उच्च शिक्षण संस्थानों में समुचित आरक्षण का अध्यादेश लेकर आओ!
वरना मोदी जी वापस जाओ !!

पुनर्विचार याचिका धोखा है!
अध्यादेश से किसने रोका है!!

उच्च शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों, कालेजों, संस्थानों, और अकादमिक संस्थाओं में “विभागवार आरक्षण” को रद्द करके इन संस्थाओं को एक इकाई मानते हुए कुल स्वीकृत पदों के अनुपात में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों का समुचित आरक्षण/ प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु’’ अविलम्ब अध्यादेश लाने की मांग

साथियो !

जैसा कि आप जानते हैं उच्च शिक्षण संस्थानों/विश्वविद्यालयों और कालेजों में विभागवार या विषयवार आरक्षण के विरुद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से 2017 में शुरू हुआ आन्दोलन आज देशव्यापी बन चुका है और सड़क से संसद तक इसकी गूंज सुनायी दे रही है. आप यह भी जानते हैं की अप्रैल 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट और विगत 22 जनवरी. 2019 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उच्च शिक्षण संस्थाओं की नियुक्ति के सम्बन्ध में दिए गये ‘विभागवार आरक्षण’ के फैसले की वजह से उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों का आरक्षण/ प्रतिनिधित्व समाप्तप्राय हो गया है. उच्च शिक्षा केन्द्रों यथा- विश्वविद्यालयों, कालेजों, संस्थानों, और अन्य अकादमिक संस्थाओं में हजारों वर्षों वर्षों से सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़ा बनाये गये इन वर्गों के प्रवेश का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है.

उच्च शिक्षा में आरक्षण की शुरुआत और वर्तमान स्थिति

उच्च शिक्षण संस्थानों के शैक्षिक पदों में अनुसूचित वर्गों को 1997 तथा अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को 2007 से आरक्षण दिए जाने की शुरुआत की गयी है किन्तु इन वर्गों को उच्च शिक्षण संस्थानों/विश्वविद्यालयों से दूर रखने का कुत्सित षड्यंत्र निरंतर जारी रखने की वजह से आजतक उच्च शिक्षण संस्थाओं में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ सका है.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में सामाजिक भागीदारी की स्थिति इस प्रकार है-

प्रोफेसर के पदों पर अनुसूचित जाति के मात्र 3.47%, जनजाति के 0.7% लोग ही नियुक्ति किये गये हैं और अन्य पिछड़े वर्गों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है जबकि सामान्य वर्ग के 95.2% लोग प्रोफेसर के पदों पर विराजमान हैं.

एसोसिएट प्रोफेसर के पदों में अनुसूचित जाति के 4.96% जनजाति के 1.3% लोग कार्यरत हैं, अन्य पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व शून्य है जबकि, 92.9% लोग एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर काबिज हैं.

असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर अनुसूचित जाति के 12.02%, जनजाति के 5.46% एवं अन्य पिछड़े वर्गों का 14.38% कोटा ही भरा गया है जबकि 66.27% पदों पर सामान्य वर्ग के लोग कब्जा जमाये बैठे हैं.

इन 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में गैर-शिक्षण पदों पर भी आरक्षित वर्गों के लोगों को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. गैर-शिक्षण पदों पर अनुसूचित जाति के 8.96%, जनजाति का 4.25%, अन्य पिछड़े वर्गों का 10.17% कोटा भरा गया है जबकि सामान्य वर्ग के 76.14% लोग गैर-शिक्षण पदों पर बैठे हैं.

इस प्रकार आंकड़ों में विभागवार आरक्षण का दुष्परिणाम आपके सामने है

उच्च शिक्षण संस्थानों में आंकड़ों में शोषित – वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व की दयनीय स्थिति साबित होने बावजूद भी केन्द्र सरकार ने अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों के हितों पर कुठाराघात करते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के माध्यम से 13 मार्च, 2018 ‘विभागवार आरक्षण’ का आदेश जारी कर दिया.

सरकार द्वारा आनन-फानन में जारी किये गये आदेश के साथ ही उच्च शिक्षण संस्थानों/ विश्वविद्यालयों/ कालेजों में अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़े वर्गों का आरक्षण निष्प्रभावी हो गया.

इस आदेश की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता कि इसके बाद 11 विश्वविद्यालयों के 706 पद विज्ञापित किये गये जिनमें मात्र 18 (2.5%) पद अनुसूचित जाति एवं 57 (8%) पद अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षित किये गये. अनुसूचित जनजाति श्रेणी का प्रतिनिधित्व तो पूरी तरह खत्म कर दिया गया. शेष श्रेणी का प्रतिनिधत्व भी कुल विज्ञापित पदों (706) की तुलना में नाममात्र का ही रह गया जबकि 49.5% आरक्षण (SC-15% +ST-7.5% +OBC-27%) की वर्तमान व्यवस्था के हिसाब से अनुसूचित जाति,जनजाति व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 353 पद आरक्षित होना चाहिए था.

इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार ने कोर्ट का बहाना लेकर बहुजन समाज के लोगों को उच्च शिक्षण संथाओं से वंचित करने की सुनियोजित साजिश की है.

अब जबकि केन्द्र की भाजपा सरकार की सुनियोजित साजिश और उसके अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग विरोधी चेहरा बेनकाब हो चुका है और इन वर्गों के छात्रो, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों एवं जनसमुदाय द्वारा चलाये जा रहे देशव्यापी आन्दोलन की आग सड़क से संसद तक धधक रही है तो सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका का दिखावा कर रही है.

यह सरकार की कुत्सित मानसिकता और सदियों से वंचित वर्गों के विरुद्ध सुनियोजित साजिश का हिस्सा है.

13 Point Roster Protest and Support of 200 Point Roster 31.01.2019

अत: हम केन्द्र सरकार से निम्नलिखित मांग करते हैं-

  1. उच्च शिक्षण संस्थानों- विश्वविद्यालयों/ कालेजों/ संस्थानों/ अन्य अकादमिक संस्थाओं में ‘विभागवार आरक्षण’ को रद्द करके इन संस्थाओं को एक इकाई मानते हुए “कुल स्वीकृत पदों के अनुपात में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व/ आरक्षण सुनिश्चित करने हेतु” संसद में अविलम्ब बिल पास किया जाये.
  2. देश की समस्त शिक्षण संस्थाओं के सभी पदों अर्थात- प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर सभी वर्गों (अनुसूचित जाति,जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों) का समुचित आरक्षण/ प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाये.
  3. सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में अरक्षित वर्ग के बैकलाग के पदों को चिन्हित करके विशेष भारती अभियान के माध्यम से अविलम्ब भरा जाये.
  4. कुलपति, निदेशक, प्राचार्य आदि के सभी पदों पर अरक्षित वर्गों को चक्रानुक्रम में समानुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाये.
  5. उच्च शिक्षण संस्थाओं की कार्यकारिणी/ परिषद/  बोर्ड/ कोर्ट/ विद्वत परिषद्/ आदि में आरक्षित वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाये.

हम अनुरोध करते हैं कि केन्द्र सरकार अनुसूचित, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों के हित में उपरोक्त मांगों पर अविलम्ब निर्णय ले और हमारे संवैधानिक अधिकारों को बहाल करे वरना, हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे और केन्द्र की भाजपा सरकार के आदिवासी, दलित एवं पिछड़ा वर्ग विरोधी चेहरे को बेनकाब करते रहेंगे.

जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी !

निवेदक- अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग संघर्ष समिति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी