भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. हजारों साल की परम्पराओं में कैसे छेड़छाड़ हुई है, मैं इस विषय पर एक छोटी सी चर्चा करने वाला हूँ. भारत में लिखित परम्पराएँ कम रही हैं, और वाचिक परम्पराएँ अधिक रही है. इसमें से एक परम्परा है- होली/ फाग की परम्परा है.

होरी का अर्थ भूनने से है. तो फाग का अर्थ रंगों के साथ अटखेलियों करने से है. यह दोनों प्रक्रिया मिल गई है. अब लोग फाग और होरी में महीन अंतर को भूल गए हैं. एक होरी/ फाग के उदहारण बुंदेलखंड के साथ सभी जगह देखने को मिलते है. होरी/ फाग की परंपरा क्यों पनपी इसे कुछ पड़ताल करने का प्रयास किया गया है. सही और, वास्तविक निष्कर्ष पर पहुचने की कोशिश कर रहा हूँ.

भारत में फाल्गुन माह की समाप्ति पर चेत्र की शुरुआत में रवि की फसल आ जाती है. चना गेंहूँ, अरहर आदि की फसल आ जाने के कारण यहाँ लोग अपने सामूहिक ख़ुशी को मनाने थे. सारे लोग मिलकर एक जगह लकड़ी एकत्रित कर फसल के पोधे लाकर भूजते थे और भुने हुई दाने को चबाकर आनंद लेते हैं और रंगोंत्सव मनाते आ रहे हैं. यहाँ तक की होरी/ फाग के अपने गीत होते थे. गाँव में आज भी इसे फाग गीतों के नाम से जाना जाता है. इस रंगों के त्यौहार में पूरा देश भारतीय संस्कृति के सरोबार हो जाता रहा है.

प्रत्येक समुदाय में होरी की परम्परा मनाई जाती है. इस प्रकार भारत में होरी मनाने का प्रमुख कारण कृषि फसल आ आने की सामूहिक ख़ुशी के रूप में देखा जाता रहा है.

भारत में आर्यों का आगमन

मेजर फिर्ब्स ने प्राचीन भारत का कालक्रम इस प्रकार निर्धारित किया है–
(1) आरंभिक हड़प्पा सभ्यता: 3500 ई. पू.,
(2) क्रकुच्छंद बुद्धकाल: 3101 ई. पू.,
(3) कोनागमन बौद्ध का काल: 2099 ई. पू.,
(4) कश्यप बुद्ध का काल: 1014 ई. पू., और
(5) गौतम बौद्ध का काल: 563 ई. पू.
(स्रोत: “जनरल ऑफ एशियाटिक सोसायटी”, अंक: जून, 1836, उद्धृत, “खोये हुए बुद्ध की खोज” डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पेज न. 89).

ईरानी ही भारत के आर्य हैं

भारत में ईरान के शासक आर्यपुत्र डेरियस प्रथम (532-486 ई. पू.) ने जब पंजाब पर कब्जा किया, तब उसके सामंत और कर्मचारी भी प्रशासन के लिहाज से पंजाब में ही बस गए. आर्यों की पहली कॉलोनी भारत के पंजाब में इसी समय बसी और ये ईरानी ही आर्य हैं.

मौर्यकाल में भी आर्य सामंत और कर्मचारी बने रहे. मौर्य राजाओं ने ईरानी सामंतों और कर्मचारियों को अपनी सेवा में रखा. अशोक ने ईरानी सामंत तुषस्प को काठियावाड़ का शासक बनाया। धीरे-धीरे ये आर्य सामंत और कर्मचारी मजबूत होते गए और एक दिन एक ईरानी सामंत ने पुष्यमित्र शुंग से मौर्य सम्राट ब्रह्द्रथ (187-185 ई. पू.) से सेनापति का पद हासिल किया और ब्रह्द्रथ की हत्या कर राजा बना और भारत में आर्य साम्राज्य शुंग वंश की स्थापना की.

संस्कृत और वेद-पुराणों का उदय

इसी दौरान भारत में पाली और फारसी भाषा के संगम से एक नई भाषा का जन्म हुआ जिसे “संस्कृत भाषा” के नाम से जाना गया है इसलिए संस्कृत में पाली और फारसी के अधिकतर शब्द आये. संस्कृत भाषा कभी भी भारत में आमजन की भाषा नहीं रही है. यह आर्य लेखकों की भाषा रही. बाद में गुप्त राजाओ ( 3-590 ई.) ने आर्य साम्राज्य को बल प्रदान किया और इसी दौर में पुष्यमित्र शुंग के शासन से लेकर गुप्तकाल तक वेद, उपनिषद्, पुराणों के लेखन का कार्य किया गया.

