आज 15 मार्च है. इसी दिन 2007 में भोपाल घोषणापत्र से प्रेरित होकर प्रो. वीरभारत तलवार, प्रो. कालीचरण, प्रो. संजय पासवान, डॉ. दिनेश राम इत्यादि की उपस्थिति में उत्तर प्रदेश के आगरा में बहुजन लेखकों का संगठन ’बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ वजूद में आया और देखते ही देखते एक दशक के मध्य ख़ामोशी से बड़े बदलाव की वैचारिक जमीन तैयार दिया.

आज यह संगठन साहित्य के लिहाज से देश के समृद्धतम संगठनों में से एक बन चुका है. इस संगठन से जुड़े लेखकों की इस मुद्दे पर 80 से अधिक किताबें तैयार किया है, जिनमें 70 के करीब किताबें खुद इस लेखक की हैं.

काबिलेगौर है कि 24 जुलाई, 1991 से लागू नवउदारवादी नीतियों के चलते आरक्षण के खात्मे से त्रस्त होकर जिन दिनों बहुजन एक्टिविस्ट आरक्षण बचाने के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग बुलंद कर रहे थे, उन्ही दिनों 2002 के 12-13 जनवरी को मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सौजन्य से भोपाल में दलितों का ऐतिहासिक सम्मलेन आयोजित हुआ.

भोपाल घोषणापत्र क्या है?

सम्मलेन के शुरू में भोपाल दस्तावेज और शेष में भोपाल घोषणापत्र (21 वीं सदी में दलितों के लिए नयी रणनीति) जारी हुआ था. चंद्रभान प्रसाद द्वारा लिखित भोपाल दस्तावेज और भोपाल घोषणापत्र में दलितों अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/ एसटी) के अतीत और वर्तमान की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, शैक्षिक अवस्था का निर्भूल विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए इक्कीसवीं सदी में भूमंडलीकारण के सैलाब में दलितों को तिनकों की भांति बहने से बचाने के लिए 21 सूत्रीय दलित एजेंडा प्रस्तुत किया गया था, जो इतिहास में भोपाल घोषणापत्र के नाम से जाना जाता है.

भोपाल घोषणापत्र को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायण का समर्थन

भोपाल घोषणापत्र में अमेरिका के सर्वव्यापी आरक्षण वाली डाइवर्सिटी से प्रेरित होकर एससी/ एसटी लिए नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि धनार्जन के समस्त स्रोतों में संख्यानुपात में आरक्षण दिलाने का ही एजेंडा पेश किया गया था. इस क्रान्तिकारी घोषणापत्र से तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायण इतने प्रभावित हुए थे. उन्होंने 25 जनवरी, 2002  को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अपने संबोधन में इसे अपनाने के लिए राष्ट्र के समक्ष अपील कर डाली थी. भोपाल घोषणापत्र दलितों में उद्योगपति ,सप्लायर, डीलर, ठेकेदार इत्यादि बनने की महत्वाकांक्षा उभारने के भरपूर तत्व थे. महत्वाकांक्षा का यह उभार राजनीति में झंझावती परिणाम ला सकता है, ऐसी आशंका इसके जारी होने के बाद देश के ढेरों विद्वानों ने जाहिर की थी.

भोपाल घोषणा का असर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह

बहरहाल भोपाल घोषणा के क्रान्तिकारी एजेंडे ने तो तत्कालीन राष्ट्रपति, प्राख्यात विद्वानों सहित पूरे राष्ट्र के दलितों को स्पर्श किया, किन्तु किसी को भी यकीन नहीं था कि भारत में भी अमेरिका की भांति सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि में आरक्षण लागू हो सकता है.

लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ऐसा कर दिखाया. उन्होंने 27 अगस्त,2002 को अपने राज्य के समाज कल्याण विभाग में एससी/एसटी के लिए कुछ वस्तुओं की सप्लाई में 30 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिखा दिया कि यदि सरकारों में इच्छा शक्ति हो तो अमेरिका की तरह भारत के वंचितों को भी उद्योग-व्यापार में अवसर सुनिश्चित कराया जा सकता है.

दिग्विजय सिंह के उस ऐतिहासिक कदम से आरक्षण के खात्मे की आशंका से भयाक्रांत दलितों में यह विश्वास जन्मा कि एक दिन उन्हें भी अमेरिका के अश्वेतों की भांति नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र में भागीदारी मिल सकती है. फिर तो ढेरों दलित नेता और संगठन अपने-अपने तरीके से डाइवर्सिटी आन्दोलन को आगे बढाने में जुट गए.

