चुनाव जीतने में नारे बहुत अहम रोल अदा करते हैं, ऐसा राजनीति के तमाम पंडित ही मानते हैं. उनका मानना है कि चुनावों में उठाये जाने वाले नारे जहां एक ओर पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करते हैं वहीं दूसरी ओर वोटरों को पार्टी के एजंडे की झलक दिखाकर पार्टियों के पक्ष में माहौल बनाते हैं. एक अच्छा नारा जहां पार्टी के पक्ष में जनसैलाब पैदा कर सकता है,वहीं गलत नारा पार्टी की लुटिया भी डुबो सकता है. नारे क्या कमाल दिखा सकते हैं, इसका प्रमाण हमने हाल के वर्षों भारत और अमेरिका में देखा. 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी ने जो ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा दिया, उसमें पिछली सरकारों से हताश-निराश लोगों में उम्मीद की किरण दिखी और अच्छे दिन आने की आश में लोग भाजपा को वोटों से लाद दिए. लगभग पांच साल बीत जाने के बाद भी यह नारा आज भी चर्चा में है. मोदी की तरह ही 2016 में डोनाल्ड ट्रंप ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’(अमेरिका को फिर से महान बनाना है) का जो नारा दिया, वह मोदी के अच्छे दिन जैसा जादू किया. और अमेरिका में अश्वेतों के बढ़ते प्रभाव से हताश गोरे प्रभुवर्ग को, जिनकी संख्या 70 प्रतिशत ज्यादा है, ट्रंप का नारा इतना स्पर्श किया कि उन्होंने एक निहायत ही विवादित और अराजनैतिक व्यक्ति को दुनिया का सबसे शक्तिसंपन्न राष्ट्राध्यक्ष बना दिया. उस नारे के असर को ट्रंप आज भी नहीं भूले हैं,इसलिए उन्होंने 2020 के लिए यह नारा स्थिर कर लिया है- ‘अमेरिका को महान बनाये रखना है (कीप अमेरिका ग्रेट)’!

सवर्ण आरक्षण के जवाब में उभरा: जिसकी जितनी संख्या भरी का नारा !

बहरहाल जो ट्रंप मोदी से खासा प्रभावित हैं, उन्होंने 2020 के लिए अपना चुनावी नारा स्थिर कर लिया है ,किन्तु आगामी कुछ महीनों में संख्याबल के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में जो आम चुनाव होने जा रहा है, उसके लिए मोदी की ओर से कोई ऐसा नारा नहीं उछाला गया है, जो अच्छे दिन जैसा प्रभाव डाल सके. अभी मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उससे कयास लगाया जा रहा है कि उनकी पार्टी की ओर से उनको ही केंद्र में रखकर ‘फिर एक बार, मोदी सरकार’ जैसा नारा उछाला जा सकता है. बहरहाल जुमलेबाजी के लिए चर्चित मोदी भले ही 2019 के लिए कोई ठोस नारा नहीं गढ़ पाए हैं, किन्तु आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर उन्होंने सवर्ण आरक्षण का जो मास्टर स्ट्रोक चला है, उससे एक ऐसे नारे के उदय की सम्भावना पैदा हो गयी है, जो न सिर्फ 2019 का राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है, बल्कि भारत सहित दूसरे देशों के चुनावी इतिहास के बेहतरीन से बेहतरीन नारों को भी म्लान कर सकता है. जी हां, बात जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी की हो रही है. मोदी ने अपने कार्यकाल के स्लॉग ओवर में सवर्ण आरक्षण का जो छक्का मारा, उससे जहां एक ओर उनकी पार्टी और सवर्ण वर्ग में उत्साह का संचार हुआ, तो वहीं दूसरी ओर वंचित बहुसंख्य वर्ग में उग्र प्रतिक्रिया हुई. और वह प्रतिक्रिया ‘जिसकी जितनी संख्या भारी’ उसकी उतनी भागीदारी’ के रूप में प्रकट हुई. 7 जनवरी को मोदी मंत्रिमंडल द्वारा गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत देने की खबर आते ही सोशल मीडिया मीडिया पर जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा उभरने लगा और 9 जनवरी की रात राज्यसभा में सवर्ण आरक्षण का प्रस्ताव पास होते-होते,सोशल मीडिया पर इसका सैलाब पैदा हो गया. यूं तो सवर्ण आरक्षण के विरुद्ध जिसकी जितनी सख्या भारी के रूप अपनी भावना प्रकटीकरण करने के लिए सबसे पहले तो बहुजन बुद्धिजीवी सामने, किन्तु थोड़े से अन्तराल में ही दलित पिछड़े समाज के नेता भी यह उठाने में होड़ लगाने लगे. इनमें कुछ सत्ता पक्ष के नेता रहे भी रहे. ऐसे नेताओं में पहला नाम सामाजिक न्याय की प्रखर प्रवक्ता अनुप्रिया पटेल का है. उन्होंने 8 जनवरी को, जिस दिन सवर्ण आरक्षण बिल लोकसभा में पेश हुआ, घोषणा किया कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए.अनुप्रिया पटेल की तरह ही राजद के तेज तर्रार नेता तेजस्वी यादव, सपा के धर्मेन्द्र यादव सहित अन्य कई नेताओं ने अपने-अपने अंदाज में पुरजोर तरीके से जिसकी जितनी सख्या भारी की मांग उठाया है.

