बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर की पुण्य तिथि के मौके पर सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के बैनर तले आज बिहार के खगड़िया जिले के परबत्ता प्रखंड मुख्यालय में ‘सवर्णआरक्षण- संविधान-देश बचाओ राष्ट्रीय अभियान’ के तहत एकदिवसीय कन्वेंशन सम्पन्न हुआ। कन्वेंशन की अध्यक्षता इंजीनियर हरिकेश्वर राम ने किया जबकि संचालन बहुजन छात्र नेता सौरभ राणा ने किया।

कन्वेंशन का आरंभ पुलवामा में आतंकवादी हमले में शहीद हुए सैनिकों को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि देने से हुआ।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कन्वेंशन को संबोधित करते हुए ‘आरक्षण बचाओ, संविधान बचाओ मोर्चा’ के संरक्षक एवं सामाजिक न्याय आंदोलन के नेता इंजीनियर हरिकेश्वर राम ने कहा कि आज बहुजनों की उनके अधिकारों से बेदखली जारी है। सवर्णों का आबादी से चार गुना से भी अधिक हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है, बावजूद इसके संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाते हुए आर्थिक आधार पर सवर्णों को आरक्षण दे दिया गया। यह बहुजनों के हितों पर ही नहीं अपितु संविधान पर भी आघात है। आज एक बार फिर ब्राह्मणवादी शक्तियां सब कुछ हड़प लेना चाहती हैं।

आगे उन्होंने कहा कि बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने वैसे तबके के लिए आरक्षण की व्यवस्था दी जिन्हें दबाया गया था और उनका शासन-सत्ता के संचालन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था। किंतु वर्तमान सरकार ने संविधान की आत्मा पर ही चोट कर दिया। लोकतंत्र में न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका, मीडिया से लेकर हर क्षेत्र में बहुजनों का संख्यानुपात में समुचित प्रतिनिधित्व आवश्यक है। किंतु आज यह प्रतिनिधित्व देने की बात तो दूर उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षक नियुक्ति में विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर की व्यवस्था कर बहुजनों को उच्च शिक्षण संस्थानों से बेदखल करने का ही रास्ता साफ कर दिया। मोदी सरकार संविधान की जगह मनुविधान को थोंपने की साजिश को अमलीजामा पहना रही है।

न्याय मंच के डॉ मुकेश कुमार ने ओबीसी रिजर्वेशन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आजादी के बाद 1953 में काका कालेकर आयोग बना, उसकी सिफारिशों को केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लागू नहीं किया। फिर 1978 में बीपी मंडल कमीशन बना। किन्तु कांग्रेस व अन्य दलों ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू नहीं होने दिया। अंततः 1990 में यह आंशिक रूप में लागू हुआ। किन्तु इतने वर्षों बाद भी ओबीसी का सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी प्रतिनिधित्व पूरा नहीं हो पाया। इसका सीधा मतलब है कि आती-जाती सरकारों ने रिजर्वेशन को ईमानदारी से कभी लागू ही नहीं किया। भाजपा- कांग्रेस बहुजनों के प्रतिनिधित्व को खत्म करने का षड्यंत्र कर रही है। इस षड्यंत्र में एससी-एसटी-ओबीसी सांसद भी शामिल हो गए हैं।

Sawarn Reservation: Save Constitution Save Nation National Campaign in the occasion of Peoples Leader Karpoori Thakur 17 02 2019 b

दलित-पिछड़े नेता और उनकी पार्टियां भी गरीब सवर्णों को प्रकारांतर से आरक्षण देने की हिमायत कर आरक्षण को गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम ही समझते हैं।

उन्होंने कहा कि रामविलास पासवान से लेकर मायावती, मुलायम, अखिलेश, नीतीश, उपेंद्र कुशवाहा, लालू-तेजस्वी ने भी ऐन-केन प्रकारेण सवर्ण आरक्षण का समर्थन ही किया है। इससे इन सबके दिवालियेपन का ही पता चलता है।

