उत्तर प्रदेश में बदलती हुई कांग्रेस की रफ़्तार तेज हो रही हैं। लगातार खुद को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही यूपी कांग्रेस एक तरफ़ तो गठबंधन में सम्मान तलाश रही है, दूसरी तरफ़ गठबंधन न हो पाने पर खुद को अकेले चुनावी समर में उतरने के लिए नए फार्मूले भी गढ़ने में लगी है।

इसीलिए कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों को लुभाने के लिए रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है, ताकि गठबंधन के सामने बड़ी लकीर खींचने का दावा करके मुश्लिम वोटो को आकर्षित कर सकें।

बीते दिनों, प्रियंका का भीम आर्मी के नेता चन्द्रशेखर रावण से, मेरठ हॉस्पिटल में मिलने की ख़बर मीडिया के जरिये राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा किया की कांग्रेस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित वोटों को लुभाने के लिए रावण को अपने पाले में ले सकती हैं।

इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले रायबरेली में राष्ट्रीय भागीदारी मिशन के नेता सुशील पासी को कांग्रेस अपनी ओर खींचने की फिराक में है । प्रखर वक्ता सुशील पासी के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय भागीदारी मिशन का प्रभाव अमेठी, प्रयागराज (इलाहाबाद), बाराबंकी ,सीतापुर, हरदोई, लखनऊ, प्रतापगढ़ ,फतेहपुर जौनपुर सहित पासी बाहुल जिलों में अच्छा हैं। सुशील पासी रायबरेली संसदीय क्षेत्र में दलित मतों का ध्रुवीकरण करने की कूबत रखते है। यह बात प्रियंका गाँधी को बेहतर ढंग से पता भी हैं।

2017 के विधानसभा चुनाव में बछरावां सुरक्षित सीट पर प्रियंका ने सुशील पासी को कांग्रेस से उम्मीदवार भी बनाया था, लेकिन स्थानीय सवर्ण कांग्रेसी नेताओं के विरोध के चलते सुशील का टिकट काट दिया गया। लेकिन सुशील ने कांग्रेस को बछरांवा सीट जीतने भी नही दिया। जिसका एहसास स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को हैं।

फ़ोटो: सुशील पासी

उन्हें डर भी हैं कि अगर लोकसभा चुनाव में सोनिया गाँधी की सीट रायबरेली में सुशील पासी कांग्रेस के विरोध में मतदान कराने में जुट जाएंगे तो रायबरेली सीट निकालना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर न साबित हो जाएं। लेकिन ख़बर है कि प्रियंका, सुशील की क्षमता के अनुसार सम्मान देकर अपने साथ लेंगी, जिसका फायदा कांग्रेस को वोट के रूप में मिलने की बड़ी सम्भवना हैं।

अब सवाल यह हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मतदाताओं के बलबूते वापसी करना चाहती हैं या फिर उच्य पदों पर कुंडली मारें सवर्ण कांग्रेसियों के सहारें? जाहिर सी बात है कि पार्टी का मूल्यांकन प्राप्त मतों के आधार पर ही होगा, लेकिन इसके लिए जातियों के बीच स्वच्छ छवि के बीच युवा नेताओँ की आवश्यकता पड़ेंगी। जिनके कहने पर कांग्रेस के पक्ष में ज्यादा से ज्यादा मतदान हो सकें। क्योंकि विभिन्न जातीयों में पनप चुके जातीय चेतना के कारण अब मतदाता आंख मूंद कर कांग्रेस पर भरोसा तो नही करेगा ? जब तक की उसके समाज का दमदार नेता दिखाई नही पड़ेगा।

लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह हैं, कि लंम्बे समय से कांग्रेस का सत्ता से बाहर रहने के कारण इसके मूल बेस वोटर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (सपा और बसपा) में सिफ्ट कर चुका हैं। इसके पीछे भी कांग्रेस की नाकामियां ही रही हैं।

राष्ट्रीय भागीदारी मिशन के नेता सुशील पासी

दलितों का वोट लेने के लिए कांग्रेस ने जनाधार वाले दलित नेताओं का इस्तेमाल किया। लेकिन उन्हे नीतिगत फैसलों में शामिल न करना, सत्ता मिलते ही दलित नेताओं को धीरे धीरे किनारे लगाना यह सब पुराने कांग्रेसियों की फितरत रहीं।