भोपाल घोषणापत्र और राजनीतिक पार्टी

नेताओं में जहां डॉ. संजय पासवान ने इस मुद्दे पर पहली बार संसद का ध्यान आकर्षित करने के बाद कई संगोष्ठियां आयोजित की, वहीँ बीएस-4 के राष्ट्रीय अध्यक्ष आर. के. चौधरी ने “निजी क्षेत्र में आरक्षण, अमेरिका के डाइवर्सिटी पैटर्न पर” को अपनी राजनीतिक पार्टी का एक सूत्रीय एजेंडा बना कर डाइवर्सिटी के पक्ष में अलख जगाना शुरू किया. इस मामले में डॉ. उदित राज भी खूब पीछे नहीं रहे. भोपाल घोषणा से प्रेरित हो देश भर के ढेरों दलित संगठनों ने अपने –अपने राज्य सरकारों के समक्ष डाइवर्सिटी मांग-पत्र रखा.

कम्युनिस्ट घोषणापत्र पर भारी पड़ सकता है: बीडीएम का घोषणापत्र

लेकिन कुछ ही वर्षों में जब डाइवर्सिटी की मांग उठाने वाले संगठनों और नेताओं की गतिविधियां धीमी पड़ने लगीं. वैसी स्थिति में डाइवर्सिटी के विचार को आगे बढ़ने के लिए इस लेखक की अध्यक्षता में 15 मार्च, 2007 को बहुजन लेखकों के संगठन “बहुजन डाइवर्सिटी मिशन” (बीडीएम) की स्थापना हुई. इस अवसर पर बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का 64 पृष्ठीय घोषणापत्र जारी हुआ. “भोपाल घोषणापत्र” के बाद बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का घोषणापत्र एक बेहद महत्त्वपूर्ण दस्तावेज रहा, इसका अनुमान सुप्रसिद्ध बहुजन लेखक डॉ. विजय डॉ विजय कुमार त्रिशरण की इस टिपण्णी से लगाया जा सकता है-

‘एच.एल.दुसाध द्वारा लिखा गया बीडीएम का घोषणापत्र बहुजन समाज के उत्थान और उद्धार का एक मन्त्र संहिता है. इस बहुजन मुक्ति संहिता में कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र से भी ज्यादा आग है. यदि गहरी निद्रा में सुषुप्त हमारे समाज के लोगों में थोड़ी भी गर्माहट पैदा हुई तो मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि बीडीएम का घोषणापत्र एक दिन कार्ल मार्क्स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पर भारी पड़ेगा’, (डॉ.विजय कुमार त्रिशरण, आरक्षण बनाम डाइवर्सिटी खंड-2, पृष्ठ-59)

भोपाल और बीडीएम के घोषणापत्र में मौलिक प्रभेद

भोपाल और बीडीएम के घोषणापत्र, दोनों में ही धनार्जन के समस्त स्रोतों में हिस्सेदारी की राह सुझाई गयी थी, पर, दोनों में मौलिक प्रभेद यह था कि भोपाल घोषणा में डाइवर्सिटी की मांग सिर्फ एससी/ एसटी के लिए थी, किन्तु बीडीएम से जुड़े लेखकों ने इसका विस्तार शक्ति के समस्त स्रोतों में सभी सामाजिक समूहों के स्त्री-पुरुषों तक कर दिया. चूंकि मिशन से जुड़े लोगों का यह दृढ मत रहा है कि आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी ही मानव-जाति की सबसे बड़ी समस्या है तथा शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षिक) में सामाजिक (social) और लैंगिक (gender) विविधता (diversity) के असमान प्रतिबिम्बन (reflection) से ही सारी दुनिया सहित भारत में भी इसकी उत्पत्ति होती रही है, इसलिए ही बीडीएम ने शक्ति के सभी स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन कराने की कार्य योजना बनाया. ऐसे में मिशन के तरफ से निम्न क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन कराने अर्थात विविधतामय भारत के चार सामाजिक समूहों -सवर्ण, ओबीसी, एससी/ एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों- के स्त्री-पुरुषों की संख्यानुपात में अवसरों के बंटवारे की निम्न दस सूत्रीय कर्मसूचियां स्थिर किया गया .

दस सूत्रीय कर्मसूचि इस प्रकार है-

1-    सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों;
2- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप;
3- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी;
4- सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन;
5- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन, प्रवेश व अध्यापन;
6- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों,उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि;
7- देश –विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को दी जानेवाली धनराशि;
8- प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों;
9- रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खाली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो, एवं
10- ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों के कार्यालयों के कार्यबल इत्यादि.

