दलित, आदिवासी, पिछड़ों को कॉलेज/ विश्ववद्यालयों में शिक्षक बनने के खिलाफ चक्रव्यहू रचने वाले 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ 31 जनवरी को बहुजन छात्र और गुरुजनों का दिल्ली में ऐतिहासिक जुटान हो गया. यूँ तो 22  जनवरी को इस मनुवादी रोस्टर पर मोहर लगने के अगले ही दिन से ही सोशल मीडिया के साथ जमीनी स्तर पर इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था, पर देश की निगाहें 31 जनवरी को दिल्ली के मंडी हाउस से संसद भवन तक होने वाले आक्रोश मार्च पर टिकी थी. इस आक्रोश मार्च के पीछे किसी संगठन विशेष की भूमिका नहीं थी: यह दो अप्रैल के स्वतः स्फूर्त ऐतिहासिक बंद जैसा आह्वान था, जिसमें एक हजार से अधिक की संख्या में प्रोफ़ेसर, शोधार्थी-विद्यार्थी, लेखक-पत्रकार सोशल एक्टिविस्ट इत्यादि स्वतःस्फूर्त रूप से शिरकत किये.

घटना की ऐतिहासिकता

उनका ऐतिहासिक जुटान  रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के खिलाफ उमड़े जन सैलाब की याद दिला गया. इस आक्रोश मार्च में उपेन्द्र कुशवाहा, सीताराम येचुरी, ए राजा,धर्मेन्द्र यादव, जिग्नेश मेवानी, चंद्रशेखर रावण, तेजस्वी यादव इत्यादि नेताओं तथा दिलीप मंडल, प्रो. रतनलाल, कौशल पवार, डॉ. हंसराज सुमन, प्रो.हेमलता महिश्वर, डॉ.राजेश पासवान, मुकेश मानस, लेखक, प्रोफ़ेसर, शोधार्थियों की उपस्थित से लोगों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुँच गया.

वैसे तो दिल्ली का आक्रोश मार्च अपने आप में ऐतिहासिक रहा, किन्तु इसी दिन बनारस, गोरखपुर इत्यादि में इस किस्म का आयोजन हुआ, जहाँ बहुजन छात्र और गुरुजनों का अभूतपूर्व जुटान हुआ. दिल्ली सहित हर जगह लोग बाबा साहेब, लोहिया, पेरियार, कांशीराम इत्यादि  जिंदाबाद के नारे लगाते हुए 200 पॉइंट रोस्टर लागु करवाने और 13  पॉइंट ख़त्म करवाने के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराए. हर जगह मार्च इस संकल्प के साथ समाप्त हुआ कि अब लड़ाई आर-पार की लड़नी है। यह संविधान, लोकतंत्र और देश को बचाने की लड़ाई है, बहुजन युवाओं के अस्तित्व की लड़ाई है’. बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ बहुजन समाज के छात्र और गुरुजनों में अपार रोष है, जिसका प्रकटीकरण 31 जनवरी को आक्रोश मार्च के रूप में हो चुका है.

31 जनवरी को दिल्ली सहित बनारस, गोरखपुर इत्यादि में आक्रोश मार्च को मिली  व्यापक सफलता के बाद इसे 2 अप्रैल की भाँति देश स्तर पर दोहराने की भी तैयारी चल रही है. लेकिन 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके बहुजन-छात्र और गुरुजनों को शिक्षा से जुडी दूसरी जरुरी समस्यायों को भी ध्यान में रखना है: लगे हाथ उन्हें उच्च शिक्षा में व्याप्त अन्याय-अत्याचार के खिलाफ भी निर्णायक लड़ाई लड़ लेनी होगी.

भारतीय वर्ग संघर्ष

यह अप्रिय सचाई है कि वर्तमान में वर्ग-संघर्ष प्रायः खुलकर सामने आ चुका है, जिससे बहुजन आँखे मूंदे हुए हैं. इस वर्ग संघर्ष में शासक वर्ग, जिस आरक्षण के जरिये बहुजनों को सरकारी नौकरियां मिलती थीं एवं जो इनके धनार्जन का प्रधान स्रोत थी, उस आरक्षण को प्रायः कागजों की शोभा बना चुका है. इसके लिए वह उन उपक्रमों को निजी क्षेत्र में दे प्रायः दे चुका  है, जहाँ आरक्षण लागू होता था. आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने के साथ वह बहुजनों उच्च व गुणवती शिक्षा से दूर धकेलने की साजिश रच रहा है. जिस तरह गांधी दलित-आदिवासी और पिछड़ों की इतनी ही शिक्षा के हिमायती थे, जिससे वे शूद्र-कर्म को बेहतर तरीके से अंजाम दे सके, ठीक उसी तरह भारत के वर्तमान शासकों को बहुजनों की उतनी ही शिक्षा काम्य है जिससे वह तीसरे, चौथे दर्जे का काम ठीक-ठाक तरीके से कर सकें. वह बहुजन समाज समाज के लोगों को वीसी, डीन, प्रोफेसर, प्रॉक्टर, डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, पत्रकार इत्यादि के रूप में देखने की मानसिकता प्रायः खो चुका है. इस कारण ही वह गुणवत्ती शिक्षा निजी क्षेत्र में शिफ्ट करने के साथ पांच दर्जन के करीब देश के बेहतरीन विश्व विद्यालयों को स्वायत्तता प्रदान कर चुका है. ऐसे में बहुजन समाज अगर शासक वर्गों का सही तरह से प्रतिरोध करना चाहता है तो उसे दो मोर्चों पर आर पार की लड़ाई लड़नी होगी. पहला, उसे नौकरियों के अतिरिक्त सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग-परिवहन, फिल्म-मीडिया इत्यादि अर्थोपार्जन के बाकी सोतों में हिस्सेदारी के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई लड़नी होगी.