बसपा का पेटेंट नारा बना: सबका नारा!

काबिले गौर है कि जिसकी जितनी संख्या भारी के जनक बसपा के संस्थापक अध्यक्ष कांशीराम रहे, जिन्होने प्रायः चार दशक पहले वोट हमारा राज तुम्हारा. तिलक तराजू इत्यादि जैसे नारों के साथ जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा दिया था.इसलिए यह बसपा का पेटेंट नारा है, जिसका बहुजन बुद्धिजीवी तो गाहे-बगाहे इस्तेमाल

करते रहे ,पर गैर-बसपाई नेता पूरी तरह परहेज करते रहे. किन्तु सवर्ण आरक्षण के बाद बुद्धिजीवियों के साथ विभिन्न बहुजनवादी दलों के नेता भी दलगत बंधन तोड़कर सोत्साह यह मांग उठाने के लिए आगे बढ़े.और जब 22 जनवरी को विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में 13 बिंदु वाले आरक्षण रोस्टर (13 प्वाइंट रोस्टर) का मार्ग प्रशस्त हुआ, पहले से ही सवर्ण आरक्षण से आक्रोशित बहुजन बुद्धिजीवियों और नेताओं में जिसकी जितनी संख्या भारी की मांग और तीव्रतर हुई. बहरहाल विगत 7 से 22 जनवरी, 2019 के मध्य जिस तरह सामाजिक न्याय को आघात पहुंचा है, उससे लोकसभा चुनाव-2019 में जिसकी जितनी संख्या भारी के चुनावी नारे की शक्ल अख्तियार करने की प्रबल सम्भावना पैदा हो गयी है और अगर ऐसा होता है तो यह न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के चुनावी इतिहास का सबसे शानदार और जानदार नारा साबित हो सकता है,ऐसा मेरा मानना है. मेरे इस दावे को परखने के लिए स्वाधीन भारत के चुनावी इतिहास के खास-खास नारों पर दृष्टिपात कर लिया जाय.

गरीबी हटाओ बनाम इंदिरा हटाओ!

1960 के दशक में जब केंद्र और राज्यों की राजनीति पर कांग्रेस का आज के भाजपा जैसा दबदबा था, उन दिनों जिन ने नारों देश की राजनीति को उद्वेलित किया था, उनमे ‘ संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’.’देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है’.’ लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’.’धन और धरती बंट के रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी’. ‘जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल’. ‘इसदीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं’. किन्तु विपक्ष के इन जोरदार नारों के बीच तब कांग्रेस के लाल बहादुर शास्त्री द्वारा गढ़ा नारा ‘जय जवान, जय किसान’ अलग से लोगों को प्रभावित किया. पचास साल से अधिक पुराना होने के बावजूद इसमें आज भी ताजगी बरकारार है.

