हर दौर में कमोबेश बदलाव होता ही है, लेकिन वह बदलाव समाज को आगे भी ले जा सकता है और पीछे भी. एक ऐसा ही बदलाव संविधान के 124वें संशोधन के बारे में कहा जा सकता है. अगर इस देश में सबसे ऊपर कोई चीज है तो वह इस देश का संविधान जिसको सभी ने स्वीकार किया है. क्योंकि यह समाज में बराबरी लाने का अब तक सबसे बेहतरीन तरीका है जिसको इस देश के संविधान निर्माताओं ने समझा.

अगर भारत के सामाजिक संरचना को देखा जाए तो गैर-बराबरी, जाति-पाति, ऊंच-नीच, छुआ-छूत इस तरह के तमाम व्यवस्था इस देश को एक राष्ट्र के रूप में बनने से रोकते है. इसलिए समाज में बराबरी, अवसरों की समानता, के लिए संविधान में प्रावधान किये गए.

लेकिन एक संस्था/ इंस्टीटूशन के रूप में जाति सबसे खतरनाक और गैर-लोकतान्त्रिक है.

भारत में चाहे कोई भी धर्म रहा है, उसमें जातीय चरित्र विद्यमान रहा है. इसलिए हज़ारों की तादाद में न केवल हिन्दुओं में बल्कि बुद्धिस्ट, सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन्स समाज में में भी जाति व्यवस्था मौजूद है.

और इस सच्चाई को संविधान निर्माता भी जानते थे. उन तबको को जिनको की जाति के आधार पर बहिष्कृत कर रखा गया और सभी तरह के अधिकारों चाहे वह शिक्षा पाने का अधिकार हो, कही भी उठने-बैठने का अधिकार, अपनी मर्ज़ी से शादी और व्यवसाय का अधिकार से वंचित रखा गया था उनके लिए संविधान ही एकमात्र ऐसा स्रोत है जिसके की अपने अधिकारों को बचा सकता है. जैसे कि आर्टिकल 14 विधि के समक्ष समानता, आर्टिकल 15 (4) और 16 (4) इन पिछड़े तबको के लिए शिक्षा और रोजगार के लिए सकारात्मक भेदभाव कीव्यवस्था (positive discrimination) (रिजर्वेशन), आर्टिकल 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.


विश्वंभर नाथ प्रजापति राजनीतिक जातिविशियों में Vishwambhar Nath Prajapati in Political Action

लेकिन कुछ दिनों पहले ही देश की वर्तमान सरकार ने अनुसूचित जाति, आदिवासी, पसमांदा और पिछड़ों के अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए एक विधेयक (बिल) ले कर आई जिसको उसने नाम दिया “Reservation for Economic Weaker Sections” अर्थात “आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों लिए आरक्षण.” यह गरीब सवर्ण जाति के लोगों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण है.

गरीब सवर्णो का डेटा कहाँ हैं?

इस विधेयक को बिना किसी ठोस आधार के ही कपोल कल्पित कल्पना के आधार पर मान लिए गया कि इस देश में सवर्ण गरीब हैं और उनकी आबादी 10 प्रतिशत हैं. पहली बात तो यह कि सवर्ण गरीब वर्ग होता हैं कि नहीं, यही किसी को नहीं पता हैं, और यदि होता हैं तो इसकी कोई रिपोर्ट क्यों नहीं है.

सवर्णगरीब हैं, यह कौन से कमीशन/ आयोग/ संस्थान की रिपोर्ट हैं? इसका सर्वे सरकार ने कब कराया? भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गरीब सवर्णों की आबादी कितनी हैं ? भारत के किस राज्य में कितने प्रतिशत गरीब सवर्ण हैं? क्या कोई ऐसा जिला हैं भी जहाँ पर केवल गरीब सवर्ण हैं? सवर्णो की विभिन्न जातियों में से कौन कितना गरीब हैं, इसका डाटा कहां है?

दूसरी बात कि क्या सरकार के गरीबी उन्मूलन के प्रोग्राम से इन सवर्ण गरीबों को कोई फायदा नहीं मिला? कितने गरीब सवर्ण है जिन्होंने गरीबी उन्मूलन के विभिन्न कार्यक्रमों का फायदा नहीं लिया?

क्या सरकार की नीतियां गरीबों के विरुद्ध हैं, जो गरीबों  की संख्या बढ़ रही हैं और वही भी केवल अपर कास्ट के लोग गरीब हो रहे है?

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात, जब आरक्षण का आधार सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव,  सामाजिक, और शैक्षणिक रूप से पिछड़ेपन से हैं फिर आरक्षण का आर्थिक आधार क्यों बनाया गया?