शिक्षा के अवसर और भारतीय वर्ग संघर्ष

दूसरा, जो शिक्षा अवसरों के हस्तगत करने का माध्यम है, उससे वंचित वर्गों का समृद्ध करने के लिए सरकारी हों या निजीक्षेत्र के शिक्षालय: हर जगह उनमे वंचित वर्गों के छात्रों के प्राइमरी से लेकर एमफिल, पीचडी में एडमिशन, टीचिंग, प्रशासनिक विभाग इत्यादि में संख्यानुपात में अवसरों के बंटवारे के लिए सर्वशक्ति लगानी होगी.इसके लिए एजुकेशन डाइवर्सिटी की लड़ाई से भिन्न कोई अन्य विकल्प नहीं है.

उच्च शिक्षा में एजुकेशन डाइवर्सिटी का अर्थ हुआ विश्वविद्यालयों के एडमिशन (एमफिल –पीएचडी तक), टीचिंग और प्रशासनिक विभाग में भारत की सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन अर्थात भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों- (1) सवर्ण, (2) ओबीसी, (3) धार्मिक अल्पसंख्यकों और (4)  एससी/ एसटी) के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में उपरोक्त क्षेत्रों में अवसरों का बंटवारा. मसलन डीयू/ जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय हों या आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसे हाई प्रोफाइल संस्थान, वहां एडमिशन और टीचिंग में जिस सामाजिक समूह का जो जनसंख्यानुपात है उसमें आधा अवसर उस समाज के पुरुषों को और आधा उनकी महिलाओं को मिले. ऐसा करने पर उच्च शिक्षण संस्थाओं का प्रजातंत्रीकरण हो जायेगा, जिससे सभी सामाजिक समूहों के स्त्री-पुरुषों को समान अवसर मिलेगा. वीसी, प्रोफ़ेसर, डीन और प्रॉक्टर इत्यादि के पदों के बंटवारे में भी यह सामाजिक और लैंगिक विविधता दिखनी चाहिए. वर्तमान में यदि हम 13 पॉइंट रोस्टर के खात्मे तक अपनी आर-पार की लड़ाई को सिमित रखते  हैं, तो हम शैक्षणिक परिसरों में पसरे व्यापक भेदभाव की अनदेखी के लिए जिम्मेवार होंगे. इस विषय में चर्चित पत्रकार सत्येन्द्र पीएस की यह टिपण्णी काफी महत्वपूर्ण है. उन्होंने फेसबुक पर लिखा है, ’इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 200 पॉइंट रोस्टर पर कुछ कहा ही नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ बताते हुए उसने अपने फैसले में क्लाज 2 खत्म किये हैं. पहला, रोस्टर सिस्टम विभागवार लागू होगा, यूनिवर्सिटी को यूनिट नहीं माना जायेगा.

दूसरा, ’आरक्षण रोस्टर को साल दर साल के मुताबिक़ आगे नहीं बढाया जायेगा/ लागू नहीं किया जायेगा. अब आप 13 पॉइंट आरक्षण लीजिये, चाहे 50 पॉइंट से चाहे 200 पॉइंट से .किसी भी हाल में यूनिवर्सिटी में अब एससी/ एसटी,ओबीसी को आरक्षण नहीं मिलेगा. और ओबीसी,एससी/एसटी के भाई लोग 200 पॉइंट रोस्टर को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसके बारे में न्यायालय कुछ नहीं कहा है. सरकार चाहे तो कह देगी कि ले ले बेट्टा 200 पॉइंट रोस्टर, जो उखाड़ना है उखाड़ ले. फैसला देने वाले न्यायाधीश भी हंस रहे होंगे और प्रकाश जावडेकर भी कहीं 9 सितारा होटल में पैग के साथ ठहाके लगा रहे होंगे. है कि नहीं!’

