प्यारे संग्रामी साथियों!

मानव जाति का इतिहास: वर्ग-संघर्ष का इतिहास!

यह एक अप्रिय सच्चाई है कि आज 21वीं सदी में बहुजन समाज उन स्थितियों और परिस्थितियों के सम्मुखीन है, जिन स्थितियों में सारी दुनिया में ही क्रांतियाँ हुईं, स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए. ऐसे में जरुरी है कि हम अपने इतिहास, खासकर नयी सदी के संघर्षों के इतिहास का सिंहावलोकन कर लें. इस क्रम में सबसे जरुरी है महान समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स (1818-1883) के नजरिये से इतिहास को समझना, जिसे अबतक नजरंदाज कर हमने ऐतिहासिक भूल की है.

मार्क्स ने कहा है अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है- अर्थात दूसरे शब्दों में जिसका शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है.

मार्क्स के अनुसार ‘समाज के शोषक और शोषित ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता. नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है. प्रभुत्वशाली वर्ग (hegemonic society) अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है.’

आरक्षण में क्रियाशील: भारत में वर्ग संघर्ष!

मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या एक मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिससे कोई देश या समाज न तो अछूता रहा है और न आगे रहेगा. जबतक धरती पर मानव जाति का वजूद रहेगा, वर्ग-संघर्ष किसी न किसी रूप में कायम रहेगा.

किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि जहां भारत के ज्ञानी-गुनी विशेषाधिकार युक्त समाज के लोगों ने अपने वर्गीय हित में, वहीं आर्थिक कष्टों के निवारण में न्यूनतम रूचि लेने के कारण बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा मार्क्स के कालजई वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की बुरी तरह अनदेखी की गयी, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही . ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है.

हिन्दू आरक्षण

जी हाँ, वर्ण व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाए तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण व्यवस्था में विविध वर्णों (सामाजिक समूहों) के पेशे/ कर्म तय रहे तथा इन तयशुदा पेशे/ कर्मों की विचलनशीलता (professional mobility) धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध (prohibited) रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली, जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है.

पारिश्रमिक-रहित वर्ण-व्यवस्था का आरक्षणवादी चरित्र

वर्ण व्यवस्था के प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकार युक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन. (कार्ल मार्क्स इसे उत्पादन के साधनो पर नियंत्रण करने वाला पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग कहतें थें- संपादक.)

महात्मा फुले का शूद्र अतिशूद्र की संकल्पना

वर्ण-व्यवस्था में वर्ग-संघर्ष की विद्यमानता को देखते हुए ही 19 वीं सदी में महामना फुले ने वर्ण-व्यवस्था के वंचित शूद्र-अतिशूद्रों को ‘बहुजन वर्ग’ के रूप में जोड़ने की संकल्पना की, जिसे 20वीं सदी में मान्यवर कांशीराम ने बहुजन-समाज का एक स्वरूप प्रदान किया. बहरहाल प्राचीन काल में शुरू हुए ‘देवासुर –संग्राम’ से लेकर आज तक बहुजनों की ओर से जो संग्राम चलाये गए हैं, उसका प्रधान लक्ष्य शक्ति के स्रोतों में बहुजनों की वाजिब हिस्सेदारी रही है.

वर्णवादी-आरक्षण का टूटना

वर्ग संघर्ष में यही लक्ष्य दुनिया के दूसरे शोषित-वंचित समुदायों का भी रहा है. भारत के मध्य युग में जहां संत रैदास, कबीर, चोखामेला, तुकाराम इत्यादि संतों ने तो आधुनिक भारत में इस संघर्ष को नेतृत्व दिया फुले, शाहू जी, पेरियार, नारायणा गुरु, संत गाडगे और सर्वोपरी उस आंबेडकर ने, जिनके प्रयासों से वर्णवादी-आरक्षण टूटा और संविधान में आधुनिक आरक्षण का प्रावधान संयोजित हुआ. इसके फलस्वरूप सदियों से बंद शक्ति के स्रोत सर्वस्वहांराओं (एससी/ एसटी) के लिए खुल गए.

मंडल उत्तर काल में वर्ग-संघर्ष का अभीष्ट!