उन्होंने कहा कि एससी-एसटी -ईबीसी-ओबीसी के लोगों को इन चुनौतियों को गहराई से समझना और सामाजिक न्याय के समग्र एजेंडे पर मुकम्मल संघर्ष के लिए आगे आना होगा।

इसके पूर्व कन्वेंशन को संबोधित करते हुए सामाजिक न्याय आंदोलन के नेता नवीन प्रजापति ने कहा कि सरकार, न्यायपालिका और मीडिया सबने मिलकर सामाजिक न्याय व संविधान के खिलाफ युद्ध  छेड़ दिया है। सवर्ण-सामन्ती-पूंजीवादी शक्तियों की नई पीढ़ी निजी स्कूलों में पढ़ रही है जबकि बहुजनों के बच्चे जिन सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, उन्हें साजिशन बर्बाद कर दिया गया है। आज सरकार हर क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। निजी क्षेत्रों में आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। यह क्षेत्र पूरी तरह से सवर्णों के लिए सुरक्षित कर दिया गया है। जबकि जिन सार्वजनिक क्षेत्रों में एससी-एसटी-ओबीसी को रिजर्वेशन की व्यवस्था है, वहां साजिशन आरक्षण को खत्म किया जा रहा है।

स्थानीय शिक्षक नवीन कुमार ने कन्वेंशन को संबोधित करते हुए कहा कि आर्थिक आधार पर सवर्णों को आरक्षण देना मनुवाद की पुनर्स्थापना करने का कुत्सित प्रयास है। वही मनुवाद जो जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था को जायज ठहराता है। आजादी के सत्तर सालों में सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्टों में बहुजन जज क्यों नहीं बन पाए? क्योंकि जहां आरक्षण नहीं है, वह पूरा क्षेत्र सवर्णों के लिए आरक्षित है। आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है। आरक्षण वस्तुतः दबे-कुचले शोषित-वंचित तबके को प्रतिनिधित्व देने और समतामूलक समाज बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है। इन बुनियादी सवालों से बहुजनों का ध्यान हटाने के लिए उन्हें ब्राह्मणवादी शक्तियां राम मंदिर की लड़ाई में फंसा देती है। बहुजनों को इस षड्यंत्र को समझने और इसके खिलाफ उठ खड़े होने की जरूरत है।

स्थानीय वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार साहनी ने कहा कि केंद्र-राज्य की सरकारों ने आरक्षण को कभी ईमानदारी से लागू नहीं किया। व्यवहार में अनारक्षित सीटें सवर्णों के लिए आरक्षित रहा है। यह 15 फीसदी से भी कम आबादी वाले सवर्णों को 50 फीसदी से भी ज्यादा रिजर्वेशन है।

वयोवृद्ध शिक्षक रामचरित्र शर्मा ने कहा कि आरक्षण सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। सत्ता और व्यवस्था पर सवर्ण-सामन्ती ताकतों का आज भी वर्चस्व बना हुआ है। मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर सवर्णों को दिया गया आरक्षण बहुजनों के हितों पर गंभीर चोट है। आज जरूरत इस बात की है कि सामाजिक न्याय के लिए जोरदार तरीके से आवाज उठाई जाए।

कन्वेंशन को पटना से आए योगेंद्र पासवान, जितेंद्र कुमार एवं स्थानीय नेता दिवाकर शर्मा, कैलाश पासवान, सौरभ तिवारी, अंजनी,मनोहर दास,कैलाश दास,शिवशंकर ठाकुर,दिलीप सहनी,प्रदुम्न,मीना तिवारी,अखिलेश रमण व अन्य ने संबोधित किया। इस अवसर पर इलाके के दर्जनों बुद्धिजीवी, महिलाएं एवं छात्र-नौजवान उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन सौरव तिवारी ने किया।