बहरहाल उच्च शिक्षा में समानता लाने व सभी सामाजिक समूहों को शिक्षार्जन का समान अवसर सुलभ कराने वाला सामाजिक और लैंगिक विविधता का यह सूत्र कोई कल्पना का विषय नहीं है. लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व तमाम देश ही इसका अनुसरण करते हैं.खास कर जिस अमेरिका के फिल्म-टीवी, फैशन, टेक्नोलॉजी, लोकतान्त्रिक मूल्यों का अन्धानुकरण भारत करता है, उस अमरीका की ताकत और समृद्धि का राज यही विविधता नीति है. वहां फिल्म-मीडिया, उद्योग-व्यापार इत्यादि तमाम क्षेत्रों की भांति उच्च शिक्षा में भी सामाजिक और लैंगिक विविधता को सम्मान दिया जाता है. इसके तहत वहां निजी और सरकारी क्षेत्र के छोटे-बड़े तमाम शिक्षण संस्थानों में एडमिशन, टीचिंग व प्रशासनिक विभाग की सेवाओं में विभिन्न नस्लीय समूहों के स्त्री और पुरुषों को संख्यानुपात में अवसर दिया जाता है. इस मामले में ‘अमेरिकन एसोसियेसन ऑफ़ कॉलेज एंड यूनिवर्सिटीज’ (आकु) की डाइवर्सिटी पालिसी आँखें खोलने वाली है.

आकु डाइवर्सिटी (विविधता) का नारा बुलंद करते हुए वर्षों से इस नीति पर अमल कर रहा है कि अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में छात्र एवं शिक्षकों का अनुपात अमेरिकी समाज में रह रहे विभिन्न नस्लीय समुदायों की संख्या के बराबर होना चाहिए.आकु के अनुसार – ‘लोकतंत्र का अर्थ यहाँ यह है कि समस्त मानव समाज का मूल्य एक समान है: सबको सम्मान की इच्छा है और सभी को सामाजिक जीवन में तथा समाज के मार्गदर्शन में योगदान के लिए सामान अवसर की जरुरत है.’ आकु यह भी मानता है- ‘जबतक वैविध्य भरे समाज में, प्रश्नों को विविध दृष्टिकोण से नहीं देखा जायेगा, तबतक अमेरिकी समाज उस आवश्यक ज्ञान की कमी महसूस करता रहेगा, जो एकीकृत समाज निर्माण के लिए जरुरी है. ’आकु की विविधता नीति का अनुसरण अमेरिका के सरकारी और निजी क्षेत्र में चलने वाले तमाम विश्व विद्यालय ही करते हैं.

विकसित देशों में शिक्षा और डाइवर्सिटी या शिक्षा के सामान अवसर

इसी कारण वहां हार्वर्ड, कोलंबिया, स्टैंफोर्ड, मैसाचुएट्स, येल, कोर्नेल, प्रिंसटन, कैलिफोर्निया इंस्टीटयूट ऑफ़ टेक्नोलाजी इत्यादि सहित प्राइवेट सेक्टर अन्य छोटे-बड़े विश्वविद्यालय क्लासरुम, टीचिंग स्टाफ, कर्मचारी विभाग में सभी नस्लीय समूहों की उपस्थिति दर्ज कराने में एक दूसरे से होड़ लगाते हैं. इससे ‘नासा’ जैसे हाई प्रोफाइल संस्थान भी मुक्त नहीं है. इन संस्थानों में लागु एजुकेशन डाइवर्सिटी के चलते जन्मगत कारणों से तमाम अवसरों से वंचित रेड इंडियंस, हिस्पैनिक्स, काले और महिलाएं ज्ञान के क्षेत्र में वहां के प्रभुवर्ग से कंधे से कन्धा मिलाकर चल रहे हैं. अमेरिका में लागु एजुकेशन डाइवर्सिटी पालिसी के चलते ही भारतीय कल्पना चावला को अन्तरिक्ष की यात्रा का सौभाग्य मिला था. एजुकेशन डाइवर्सिटी के चलते ही ढेरों भारतीय अमेरिका पहुंचकर ज्ञान के क्षेत्र में झंडा गाड़ने में कामयाब हो रहे हैं.

बहरहाल आज जबकि बहुजन छात्र और गुरुजन उच्च शिक्षा में व्याप्त अन्याय के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने जा रहे है, क्या उचित नहीं होगा कि वे अमेरिका के एजुकेशन डाइवर्सिटी के चमत्कारी परिणामो को ध्यान में रखते हुए अपनी लड़ाई को 200 पॉइंट रोस्टर से आगे बढ़ाते हुए एजुकेशन डाइवर्सिटी तक प्रसारित करें और मांग उठायें कि जेएनयू, डीयू, बीएचयू , भामा एटामिक रिसर्च सेंटरइसरो-डीआरडियो इत्यादि जैसे सरकारी संस्थान ही नहीं, मणिमाल. अमृता, विट, थापर, एमिटी इत्यादि के क्लासरूम, टीचिंग स्टाफ, कमचारी विभाग में भारत की सामाजिक विविधता दिखे अर्थात इनमे सवर्ण, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यको के स्त्री और पुरुषों की वाजिब उपस्थिति झलके.

ध्यान रहे इस लड़ाई में भी उतनी ही उर्जा लगेगी ,जितनी 200 पॉइंट रोस्टर में लग रही है. ऐसे में क्यों न वे एजुकेशन डाइवर्सिटी की लड़ाई लड़कर देश के निजी और सरकारी शिक्षण संस्थानों को लोकतांत्रिक शक्ल प्रदान करें.