हजारों साल से भारत के विशेषाधिकार युक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज: दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर. मंडलवादी आरक्षण ने परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित एवं राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया. मंडलवादी आरक्षण से हुई इस क्षति की भरपाई ही दरअसल मंडल उत्तरकाल में सुविधाभोगी वर्ग के संघर्ष का प्रधान लक्ष्य था. कहना न होगा कि 24 जुलाई, 1991 को गृहित नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर भारत के शासक वर्ग ने, जो विशेषाधिकार युक्त सुविधाभोगी वर्ग से रहे, मंडल से हुई क्षति का भरपाई कर लिया. मंडलवादी आरक्षण लागू होते समय कोई कल्पना नहीं कर सकता था, पर यह अप्रिय सचाई है कि आज की तारीख में हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग का धन-दौलत सहित राज-सत्ता, धर्म-सत्ता, ज्ञान-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो गया है, जिसमें पी. वी. नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह की विराट भूमिका रही. किन्तु इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ववर्तियों को मीलों पीछे छोड़ दिया है. इनके ही राजत्व में मंडल से हुई क्षति की कल्पनातीत रूप से हुई भरपाई.

सबसे बड़ी बात तो यह हुई है कि जो आरक्षण आरक्षित वर्गों, विशेषकर दलितों के धनार्जन का एकमात्र स्रोत था, वह मोदी राज में लगभग शेष कर दिया गया है, जिससे वे बड़ी तेजी से विशुद्ध गुलाम में तब्दील होने जा रहे हैं. आरक्षण पर संघर्ष के इतिहास में आज के लोकतांत्रिक युग में परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग की इससे बड़ी विजय और क्या हो सकती है!

मोदी-राज के स्लॉग ओवर के  दो छक्के: सवर्ण और विभागवार- आरक्षण !

बहरहाल जो मोदी खुद को नीची जाति का बताते हुए अच्छे दिन लाने; प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 100 दिन के अन्दर 15 लाख जमा कराने तथा तथा युवाओं को हर साल दो करोड़ नौकरी सुलभ कराने जैसे जैसे अभूतपूर्व लोक-लुभावन चुनावी वादे के साथ सत्ता में आये. किन्तु उनके सत्ता में आने के डेढ़ दो साल बाद ही उनके मंत्रिमंडल के कुछ जिम्मेवार लोगों ने बता दिया कि प्रत्येक के खाते में 15 लाख जमा कराने, प्रत्येक वर्ष दो करोड़ नौकरियां देने और अच्छे दिन लाने का वादा महज चुनावी जुमला था.

अब जहाँ तक नीची जाति का सवाल है, मोदी ने जिस तरह के फैसले लेने शुरू किये, उससे साफ़ होते गया कि उनका खुद को नीची जाति बताना भी जुमला ही था. मूलतः वह उस संघ के एकनिष्ठ सेवक हैं, जिस संघ का प्रधान लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों का हित-पोषण है एवं जो पूना पैक्ट के ज़माने ही आरक्षण का विरोधी रहा तथा जिसके पहले स्वयंसेवी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आरक्षण के खात्मे की संघ की योजना को मूर्त रूप देने के लिए उन लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औने-पौने दामों में बेचने जैसा देश-विरोधी काम अंजाम दिया था, जो देश की आन-बान-शान तथा दलित, आदिवासी पिछड़ों को आरक्षण सुलभ कराने के जरिया रहे.

देश प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के कुछेक अन्तराल बाद ही उनकी सवर्णपरस्त नीतियों से यह साफ़ हो गया कि संघ के हिडेन एजंडे (छुपेकार्यक्रम को पूरा करने के लिए वह आरक्षण के खात्मे तथा सवर्णों वर्चस्व को नए सिरे स्थापित करने में सर्वशक्ति लगायेंगे और वैसा किया भी.