सामाजिक न्याय के पुरोधाओं की जाँच पड़ताल

उपरोक्त प्रश्नों के सन्दर्भ में तथाकथित सामाजिक न्याय के पुरोधाओं की भी जाँच पड़ताल करना बहुत जरुरी हैं.

पहली और दूसरी पॉइंट पर ज्यादा बात इसलिए नहीं करूँगा क्योंकि ये दोनों ही बातें आप खुद से सोचिये.

पहली बात एक मेथोडोलॉजिकल (शोध-प्राविधिक) सवाल हैं.
दूसरी बात पॉलिसी लेवल (नीतिगत स्तर) का सवाल हैं, जो सीधे-सीधे वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (BJP/ बीजेपी) सरकार की  विफलताओं और प्रोपोगंडा (मिथ्याप्रचा) को दर्शाती हैं.
तीसरी बात हमारे  “सामाजिक न्याय” के आकाओं से जुडी़ हैं .

पिछड़ा वर्ग आयोग का इतिहास

प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर कमीशन) के समय से ही सवर्णो का तर्क आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन का था, ताकि सदियों से चली आ रही शोषणकारी, जाति व्यवस्था को ज्यों-का-त्यों रखा जा सके. जिन अनुच्छेदों का प्रावधान संविधान में है उसको तो तथाकथित बहुजन, समाजवादी, वामपंथी पार्टियां लागू नहीं करा पा रही हैं, और जो संविधान के एकदम विरुद्ध है उसमें BJP का खुले दिल से साथ दे रहीं हैं. इनको दलित पिछड़े आदिवासियों से कोई लेना देना नहीं है इसलिए ये आप के ही खिलाफ खड़े हो रहे हैं.

अब शुरू से शुरू करतें हैं. इन पार्टियों को BJP को ब्राह्मणवादी-मनुवादी बोलने से दो फायदा होता है.

पहला यह कि BJP ब्राह्मणवादी-मनुवादी है, यह सबको पता चल जाता है.
दूसरा और जो सबसे बड़ा फायदा यह होता वह यह है कि वे खुद ब्राह्मणवादी हैं, यह प्रश्न ही गायब हो जाता है.  उनका ब्राह्मणवाद छुप जाता है, वही हाल है आज की राजनीति का.

सवर्णो के आरक्षण का समर्थन और अति-पिछडो का पृथक आरक्षण का विरोध

उत्तर प्रदेश में OBC का वर्गीकरण के घोर विरोधी पार्टियाँ संसद में सवर्ण रिजर्वेशन का समर्थन करती हैं. सवर्णों का रिजर्वेशन स्वीकार है, लेकिन अति पिछड़ों और पसमांदा का रिजर्वेशन इनको नागवार गुजरता है. क्या यही है सामाजिक न्याय, क्या यही है बहुजन राजनीति?

लोकसभा और राज्यसभा का सांसद बनने के लिए भारत के नागरिक को पागल या दिवालिया नहीं होना चाहिए ऐसा हमारा संविधान कहता है. अब देखिए कौन है पार्लियामेंट में? हमारे संविधान निर्माता बहुत दूरदर्शी थे. लेकिन आज पूरा पार्लियामेंट पागल और दिवालिया लोगों से भरा है और उसी का परिणाम है 10% सवर्ण आरक्षण.

सवर्णों के आगे सारी पार्टियों ने घुटने टेक दिए. लोक सभा में कुल 326 मतों में से 323 समर्थन में पड़े और 3 विरोध में पड़े. वही राज्य सभा में 165 मत समर्थन में और 7 विरोध में पड़े और भारी बहुमत से यह विधेयक/ बिल पास हो गया.

किस विचारधारा का समर्थन?

यह माना जाता है कि BJP को हरा दो तो राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ (RSS/ आरएसएस) की हार हो जाती है, तो BJP को समर्थन करके किसको जीताए हैं? RSS को!

इसलिए यह सब पार्टियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सवर्ण रिजर्वेशन, जो की सीधे-सीधे कांस्टीट्यूशनल प्रिंसिपल (सवैधानिक मूल्यों) की वायलेशन (अवहेलना) है, उसमें साथ दे रही हैं.

यह कैसे नहीं माना जाएगा कि बाकी पार्टियां भी ब्राह्मणवादी नहीं है? आज उनका ब्राह्मणवाद BJP के ब्राह्मणवाद के साथ मिलकर एक हो गया.

सवर्णो के आरक्षण के लिए जिम्मेदार कौन?

