14 फ़रवरी, 2019 को घटित पुलवामा कांड के बाद मीडिया, खासकर टीवी चैनलों की भूमिका देखकर लोग स्तब्ध और शर्मसार हैं. उनकी भूमिका से आहत खुद मीडिया से जुड़ी एक शख्सियत ने हाल ही में एक बड़ी कातर अपील की है. उन्होंने कहा है-

‘अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यून चैनलों को देखना बंद कर दें. अगर आप लोकतंत्र में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका निभाना चाहते हैं तो न्यून चैनलों को देखना बंद कर दें. अगर आप अपने बच्चो को साम्प्रदायिकता से बचाना चाहते हैं तो न्यून चैनल देखना बंद कर दें. अगर आप भारत में पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो न्यून चैनल देखना बंद कर दें. न्यूज चैनलों को देखना खुद के पतन को देखना है. मैं आपसे अपील करता हूँ कि आप कोई भी न्यूज चैनल न देखें. न टीवी सेट पर देखें न मोबाईल पर.’

बहरहाल सच्चे देशप्रेमी मीडिया की भूमिका देखकर आज जरुर विरक्ति की सारी सीमायें तोड़ रहे हैं, किन्तु मैं सामाजिक न्याय पर इनकी भूमिका देखकर बराबर से विरक्त और आहत होते रहा हूँ. और मैं जब-जब मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका से आहत होता हूँ, पत्रकारिता पर डॉ. श्योराज सिंह ‘बेचैन’ का 1997 में प्रकाशित शोधग्रन्थ , “हिंदी की दलित पत्रकारिता पर डॉ.आंबेडकर का प्रभाव” के अंतिम अध्याय के पन्ने अवश्य ही पलटता हूँ.

डॉ. बेचैन ने ग्रथ के 332-376 पृष्ठ तक विभिन्न साक्षात्कार नामक आठवें अध्याय में कमलेश्वर, मृणाल पांडे, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, सुभाष धूलिया, राज किशोर, राजेन्द्र यादव, अभय कुमार दूबे, मंगलेश डबराल, मस्तराम कपूर, डॉ. महीप सिंह जैसे प्रमुख लेखक-पत्रकारों से कुछ ऐसे सवाल किये हैं, जिससे हिंदी पत्रकारों की दलित –बहुजनों के प्रति उदासीनता और आरक्षण विरोध के पीछे क्रियाशील मानसिकता तथा सवर्ण प्रेम को समझने में भारी मदद मिलती है. बहरहाल हांल ही में एक बार फिर बेचैन साहब की किताब के पन्ने उलटने की जरुरत पड़ी. कारण 8 से 22 जनवरी के मध्य आरक्षण के संघर्ष पर केन्द्रित भारत के इतिहास में जो दो बेहद महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई, उस पर मुख्यधारा की मीडिया ने जो रुख अपनाया, उससे स्पष्ट हो गया कि  वह अपने क्षुद्र वर्गीय स्वार्थ से एक इंच भी पीछे हटने वाली नहीं है. इस साक्षात्कार में जो सामग्री मिलेगी उसके आधार पर पुलवामा उत्तरकाल की भूमिका समझने में आसानी हो सकती है.

जिस सवर्ण आरक्षण को कभी संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया था कि चूंकि आरक्षण का आधार निर्धनता नहीं, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, अतः गरीब सवर्णों के लिए उठती आरक्षण की मांग पर स्वीकृति दर्ज कराने की कोई युक्ति नहीं है , उसे  प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान की धज्जियां विखेरते हुए महज दो दिनों में संसद में पास करा लिया. 9 जनवरी, 2019 को संविधान संशोधन के जरिये पारित सवर्ण आरक्षण के विस्मय से राष्ट्र उबर भी नहीं था कि 22 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने समग्र विश्वविद्यालय की जगह विभाग को इकाई मानने के इलाहबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर मोहर लगा दिया.

बहरहाल 8-22 जनवरी, 2019 के मध्य जिस तरह मोदी राज में सवर्ण और विभागवार आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ, उससे वंचित वर्गों के लोग अभूतपूर्व आक्रोश के साथ सरकार के खिलाफ सडकों पर उतरने लगे. लोगों में यह आक्रोश पैदा होना लाजिमी था. कारण, इन दोनों नए आरक्षणों के जरिये उस वर्ग के लोगों को और सशक्त बनाने का प्रयास हुआ था, जिनका पहले से ही न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म के क्षेत्र में 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है. जहाँ तक उच्च शिक्षा का सवाल है केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर, एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पदों पर इनकी उपस्थित क्रमशः 95.2 , 92.90 और 76.12  प्रतिशत है .