फ़ोटो: सुशील पासी

उदाहरण के लिए 1980 में दलित नेता धर्मवीर के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत से कांग्रेस की सरकार बनी तो उस समय सवर्ण कांग्रेसियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश के बावजूद धर्मवीर को मुख्यमंत्री की शपथ नही लेने दिया बल्कि कई कांग्रेसी ब्राह्मणों ने भूखहड़ताल करके धरने पे बैठ गए कि दलित मुख्यमंत्री स्वीकार नही होगा।

इन कांग्रेसियों के विरोध के चलते लौह महिला नेता इंदिरा को अपना फैसला वापस लेना पड़ा. बाद में वी. पी. सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उसके बाद से कांग्रेस उत्तर प्रदेश में लौटकर वापस सत्ता में नही आयीं।

कांग्रेस के इतिहास पर इसीलिए चर्चा जरूरी है कि पुरानी कांग्रेस के चाल चरित्र दलित नेताओँ को इस्तेमाल करके छोड़ देने की रही हैं।

इसलिए सवाल है कि क्या प्रियंका के नेतृत्व में बदल रहीं कांग्रेस इस परंपरा से उबर पायेगी?  

उत्तर प्रदेश में अभी भी सवर्ण नेताओं का बोल बाला हैं। वो दलित नेताओं को अपने सेफ्टीवाल के रूप में देखते हैं। जबकि इन सवर्ण कांग्रेसी नेताओं के पास इनके समाज का वोटर नही रह गया हैं, लेकिन संगठन के उच्य पदों पर यही लोग कुंडली मारकर बैठें हैं। जिससे नए लोग आकर्षित होकर आते है लेकिन अवसर न पाने पर टिकते नहीं।

दलित वोट की फिराक में लगी कांग्रेस रावण के जरिये पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज्यादा सफ़लता मिलने की संभावना कम ही दिखाई पड़ती है, क्योंकि भीम आर्मी से जुड़े हुए लोग 90 प्रतिशत बसपा के कट्टर समर्थक हैं। वें लोग रावण के साथ भीड़ भले बने रहते हैं, लेकिन कांग्रेस को वोट नही करेंगे।

इसलिये रावण भी बड़ी चालाकी से बसपा के खिलाफ बोलने से कतराता है। वह जानत है कि बसपा के खिलाफ बोलना खतरों से खाली नही हैं। भले ही मायावती उन्हें बीजेपी -आरएसएस का एजेंट कहें !

सुशील पासी के साथ रावण वाली स्थिति बिल्कुल नही हैं वह पासी समाज को भगीदारी दिलाने की बात करते हैं। वे प्रखर वक्ता के तौर पर लोकप्रिय है, उन्हें सुनने के लिए स्वतः भीड़ आती हैं।

हालाँकि की चुनावी राजनीति में सुशील पासी के पास लगभग 20 वर्षों के लम्बे संघर्ष का अनुभव है जिनके संयोजन में राष्ट्रीय भागीदारी मिशन नाम से सामाजिक-राजनीतिक संगठन चल रहा है। इसमें बड़ी मात्रा में बूथ स्तर तक युवा जुड़े हैं, जो किसी पार्टी के समर्थक नही है और इस पर कांग्रेस की नज़र हैं।

अब देखना यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय भागीदारी मिशन के दोनों बड़े नेताओं को कांग्रेस अपने पाले में कैसे और कब लेती हैं। क्योंकि दोनों नेता अड़ियल मिज़ाज के हैं और कांग्रेसी चाल चरित्र को समझते हैं, लेकिन वक्त की नज़ाकत देखकर फैसला ले भी सकते हैं। जिससे बीजेपी के दलित अत्याचार से आक्रोशित दलित मतों को बड़ी मात्रा में अपने साथ जोड़ सकें। अगर यह प्रयोग सफल होता हैं तो कांग्रेस यूपी में त्रिकोणी लड़ाई में आ जायेगी।