होरी/  होलिका की पौराणिक व्याख्या: भारत में आर्यों का खुलकर बसना 321वी ई. पू. से शुरू हुए. वह क्षेत्र जिसे सेल्यूकस ने हारने के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य को दिए थे, यही वह एरियाना प्रदेश है. यही आर्यवर्त है. इसलिए महाभारत में आर्यावर्त के बाहर के देश को भारत कहा गया है. भारत में आर्यों का आगमन चोथी या पांचवी सदी में फारस से माना जाता है. जब वे भारत में आये तब वहाँ से अपनी संस्कृति को लेकर आये. लेकिन भारत में विवधता संस्कृति के मानने वाले लोग रहते थे.

भारत में गैरद्रविण आर्य अपनी संस्कृति से भारतवासियों को प्रभावित करने में न केवल अक्षम हुई है बल्कि परास्त हुये है. अतः उन्हें भारतीय संस्कृति की व्याख्या के अपने नये मापदंड बनाना शुरू किया.

संस्कृत का उदय और पाली

यह कार्य भारत में संस्कृत भाषा के उद्भव पहली सदी से शुरू होता है. भारत में संस्कृत का विकास पाली और फारसी के भाषा के मिश्रण से हुआ है. यह दो भाषाओँ की संतान भाषा है. वह संस्कृत ही है, इसलिए संस्कृत भाषा में पाली भाषा के अधिकतर शब्द आये हैं न ली पाली में संस्कृत भाषा के शब्द गए हैं.

सांस्कृतिक वर्चश्व के लिए आर्यों द्वारा भारतीय सामाजिक व्यवस्था का गलत व्याख्या

एक अलग भाषा संस्कृत के जन्म होने के बाद आर्य विद्वानों ने भारत में चली आ रही परम्पराओं की अलग से व्याख्या करना शुरू किया. सबसे पहले भारतीय सामाजिक व्य्व्वस्था को पुनर्परिभाषित किया गया जिसे वैदिक सामाजिक व्यवस्था के नाम यानी वर्णव्यवस्था के नाम से जाना गया है.

इस प्रकार आर्य विद्वानों ने अपने आपको को भारत में स्थापित करने के लिए भारत के हरेक पहलु को छुआ और यहाँ के राजाओं को जनता को हीन / निम्न घोषित करने का कार्यक्रम अपने साहित्य के माध्यम से किया. यही कालांतर में वह साहित्य सन्दर्भों के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा.

भारत में अधिकतर परम्पराएँ आर्यों के आगमन से पहले से ही अस्तित्व में थी लेकिन आर्यों ने उनमें अलौकिकता जोड़कर अपना स्थान सुनिश्चित करने का प्रयास किया.

भारत में प्रथम आर्य शासक पुष्यमित्र शुंग ही आर्य वंश का भारत में संस्थापक भी है, और भारत में तब इंडो-आर्यन नई संस्कृति का जन्म हुआ जिसे ब्राह्मण संस्कृति से नाम से जाना गया. इस प्रकार राजा महाबली की कहानी, हिरनकश्यप के हत्या की कहानी या अन्य कहानियों को आर्य लेखकों ने गुप्तकाल में बैठकर काउंटर कर दिया. जबकि यह कहानियों आर्यों के आने के हजारों वर्षों से पहले से भारत में चली आरही है या प्रचलन में रही हैं. सवाल यह उठता है कि आर्य लेखकों ने झूठे पात्रों  के माध्यम से सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने की कोशिस की.

आर्यो ने सांस्कृतिक वर्चस्व कैसे स्थापित की

आर्य लेखकों ने अपने सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए भारतीय परम्पराओं की पहले विकृत व्याख्या की फिर अपनी एक नई कहानी उसमें मिलाई या घुसेड़ी ताकि भविष्य में वह परम्परा उनके नाम से जानी जायेगी और वही हुआ भी. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि भारत में बौद्ध परम्परा में तथागत गौतम बौद्ध सत्ताईसवे बौद्ध है तो जैनो को तीर्थंकर परम्परा में चोबीसवे महावीर हैं. इस परम्परा के तुलना में और इसे काउंटर करने के लिए आर्य लेखकों ने गुप्तकाल में विष्णु नामक एक नया पात्र का निर्माण किया और जिसे अवतारवाद की आधारशिला पर खडा किया. यह अवतारवाद बोद्धों और जैनों की नक़ल करके खड़ी की गई है. अवतार और कुछ नहीं बल्कि बौदों और जैनों की परम्परा का अनुकरण मात्र है. बाद में इस विष्णु पात्र के माध्यम से आर्य लेखकों ने प्रत्येक भारतीय परम्परा को विकृत कर उसकी नई व्याख्या समाज के सामने प्रस्तुत की.

सांस्कृतिक षड्यंत्र

जो भारतीय परम्पराएँ हजारों साल से चली आ रही थी. उनकी नई व्याख्या आर्य लेखकों ने गुप्तकाल में की गई है. यह एक सांस्कृतिक षड़यंत्र का हिस्सा है. सांस्कृतिक वर्चस्व दो तरीके से किया जा सकता है. आर्य संस्कृति/ ब्राह्मण संस्कृति के पास भारतीय संस्कृति को कुछ देने के लिए नहीं था इसलिए उसे विकृत करने के आलावा आर्य लेखकों के पास कोई नया विकल्प नहीं सूझा था. इसलिए आर्य लेखकों ने अपनी संकीर्ण मानसिकता से और कुत्षित लेखनी के प्रयास से भारतीय परंपराओं की गलत व्याख्या करते गए और वही विकृत व्याख्या भारतीय संस्कृति के हिस्से के रूप में प्रस्तुत की जाने लगी.