सवर्ण और विभागवार-आरक्षण, दुनिया के आरक्षण के इतिहास के लिए एक अजूबा रहा. क्योंकि दुनिया में अबतक आरक्षण उन्ही वर्गों को सुलभ कराया गया, जिनको जबरन शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक) से दूर धकेलकर अशक्त बनाया गया. इसी कारण अमेरिका के रेड इंडियंस, हिस्पैनिक्स, कालों; अफ्रीका के कालों, न्यूज़ीलैंड-ऑस्ट्रेलिया के मूलनिवासियो, भारत के दलित, आदिवासी, पिछड़े और सारी दुनिया की महिलाओं को आरक्षण के जरिये सशक्त बनाने का प्रयास हुआ.

लेकिन मोदी राज में 8-22 जनवरी, 2019 के मध्य  ऐसे तबकों को आरक्षण का लाभ सुलभ कराया गया, जिनकी प्रगति में न तो अतीत में कोई अवरोध खड़ा किया गया और न आज किया जा रहा है. उलटे इनका अतीत एक ऐसे सामाजिक अन्यायकारी वर्ग के रूप में है जो हिन्दू आरक्षण से शक्तिसंपन्न बनकर दूसरे वंचित ताबकों के उत्पादन का हरण किया. लेकिन ऐसे सुविधाभोगी वर्ग के आरक्षण के खिलाफ वंचित बहुजनों ने उस दृश्य की अवतारणा नहीं किया, जो 1990 में मंडल आरक्षण और 2006 में पिछड़ों के उच्च शिक्षा में पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ इस सुविधाभोगी वर्ग ने किया था.

सवर्ण और विभागवार आरक्षण के खिलाफ बहुजनों ने आत्मदाह और देश की संपदा-दाह न कर सिर्फ शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू किया. इस क्रम में 31 जनवरी को दिल्ली में ऐतिहासिक आक्रोश मार्च निकाला गया, जिसमें 25 हजार से अधिक की संख्या में वंचित वगों के छात्र, शोधार्थियों, प्रोफेसर, लेखक-पत्रकार और एक्टिविस्टों ने भाग लिया. यह ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ ऐतिहासिक आक्रोश मार्च था, जिसमें  वंचित वर्गों के बौद्धिक तबके ने 13 पॉइंट रोस्टर के खात्मे और 200 पॉइंट रोस्टर लागू करने की मांग बुलंद की.

किन्तु वंचितों के आक्रोश को मेन मेनस्ट्रीम मीडिया में कोई जगह नहीं मिली. उलटे जब आक्रोश मार्च की तैयारी शुरू हुई तभी मीडिया ने सारा ध्यान-ज्ञान अयोध्या में राम मंदिर बनवाने में लगा दिया. इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान सामाजिक न्यायवादी विभिन्न दलों के नेता 16 वीं लोकसभा के अंतिम संसद सत्र में में 13 पॉइंट रोस्टर वापस लेने के धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, पर मेंन स्ट्रीम मीडिया में यह कही नहीं नजर आ रहा है.

बहरहाल आठ से बाईस जनवरी 2019 के मध्य स्वाधीन भरता के इतिहास सामाजिक अन्याय के जो नए अध्याय जुड़े एवं पर जिस तरह वंचित वर्गों के बुद्धिजीवियों ने आक्रोश व्यक्त किया, उसकी मीडिया ने अनदेखी कर क्यों सामाजिक अन्याय को बढ़ावा दिया, इसे समझने के लिए मुझे एक बार फिर पत्रकारिता पर डॉ. बेचैन के शोधग्रंथ के साक्षात्कार अध्याय के पन्ने उलटने की जरुरत महसूस हुई.

साक्षात्कार में डॉ. बेचैन ने विभिन्न विद्वानों से जो कई सवाल पूछे हैं, उनमें से एक है, ”क्या हिंदी पत्रकारिता हिन्दू पत्रकारिता है?”