भाजपा-मोदी राज में आरक्षण और बहुजन हित

विगत साढ़े चार वर्षों में आरक्षण के खात्मे तथा बहुसंख्य लोगों की खुशिया छीनने की रणनीति के तहत ही मोदी राज में श्रम कानूनों को निरंतर कमजोर करने के साथ ही नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, शक्तिहीन बहुजनों को शोषण-वंचना के दलदल में फंसानें का काम जोर-शोर से हुआ. बहुसंख्य वंचित वर्ग को आरक्षण से महरूम करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों इत्यादि को निजीक्षेत्र में देने की शुरुआत हुई. आरक्षण के खात्मे के योजना के तहत ही सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी दी गयी. आरक्षित वर्ग के लोगों को बदहाल बनाने के लिए ही 62 यूनिवर्सिटियों को स्वायतता प्रदान करने के साथ –साथ ऐसी व्यवस्था कर दी गयी जिससे कि आरक्षित वर्ग, खासकर एससी/एसटी के लोगों का विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्ति पाना एक सपना बन गया. कुल मिलाकर जो सरकारी नौकरियां वंचित वर्गों के धनार्जन का प्रधान आधार थीं, मोदीराज में उसके स्रोत आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया. इस आशय की घोषणा 5 अगस्त, 2018 को खुद मोदी सर्कार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने कर दिया.उन्होंने उस दिन कहा, “सरकारी नौकरिया ख़त्म हो चुकी है लिहाजा आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है”.

बहरहाल जिस मोदी राज में आरक्षण को निरर्थक बना दिया गया, उसी मोदीराज के स्लॉग ओवर में संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए 7-22 जनवरी,2019 के मध्य दो ऐसे काम हुए जिससे भारत के वर्ग संघर्ष के इतिहास में कुछ नए अध्याय जुड़ गए.

पहला, जिस सवर्ण आरक्षण को कभी संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया था कि चूंकि आरक्षण का आधार निर्धनता नहीं, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, अतः गरीब सवर्णों के लिए उठती आरक्षण की मांग पर स्वीकृति दर्ज कराने की कोई युक्ति नहीं है, उसे  मोदी ने संविधान की धज्जियां विखेरते हुए महज दो दिनों में संसद में पास करा लिया. दूसरा, 9 जनवरी, 2019 को संविधान संशोधन के जरिये पारित सवर्ण आरक्षण के विस्मय से राष्ट्र उबर भी नहीं था कि 22 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने समग्र विश्वविद्यालय की जगह विभाग को इकाई मानने के इलाहबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर मोहर लगा दिया.

अपडेट: 27 फ़रवरी, 219 को सुप्रीम कोर्ट ने 13 पॉइंट विभागवार आरक्षण पर यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी/ UGC) और भारत सरकार के पुनर्विचार अर्जी को भी ख़ारिज कर दिया- संपादक

बहरहाल 7-22 जनवरी, 2019 के मध्य मोदी राज में लागू सवर्ण और विभागवार आरक्षण का योग्य जवाब देने की तैयारी में जब बहुजन समाज व्यस्त था, 20 फ़रवरी, 2019  को सुप्रीम कोर्ट में दस लाख आदिवासी परिवारी को जंगल से से खदेड़ने का आदेश जारी कर दिया, इससे लगभग 40 लाख आदिवासीयों के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है. ऐसा करके मोदी राज में वर्ग संघर्ष को शिखर पर पहुंचा दिया गया है.

इन्हीं हालातों में दुनिया के तमाम देशो में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए !

आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के सवर्णों जैसा शक्ति के स्रोतों पर पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है. आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमे 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्हीं के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्हीं की है. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है. मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन, प्रशासन, उद्योग, व्यापार, फिल्म, मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है. आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में परम्परागत विशेषाधिकार युक्त व सुविधाभोगी वर्ग का ऐसा दबदबा नहीं है. इस दबदबे ने बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसा विकट हालात पैदा कर दिया है, ऐसे से ही हालातों में दुनिया के कई देशों में शासक और गुलाम वर्ग पैदा हुए: ऐसी ही परिस्थितियों में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए.

काबिले गौर है कि शासक और गुलाम के बीच मूल पार्थक्य शक्ति के स्रोतों  (आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक) पर कब्जे में निहित रहता है. गुलाम वे हैं जो शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रहते हैं, जबकि शासक वे होते हैं, जिनका शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार रहता है. तमाम उपनिवेशों के मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में शक्ति के स्रोतों पर शासकों का एकाधिकार रहा है.

अगर शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिया होता, दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होता. शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार रहने के कारण ही भारतवासियों को स्वाधीनता संग्राम का आन्दोलन संगठित करना पड़ा.

ऐसे ही हालातों में दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासी कालों को शक्ति के स्रोतों पर 80-90%  कब्ज़ा जमाये अल्पजन गोरों के खिलाफ कठोर संग्राम चलाना पड़ा. अमेरिका का जो स्वाधीनता संग्राम सारी दुनिया के लिए स्वाधीनता संग्रामियों के लिए एक मॉडल बना, उसके भी पीछे लगभग वही हालत रहे.