भारत में हिरनकश्यप राजा राज्य करते थे जो यह कहानी भी आर्यों के आगमन के करीब हजार साल पहले की है. उनकी बहिन का नाम होरी था और उसके बेटे का प्रह्लाद था वे उस क्षेत्र के यह राजा थे जो बलि प्रथा का विरोधी था उसके शासन में महिला समानता का प्रमुख रूप से सिधांत था. लेकिन आर्य लेखकों ने गुप्तकाल में बैठकर इस कहानी में एक और नई कहानी जोड़ दी कि हिरनकश्यप भगवान का विरोधी था वह भगवान का नाम नहीं लेता था और देवताओं को परेशान करता था. अतः भगवान विष्णु ने नरसिंह भगवान् का अवतार लिया और हिरनकश्यप की हत्या कर दी. आर्यों की भाषा में धार्मिक हत्या को वध कहा जाता है.

अब शोध का विषय यह है कि भारत में वेदों के कुछ हिस्से पहली से तीसरी सदी में लिखे गए. वेदों में विष्णु का नाम का कोई पात्र नहीं है. लेकिन पुराणों में विष्णु का नाम उल्लेख मिलता है.

भारत में वेदों की शुरुआत ही संस्कृत भाषा के जन्म के बाद हुई है. यह भाषा ही पहली से दूसरी सदी से अस्तित्व में आई है तब जब हिरनकश्यप शासन कर रहे थे तब तक आर्यों का आगमन भी नहीं हुआ था और भारत में विष्णु पुराण गुप्तकाल के बाद लिखा गया है. विष्णु नमक पात्र भारत में हजारों साल पहले जन्म लिए हिरनकश्यप का वध कर रहे हैं.

सही मायने में भारत के इतिहास में विष्णु नाम कोई पात्र नहीं हुआ. यह काल्पनिक पात्र का अवतार आर्य लेखकों ने अपनी लेखनी से करवा है और आर्य विद्वानों ने विष्णु के अवतार के माध्यम से भारतीय परम्परागत राजाओं की साहित्यक तौर पर हत्या करने के लिए पूरा रोडमेप तैयार किया. यह आर्य विद्वानों की कुत्सित मानसिक कलाकारी है.

इस प्रकार आर्य लेखकों ने विष्णु नामक पात्र के माध्यम से भारत में हजारों साल से चली आ रही परम्पराओं में नई घुसपेठ कर दी और भारतीय परम्पराओं को विकृत कर दिया है इसलिए भारत में होरी/ होलिका की परंपरा को विकृत करने का कार्य कुत्षित मानसिकता का प्रतीक भी है. और फिर एक नई परम्परा की कहानी चल पड़ीं होरी को जलाने की और भगवान् विष्णु ने होरी/ होलिका को जला दिया और प्रहलाद बच गया क्योकि वह भगवान का भक्त था.

इस पूरे रेखांकन में आर्यों विद्वानों ने विष्णु के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि जो भगवान का भक्त रहेगा सिर्फ वही बचेगा.

हरेक घटना पर आर्य विद्वानों ने यही कलम की बाजीगरी दिखाई है जिसमें में सफल भी हुये हैं और उन्होंने भारत की मूल संस्कृति को अपने अनुसार मोड़ने में सफलता प्राप्त की. सवाल तो यह उठता है कि 21 सदी भी होरी/ होलिका एक महिला को क्यों जला जाए है. इसलिए कि यह आर्यन नहीं है भारतीय मूल की है. भारत में सवर्ण हिन्दू महिला आन्दोलन के समर्थक इस प्रकार संस्कृति के नाम पर इसे सही मानने हैं. आज लोगों को इसके लिए आगे आने की जरुरत है.

भारतीय संस्कृति में कभी भी महिलाओं को जलाने के उदाहरण नहीं मिलते हैं. जहाँ भारत में माता का दर्जा पिता से बढ़ा हो और पूरे भारत में मात्रसत्तामक परिवार रहे हों. वहां एक महिला को कैसे उसे जलाने का समर्थन किया जा सकता है.

किसी महिला को सांकेतिक रूप में भी जलाने का विरोध कीजिये.

भारतीय मूलनिवासी परम्परा को गैरद्रविण (विदेशी आर्य) कभी नहीं हरा पाए सिर्फ उन्होंने कुत्षित लेखनी के साहित्य के माध्यम से हरा दिया जिसे लोगों ने आज धार्मिक कार्य मानकर आंख मूंदकर स्वीकार कर लिया है.