आज सवर्णो को रिजर्वेशन मिला है, इसके लिए सुश्री मायावती, रामदास अठावले और अखिलेश यादव जैसे लोग भी जिम्मेदार है.

सवर्णो के रिजर्वेशन को डिस्कोर्स (विमर्श) में लाने का क्रेडिट भी बहन जी को ही जाता है. बहन जी (और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव- संपादक) तो पिछले एक दशक से सवर्णो को रिजर्वेशन की पुरजोर वकालत करती रही हैं. इस बिल को लाने के लिए संविधान की मूल भावना के साथ छेड़-छाड़ करते हुए संविधान में संशोधन केवल 24 घंटे में ही कर दिया गया. किसी को भी न बताया गया, ना ही इस बिल को पार्लियामेंटरी स्क्रुटनी कमिटी के पास भेजा गया. और सबसे अद्भुत बात यह भी है, कि सभी पार्टियों ने इसका न केवल समर्थन किया बल्कि इसके लिए अपना वोट भी BJP के साथ दिया. और तथाकथित सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां जैसे- बहुजन समाज पार्टी (बसपा. BSP), समाजवादी पार्टी (सपा/ SP) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद/ RJD) ने भी इस बिल का समर्थन किया. जबकि इन पार्टियों का अस्तित्व ही सवर्णो के खिलाफ प्रतिरोध करके आया  था.

जैसे की BSP का यह नारा- “तिलक तराजू और तलवार: इनको मारो जूते चार”, इसमें साफ़-साफ़ द्विज वर्णो की सत्ता को चैलेंज किया गया है. लेकिन आज यह पार्टी इन्हीं के चरणों में गिर पड़ी है. सन 1993 के इलेक्शन में यही BSP ने किसी भी सवर्ण को टिकट नहीं दिया था, लेकिन आज सवर्ण रिजर्वेशन की सबसे ज्यादा समर्थन करने वाली यही है.

पिछले एक दशकों से ही BSP सवर्ण रिजर्वेशन का समर्थन करती रही है, और 10 प्रतिशत रिजर्वेशन देने की बात करती रही है.

इसमें एक वजह यह भी है 2007 के चुनाव में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ ने काफी हद का BSP को फायदा पहुंचाया था.

SP ने भी अपने पिछले घोषणा पत्र में सवर्ण रिजर्वेशन का समर्थन किया था, जैसा की श्री रामगोपाल वर्मा ने खुद ही कहा है. SP तो इसके पहले भी उत्तर प्रदेश में त्रि-स्तरीय रिजर्वेशन ख़त्म करने का काम कर चुकी है.

और यह होगा भी क्यों नहीं? अखिलेश यादव खुद परशुराम को आदर्श बताते है, विष्णु मंदिर और विष्णु नगर बनाने की बात करते है. ब्राह्मणों और सवर्णों को खुश करने के लिए BSP-SP हाराहूशी से लगे हुए थे. RJD ने भी “मुख में राम: बगल में छुरी” का फार्मूला अपनाते हुए समर्थन किया. RJD के तेज प्रताप यादव, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री, बिहार, भी सार्वजनिक रूप से राम मंदिर और सवर्ण रिजर्वेशन का समर्थन करते है. यही हाल मज़दूरों के दर्द को भुनाने वाली कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सिस्ट (सीपीएम/ CMP)  का भी रहा, जिसने अपने ब्राह्मणवादी जातीय चरित्र का परिचय देते हुए सवर्ण आरक्षण विधेयक का समर्थन किया.

कथनी और करनी

अब प्रश्न उठता है, कि दलित, पिछड़ा, आदिवासी, पसमांदा, मज़दूर और  मुस्लिमों की बात करने वाली पार्टियां आखिर इन समुदायों का साथ न देकर सवर्णो का साथ  क्यों दिया ? BJP जब ब्राह्मण-बनिया हितों के साथ सवर्णो की पार्टी है, RSS के इशारों पर काम करती है, तो आखिर तथाकथित सामाजिक न्याय की पार्टियां किसके इशारों पर काम करती हैं? आज इन्होंने जो ऐतिहासिक भूल और दलित पिछड़ों के साथ धोखा किया वह भी तारीख में दर्ज़ हो गयी हैं.

