बहुजन साहित्य संघ, जेएनयू द्वारा 13 फ़रवरी 2019 को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका “ज़मीन” का विमोचन और “पसमांदा आंदोलन: दशा एवं दिशा” पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया. इसमें अर्जुमंद आरा, गौरी पटवर्धन और खालिद अनीस अंसारी ने अपनी बात रखी. सञ्चालन ज़ुबैर आलम ने किया.

अर्जुमन्द आरा ने अपनी बात रखते हुए कही कि हमारे सामने यह दुविधा है की हम किसे मुख्य धारा की पत्रिका कहेंगें? उन्होंने कहा कि क्या देश की 85% लोगो का साहित्य मुख्य धारा नहीं है. यह कैसे हो सकता है कि इतने बड़े आबादी को हम मुख्यधारा मानाने से इंकार कर दें? उन्होंने इस पत्रिका के उद्देश्य के बारे में बताते हुए कहा कि यह एक ऐसा प्रयास है कि दुनियां के विभिन मुल्को में चल रहे साहित्यिक और सामाजिक आंदोलनों को हम एक जगह ला सकें. उन्होंने कहा कि यह पत्रिका हिंदी में होगी लेकिन यह (सिर्फ) हिंदी साहित्य की पत्रिका नहीं होगी.

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अर्जुमन आरा ने पत्रिका में प्रकाशित भारतीय और पाकिस्तानी लेखकों के कुछ अंश पढ़कर भी सुनाएँ. जिससे पता चलता है कि राजनैतिक नक़्शे पर भारत और पाकिस्तान दो मुल्क है लेकिन सामाजिक स्तर पर दोनों देशो के दरकिनार कर दिए गए लोगो के दर्द एक ही है.

गौरी पटवर्धन ने साहित्य में कमेरा वर्ग के योगदान पर जोर देते हुए कहा कि भाषा और संस्कृति का निर्माण लिखने वालो ने नहीं बल्कि कमेरा और अर्जक समाज ने किया है. उन्होंने जी. अलोइसिस को उद्धृत करते हुए कहा कि भाषा, गीत, संगीत, संस्कृति का निर्माण कमेरा समाज ने अपने रोज मर्रा के उपयोग और मनोरंजन के लिए किया. उन्होंने यह सीधे-सीधे नहीं कहा लेकिन लेकिन उनका आशय यह भी था कि बाद में ज्ञान पर समाज के अल्पसंख्यक पुजेरी समाज ने कब्ज़ा कर लिया.

खालिद अनीस अंसारी ने पसमांदा आंदोलन पर जोर दिया और कहा कि भारत में जो स्थिति सवर्ण समाज और अर्जक समाज की है ठीक वही स्थिति भारतीय मुसलमानो में भी है. वहां भी अशराफ और पसमांदा है. यह सिर्फ शब्दों का अंतर है वस्तुस्थिति का नहीं. उन्होंने कहा कि मंडल कमीशन में पिछड़े जाति के मुसलमानो को आरक्षण मिला हुआ है यह काका कालेलकर कमीशन ने भी दिया था. पिछड़े और पसमांदा का मजहब अलग-अलग है लेकिन दर्द साझा है. 1998 में अली अनवर ने अपनी किताब मसावात की जंग के द्वारा पिछड़े भारतीय मुसलमानो के लिए पसमांदा शब्द का ईजाद किया तब से इस आंदोलन ने और जोर पकड़ा है. भारतीय मुसलमानो का भला तभी होगा जब वह सेक्युलर कम्युनल हिन्दू मुस्लमान के बहस से आगे सोचेगा.

उन्होंने कहा कि सैयदवाद (भारतीय सन्दर्भ में ब्राह्मणवाद) सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि यह दूसरे देशो में भी है और वहां भी इसके खिलाफ आंदोलन चल रहें हैं. उदहारण के तौर पर यमन में लोगो ने सैयदवाद के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है.

भारत में अशरफों ने ऐसा कोई भी आंदोलन नहीं चलाया जो मुसलमानो के जमीनी हकीकत में कोई सकारात्मक परिवर्तन लाये.

मुद्राराक्षस ने जो धर्म की पुनर्पाठ की जरुरत बताई है वह सिर्फ हिन्दू समाज के लिए नहीं बल्कि मुस्लिम समाज के लिए भी जरुरी है – खालिद ने इस पर जोर दिया.

खालिद ने अंत में लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के तथाकथित सेक्युलर और मुस्लिम रहनुमा राजनीति की कलाई खोली और उसकी आलोचना कि लेकिन इसपर यह कहकर विस्तार से चर्चा नहीं की कि यह इस विचार गोष्ठी का मूल विषय नहीं है.