कुल मिलाकर बीडीएम के दस सूत्रीय एजेंडे में सवर्ण, ओबीसी, एससी/ एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के मध्य धनार्जन के समस्त स्रोतों के संख्यानुपात में बंटवारे का निर्भूल सूत्र था ही, इसके साथ राजनीतिक-धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में भी सबकी भागीदारी का अभूतपूर्व प्रोग्राम दिया गया था.

डाइवर्सिटी से पनपने लगी है: सर्वत्र भागीदारी की चाह

भोपाल घोषणा से जुड़ी टीम और बीडीएम से जुड़े लेखकों की सक्रियता से एससी/ एसटी ही नहीं, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों में भी नौकरियों से आगे बढ़ कर उद्योग-व्यापार सहित हर क्षेत्र में भागीदारी की चाह पनपने लगी. संभवतः उद्योग-व्यापार में बहुजनों की भागीदारी की चाह का अनुमान लगा कर ही उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने जून 2009 में एससी/ एसटी के लिए सरकारी ठेकों में 23 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दिया. इसी तरह केंद्र सरकार ने 2011 में लघु और मध्यम इकाइयों से की जाने वाली खरीद में एससी/ एसटी के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण घोषित किया गया.

बाद में 2015 में बिहार में पहले जीतन राम मांझी और उनके बाद नीतीश कुमार सिर्फ एससी/ एसटी ही नहीं, ओबीसी के लिए भी सरकारी ठेकों में आरक्षण लागू किया. यही नहीं बिहार में तो नवम्बर-2017 से आउट सोर्सिंग जॉब में भी बहुजनों के लिए आरक्षण लागू करने की बात प्रकाश में आई.

किन्तु बहुजनों द्वारा सरकार पर जरुरी दबाव न बनाये जा के कारण इसका लाभ न मिल सका. बहरहाल नौकरियों से आगे बढ़कर सीमित पैमाने पर ही सही सप्लाई, ठेकों, आउट सोर्सिंग जॉब में बिना बहुजनों के सड़कों पर उतरे ही, सिर्फ डाइवर्सिटी समर्थक लेखकों की कलम के जोर से कई जगह आरक्षण मिल गया. नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, ठेकों इत्यादि में आरक्षण के कुछ –कुछ दृष्टान्त साबित करते हैं कि डाइवर्सिटी अर्थात सर्वव्यापी आरक्षण की मांग सत्ता के बहरे कानों तक पहुंची और उसने ज्यादा तो नहीं, पर कुछ-कुछ अमल भी किया.लेकिन बीडीएम को सबसे बड़ी संतुष्टि की बात रही कि कई पार्टियों ने डाइवर्सिटी को अपने घोषणापत्र में जगह दिया. इस मामले में सबसे आश्चर्य घटित किया भाजपा ने.

पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी

भाजपा का घोषणापत्र

सबसे पहले भाजपा ने ही 2009  में 15 वीं लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र के हिंदी संस्करण के पृष्ठ 29 पर लिखा-

‘भाजपा सामाजिक न्याय तथा सामाजिक समरसता के प्रति प्रतिबद्ध है. पहचान की राजनीति, जो दलितों, अन्य पिछड़े वर्गों और समाज के अन्य वंचित वर्गों को कोई फायदा नहीं पहुचाती, का अनुसरण करने की बजाय भाजपा ठोस विकास एवं सशक्तिकरण पर ध्यान केन्द्रित करेगी. हमारे समाज के दलित, पिछड़े एवं वंचित वर्गों के लिए उद्यमशीलता एवं व्यवसाय के अवसरों को इस तरह बढ़ावा दिया जायेगा, ताकि भारत की सामाजिक विविधता पर्याप्त रूप से आर्थिक विविधता में प्रतिबिम्बित हो.’

भाजपा वहीँ  नहीं रुकी, उसने बिहार विधान सभा चुनाव-2010 और उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव -2012  में भी अपने घोषणापत्रों में वही बातें उठाई. मोदी के उदय के बाद से भाजपा के घोषणा पत्रों में अब कही जिक्र नहीं होता. बिहार विधान सभा चुनाव-2010 में बीडीएम की ओर से पार्टियों के घोषणापत्र में डाइवर्सिटी को शामिल करवाने के लिए विशेष अभियान चलाया गया था, जिसका अच्छा परिणाम सामने आया.

कांग्रेस का घोषणापत्र

तब बिहार कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में लिखा-

‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विश्वास है कि अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को शिक्षा के अलावा व्यवसायिक विकास के कार्यक्रमों की आवश्यकता है. इसे देखते हुए सरकारी ठेकों और अन्य कार्यों में इनके लिए प्राथमिकता वाली नीति अपनाई जाएगी.’

