भारतीय न्यायपालिका अपने सत्व में बेहद एलिट और सामंती तत्वों को समेटे हुए है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण इसकी आतंरिक कोलेजियम व्यवस्था है जिसे यह हर कीमत पर बनाए रखना चाहती है. इसका सबसे बड़ा कारण अपने सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर को यह अबाध रूप से भोगते रहना चाहती है.

आम तौर पर भारतीय राजनीतिक दलों पर भाई-भतीजावाद के आरोप सबसे ज्यादा लगते हैं, पर सच तो यह है कि हर प्रत्याशी को जनता के सामने हर पांच साल में परीक्षा देनी पड़ती है. पर हमारी न्याय-व्यवस्था का कोई सानी नहीं है.

आरक्षण के सन्दर्भ में देखें तो बात और स्पष्ट होती है. विधायिका और कार्यपालिका तक में आरक्षण है जो संविधान द्वारा निर्देशित हैं पर न्यायपालिका में किसी तरह का कोई आरक्षण नहीं है. जबकि यह भी उसी संविधान से आबद्ध है. ये तीनो ही लोकतंत्र के जायज स्तम्भ हैं.

हमारे देश के न्यायाधीश भी इसी समाज की पैदावार हैं. स्वयं को उच्चतम नैतिकता के धरातल पर रखनेवाले इन न्यायाधीशों को हमारे देश की सामाजिक वास्तविकता को जानना-समझना चाहिए.

2013 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी. सथासिवम ने एक बयान दिया था कि न्यायपालिका को उत्पीड़ित वर्गों और महिलाओं की तरफ से अधिक प्रतिनिधित्व की जरूरत है.

कानून और न्याय संबंधी समिति की 21 वीं रिपोर्ट जो 2007 में आई थी और जिसकी अध्यक्षता श्री सुदर्शन नचीप्पन कर रहे थे, उस समिति का कहना था कि-

“इस तरह की प्रतिष्ठित संस्था को सामाजिक न्याय की वास्तविकता का भी प्रदर्शन करना चाहिए जिसमें न्यायपालिका बनाई गई है। यह अलग-थलग नहीं रह सकता और न ही इसे इतना बेशकीमती बना दिया जाए कि यह समाज की पहुँच से दूर और संवैधानिक प्रावधान के दायरे से बाहर हो जाए”.

समिति का यह भी कहना था-

“न्यायपालिका अनुभवी न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक अधिकारियों द्वारा संचालित और संवर्धित है। जब विधायिका और कार्यपालिका को संवैधानिक आरक्षण के दायरे में रखा जाता है तो यह स्वाभाविक है कि लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ न्यायपालिका को भी संवैधानिक आरक्षण के सिद्धांत से आच्छादित होना चाहिए।”

यदि हम उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायधीशों की पड़ताल करें तो भाई-भतीजावाद के इतने ओर-छोर दिखेंगे जिससे न तो कोई कबीर अपनी चदरिया बिन पाएगा और न ही समानता और न्याय, जिसका दावा किया जाता है कि वहाँ मिलता है, किसी को कभी मिल पाएगा. इस लोकतंत्र को सुसंगत और और सुचारू रूप तभी दिया जा सकता है जब स्वतंत्रता-समानता और बंधुता को अक्षुण्ण रखा जाए और यह तभी संभव है जब लोकतंत्र में हर संस्थान चाहे वह निजी हो या सार्वजनिक, “हम भारत के लोग” का उचित प्रतिनिधित्व मिले…….!!

स्रोत: राजीव सुमन, फेसबुक, 18.03.2019
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