इस सवाल पर सामान्य मत भिन्नता होने के बावजूद सभी ने “हां” में ही उत्तर दिया है और उन सबके विचारों का मुकम्मल प्रतिबिम्बन मंगलेश डबराल के इन शब्दों में हुआ है-

“हिंदी पत्रकारिता हिन्दू पत्रकारिता है, यह आलोचना काफी हद तक सही है.”

क्योंकि तथाकथित कारसेवा और उसके बाद बाबरी मस्जिद ढहाने का जो दुष्कर्म किया गया, उस पर अखबारों ने एक अश्लील और क्रूर किस्म के उत्साह के साथ जो कुछ लिखा, वह हिंदी जैसे बहुसंख्यक भाषा पर एक कलंक है. मुझे यह सोचकर अत्यंत दुःख हुआ कि क्या यह वही पत्रकारिता की भाषा है, जिससे हमलोग समाज को बदलने,आम आदमी की तकलीफ और उसके संघर्ष को व्यक्त करते आये हैं. क्या हिंदी पत्रकारिता का इस्तेमाल मनुष्य के भीतर घृणा, हिंसा और बर्बरता फैलाने के लिए हो रहा है!

हिंदी पत्रकारिता के साथ एक बड़ा दुर्भाग्य है कि उत्तर भारत के ज्यादातर हिंदी अख़बारों के मालिकों और पत्रकारों के बहुत क्षुद्र स्वार्थ बन गए हैं. उन स्वार्थों के आगे समाज और मनुष्य उनके लिए कुछ नहीं हैं.

राजनैतिक रूप से कहा जाता है कि इस देश में उत्तर प्रदेश ही राज करता है और उत्तर प्रदेश की भाषा हिंदी है. इस राजनैतिक ताकत ने हिंदी पत्रकारिता को सत्ता के करीब रहने का आसान रास्ता सुलभ करा दिया है. इस स्थिति में सामाजिक चिंता, मानवीय समस्याएं, दलितों, पीड़ितो व श्रमिक वर्ग की समस्या,उनकी जरूरतों की पहचान, ज्ञान-विज्ञान जैसी चीजों के लिए जगह  कम से कम होती गयी.

वास्तविक पत्रकार वही लोग हो सकते हैं जिनमें समाज से सच्चा सरोकार हो और जो समाज और व्यवस्था की गड़बड़ियों पर ऊँगली रखना अपना पहला काम मानते हों.

एक भ्रष्ट राजनैतिक तंत्र द्वारा दी गयी सत्ता के अहंकार में चूर हिंदी पत्रकारिता में ऐसी मानवीय चीजों के लिए जगह कहाँ बंची रहेगी.

मीडिया पर 1941 में बनी बेहतरीन क्लासिक फिल्म – संपादक

उत्तर प्रदेश राजनैतिक रूप से शक्तिशाली है तो सांस्कृतिक रूप से अत्यंत दरिद्र भी है. यह दरिद्रता हिंदी अख़बारों में भी प्रकट होती है. कुछ अख़बारों के पत्रकार या तो नेता हैं विभिन्न पार्टियों के एजेंट.

यह बड़ा दुर्भाग्य है कि हिंदी की पत्रकारिता पूरे समाज के बारे में व्यापक अंतर्दृष्टि रखने की बजाय एक घटिया हिन्दू मानसिकता की अभिव्यक्ति है.

मंगलेश डबराल की ही बात को आगे बढाते हुए डॉ. महीप सिंह ने अपने साक्षात्कार में कहा है-

“हिंदी पत्रकारिता के सार्वदेशिक चरित्र का अध्ययन करने से कुछ बातें स्पष्ट रूप से उभरती हैं. एक, इन पत्र-पत्रिकाओं का स्वामित्व अधिसंख्य रूप में वैश्यों/ मारवाड़ियों के हाथ में केन्द्रित है. बिड़ला,जैन, डालमियां, अग्रवाल, गुप्ता, माहेश्वरी आदि संज्ञाएँ लगभग सभी पत्रों के स्वामियों के साथ जुड़ी दिखती हैं. इसका दूसरा चरित्र यह है कि सम्पादक और सम्पादकीय विभाग में ब्राह्मणों का वर्चस्व है या कायस्थों का. दलित या दूसरी जातियों पिछड़ी जातियों की भागीदारी न के बराबर है. ऐसी स्थिति में वर्गों और जातियों की मानसिकता पत्रकारिता के तेवर को प्रभावित तो करेगी ही.”

