प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी प्रयागराज में कुम्भ मेले में स्नान करने गए. कुम्भ में अनेक राजनीतिक दलों के नेता अक्सर स्नान करने जाते रहे हैं. उसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्नान किया गया किन्तु यह इसलिए विशेष रहा क्योकि उन्होंने वहां पांच सफाई कर्मियों के पैर धोये और उनको तौलिये से पौंछा भी. यह प्रोग्राम इसलिए भी विशेष था कि इस प्रोग्राम की जानकारी पहले से नहीं थी. न प्रधान मंत्री के निजी लोगो को और न भाजपा के अन्य नेताओं को. जिन पांच लोगो के उन्होंने पैर धोये, उनमें से तीन पुरुष और दो महिलाएं हैं. उन्हें भी इस बात का अहसास नहीं था कि प्रधान मंत्री उनके पैर धोयेंगे. इस तरह उनको भी बहुत सुखद आश्चर्य हुआ.

यहाँ इसके कई राजनीतिक अर्थ लगाए जा रहे हैं. एक बड़ा तर्क जो आ रहा है, वह यह है कि ऐसा नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री बिना ठोस कारणों से ऐसा करेंगे. राजनीतिक रूप से यह कदम इसलिए उठाया गया है कि ताकि वे दिखा सके कि वे दलितों की बहुत इज्जत करते हैं, सम्मान करते हैं. राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए रहे हैं कि उन्होंने दलितों का वोट लेने के लिए ऐसा किया है.  इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है. यहाँ कई प्रश्न है. क्या पैर छूने से दलित उनके पक्ष में वोट करेंगे?

राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि यह टॉकेनिज़्म पॉलिटिक्स का हिस्सा है. यह कोई नई  पॉलिटिक्स नहीं है. दलितों के घर खाना खाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है. भाजपा नेता कई बार प्रचार के लिए दलितों के घर खाना खा चुके हैं. उनका मानना है कि इससे अछूतपन दूर होता है, दलित समाज हिन्दू समाज से जुड़ेगा. यह काम केवल भाजपा नेताओं ने ही नहीं किया, बल्कि दलितों के घर खाना खाने का काम  कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी किया है. खाना खाने की घटना होती रही हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पैर धोना अपने में एक नई घटना है.

यहाँ प्रश्न है कि कि इससे क्या होगा? क्या दलितों को सम्मान मिल जायेगा. यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस/ RSS) के समरसता प्रोग्राम का हिस्सा है. आरएसएस का मानना है कि दलितों के साथ बैठने, खाना खाने जैसे प्रोग्राम से हिन्दू समाज में समरसता आएगी.

कुछ साल पहले उज्जैन में कुम्भ मेला के दौरान भी ऐसा ही प्रोग्राम रखा गया था. जिसमे एक घाट पर सबको नहाना था. बाद में जब यह प्रोग्राम  मिडिया में चर्चा में आया तो भाजपा प्रवक्ता ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि भाजपा ने ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं रखा.

यहाँ मोदी को चुनाव आते ही ऐसी टोकेनिज़्म पॉलिटिक्स करने की जरूरत क्यों पड़ गयी. बात ऐसी है कि मोदी सरकार से दलित समाज बहुत नाखुश है. यह बात उस भी पता चल गयी थी जब पिछले साल अनुसूचित जाति – जनजाति अत्याचार निवारण अधनियम (SC ST Act) के मसले पर 2 अप्रैल, 2018 को पूरे भारत में देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे. अभी पिछले महीने सरकार और कोर्ट ने 13 पॉइंट रिजर्वेशन  रोस्टर लागू कर दिया है. जिससे SC ST OBC के उम्मीदवारों का यूनिवर्सिटी कॉलेज में फैकल्टी बनने की सम्भवना लगभग खत्म हो गयी है. इस तरह रिजर्वेशन पर लगातार हमला किया जा रहा है. यह बात गाहे-बगाहे भाजपा नेता कभी कभी बोल भी देते हैं. सभी पब्लिक सेक्टर प्राइवेट हाथो में बेचे जा रहे हैं. नौकरशाही में केंद्रीय सचिवालय में दलित न के बराबर हैं. केबिनेट में भी दलित नहीं के बराबर है. यहाँ तक कि भाजपा अपने सहयोगी दलितों, जो उसके साथ रहे हैं, को भी नजरअंदाज कर रही है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रामदास आठवले इसके उदहारण हैं.

अब बात सफाईकर्मी की आती है. पूरे शहर की गंदगी दूर करने की जिम्मेदारी सफाईकर्मी की होती  है जो वाल्मीकि समाज से आते हैं. इनको सफाई करने के लिए सीवर में उतरना पड़ता है जो कि पूर्णतः जोखिम भरा कार्य है. जहरीली गैस से आये दिन उनमें से कई की मृत्यु हो जाती है. सफाई करने  के लिए आधुनिक व्यस्था नहीं है. जमाना इतना आगे बढ़ गया और विज्ञान ने इतना विकास कर लिया किन्तु सीवर में घुसकर सफाई करने की व्यवस्था वही सैकड़ो साल पुरानी है. उसमें कोई विकास नहीं हुआ. इस तरह से उनके मानवाधिकार का हनन प्रतिदिन हो रहा है .

नरेंद्र मोदी सरकार ने उनको अभी तक स्थायी नौकरी प्रदान नहीं की है. कोई सामाजिक सुरक्षा की गारंटी उन्हें सुनिश्चित नहीं की गयी है. जिन सफाईकर्मी की सीवर में मौत हो जाती है उनके आश्रितों को कोई नौकरी नहीं दी जाती है, और न उनके बच्चो को पढाई-लिखाई की व्यवस्था प्रदान की जाती है. वे कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) पर कम सैलरी पर काम करने को मज़बूर हैं. यदि सरकार उनके लिए चिंतित होती उनको सरकारी नौकरी प्रदान करती.

सफाई कर्मियों के लिए लम्बे समय से आंदोलन कर रहे बेजवाडा विल्सन ने इस संबंध में सवाल उठाया है कि “क्या सफाईकर्मी इतने तुच्छ हैं कि उनका पांव धोकर सम्मान किया गया है? इससे किसका महिमामंडन हो रहा है? जिसका पांव धोया गया या जिसने पांव धोया है? अगर पांव धोना ही सम्मान है तो फिर संविधान में संशोधन कर पांव धोने और धुलवाने का अधिकार जोड़ दिया जाना चाहिए.”

नरेंद्र मोदी द्वारा पैर धोने पर दिल्ली में वाल्मीकि समाज द्वारा एक धरना प्रदर्शन किया किया. उसमे सफाई कर्मियों ने कहा कि “हमे पूजने से पहले जीवन का अधिकार चाहिए.” सफाई कर्मी मनुष्य हैं, उन्हें पूजा नहीं जाना चाहिए, बल्कि उन्हें मानवीय अधिकर चाहिए, और देश की सरकार उनके साथ सम्मान करने का दिखावा कर रही है. जाति भारतीय आदमी के दिमाग में हैं, और मोदी पैर धोकर जाति व्यवस्था से लड़ाई लड़ रहे हैं.

दलितों को आज समरसता और इस टिकेनिज़्म पॉलिटक्स से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि उनके सामाजिक – आर्थिक उन्नति के लिए कुछ ठोस प्रोग्राम चलाये जाये, उनके लिए आर्थिक सशक्तिकरण के लिए रोजगारपरक योजनाएं चलाई जाये. दलितों को जरूरत समानता की है. जब समाज में समानता आ जाएगी, समरसता अपने आप आ जाएगी.