लोक जान शक्ति पार्टी की स्थिति और राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन की मजबूरी

किन्तु तब इस मामले में सबसे आगे निकल गयी थी लोकजनशक्ति पार्टी.उस चुनाव में अगर भाजपा और कांग्रेस ने डाइवर्सिटी के लिए संकेत किया तो लोजपा इसके समर्थन में खुलकर सामने आई. चूँकि लोजपा का घोषणापत्र राजद के साथ संयुक्त रूप से तैयार हुआ था, इसलिए घोषणा पत्र में तो नहीं. किन्तु 15 अक्तूबर से 6 नवम्बर, 2010  तक रेडियो-टीवी पर लोजपा को सात-आठ बार जो अपनी बात रखने का अवसर मिला, उसमें हर बार यही दोहराया गया- ‘ठेकेदारी सप्लाई, वितरण, फिल्म,मीडिया आदि धनोपार्जन का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं. इसमें दलित,पिछड़े, अल्पसंख्यकों को कोई अवसर नहीं है .सदियों से व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असमानता को ख़त्म करने के लिए राज्य सरकार नीतिगत फैसला नहीं कर सकी. धनोपार्जन के सभी संसाधनों और स्रोतों में सभी वर्गों को डाइवर्सिटी के आधार पर संख्यानुपात में समान भागीदारी और हिस्सेदारी की जरुरत है. लोजपा इसका समर्थन करती है.’          

सवर्ण आरक्षण के बाद उज्ज्वलतर हुई: डाइवर्सिटी की सम्भावना

बहरहाल मूलनिवासी एससी-एसटी को भूमंडलीकरण के सैलाब से बचाने के लिए अमेरिका के डाइवर्सिटी पैटर्न पर नौकरियों से आगे बढकर उद्योग-व्यापार इत्यादि समस्त क्षेत्रों में संख्यानुपात में हिस्सेदारी दिलाने के जिस विचार कर जन्म हुआ एवं जिसे 27 अगस्त 2002 को अमली पहना पहनकर दिग्विजय सिंह ने इसे लागू होने का आधार दिया, वह विचार बीडीएम के सौजन्य से काफी आगे बढ़ चुका और आज हजारो-लाखों  लोग अपने-अपने तरीके से इसे उठा रहे हैं. यही कारण  है ज्यों ही 7 जनवरी, 2019 को सवर्ण आरक्षण का बिल लोकसभा में रखने का प्रस्ताव मोदी सरकार की ओर से आया, संग-संग प्रतिक्रियास्वरूप जिसकी जितनी संख्या की बात सोशल मीडिया में उभरने लगी और 9 जनवरी, 2019 को यह बिल राज्यसभा में पास होते-होते सोशल मीडिया में छा गया. यही नहीं जागरूक लोगों के साथ विभिन्न दलों के नेता, जिसमे सत्ता पक्ष के थे,खुल कर संख्यानुपात में आरक्षण के बंटवारे की मांग उठाने लगे. हो सकता है, कुछ लोग इसे अस्वीकार करें, किन्तु यह सचाई कि सवर्ण आरक्षण के बाद आज संख्यानुपात आरक्षण का जो शोर उठा है, उसके पृष्ठ में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से जुड़े लेखकों ही अधिकतम योगदान है. अब लाख टके का सवाल है, सवर्ण और विभागवार आरक्षण के जवाब में जो नेता वंचित बहुजन समाज को संख्यानुपात में आरक्षण की बात जोर-शोर से उठाने के लिए सामने आये,क्या वे बीडीएम का दस सूत्रीय एजेंडा अपनी पार्टियों के घोषणापत्र में शामिल करवाने के लिए आगे आएंगे!

बीडीएम का एजेंडा ध्वस्त कर सकता है: राष्ट्रवाद का दुर्ग!

बहरहाल 17 वें लोकसभा चुनाव में बीडीएम का दस सूत्रीय एजेंडा उठाने से बेहतर बहुजनवादी के लिए कुछ हो ही नहीं सकता. कारण, सामाजिक न्याय के एजेंडे को अनंत विस्तार देने की जो क्षमता बीडीएम के एजेंडे में है, वह किसी भी अन्य  संगठन के एजेंडे में नहीं. इसके समक्ष टिकने की कूवत अंततः अप्रतिरोध्य सी दिख रही चैम्पियन सवर्णवादी भाजपा में तो नहीं ही है. स्मरण रहे राज्य पर राज्य जीतती जा रही भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी सामाजिक न्याय-विरोधी छवि है. यह उसकी एक ऐसी कमजोरी है, जिसकी काट वह आंबेडकर प्रेम प्रदर्शन में दूसरे दलों को मीलों पीछे छोड़ने के बाद भी आजतक नहीं ढूंढ पाई है.

