आज 15 मार्च, 2019 को मान्यवर कांशीराम साहब के जन्मदिवस पर मंगलकामनाये प्रेषित करते हुए अपनी बात रखने की शुरुआत उन्ही के द्वारा कही गई बातों से कर रहा हूं, मान्यवर कांशीराम साहब ने कहा था कि जिस दिन भारत का मनुवादी समाज अपने जन्मजात मनुवादी अधिकारों की लड़ाई हेतु आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरेगा उस दिन समझ लेना बहुजन आंदोलन सही दिशा में चल रहा है। मान्यवर काशीराम साहब ने ऐसा क्यों कहा होगा और इसका BHU के मनुवादी आंदोलन से क्या लेना देना है?

मैं अपनी बातों की बिंदुवार रख रहा हूं कि ऐसा क्यों?

BHU के सवर्ण मनुवादियों का सड़क पर उतरना इस बात का परिणाम है कि, BHU के बहुजन समाज और अन्य न्यायप्रिय साथियों ने अपने आंदोलन की सफलता से यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु और संख्या के आधार पर भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु मनुवादी रूढ़ि व अन्यायी सत्ता को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर सकते है। जिससे सवर्ण समाज के मनुवादी लोगों द्वारा देश की संपत्ति पर स्थापित एकाधिकार को चुनौती मिली है।

उनकी यह बेचैनी कि मनुवादी अल्पसंख्यको को अब तक दबाये गए संसाधनो को संवैधानिक तरीके से साझा करना पड़ेगा। भले ही यह आरम्भिक तौर पर कम हो लेकिन बहुजनों के आंदोलन से बढ़ता जाएगा। ये बहुत बड़ी वजह और चिंता है जो सवर्ण समाज के मनुवादियों को आंदोलन हेतु प्रेरित कर रही है।

इस प्रकार के आंदोलन के उभार का दूसरा पक्ष यह है कि जब मनुवादी पार्टियां उनके हजारों सालों के पारंपरिक गैर संवैधानिक अधिकारों को बचाये रखने में सक्षम नही है तो वे भाजपा और कांग्रेस को क्यों वोट करे? उनके अंदर स्वतंत्र राजनैतिक चेतना जन्म ले रही है जो कि मनुवादी सवर्णो को एक स्वतंत्र वोट बैंक बना सके जो किसी भी सत्ता को अपनी मांगे मनवाने में सक्षम हो न कि भाजपा व कांग्रेस की तरह बहुजनों के सतत आंदोलन के दबाव में आकर उनके संवैधानिक अधिकार देने को मजबूर हो। यह सवर्णो में मनुवादी अस्मिता व स्वाभिमान का राजनैतिक उभार भी है।

मनुवादी सवर्णो के आंदोलन का एक पक्ष यह भी है कि क्या सरकारी नौकरियों में सवर्णो की सभी जातियों को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मिल पा रहा है या नही? या फिर अधिकांश सवर्ण जातियों को मुगालते में रखकर 50.5% हिस्सेदारी का फायदा केवल एक दो जातियां ही उठा रही है और अन्य सवर्ण जातियां मूकदर्शक मात्र हैं।

BHU में मनुवादी सवर्णो के आंदोलन से तथाकथित सामाजिक न्याय की बात करने वाले सवर्णो का गैर संवैधानिक मनुवादी पक्ष स्पष्ट हो जाएगा जिससे ऐसे लोग जो अब तक भ्रम में थे कि मनुवादी सवर्ण जो विभिन्न शैक्षिक व सामाजिक संवादों में न्याय व बराबरी की बात करते है वास्तविकता में उनकी नजर में इसका अर्थ क्या है और क्या वे SC, ST और OBC को उनका अधिकार देने के लिए कितना तैयार है। हम सभी जानते है कि विभागवार आरक्षण की स्थिति में SC, ST और OBC का प्रतिनिधित्व नगण्य हो जाता है।

BHU में बहुजनों के द्वारा संवैधानिक प्रतिनिधत्व 49.5% को हासिल करने के लिए चलाये गए आंदोलन में जो लोग मनुवादी सवर्णो के दबाव में हिस्सा नही लेते थे, क्या वे अब सारी स्थितियों के स्पष्ट हो जाने पर मनुवादी सवर्णो के रुख को जानने के बाद अपने अधिकारों के लड़ाई के लिए प्रतिबद्ध होंगे या फिर मनुवादी दासता को स्वीकार करते हुए घुटने टेक देंगे।

यह आंदोलन मनुवादी न्याय और संवैधानिक न्याय के समर्थकों के चेहरे स्पष्ट कर देगा कौन किस तरफ है और SC, ST, OBC में कितने विभीषण है जो अपने अधिकार की बलि चढ़ाकर संघ पोषित ज्ञान में डूबकर अपनी अस्मिता और स्वाभिमान मनुवादी सवर्णो के चरणों मे रख देंगे।

इन बिंदुओं में उल्लेखित बातों से यह स्पष्ट होता है कि मान्यवर कांशीराम साहब का यह कहना कि मनुवादी सवर्णों का आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरना बहुजन कारवां की जीत है, क्योंकि यह शोषक और शोषित के चेहरे को स्पष्ट कर देता है.

भ्रम में रहने वालों को यथास्थिति का ज्ञान कराता है कि SC, ST और OBC को अपने अधिकारों की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी और मनुवादी सवर्णों के चेहरे लगा सामाजिक न्याय का पाखण्डी नकाब हट जाता है। अब ये सीधी संवैधानिक लड़ाई है। आप अपना पक्ष तय करो आप किधर हो?