आज़ादी के बाद जिस एक व्यक्ति ने भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन दिया वे मान्यवर कांशीराम हैं.  उन्होंने 1980 के दशक से अपनी राजनीति में शुरू की. उनके योगदान से सदियों से वंचित समाज को राजनीति में जगह मिली, जो उसे पहले कभी नहीं मिला था. वंचित समाज को अहसास कराया कि वह भी इस देश का हुक्मरान बन सकता है. फुले – अम्बेडकरवादी राजनीति में कांशीराम का कद आज़ादी के बाद के विचारको – नेताओ में सबसे ऊँचा है.

वे 1934  में पंजाब के एक रैदासी सिख परिवार में जन्में. उन्होने अपनी  राजनीति की शिक्षा महाराष्ट्र से ली. वे पूणा में नौकरी करते थे. इसलिए उन्होंने वहाँ रहकर अम्बेडकरवादी आंदोलन को निकट से देखा. उन्होंने महाराष्ट्र में देखा कि बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा बनाई गयी रिपब्लिकन पार्टी किस तरह अपने आंतरिक गुटबंदी  के कारण अनेक भागो के बंट चुकी है.

गैर-राजनीतिक संगठनो का महत्त्व

उन्होंने सबसे पहले सामाजिक स्तर पर संगठन बनाये. वे संगठन की शक्ति में विश्वास रखते थे. उनका कहना था –

जिस समाज की गैर – राजनीतिक जड़ें कमजोर  होती हैं, उनकी राजनीति कामयाब नहीं होती.

इसलिए उन्होंने गैर – राजनीतिक जड़ो को मजबूत करने के लिए 1970 के दशक में बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्मुनिटी एम्प्लाइज फेडरेशन (Backward and Minority Communities Employees’ Federation/ BAMCEF) जिसे संक्षिप्त रूप में बामसेफ की स्थापना की. यह गैर – राजनीतिक, गैर – धार्मिक, गैर – उत्तेजनात्मक (non – agitational) संगठन था. 1980 में उन्होंने “दलित शोषित समाज संघर्ष समिति” जिसे लोकप्रिय रूप में  “DS 4” से जाना जाता था की स्थापना की. उसके बाद उनको लगा कि अब राजनीतिक पार्टी की स्थापना की जानी चाहिए. तब 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की.

मीडिया तथा राजनीतिक विश्लेषकों ने कांशीराम को नेता कहा है. किन्तु  उन्होंने जीवन में कभी कोई पद नहीं लिया. वे चाहते तो उत्तर प्रदेश के मुख्य्मंत्री, केंद्र सरकार में केबिनेट मंत्री और यहाँ तक कि राष्ट्रपति भी बन सकते थे. 1997 में भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने उनको राष्ट्रपति पद देने की पेशकश की थी. किन्तु उनका कहना था कि मुझे पद से ज्यादा अपने समाज के लोगो की फिक्र है. पद का उनके लिए कोई महत्व नहीं था.

वे सामाजिक परिवर्तन पर जोर देते थे. उनका कहना था कि भारतीय जातिगत समाज में निचली जातियों का आत्म सम्मान मार दिया गया है.

सदियों से पिछले इन निचली जातियों के लोगों में उनका आत्मविश्वास जगाने की जरूरत है. दलित, आदिवासी,  पिछड़े और धार्मिक रूप से परिवर्तित अल्पसंख्यक ही इस देश के मूलनिवासी हैं. जिसे उन्होंने बहुजन समाज का नाम दिया.  इस बहुजन समाज को मुझे देश का हुक्मरान बनाना है.

चमचा युग

उनका कहना था की ब्राह्मणवादी पार्टियों  में SC ST समुदाय के सांसद/ विधायक चमचा बनकर रह जाते हैं. वे अपने समाज की बात नहीं रख पाते. उनका स्वतंत्र वज़ूद नहीं होता . इसलिए फुले – अम्बेडकरवादी सिद्धांतो पर आधारित एक ऐसी पार्टी हो जो समाज के कमजोर तबके को देश का हुक्मरान बनाये.

बहुजन समाज की केमिस्ट्री

बहुजन समाज को हुक्मरान बनाने के लिए कांशीराम ने अपनी एक केमिस्ट्री बनाई. वे SC ST OBC समुदाय के लोगो  को एक मंच पर लाये. उन्होंने बताया कि भारत में लोग 6000 जातियों में बंटे हुए हैं. यदि दलित – पिछडो को अपनी मुक्ति चाहिए  तो आपस में भाईचारा बनाना होगा. एक बहुजन समाज का निर्माण करना होगा. इस क्रम में उन्होंने ऐसे महापुरुषों को अपना आदर्श बनाया जिन्होंने बहुजन समाज के मुक्ति के लिए काम किया हो.

उन्होंने अपने आदर्शों में ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज, नारायण गुरु, डा. भीमराव अम्बेडकर, रामास्वामी पेरियार को शामिल किया. उनके ज्यादातर आदर्श पिछड़े  समाज के हैं.