उसकी इसी कमजोरी का सद्व्यवहार कर लालू प्रसाद यादव ने उसे बिहार विधानसभा चुनाव- 2015 बुरी तरह शिकस्त दे दिया था. काबिलेगौर है कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण के समीक्षा की बात उठाया, तब लालू प्रसाद यादव ने फिजा में यह बात फैला दी, ’तुम आरक्षण का खात्मा करना चाहते हो, हम सत्ता में आयेंगे तो संख्यानुपात में सबको आरक्षण देंगे.’ तब विपुल प्रचारमाध्यमों और संघ के विशाल संख्यक एकनिष्ठ कार्यकर्ताओं से लैस भाजपा लाख कोशिशें करके भी लालू की उस बात की काट नहीं ढूंढ पाई और शर्मनाक हार झेलने के लिए विवश हुई. इसके पहले उन्होंने आरक्षण का दायरा बढाकर भाजपा को मात देने का प्रयोग अगस्त 2014 में अनुष्ठित होने वाले बिहार विधानसभा उप-चुनाव में किया था. तब उन्होंने मांग उठाया था,’सरकार ठेकों  सहित विकास की तमाम योजनाओं में दलित. पिछड़े और अकलियतों को 60 प्रतिशत आरक्षण दें’. आरक्षण का दायरा बढाकर भाजपा को शिकस्त देने का उनका दांव सही पड़ा और लालू-नीतीश गठबंधन 10 में से 6 सीटें जीतने में कामयाब रहा. तब अंधी-तूफ़ान की तरह उभरे मोदी की भाजपा को शिकस्त देना किसी अजूबे से कम नहीं लगा था.

बहरहाल 2019  में स्थितियां और बदतर हुईं हैं. तब 2015 में मोदी का सम्मोहन चरम पर था. वे अपराजेय थे. किन्तु अपने कार्यकाल में लोगों के खाते 15 लाख रूपये जमा कराने; युवाओं को हर साल दो करोड़ नौकरियां देने व अच्छे दिन लाने इत्यादि में बुरी तरह विफल मोदी आज खुद भाजपा के लिए ही बोझ बन चुके हैं. इस बीच वह सामाजिक न्याय को क्षति पहुचाने व आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने के मोर्चे पर नरसिंह राव, डॉ. मनमोहन सिंह और खुद संघी वाजपेयी जैसे अपने पूर्ववर्तियों को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं. इधर उनके कार्यकाल के स्लॉग ओवर में 7 से 22 जनवरी, 2019  के मध्य जिस तरह ‘सवर्ण आरक्षण’ तथा ‘विभागवार आरक्षण’ पर मोहर लगी है, उससे जहाँ एक ओर उनकी छवि नयी सदी के सबसे बड़े सवर्ण ह्रदय-सम्राट के रूप में स्थापित हुई है, वहीँ दूसरी ओर वह बहुजनों की नज़रों में मंडल उत्तर-काल के सबसे बड़े सामाजिक न्याय विरोधी के रूप में उभरे हैं.

उनकी चरम सामाजिक न्याय-विरोधी छवि के कारण ही 8 जनवरी, 2019  से रातो-रात बहुजन नेताओं में संख्यानुपात में आरक्षण की वह मांग शोर में तब्दील हो गयी, जिसके लिए बहुजन बुद्धिजीवी वर्षों से प्रयास कर रहे थे. उसके अतिरिक्त 13 प्वाइंट रोस्टर के खात्मे की लड़ाई के साथ बहुजन बुद्धिजीवि अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में मूलनिवासी एसटी-एससी और ओबीसी को प्राथमिकता दिए जाने की मांग उठाने लगे, जिसके सुप्रीम कोर्ट द्वारा लाखों आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने का आदेश जारी होने के बाद जोर पकड़ने की सम्भावना काफी बढ़ गयी.

ऐसे में 7 जनवरी, 2019  के बाद के बदले हालात को दृष्टिगत रखते हुए यदि बहुजनवादी दल ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के दस सूत्रीय एजेंडे’ को हथियार बनाकर 2019  के लोकसभा चुनाव में उतरने का मैन बनाते हैं तो शायद बिहार विधानसभा चुनाव- 2015 से भी बेहतर परिणाम देने में सफल हो जायेंगे. बीडीएम के एजेंडे सामने राम मंदिर, पुलवामा इत्यादि के जोर से खड़ा किया गया राष्ट्रवाद का महल शर्तिया तौर पर तिनकों की भांति उड़ जायेगा.