नरेन्द्र मोदी जिस विचारधारा में पल्लवित हुए हैं, उस संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस/ RSS)  की स्थापना 1925 में हुई थी. एक पूरी विचारधारा जो स्वर्ण हिन्दुओं ने अपने हितों को राजनीतिक तौर पर सुरक्षित रखने हेतु बनाई गई थी. हेडगेवार से लेकर गोलवलकर तक और पंडित दीनदयाल का एकात्मवाद और कुछ नही है बल्कि भारतीय संस्कृति (श्रमणसंस्कृति) को ख़त्म कर ब्राह्मण संस्कृति को पुनः स्थापित करने का प्रयास रहा है. इसे हमारे तत्कालीन संविधान निर्माताओं ने कोई स्थान नहीं दिया है.

लेकिन संस्था के लगातार संगठित प्रयासों के कारण इसने पहली बार सत्ता का स्वाद अटल विहारी बाजपेयी को 1997 में प्रधानमंत्री के तौर चखा. इसके बाद एक पूरा कार्यकाल उन्हें मिला. उसी विचारधारा में पले-बड़े श्री नरेन्द्र मोदी बड़ी ठसक के साथ 2014 के चुनाव मैदान में उतरे थे. उनके भाषण देने का तरीका और अंदाज लोगों को भाया और लोगों की आशाएं देश के भविष्य के रूप में मोदी जी पर टिक गई थी. इसमें “अबकी बार मोदी सरकार” जैसे लोकलुभावन नरो के साथ-साथ आरएसएस कैडर, मीडिया एवं सोसल मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है और मोदीजी को करिश्माई लीडर के रूप में पेश किया गया. उसी के उदाहरणों की चर्चा हम करने वालें हैं:-

वंशवाद

(1) 2014 के चुनावी भाषणों को देखने पर जो ठसक मोदी जी भाषणों में दिखाई पड़ती थी बो अब धूमिल हो रहे है जैसे-मोदी जी अपने भाषणों में सोनियां गाँधी, राहुल गाँधी और पूरी कांग्रेस के वंशवाद पर प्रशन जिस लहजों में उठाते थे, यहाँ तक की जवाहरलाल नेहरु तक एवं तमाम नेताओं पर सबाल उठाते थे कि एक परिवार सिर्फ राजनीती करने ही आया है.

यहाँ तक मोदी जी ने सोनियां गाँधी की नागरिकता पर भी सबाल जनता के बीच में उठाए थे, जिसका जबाब बाद में न तो स्वयं मोदी जी ने दिया और न ही जनता ने खोजने की कोशिश की है. लेकिन चुनाव जीतने के बाद मुद्दा गायब हो गया. मोदी जी कहते थे कि वाड्रा को जेल भेजेगें पर पूरे पांच साल में ऐसा नहीं हो पाया. राजनीती के चुनावी प्याले में जितनी राजनीती गिरी उसका फायदा निश्चित तौर पर मोदी जी और बीजेपी को मिला था.  

लालू चारा चोर

(2) मोदी ने अपने भाषणों में अक्सर बिहार के लालू यादव को चारा घोटाले के पेराकौर के रूप प्रस्तुत करने का कार्य किया जिसका फ़ायदा उन्हें हुआ, मायावाती, मुलायम सिंह यादव और अन्य नेताओं के व्यक्तिगत चरित्र में झाँकने की जो हिम्मत मोदी ने दिखाई थी. शायद यह कार्य कोई और अच्छा कुशल नेता करने से बचता है लेकिन मोदी जी ने अपने भाषणों के दौरान धारा 370  के बारें में बड़े दमदारी के साथ और राममंदिर मुद्दा ने हिन्दू और मुसलमान वोटरों के बीच जो धुर्वीकरण की राजनीती के बीच बोये थे उसका उन्हें चुनाव में फायदा मिला.

महंगाई

मोदी जी ने अपने भाषणों के दौरान देश की महगाई का खूब मुद्दा भी उछाला यहाँ तक अपनी बहकी हुई जबान से यह जनता को वादा किया था की  देश के हर नागरिक के खाता धारक के अकाउंट में 15 लाख रूपये आयेगें लेकिन उन्होंने उन्होंने कभी वादाखिलाफी की जिम्मेदारी नहीं ली.

कालाधन

कालाधान एक और महत्पूर्ण मुद्दा बनाया था कि हमारी सरकार आने बाद देश में छुपा कालाधन और देश के बाहर कालाधन को देश में लेकर आयेगें लेकिन सरकार आने के बाद कालाधन का प्रवाह विदेशों की ओर और बड़ा और तो और उनके ही बड़े नेता ने चुनावी जुमला कहकर मोदी जी के वादे को कमतर करने का प्रयास किया.   

2 करोड़ नौकरी प्रतिवर्ष

(3) मोदी जी ने अपने चुनावी वादों में 2 करोड़ हर साल नौकरियां देने का वादा किया था. लेकिन सरकार में आने के बाद बे ऐसा करने में कामयाब होते नहीं दिखे और नोटबंदी की मार ने नौकरियां छीनने का जो कार्य किया उसका श्रेय मोदी जी को निश्चित तौर पर जाता है. लेकिन वे इससे बचने का प्रयास करते रहे हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा

राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर देश में प्रत्येक सरकार सजग रही है लेकिन मोदी जी ने सबाल उठाये लेकिन पूरे पांच साल में हालात ठीक नहीं हुए. यहाँ तक की पिछले चुनाव में मोदी जी “चाय” के मुद्दों को भी खूब भुनाया लेकिन सरकार आने के बाद “चाय कैंटीन” के नाम से कोई पालिसी का निर्माण सरकार नहीं कर सकी.

