विद्वता का ताप खाये लोग सकारात्मक मुद्दों को आगे बढ़ाने के बजाय मनुवादी ट्रैप में फसेंगे तो उनके ज्ञान व तर्क की पराकाष्ठा वही समझें. मनुवादियों के एक विशेष रणनीति होती है जिसे आप सीधे सीधे नही खत्म कर सकते उसे बदलने का प्रयास न करते हुए समाज के में कुछ दलालों, अनगढ़ विद्वानों व मूर्खो द्वारा दुष्प्रचार करके समाज की उस शक्ति के बारे में ही संसय उत्पन्न कर दिया जाय उसके बाद किसी भी गलत तथ्य व नीति की स्थापना धीरे धीरे स्वतः ही हो जाएगी. आप क्रांति प्रतिक्रांति का इतिहास पढ़ लीजिये ब्राह्मण संस्कृति ने श्रमण संस्कृति को इसी प्रकार से परास्त किया है. इसे प्रतिक्रांति कहतें हैं.

ऐसी क्या आवश्यकता पड़ती है कि ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग वर्ण व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए राजा बनता है. क्योकि वह समझ चुके होते है ब्राह्मण धर्म की पुनर्स्थापना हेतु सत्ता की आवश्यकता होगी तभी श्रमण सभ्यता अर्थात बौद्ध धम्म व संस्कृति को अवनति पर लाकर समाज से दूर किया जा सकता है.

सत्ता की स्थापना के बाद पुष्यमित्र शुंग सीधे तौर पर सांस्कृतिक व धार्मिक बदलाव लाकर जनता से बौद्ध धम्म को नही हटा सकता था, इसलिए सबकुछ वैसे ही रहने देता है बौद्धों के महत्व के तमाम दिन व त्योहार व को जो विशेष रूप से पूर्णिमा पर ही पड़ते है साथ मे विभिन्न प्रतीकों को उनके बाहरी स्वरूप में बिना बदलाव लाये नए तथ्य व प्रक्रिया का निर्माण इस प्रकार करता है जिससे जनता आसानी से उसको उसी रूप में स्वीकार कर ले.

इसी को आधार बना के ब्राह्मण संस्कृति के ग्रंथों की रचना का कार्य शुरू होता है जिससे इस बदलाव का प्रमाणीकरण हो पाए. अष्टविनायक-अष्टविनय व शीलो को धारण करने वाले बुद्ध का रूपांतरण सरस्वती- महामाया की मूर्ति का रूपांतरण बुद्ध का रूपांतरण शंकर रूप में- बौद्धों में नागवंशी का महत्व है वही से बुद्ध को नए तरीके से शंकर के रूप में प्रस्तुति बाद में रूपांतरण बौद्धों के धम्मपद का गीता के रूप में ब्राह्मणीकरण और धीरे धीरे सारे बौद्धस्थलों का मंदिर के रूप में रूपांतरण.

आज भी समाज बौद्ध धम्म का पालन करता है पर कई तरह से रूपांतरण के कारण किसी को इसका अहसास नही है.

ऐसे तमाम उदाहरण है जो तथ्यपरक है और ऐतिहासिक भी. बाबा साहब ने कहा है भारत का इतिहास कुछ और नही ब्राह्मण और श्रमण के मध्य क्रांति प्रतिक्रांति का इतिहास है.

वर्तमान बहुजन नेतृत्वकर्ता व प्रतीकों के साथ भी यही प्रयोग बहुत तेजी से जारी है. उन्हें समाज के अंतर्मन से इन्हें सीधे सीधे नही हटाया जा सकता इसकिये संशय की प्रक्रिया जारी है. बहुतेरे लोग इसके शिकार मात्र है.

जब तक बाबा साहब ने संघर्ष किया उस समय आज तक ब्राह्मण संस्कृति की नेतृत्व (कांग्रेस, भाजपा व अन्य सामाजिक संगठन) यह साबित करने का प्रयास करता रहा कि बाबा साहब अछुतो का प्रतिनिधित्व नही करते. आज तक यह प्रयास जारी है कि समाज यह कभी न समझे न स्वीकार करे कि बाबा साहब ने अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक (OBC, SC, ST, MT) व महिलाओं के लिए क्या किया?

मान्यवर काशीराम जी के लिए कहा गया कि वे बाबा साहब की नीतियों के तहत नही चलते थे?
सत्य क्या है यह सभी को पता है कि बहुजन सिद्धांत श्रमण संस्कृति की पुनर्स्थापना का सिद्धांत है. इसी प्रक्रिया में आज यह संशय उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा है बहन जी मान्यवर कांशीराम जी की नीतियों का पालन नही कर रही है.

ऐसा कहने वाले लोगो मे कई सारे लोग संशय की प्रक्रिया के शिकार मात्र है जिसे ब्राह्मण संस्कृति द्वारा दलालों के माध्यम से अनगढ़ अनपढ़ों व भटके हुए तथाकथित विद्वानों में प्रतिस्थापित किया जा रहा है ताकि ये सब स्वयं ही अपनी शक्ति व सामर्थ्य को खत्म करने पर उतारू हो जाये जो कि संशय के शिकार लोग पूरी लगन व निष्ठा से कर रहे है.

ब्राह्मण संस्कृति (मनुवादी) की एक शक्ति ऐसी बामसेफ के लोग है जो रजिस्टर्ड बामसेफ से है जिन्होंने मान्यवर कांशीराम साहब को धोखा दिया आज भी वे सभी आपस मे लड़ रहे है कौन वास्तविकता में असली है सुप्रीम कोर्ट में केस जारी है.

रजिस्टर्ड बामसेफ का एक ऐसा ही धड़ा जो समाज से सबसे ज्यादा धन का अवशोषण कर रहा है वह अपनी शक्ति इस बात में लगा रहा है कि कैसे बहुजन समाज कमजोर हो उत्तर प्रदेश में इसके लिए उन्होंने भाजपा के हाथों में खेलने वाले शिवपाल जी से गठबंधन किया ताकि वे बहुजन समाज को ज्यादा से ज्यादा नुकशान पहुंचा सके. कोई भी समझदार यह बता देगा कि यदि ऐसे लोग वास्विकता में सामर्थ्यशाली है तो किसी अन्य राज्य में अपनी राजनैतिक शक्ति बनाकर अपने प्रतिनिधि जिताकर यह साबित करते कि वे बेहतर रणनीतिकार व नेतृत्वकर्ता है परंतु उन्हें इस बात की चिंता नही है उन्हें कही अन्य स्थानों पर बहुजन सत्ता की स्थापना करनी है.

उनका ध्यान इस बात पर केंद्रित है कैसे बहुजन समाज पार्टी को नुकसान पहुचाया जाय।

मान्यवर साहब ने बहुत कुछ महाराष्ट्र से सीखा वहाँ पर उनका स्थायित्व व संगठनात्मक ढांचा भी था बावजूद इसके उन्होंने महाराष्ट्र से अपने सामाजिक राजनैतिक आंदोलन की शुरुआत न करके अन्य प्रदेशों को ही चुना। आज के समय मे जो लोग अपना घर फूंकने पर आमादा है उन्हें चाहिए कि जिन छप्परों के सहारे है दूसरे राज्यों की बरसात में जाकर जांच जरूर कर ले कि यह कितना सक्षम होगा अन्यथा ऐसे लोग पूरे बहुजन समाज का अनर्थ कर डालेंगे।

बहुजन समाज पार्टी हमेशा से बहुजनों के लिए बहुजनों द्वारा बहुजनों को साथ मे लेकर बढ़ने वाला आंदोलन था हमेशा रहेगा।