1970 के दशक में राजाओं के प्रिवीपर्स के खात्मे और बैंकों- कोयला खानों इत्यादि के राष्ट्रीयकरण का साहसिक निर्णय लेने वालीं इंदिरा गांधी ने जब 1971 में ‘गरीबी हटाओं’ का नारा दिया, उसका परिणाम चमत्कारिक रहा. लोगों को विश्वास हुआ असाधारण संकल्प की स्वामिनी इंदिरा गाँधी भारत से गरीबी हटाने का कारनामा अंजाम दे सकती हैं. इस भरोसे से लोगों ने अपने वोट से उन्हें इतना ताकतवर बना दिया कि उन्हें विश्व इतिहास की सबसे ताकतवर महिला शासकों की विशिष्ट पंक्ति में अपना नाम दर्ज कराने लायक कारनामे अंजाम देने कोई कोई दिक्कत ही नहीं हुई. उन दिनों वह अपनी हर चुनावी सभा में अपने भाषण के अंत में यही बोलती थीं- ‘वे कहते हैं, इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ’. किन्तु गरीबी हटाओं नारे से ताकतवर बनकर उभरी इंदिरा गाँधी जब 1975 में इमरजेंसी लगाने के बाद 1977 में चुनाव में उतरी, ‘इंदिरा हटाओं, देश बचाओं’ का उद्घोष करने वाले जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्ष ने ‘संजय की मम्मी–बड़ी निकम्मी’, ‘नसबंदी के तीन दलाल- इंदिरा, संजय, बंसीलाल’, ‘देखो इंदिरा का ये खेल, खा गई राशन, पी गई तेल’ के नारों से उन्हें क्षत-विक्षत करा दिया. उस दौर में रामधारी सिंह दिनकर की कविता की ये पंक्तियाँ – ‘सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है/भावी इतिहास तुम्हारा है/ ये नखत अमा के बुझते हैं/ सारा आकाश तुम्हारा है. दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है – जनांदोलन का नारा बन गई. इन नारों की आंधी में इमरजेंसी के दौरान उछाला गया कांग्रेसी देवकांत बरुआ का ‘इंदिरा इज इंडिया एन्ड इंडिया इज इंदिरा’ और साहित्यकार श्रीकांत वर्मा का रचा नारा ‘ ‘जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर , मुहर लगाना हाथ पर’ बिलकुल ही नहीं टिक पाये और इंडिया गांधी सत्ता से दूर हो गयीं.

जबतक सूरज चाँद रहेगा: इंदिरा तेरा नाम रहेगा!

बाद में जब सम्पूर्ण क्रांति वाली सरकार सम्पूर्ण भ्रान्ति में तब्दील होने लगी, समय की नब्ज पहचानते हुए इंदिरा गांधी 1978 में कर्णाटक के चिकमंगलूर लोकसभा सिट से उप-चुनाव की लड़ाई में उतरीं. तब उनका सेनापति बने देवराज अर्स ने नारा दिया ‘एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर-चिकमंगलूर’. और इस चुनाव में विजय के बाद इंदिरा गाँधी फिर पीछे मुड़कर नहीं देखीं; जबतक रहीं, शेरनी बनकर रहीं. इसी शेरनी के लिए

13 Point Roster Protest and Support of 200 Point Roster 31.01.2019

1980 में नारा दिया गया ‘आधी रोटी खाएंगे, इंदिराजी को लाएंगे’. और यह नारा उनकी सत्ता में जबरदस्त वापसी बड़ा सबब बना. परवर्तीकाल में जब इंदिरा जी के मौत के बाद 1984 में लोकसभा चुनाव अनुष्ठित हुआ, तब उसमें ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा’, ‘ मेरे खून का अंतिम कतरा तक इस देश के लिए अर्पित है’, ’उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं’ जैसे नारों ने राजनीति में नवप्रवेशी राजींव गांधी के पक्ष सहानुभूति का सैलाब पैदा करने बड़ी भूमिका अदा की. बाद में जब बोफर्स कांड में राजीव गांधी को दागदार बनाकर विश्वनाथ प्रताप सिंह चुनाव में उतरे, उनके पक्ष में यह नारा-‘ राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’- जादू सा काम किया.

मिले मुलायम कांशीराम: हवा में उड़ गए जय श्रीराम!