माई समीकरण

भारत में लोकतंत्र, संविधान में विश्वास की वजह से चलता हैं, लेकिन अगर इस संवैधानिक विश्वास पर ही हमला हो तो वह लोकतंत्र पर हमला हैं. मुस्लिमों की बात करने वाली SP कभी भी बैकवर्ड मुस्लिमों (पसमांद) के रिजर्वेशन के लिए आज तक विधेयक नहीं ला पायी. SP का अस्तित्व ही माय समीकरण (माय = MY = मुस्लिम यादव) पर टिका हैं, जिसमें की पहले मुस्लिम हैं फिर यादव. लेकिन मुस्लिमों को बदले में क्या मिला? SP बैकवर्ड मुस्लिमों (पसमांदा) का रिजर्वेशन बढ़ाने के लिए कभी आंदोलन नहीं कर पायी. अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी/ OBC) के वर्गीकरण का भी विरोध करती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अति पिछड़ों और पसमांदा की हालत सबसे ख़राब हैं.

स्वास्थ्य के मामले में भी अधिकतर अति पिछड़ी जातियां बहुत ही बुरी हालत में हैं. उनका स्वास्थ्य किसी सवर्ण के मुकाबले बहुत ही निम्न स्तर का होता है. महिलाओं का भी स्वास्थ्य इन समाजों में बहुत ही निम्न स्तर का है. BSP दलितों (अनुसूचित जाति) का चैंपियंस होने का क्लेम करती रही हैं. लेकिन इनके इमेजिनेशन (कल्पन) में कितनी बार दलित मुस्लिम और दलित क्रिश्चियन्स आये आप खुद सोचिये.

संविधान के आर्टिकल 341 की खामियों और 1950 के प्रेस्डेंसियल आर्डर (राष्ट्रपति आदेश) पर कौन बोलेगा? क्या सामाजिक न्याय कभी अति पिछड़ों, पसमांदा, दलित मुस्लिमों और दलित क्रिश्चियन्स तक पहुंचेगा?

क्या कभी इनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक  स्थिति दिखती हैं? सवर्ण गरीबो की कल्पना करके इन्होंने समाज के दबे-कुचले वर्गों के साथ धोखा किया हैं. इन सामाजिक न्याय के योद्धाओं ने एक तरफ जहाँ सदियों से दबे-कुचले समाजों के अधिकारों का विरोध किया हैं तो वही दूसरी तरफ सवर्ण रिजर्वेशन का भरपूर समर्थन किया हैं. BJP के साथ मिलकर तथाकथित सामाजिक न्याय के झण्डाबरदारो ने भी दबे कुचले लोगों की पीठ में छुरा घोंपा हैं.

समाज में न्याय कैसे आए?

नीत्से (2000:148) कहता हैं कि-

न्याय उनमें पैदा होता हैं जो लगभग समान रूप से शक्तिशाली हैं
Friedrich Nietzsche, German Thinker, (1844-1900)

तो क्या दलित पिछड़े तबके सवर्णो के समान शक्तिशाली है? नहीं, तो फिर न्याय का जन्म कैसा होगा? न्याय पैदा होगा, इन तबकों को भी बराबरी, अवसरों की समानता, और प्रतिनिधित्व देने से. लेकिन प्रतिनिधित्व किसको मिला जो पहले से शक्तिशाली हैं यानि न्याय स्थापित नहीं हो रहा हैं.

होना तो यह चाहिए था कि पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व उसके आबादी के हिसाब से दिया जाता ताकि न्याय और समानता आ सके लेकिन हुआ इसके उल्टा. समाजवादी, बहुजन, और सर्वहारा की राजनीति करने वालो में वैचारिक दरिद्रता पैदा हो गयी हैं.

इनके अंदर न्याय की मूलभूत अवधारणा की समझ ही नहीं पैदा हो रही हैं. प्रतिनिधित्व की सबसे तत्काल जरूरत अगर किसी को हैं तो वह हैं अति पिछड़ों, पसमांदा, दलित मुस्लिम और दलित क्रिश्चियन्स को. क्यों नहीं मिलते है इन समुदायों के डॉक्टर, इंजीनियर्स, कॉर्पोरेट्स, थानेदार, पुलिस, सिविल सर्वेंट, प्रोफेसर, वाईस चांसलर, विधायक, संसद, मंत्री, आदि? क्योंकि लोकतंत्र कुछ जातियों और क्लास तक आकर ठहर गया हैं और उसी की कड़ी हैं, सवर्ण रिजर्वेशन विधेयक जिसके लिए  बीजेपी, कांग्रेस, CPM के साथ-साथ तथाकथित सामाजिक न्याय के प्रहरी SP, BSP, जनता दल यूनाइटेड(जदयू/ JDU), और RJD भी जिम्मेदार हैं.

डॉ आंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर और मान्यवर कांसीराम के रास्तों से यह लोग भटक गए हैं, जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ेगा.