ऐसे में आज यदि भारत पर नजर दौड़ाई जाय तो पता चलेगा कि मंडल उत्तर काल में जो स्थितियां और परिस्थितियां बन या बनाई गयी हैं, उसमें मूलनिवासी बहुजन समाज के समक्ष एक नया स्वाधीनता संग्राम संगठित करने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बचा है.

सर्वव्यापी आरक्षण के जोर से ही भारतीय शासको के खिलाफ लड़ी जा सकती है: गुलामी से मुक्ति की लड़ाई!

स्मरण रहे दुनिया में जहां- जहां भी गुलामों ने शासकों के खिलाफ खिलाफ मुक्ति की लड़ाई लड़ी, उसकी शुरुआत आरक्षण से हुयी.

आरक्षण का उदेश्य क्या है?

काबिलेगौर है कि आरक्षण और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों से जबरन दूर धकेले गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन  हिस्सेदारी दिलाने का माध्यम है. आरक्षण से स्वाधीनता की लड़ाई का सबसे उज्ज्वल मिसाल भारत का स्वाधीनता संग्राम है.

भारत में आरक्षण की मांग का इतिहास

अंग्रेजी शासन में शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार दौर में भारत के प्रभुवर्ग के लड़ाई की शुरुआत आरक्षण की विनम्र मांग से हुई. तब उनकी निरंतर विनम्र मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने सबसे पहले 1892 में पब्लिक सर्विस कमीशन की द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में 941 पदों में 158 पद भारतीयों के लिए आरक्षित किया.

एक बार आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखने के बाद सन 1900 में पीडब्ल्यूडी, रेलवे, टेलीग्राम, चुंगी आदि विभागों के उच्च पदों पर भारतीयों को नहीं रखे जाने के फैसले की कड़ी निंदा की. कांग्रेस तब आज के बहुजनों की भांति निजी कंपनियों में भारतीयों के लिए आरक्षण का आन्दोलन चलाया था. हिन्दुस्तान मिलों के घोषणा पत्रक में उल्लेख किया गया था कि ऑडिटर, वकील, खरीदने-बेचने वाले दलाल आदि भारतीय ही रखे जाएँ. तब उनकी योग्यता का आधार केवल हिन्दुस्तानी होना था, परीक्षा में कम ज्यादा नंबर लाना नहीं.बहरहाल आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखते-चखते ही शक्ति के स्रोतों पर सम्पूर्ण एकाधिकार के लिए देश के सवर्णों ने पूर्ण स्वाधीनता का आन्दोलन छेड़ा और लम्बे समय तक संघर्ष चलाकर अंग्रेजो की जगह काबिज होने में सफल हो गए.

अफ्रीका का उदहारण और भारत

ऐसा दक्षिण अफ्रीका में हुआ, जहां गोरों को हटाकर मूलनिवासी कालों ने शक्ति के समस्त स्रोतों पर कब्ज़ा जमा लिया और आज वे गोरों को प्रत्येक क्षेत्र में उनके संख्यानुपात 9-10 % पर सिमटने के लिए बाध्य कर दिए हैं. इससे गोरे वहां से पलायन करने लगे है.

बहरहाल इतिहास की धारा में बहते हुए मूलनिवासी एससी, एसटी, ओबीसी और इनसे धर्मान्तरित तबके के लोग भी आरक्षण के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, किन्तु वह लड़ाई अपने-अपने सेक्टर में आरक्षण बचाने; निजीक्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण बढ़ाने की लड़ाई तक सीमित है.यदि बहुजनों को देश के सुविधाभोगी वर्ग की गुलामी से मुक्ति पानी है,जैसे हिन्दुस्तानियों ने अंग्रेजों से पाया; यदि उन्हें वर्ग संघर्ष में हारी हुई बाजी पलटनी है तो उन्हें आरक्षण की लड़ाई को सर्वव्यापी आरक्षण तक विस्तार देना होगा.भारी राहत की बात है कि सवर्ण आरक्षण बिल पारित होने के बाद वर्षों से आरक्षण की सीमित लड़ाई तक व्यस्त रहने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ता, नेता, छात्र और गुरुजनों में आरक्षण बढ़ाने की लड़ाई में उतरने की मानसिकता विकसित हुई है. वे मांग कर रहे हैं कि आरक्षण का दायरा 100%  करके विभिन्न सामाजिक समूहों की संख्यानुपात में बंटवारा कर दिया जाय.