उसी वीपी सिंह ने जब 7 अगस्त, 1990 को मंडलवादी आरक्षण की घोषणा किया, देश की राजनीति में भूचाल आ गया और देखते ही देखते राजनीति मंडल-कमंडल पर केन्द्रित हो गयी. धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में वर्षों एकक्षत्र राज करने वाली कांग्रेस की चमक फीकी पड़ने लगी और हिंदुत्ववादी, बहुजनवादी और अन्य कई क्षेत्रीय पार्टिया उसकी जगह लेने लगीं . एक अंतराल के बाद बड़ा बदलाव 2014 में में आया, जब केंद्र में भाजपा के नरेंद्र मोदी की सरकार आई और जिस तरह कभी कांग्रेस केंद्र से लेकर राज्यों तक एकछत्र राज्य किया, उसकी पुनरावृति भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कर दिखाया. भारी परिवर्तन से भरे मंडल उत्तरकाल के प्रायः ढाई दशक में ढेरों नारे गूंजे जिन्होंने अपने दौर में चुनावों को प्रभावित किया और वे आज भी हमारी स्मृति से छिटके नहीं हैं. इनमे कुछ खास नारे हैं-: ‘सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे’. ‘ये तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी है’,‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’, ‘राजीव तेरा ये बलिदान याद करेगा हिंदुस्तान‘, ‘सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी’, ‘भूरा बाल साफ करो’, ‘रोटी, कपड़ा और मकान, मांग रहा है हिंदुस्तान’, ‘अटल, आडवाणी, कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’, ‘ठाकुर बाभन बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर’, ‘तिलक ताराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’, ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जयश्रीराम’, ‘चलेगा हाथी उड़ेगी धूल, ना रहेगा हाथ, ना रहेगा फूल’, ‘ऊपर आसमान, नीचे पासवान’, ‘अमेठी का डंका, बेटी प्रियंका’, ‘मां, माटी, मानुष’, ‘चढ़ गुंडन की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर’, ‘अबकी बार मोदी सरकार’, ‘कट्टर सोच नहीं युवा जोश’, ‘यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम’, ‘गुंडे चढ़ गए हाथी पर गोली मारेंगे छाती पर’, ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है’!

विश्व इतहास का सर्वोत्तम नारा!

बहरहाल स्वाधीनोत्तर भारत के बड़े-बड़े चुनावी नारे ही नहीं, स्वाधीनता संग्राम के ‘स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’, ‘तुम हमें खून दो-हम तुम्हे आजादी देंगे’, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ इत्यादि जैसे देश-भक्तिमूलक नारों से लेकर ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’, ‘राजसत्ता का जन्म बंदूक की नाली से होता ’, ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ इत्यादि जैसे विश्वविख्यात नारों से भी यदि तुलना किया जाय, तो भी जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा मीलों आगे नजर आएगा. कारण, जिसकी जितनी संख्या नारे का प्रभाव सार्वदेशिक है. यह नारा प्राचीन समाजों में जितना उपयोगी हो सकता था,आज के लोकतान्त्रिक युग में भी उतना ही प्रभावी है. इसका सम्बन्ध प्रकृत न्याय से है. अगर यह शाश्वत सचाई है कि सारी दुनिया में ही जिनके हाथों में हाथों में सत्ता की बागडोर रही,उन्होंने शक्ति के स्रोतों (आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक) का विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारा कराकर ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या- आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी- को जन्म दिया, तो इससे उबरने में जिसकी जितनी संख्या भारी से बेहतर कोई सूत्र हो ही नहीं सकता. विशेषकर जहाँ-जहां जन्मगत आधार पर अवसरों से वंचित कर समुदाय विशेष के लोगों का जीवन नारकीय बनाया गया; आर्थिक और सामाजिक विषमता की खाई खोदी गयी, वहां मानवता की स्थापना के लिए जिसकी जितनी संख्या भारी से बेहतर कोई सूत्र ही नहीं हो सकता है. ऐसे में इसमें निहित अपील को देखते हुए निःसंदेह इसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नारा कहा जा सकता.

जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा : क्यों लोकसभा चुनाव-2019 में घटित कर सकता है चमत्कार!

बहरहाल जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा लोकसभा चुनाव-2019 में क्यों घटित कर सकता है चमत्कार, यह जानने के लिए कुछ बुनियादी बातों को ध्यान में रखना है. सबसे जरुरी तो यह जानना है कि यह चुनाव उस मोदी के खिलाफ लड़ा जायेगा जो मोदी खुद को नीची जाति का बताते हुए अच्छे दिन लाने; प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 100 दिन के अन्दर 15 लाख जमा कराने तथा तथा युवाओं को हर साल दो करोड़ नौकरी सुलभ कराने जैसे जैसे अभूतपूर्व लोक-लुभावन चुनावी वादे के साथ सत्ता में आये. किन्तु उनके सत्ता में आने के डेढ़ दो साल बाद ही उनके मंत्रिमंडल के कुछ जिम्मेवार लोगों ने बता दिया कि प्रत्येक के खाते में 15 लाख जमा कराने:प्रत्येक वर्ष दो करोड़ नौकरियां देने और अच्छे दिन लाने का वादा महज चुनावी जुमला था. अब जहाँ तक नीची जाति का सवाल है, मोदी ने जिस तरह के फैसले लेने शुरू किये, उससे साफ़ होते गया कि उनका खुद को नीची जाति बताना भी जुमला ही था. बमूलतः वह उस संघ के एकनिष्ठ सेवक हैं, जिस संघ का प्रधान लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों का हित-पोषण है एवं जो पूना पैक्ट के ज़माने ही आरक्षण का विरोधी रहा तथा जिसके पहले स्वयंसेवी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आरक्षण के खात्मे की संघ की योजना को मूर्त रूप देने के लिए उन लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औने-पौने दामों में बेचने जैसा देश-विरोधी काम अंजाम दिया था, जो देश की आन-बान-शान तथा दलित,आदिवासी पिछड़ों को आरक्षण सुलभ कराने के जरिया रहे. देश प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के कुछेक अन्तराल बाद ही उनकी सवर्णपरस्त नीतियों से यह साफ़ हो गया कि संघ के हिडेन एजंडे को पूरा करने के लिए वह आरक्षण के खात्मे तथा सवर्णों वर्चस्व को नए सिरे स्थापित करने में सर्वशक्ति लगायेंगे और वैसा किया भी.