किसान आत्महत्या

(4) पिछले चुनावी भाषणों में किसान आत्महत्या का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया लेकिन सरकार बनाते ही पूरे पांच साल के आकड़ें देखने पर पता चलता है किसानों की आत्महत्या के मामले और बढ़ते गए. किसानों को बड़ी-बड़ी बीमा कम्पनियों के भरोसे छोड़ दिया गया जिनमें बीमा कम्पनियों ने अरबो रुपयें की कमाई की. इसके विपरीत मोदी सरकार ने करीब 42 हजार करोड़ रूपये पूजीपतियों के कर्ज के माफ़ कर दिए.

गौ-आतंक और शोषित-वंचितों की सुरक्षा

(5) मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके काडर के लोगों ने दलित और आदिवासियों पर अत्याचार के केसों की जो बाढ़ आई न केवल गुजरात में बल्कि पूरे देश में गौरक्षा के नाम पर दलितों के ऊपर जो कहर भरपाया गया. यह बात देश छुपा नहीं सकता है और मानवीय असुरक्षा की भावना वंचित तबके में उत्पन्न हुई जिसकी शंका का समाधान नरेंद मोदी जी की सरकार पूरे पांच साल में नहीं कर पाई है.

सरकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली

(6) भारत में सरकारी संस्थाओं के नाम बदलने या उनकी कार्यप्रणाली के रूप में जैसे सीबीआई के अफसरों का तमाशा जो देश ने देखा यह कार्य भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ था. पिछले चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा नरेन्द्र मोदी जी ने बखूबी भुनाया लेकिन पंजाब नेशनल बैंक घोटाले, नीरव मोदी और मेहुल चेकसे का भागना राफेल केस में कोर्ट में यह कहना कि “राफेल सौदों से जुडी फाइल चोरी हो गई है” और बाद में यह कहना कि “फाइल मिल गई है” देश के सामने शंका पैदा करता है. यह सब इसी मोदी जी की सरकार में संभव हुआ है.

निजीकरण

संसाधनों का जिस तरीके से निजीकरण करने की हिम्मत नरेन्द्र मोदी सरकार ने दिखाई है, चाहे लाल किला हो, रेलवे स्टेशन हो या एयरपोर्ट को निजी हाथों में बेचने का कार्य किया है, मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो सत्ता से  सवाल पूछे. इसका कारण यह है कि करीब 500 करोड़ रूपये के विज्ञापन मीडिया को भी मिले हैं.

उच्च शिक्षा

(7) उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों के विरोध में इलाहावाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद रोस्टर सिस्टम को लागू करने में मोदी सरकार ने तत्परता दिखाई उसके बदले हालत में जिसका पूरे देश में विरोध हुआ वह विरोध सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद और तेज हो गया. इसके कारण सरकार को जनता के दवाव में आकर अध्यादेश लाना पड़ा लेकिन फिर भी इसपर सरकार की मंशा को क्लीनचिट नहीं दी जा सकती है.  

आदिवासी विस्थापन और अन्य समस्यायें

(8) आदिवासियों के विस्थापन के केस में मोदी सरकार ने अपना सरकारी वकील पैरवी के लिए नहीं भेजा और करीब 10 लाख आदिवासियों के परिवारों के विस्थापन की तलवार लटका दी गई जिसका भारी विरोध के बीच सरकार की किरकिरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में स्टे के बाद रोका जा सका. (नोट: विस्थापन आदिवासियों केनहीं बल्कि एक तय समय सीमा के बाद जंगल में रह रहे लोगो का होना है, लेकिन पॉपुलर रूप में इसे आदिवासियों के विस्थापन के रूप में देखा गया. – संपादक)

उच्च शिक्षा में फ़ेलोशिप

(9) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एम.फिल./पी.एच.डी करने के लिए अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलने वाली “राजीव गाँधी नेशनल फेलोशिप” की संख्या कम कर बाद में बंद कर दी गई और तो और डिजिटल इण्डिया के जमाने में मानव संसाधन मंत्रालय ने अपनी वेवसाइट पर लिस्ट डालना ही बंद कर दिया गया है.     

अन्य तमाम मुद्दों पर इस बार मोदी जी की पकड़ ढीली हुई और फीकी हुई है मोदी जी के चेहरे पर जो शिकन के निशान बन रहे हैं. वे उनके पिछले चुनाव में वादा पूरा न करने के कारण बन रहे है.

तथाकथित मीडिया मुद्दों से बरगला रहा है. जनता अपनी जागरूकता और सजगता के साथ मुद्दों को केंद्र में लाने की जिम्मेदारी उठा सकती है वरना इस बार चुनाव पुलवामा के शहीदों की चादर में लड़ा जा रहा जो सिर्फ एक मुद्दा है. देश के बहुत सारे मुद्दों की बलि चुनाव के लिए नहीं चड़ाई जा सकती है.