मंडल के विरोध में हिंदी पत्रकारों द्वारा विरोध का माहौल बनाने के प्रश्न पर मशहूर पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह का जवाब है, –

‘मंडल विरोधी रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारिता बिलकुल निष्पक्ष और वस्तुपरक नहीं रही. इसलिए कि समाचार तंत्र पर सवर्ण जातियों का पूरी तरह कब्ज़ा कायम है.’

इसी सवाल पर चर्चित पत्रकार अभय कुमार दूबे का कहना रहा है-

‘मंडल विरोधी आन्दोलन एकतरफा था. मंडल समर्थकों ने इसके विरुद्ध कोई आन्दोलन नहीं किया. अगर वे भी आन्दोलन में खड़े होते तो जो सामाजिक ध्रुवीकरण होता, उससे हिंदी पत्रकारिता के रहनुमाओं की चूलें हिल जाती.’

बहरहाल मुख्यधारा अर्थात हिंदी पत्रकारिता में सामाजिक न्याय, मानवीय समस्याएं, दलितों, पीड़ितो व श्रमिक वर्ग की समस्याओं,उनकी जरूरतों की पहचान, ज्ञान-विज्ञान जैसी चीजों के लिए जगह कम से कम क्यों होती गयी है, इसकी निर्भूल पहचान मंगलेश डबराल, सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने की है. उनका अनुसरण कर कोई भी सही निष्कर्ष पर पहुँच सकता है. बहरहाल मैं समस्या की मुख्य जड़ सुरेन्द्र प्रताप सिंह के शब्दों में सवर्ण वर्चस्व को मानता हूँ.

जिन सवर्णों का मीडिया तंत्र पर कब्ज़ा है वे मानव सृष्टि में हिन्दू धर्म के दैविक सिद्धांत में अपार आस्था के कारण इस बात में विश्वास करते हैं कि सिर्फ हिन्दू- ईश्वर के उत्तमांग (मुख, बाहू, जंघे) से जन्मे लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) ही शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक, धार्मिक) के भोग के अधिकारी हैं: बाकी दलित-आदिवासी-पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित गैर-सवर्ण शक्ति के स्रोतों के भोग के अनाधिकारी हैं.

Reality of TV Media Do You Agree

इसलिए जब कभी दैविक अनाधिकारी वर्ग के लोगों (बहुजनों) को राज्य द्वारा शक्ति के स्रोतों में शेयर दिलाने का उपक्रम चलाया गया, दैविक अधिकारी (सवर्ण) वर्ग के नेता, छात्र और उनके अभिभावक, पूंजीपति, लेखक, साधु-संतो इत्यादि के साथ पत्रकार भी अवरोध खड़ा करने में पीछे नहीं रहे.

इन्होने पूना पैक्ट के जमाने से आरक्षण विरोध का जो सिलसिला शुरू किया, वह मंडल-1 (1990), मंडल-2 (2006), औरत्रिस्तरीय आरक्षण तक अटूट रहा.

आज की तारीख में  सवर्ण और विभागवार जैसे सामाजिक अन्यायकारी फैसलों के खिलाफ अगर मुख्यधारा के पत्रकार मुखर नहीं हो पाये तो उसके पीछे दैविक अनाधिकारी वर्गों के अधिकारों के प्रति उनकी अपार घृणा ही है. ऐसे में हिंदी पत्रकारिता का दशकों पुराना चाल-चरित्र देखते हुए दावे के साथ कहा जा सकता है यह समग्र वर्ग की चेतना से उसी दिन समृद्ध हो पायेगी, जब इसमें भारत की सामाजिक और लैंगिक विविधता का सही प्रतिबिम्बन होगा.

वर्तमान स्वरुप में तो यह स्व-वर्गीय चेतना के हाथों विवश होकर पत्रकारिता को कलंकित करने के लिए अभिशप्त है.

नोट: द नेशनल प्रेस कॉपीराइट कानून, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी कानून और सम्बंधित कानून का सम्मान करता है. इस लेख में प्रयुक्त दो रेखाचित्र के लिए द नेशनल प्रेस सम्बंधित व्यक्ति का आभारी है, लेकिन हम इसके मूल स्रोत तक पहुँचने में में असमर्थ हैं. अगर किसी को कोई जानकारी हो तो बताएं – संपादक।