विगत साढ़े चार वर्षों में आरक्षण के खात्मे तथा बहुसंख्य लोगों की खुशिया छीनने की रणनीति के तहत ही मोदी राज में श्रम कानूनों को निरंतर कमजोर करने के साथ ही नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, शक्तिहीन बहुजनों को शोषण-वंचना के दलदल में फंसानें का काम जोर-शोर से हुआ. बहुसंख्य वंचित वर्ग को आरक्षण से महरूम करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों इत्यादि को निजीक्षेत्र में देने की शुरुआत हुई. आरक्षण के खात्मे के योजना के तहत ही सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई की मजूरी दी गयी. आरक्षित वर्ग के लोगों को बदहाल बनाने के लिए ही 62 यूनिवर्सिटियों को स्वायतता प्रदान करने के साथ –साथ ऐसी व्यवस्था कर दी गयी जिससे कि आरक्षित वर्ग, खासकर एससी/एसटी के लोगों का विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्ति पाना एक सपना बन गया. कुल

मिलाकर जो सरकारी नौकरियां वंचित वर्गों के धनार्जन का प्रधान आधार थीं, मोदीराज में उसके स्रोत आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया.

अब जहाँ तक सवर्णों को और शक्तिशाली बनाने का सवाल है, मोदी इस मामले में जो प्रयास किये, उसका परिणाम 2015 से प्रकाशित होने वाली एचडीआई, वर्ल्ड हैपीनेस इंडेक्स, क्रेडिट सुइसे की रिपोर्टों में दिखने लगा.

2015 से जहाँ विभिन्न रिपोर्टों में मानव विकास तथा खुशहाली के मामले में बहुजनों की बाद से बदतर होती स्थिति की झलक मिलने लगी, वहीँ सवर्णों की दौलत वर्ष दर वर्ष हैरतंगेज बढ़ोतरी लोगों को चौकाने लगी. इस मामले 22 जनवरी, 2018 को प्रकाशित ऑक्सफाम की रिपोर्ट कुछ ज्यादे ही हैरतंगेज रही. उस रिपोर्ट से पता चलता है कि टॉप की 1% आबादी अर्थात 1 करोड़ 3o लाख लोगों की धन-दौलत पर 73 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है. इसमें मोदी सरकार के विशेष योगदान का पता इसी बात से चला कि सन 2000 में 1प्रतिशत वालों की दौलत 37 प्रतिशत थी ,जो बढ़कर 2016 में 58.5 प्रतिशत तक पहुच गयी. अर्थात 16 सालों में इनकी दौलत में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. किन्तु उनकी 2016 की 58.5 प्रतिशत दौलत सिर्फ एक साल के अन्तराल में 73 प्रतिशत हो गयी अर्थात सिर्फ एक साल में 15 प्रतिशत का इजाफा हो गया. शायद ही दुनिया में किसी परम्परागत सुविधाभोगी तबके की दौलत में एक साल में इतना इजाफा हुआ हो. किन्तु मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों से भारत में ऐसा चमत्कार हो गया. 1 प्रतिशत टॉप वालों से आगे बढ़कर यदि टॉप की 10 प्रतिशत आबादी की दौलत का आंकलन किया जाय तो नजर आएगा की देश की टॉप 10प्रतिशत आबादी, जिसमें 99.9% सवर्ण होंगे, का देश की सृजित धन-दौलत पर 90प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो गया है.