गुलामी से मुक्ति और वर्ग संघर्ष में हारी बाजी पलटने के लिए : बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का दस सूत्रीय एजेंडा!

बहरहाल मूलनिवासी एससी, एसटी, ओबीसी और इनसे धर्मातरित तबकों के लोग अगर यह महसूस करते हैं कि आरक्षण के विस्तार की लड़ाई लड़कर ही बहुजनों को गुलामी से मुक्ति दिलाया और वर्ग संघर्ष में हारी बाजी पलटा जा सकता है तो इस लक्ष्य को साधने के लिए अमेरिकी और दक्षिण अफ़्रीकी मॉडल की सर्वव्यापी आरक्षण से प्रेरित ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ का भारत के प्रमुख सामाजों- सवर्ण, ओबीसी, एससी/ एसटी और इनसे  धर्मान्तरित अल्पसंख्यकों- के स्त्री पुरूषों के मध्य संख्यानुपात में शक्ति के स्रोतों के बंटवारे के निम्न दस सूत्रीय एजेंडे पर लड़ाई लड़ने से बेहतर कुछ हो सी नहीं सकता!

1 सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों अर्थात पौरोहित्य.

2 सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप.

3 सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी.

4 सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन.

5 सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों. विश्वविद्यालयों, तकनीकि, व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन,प्रवेश व अध्यापन.

6 सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों,उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि.

7 देश –विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को दी जानेवाली धनराशि.

8 प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मिडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों.

9 रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो. एवं

10 ग्राम-पंचायत,शहरी निकाय, संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि.

संख्यानुपात में आरक्षण की लड़ाई लड़नी होगी: अवसरों और संसाधनों पर मूलनिवासियों का  पहला हक़ की लड़ाई.

“अवसरों और संसाधनों पर मुलनिवासियीं पर पहला” पर विस्तृत लेख
देश के संसाधनों और अवसरों पर पहला हक़ मूलनिवासी शोषित वंचित वर्गों का है! -एच. एल. दुसाध” यहाँ पढ़ें –

इसमें कोई शक नहीं कि उपरोक्त क्षेत्रों में संख्यानुपात में बंटवारे के आधार पर मूलनिवासी नेता, एक्टिविस्ट, छात्र-गुरुजन और बुद्धिजीवी आगे की लड़ाई लड़ते हैं तो शासक दल जितना भी देव और देश-भक्ति की लहर पैदा करे; जितना भी समाज को बांटने की साजिश करे मूलनिवासी बहुजन समाज दक्षिण अफ़्रीकी मूल निवासियों का इतिहास भारत में दोहराकर शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारे का काम अंजाम दे सकता है. कारण उपरोक्त क्षेत्रों के संख्यानुपात में बंटवारे से सामाजिक न्याय की लड़ाई के एजेंडे को इतना विस्तार मिल जायेगा कि कुशल वक्ता-प्रवक्ता औए नेताओं से लैस तथा मीडिया, लेखकों, साधु–संतों और धन्नासेठों के भरपूर समर्थन से पुष्ट होकर भी शासक दल हारने के लिए विवश रहेंगे, ऐसा मंडल उत्तरकाल का इतिहास बता बताता है.

लेकिन मूलनिवासी समाज अगर संख्यानुपात में बटवारे की लड़ाई में कामयाब हो भी जाय तो भी उसका सुफल तब तक नहीं मिल सकता, जबतक उस 13 प्वाइंट रोस्टर को, जो कल उच्च शिक्षा से आगे बढ़कर प्रत्येक क्षेत्र में ही लागू हो सकता है, रिवर्स (उलटने) की लड़ाई नहीं जीत लेते. 13 प्वाइंट रोस्टर को उलटने पर नियुक्तियों में चौथा, सातवां और चौदहवां पद ही सवर्णों को मिलेगा. इस क्रम में सवर्णों को अवसर मिलने से ही समतामूलक समाज की स्थापना तथा मूलनिवासियों की मुक्ति का काम पूरा हो सकता है. इसके लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण के साथ अवसरों और संसाधनों पर पहला हक़ मूलनिवासी एसटी,एससी और ओबीसी की मांग जोर- शोर से निरंतर उठानी पड़ेगी.     

निवेदक: एच. एल. दुसाध, संस्थापक अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशनन, दिल्ली