पुलवामा आतंकी हमले में भारत माता ने अपने 44 जवान बेटे खोए है। पूरा देश इस घटना से आहत हुआ है। पुरे देश की संवेदनाएं शहीदों के परिजनों के साथ है। इस बात में किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए। किन्तु, इसी के साथ दुर्भाग्यवश संवेदनाएं प्रदर्शित करने का एक संवेदनहीन प्रतियोगी दौर शुरू हो गया है।

इस दौड़ में सोशल मीडिया, नागरिक  राजनैतिक संगठन और आमजन सभी शामिल हो गए। लोग अपनी तस्वीरें बदल रहे है और सोशल मीडिया संवेदना के संदेशों से भरा पड़ा है। संवेदना अपने पूरे उफान पर है और उन्माद की तरफ बढ़ रही है जो किसी भी वक्त त्रासदी का रूप ले सकती है। कुछ लोग संवेदना से शुरू हुये थे और टार्चर का वीडियो शेयर करने तक पहुंच चुके है।

सबसे आगे वो न्यूज़ चैनल है जिन्होंने पिछले 72 घंटों में किसी भी दूसरी न्यूज़ को अपनी रिपोर्ट में स्थान नहीं दिया है। ये दिन-रात चौबीसों घंटे बिना रुके एक-एक पल की लाइव रिपोर्टिंग कर रहे है। ये न्यूज़ चैनल सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक, आर-पार की लड़ाई और पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा देने की मांग कर रहे है।

भावुक तस्वीरें और देशभक्ति के गीतों से उन्माद पैदा किया जा रहा है। उन्माद पैदा करने वाले स्वयं को सैनिकों के सबसे बड़े हमदर्द के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे है। जो लोग आज राष्ट्रवाद के सबसे बड़े ठेकेदार और सैनिकों के हिमायती बनकर संवेदना के नाम पर उन्माद फैला रहे है, उन्होंने कभी भी सैनिको की पीड़ा को महसूस करने की कोशिश नहीं की है।

जब एक सैनिक को अच्छा खाना नहीं मिलता, बड़े अफसर बदसलूकी करते है और इसकी शिकायत करने पर एक सैनिक को सेना से निकाल दिया जाता है उस वक्त ये लोग खामोश रहते है।

जब सैनिक ‘वन रेंक वन पेंशन’ की मांग को लेकर प्रदर्शन करते है उस वक्त ये लोग कहीं दिखाई नहीं पड़ते।

जब 14 अगस्त 2015 को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे सैनिकों पर लाठियां बरसाई गयी, उस वक्त ये लोग खामोश रहे और मीडिया ने भी इस घटना को ब्लैकआउट किया।

केंद्रीय रिज़र्व फाॅर्स (सीआरपीएफ/ CRPF) के जवान जो दिन रात अपनी जान हथेली पर लेकर आंतरिक सुरक्षा में जुटे हुए हैं, उन्हें सेना का दर्जा भी प्राप्त नहीं है। उनकी शहादत को राजकीय सम्मान तो मिल गया, लेकिन उन्हें पेंशन नहीं मिलती! जिन्हें मीडिया और पूरा देश शहीद कह रहा है, सीआरपीएफ के वे जवान आधिकारिक रूप से शहीद भी नहीं हैं।


ये अर्द्धसैनिक पहले भी अपने पेंशन के अधिकार और सेना के बराबर सहूलियतें पाने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। वास्तविकता यही है कि सैनिको की हमदर्दी का मुखौटा पहनकर ये लोग सरकार का बचाव कर रहे है।

इस आतंकी हमले को रोकने में सरकार पूरी तरह से असफल रही है। भावनात्मक अपील और युद्धोन्माद की आड़ में सरकार और सुरक्षा जांच एजेंसियों की असफलता को छिपाया जा रहा है किन्तु भविष्य में ऐसी घटनाये न हो यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार और सुरक्षा जाँच एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस घटना से जुड़े सभी अहम सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए।

जब 7 फरवरी 2019 को ख़ुफ़िया एजेंसी ने इम्प्रूवड एक्सप्लोसिव डिवाइस (Improved Explosive Device/  IED/ आईईडी) से आतंकी हमले का अंदेशा जताया तो इस हमले को टालने के लिए क्या कदम उठाये गए? जब IED से आतंकी हमले का अंदेशा था तो 350 किलो IED एक गाड़ी में कैसे इक्कठा हुआ? कड़ी जाँच और नाकेबंदी के बावजूद 350 किलो विस्फोटक से भरी गाड़ी सैनिको के काफिले के करीब कैसे पहुंच गयी? सैनिको की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार कौन से ठोस कदम उठा रही है? नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक से आतंकियों की कमर तोड़ने के दावों का क्या हुआ?

जब तक हम ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय नहीं करेंगे, दोषियों की निशानदेही नहीं करेंगे और सैनिको की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को बाध्य नहीं करेंगे तब तक हमारे शहीद अपनी जान गवांते रहेंगे चाहे हम जितनी संवेदनाएं व्यक्त करें। चाहे जितनी मोमबत्तियां जलाएं और चाहे जितने कैंडल मार्च निकाले।

कॉर्पोरेट मीडिया की भूमिका सबसे ज्यादा निराशाजनक रही। वह सरकार से सवाल पूछने की बजाय खुद को सबसे ज्यादा देशभक्त न्यूज़ चैनल साबित करने में लग गया। मीडिया यह पूछना भूल गया कि CRPF के अर्धसैनिक बलों को सेना का दर्जा कब मिलेगा? CRPF  के जवानों को पेंशन का अधिकार और सेना के बराबर सहूलियतें कब मिलेंगी? सोशल मीडिया ने भी इसी ट्रेंड को फॉलो किया। यह महज़ इत्तेफाक नहीं है कि भारतीय मीडिया की विश्व में रैंकिंग गिरकर 138 पहुँच गयी है।

यह लेख द नेशनल प्रेस को 17 फ़रवरी 2019 को प्राप्त हुआ था