एक बार फिर अस्पृश्य बनाने की जरुरत आन पड़ी है. इस दिशा में बहुजन प्रतिभाओं से भाजपा को कंगाल करना एक बड़ा कदम हो सकता है. इस दिशा में अनुप्रिया पटेल को अपने साथ जोड़कर शुरुआत की जा सकती है.

अगर स्थापित बहुजनवादी दल ऐसा नहीं करेंगे, तब बहुजन समाज अनुप्रिया जैसी प्रतिभाओं को दूसरे सवर्णवादी दल कांग्रेस के साथ जुड़ते देखने के लिए अभिशप्त होगा.