आजादी के बाद बड़ी वैचारिक क्रांति

आज़ादी के बाद वह पहले सामाजिक नेता थे जिहोने डा अम्बेडकर के विचारों को अपनी राजनीति का आधार बनाया. इसके लिए उन्होंने प्रतीक चुने. उन्होंने नीला झंडा और चुनाव चिन्ह हाथी चुना. ध्यान रहे कि डा अम्बेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी का झंडा नीला ही था और चुनाव चिन्ह भी हाथी ही था.

कांग्रेस  गाँधी को राष्ट्रपिता मानती थी. इसके जबाब में कांशीराम में ज्योतिबा फुले को राष्ट्रपिता माना. यह उनकी बहुत बड़ी वैचारिक क्रांति थी. उनका स्पष्ट कहना था कि गाँधी हमारे राष्ट्रपिता नहीं हो सकते. क्योकि गाँधी ने वर्ण व्यवस्था को स्वीकार किया है.

उनका कहना था कि हमारा मुख्य उद्देश्य भारतीय समाज में बुनियादी स्तर पर परिवर्तन लाना है जो जाति व्यवस्था से पीड़ित है. उनका महावाक्य था –

‘जिस दिन बहुजन समाज के लोग अपने दम पर सत्ता हासिल कर लगे, उस दिन उनको पता चल जायेगा कि शासक और शासित में क्या अंतर होता है. हमे आरक्षण मांगने वाला नहीं देने वाला समाज बनना है. मैं अपने लोगो को इस प्रकार तैयार कर रहा हूँ कि वे दूसरे को आरक्षण दें, न कि खुद मांगे.’

देश के शासक बनने की युक्ति

उनका कहना था कि देश में बहुजन समाज को शासक बनाने के लिए  बाबा साहेब ने संविधान और वोट देने का अधिकार दिया है. इनसे बहुजन समाज के लोग  दश के शासक बन सकते हैं. बस अपने वोट के अधिकार का प्रयोग विवेक से करना है. हमे अपना वोट बेचना नहीं है. जो लालच में वोट देते हैं, उनकी पीढ़ियां उनको  कोसती है. वोट बहुजन समाज का सबसे बड़ा हथियार है.

यही उनकी मुक्ति  का साधन है. उनके अनुसार  जो जाति शासक होती है, उस पर कोई अत्याचार नहीं कर सकता. उसकी बहिन बेटियों पर जुल्म नहीं होते. हमारा आंदोलन बहुजन समाज के सम्मान और स्वाभिमान के लिए है. हम समानता और आत्म सम्मान के लिए लड़ रहे हैं.

अपने समाज को जगाने के लिए  और उनको एकता के सूत्र में बढ़ने के लिए उन्होंने कई नारे दिए. एक नारा था-

वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा

इसका अर्थ है हमारा बहुजन समाज वोट देता है और नेता सवर्ण बनता है. अब यह नहीं चलेगा. हमारा समाज हमारे नेता को वोट देगा. उनका दूसरा नारा था – जिसकी जितनी संख्या  भारी, उसकी उतनी भागीदारी. इसका अर्थ है सत्ता और शक्ति के प्रतिष्ठानों में जिस समुदाय की जितनी आबादी है, उसका उतना ही हिस्सा होना चाहिए.

उन्होंने अपनी राजनीति का केंद्र उत्तर प्रदेश बनाया. उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश सबस बड़ा प्रदश है. यह ब्राह्मणवाद  की गर्दन है, जब गर्दन को दबोच लिया जायेगा. तो दूसरे अंग अपने आप काम करना बंद हो जायेगे. फिर ब्राह्मणवाद की मौत हो जाएगी.

उनका तर्क था कि चुनाव में बसपा को इतनी सीट दे दीजिये कि हमारे बगैर किसी की सत्ता नहीं बन सके. उस पार्टी को हमारी शर्तो को मानना होगा. उन्होंने राजनीति में तरह तरह के प्रयोग किये. सबसे पहले 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ गंठबंधन बनाया, फिर उसके साथ मिलकर सरकार बनाई. उसके बाद उन्होंने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई. उन्होंने कांग्रेस  के साथ भी गठबंधन किया था.

वे खुलेआम कहते थे हम मजबूर सरकार चाहते हैं. मजबूर साकार बहुजन समाज के हित में हैं. वे कहते थे मैं बार बार चुनाव चाहता हूँ. इससे  बहुजन समाज को अवसर मिलेंगे. हमारा समाज हमेशा अवसर से वंचित रहा है, इसलिए हमे अवसर निर्मित करने होंगे. चूँकि स्थायित्व उनकी राजनीति का मकसद नहीं था, इसलिए  वे सभी को विरोधी मानते थे.

उनका मकसद सीधे सामाजिक आधार से संवाद बनाना था. इसी बल पर उन्होंने बसपा को आगे बढ़ाया. उन्होंने परम्परागत रूप  से राजनीतिक नैतिकता को बहुजन समाज के लिए व्यर्थ मानते थे. उन्होंने राजनीतिक अकादमिक ज्ञान और भाषा की चिंता भी  नहीं की.

वंचित समाज में उसके अंदर आत्मविश्वास जगाने और आत्म समान दिलाने के उनकी महती भूमिका रही. जो उनको पहले नेताओ से विशिष्ट बनाती है. उन्होंने राजनीति का डिस्कोर्स बदल दिया. वे पार्टी अध्यक्ष से ज्यादा एक विचारधारा के रूप में याद किये जाते हैं.