संपदा-संसाधनों का इतना असमान बंटवारा और कहां!

आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के सवर्णों जैसा शक्ति के स्रोतों पर पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है. आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमे 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्ही के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्ही की है. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं . देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है. मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्ही वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में

दुनिया में कहीं नहीं है. इस स्थिति को आजाद भारत, विशेषकर मोदीराज में सुपरिकल्पित रूप से बढ़ावा दिया गया, जिसकी झलक 2015 से लगातार क्रेडिट सुइसे, ऑक्सफाम इत्यादि की रिपोर्टों मिलती रही है. मोदीराज में आर्थिक असमानता में इतना भयावह इजाफा हुआ कि थॉमस पिकेटी जैसे ढेरों अर्थशास्त्री संपदा-संसाधनों के

पुनर्वितरण की बात उठाने लगे.ज्यों-ज्यों विभिन्न अर्थशास्त्री संपदा-संसाधनों के पुनर्वितरण की बात उठाते गए, त्यों-त्यों वंचितों में संख्यानुपात में भागीदारी की चाह पनपती गयी.

बहरहाल आज जबकि आम चुनाव सिर पर है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हजारों साल के विशेषाधिकारयुक्त तबकों के शक्ति के तमाम स्रोतों पर ही 80-90 प्रतिशत कब्जे ने बहुजनों में सापेक्षिक वंचना के अहसास को धीरे-धीरे जिस तरह विस्फोटक बिन्दु के करीब पहुंचा दिया है, उससे बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित होने लायक पर्याप्त सामान जमा हो गया है. स्मरण रहे साड़ी दुनिया में ही सापेक्षिक वंचना के एहसास के घनीभूत होने से ही क्रांतियां घटित हुई, और आज की तारीख में सापेक्षित वंचना का अहसास तुंग पर पहुँचने लायक हालत दुनिया में और कहीं नहीं हैं. भारत में सापेक्षिक वंचना का भाव क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक और शर्त पूरी करता दिख रहा है और वह है ‘हम-भावना’ का तीव्र विकास. कॉमन वंचना ने बहुजनों को शक्तिसंपन्न वर्गों के विरुद्ध बहुत पहले से ही ‘हम-भावना’ से लैस करना शुरू कर दिया था, जिसमें सवर्ण तथा विश्व विद्यालयों में

विभागवार आरक्षण की घोषणा के साथ लम्बवत उछाल आ गया है. क्रान्तिकारी बदलाव में दुनिया के प्रत्येक देश में ही लेखकों ने प्रभावी भूमिका अदा किया है. मंडल के दिनों में वंचित जातियों में बहुत ही गिने-चुने लेखक थे: प्रायः 99 प्रतिशत लेखक ही विशेषाधिकारयुक्त वर्ग से थे, जिन्होंने मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ सुविधाभोगी वर्ग को आक्रोशित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी. तब उसकी काट करने में वंचित वर्गों के गिने-चुने लेखक पूरी तरह असहाय रहे. लेकिन आज की तारीख में वंचित वर्ग लेखकों से काफी समृद्ध हो चुका है, जिसमे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है. सोशल मीडिया की सौजन्य से इस वर्ग में लाखों छोटे-बड़े लेखक -पत्रकार पैदा हो चुके हैं,जो देश में व्याप्त भीषणतम आर्थिक और सामाजिक विषमता का सदव्यवहार कर वोटके जरिये क्रांति घटित करने लायक हालात बनाने में निरंतर प्रयत्नशील हैं.

वर्तमान हालात में यदि सामाजिक न्यायवादी दल प्रत्येक क्षेत्र में जिसकी जितनी संख्या भारी की घोषणा कर दें तो …

ऐसे में बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित करने लायक पनपे हालात को दृष्टिगत रखते हुए यदि सामाजिक न्यायवादी दल सत्ता में आने पर सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों,सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, फिल्म-मीडिया, एनजीओ और विज्ञापन निधि, सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जाने वाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों,तकनीकी-व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के संचालन, प्रवेश और

अध्यापन इत्यादि में अवसरों का बंटवारा भारत के प्रमुख समाजो-सवर्ण,ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों- के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में कराने के वादे पर चुनाव में उतरते हैं तो मीडिया, धन-बल, साधु-संत इत्यादि से भरपूर लैस होने के बावजूद सवर्णवादी भाजपा हवा में उड़ जाएगी तथा बहुजनवादी दल सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने का चमत्कार घटित कर देंगे, ऐसा इस लेखक का विश्वास है.