भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रकृति की सुंदरता से लेकर ढेरो कलाकृतियों का पूरा वास है, ढेर सारी भाषायें यहाँ की पहचान है. यहाँ अलग-अलग संस्कृतियाँ, ढेरो भरपूर तीज-त्यौहार आदि. आपको सालों भर कोई न कोई त्यौहार व ख़ुशी का अपना ही पैगाम देते मिलते हैं.

इन्ही ढेरों त्योहारों के बीच में एक त्यौहार है होली का, जिसे कि पूरा किया जाता है एक वाक्य में ‘होली: रंगों का त्यौहार’. मैं कई कैलेंडर तक उठा कर देखी हूँ, जहाँ पर होली सिर्फ रंग और प्रेम के त्यौहार के रूप में ही परिभाषित किया जाता है. होली कई दूसरे देशो में भी मनाई जाती है, लेकिन मैं इसे बस रंगों के या अबीर गुलाल से एक प्रेम व सौहार्दपूर्ण बनाने का त्यौहार भर समझ पायी हूँ.

पिछले दिन लगातार कई बार ‘होली रंगों का त्यौहार’ देखते-देखते ही मेरा ध्यान गया कि यदि यह त्यौहार रंगों का ही है, तो फिर इसमें होलिका दहन का क्या साक्ष्य है?

रंगों के बीच मे होलिका दहन कहाँ से आ गया? किसी की मृत्यु को बढ़िया ढंग से जश्न के रूप में बनाया जा रहा है. सदियों से यह सवाल, और इस त्यौहार का मतलब मुझे बार-बार सोचने पर मजबूर कर दिया है.

उत्तर प्रदेश में होलिका दहन, फोटो: द नेशनल प्रेस, 01.03.2018, सर्वाधिकार सुरक्षित

अगर पुराण आदि की बात की जाए तो इस त्यौहार से जुड़े एक नहीं हमारे सामने कई ढेर सारी कहानियों का लेखा-जोखा है, जिनमे से कुछ इस प्रकार हैं-

पहली प्रचलित कथा

सबसे बड़ी और प्रचलित कहानी है, असुर राजा हिरणकश्यप की, जो कि एक राजा हुआ करता था. अपने राज में उसने ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या की थी. इससे खुश होकर भगवान ब्रह्मा ने हिरण्यकश्यप को वरदान भी दिया था. जिसके अनुसार उसे न कोई स्त्री, न कोई पुरुष, न कोई पशु, न कोई पक्षी, न दिन में, न रात में कोई मार सकता था.

वरदान प्राप्त करने के बाद हिरणकश्यप ने अहंकार में आकर भगवान विष्णु के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. वह तीनो संसारो का स्वामी बनने का ख्वाब देखने लगा.

पुराणों के अनुसार हिरणकश्यप पत्नी भी थी, जिसका नाम कयाधु था. कयाधु बड़े भक्ति भाव से भगवान विष्णु की पूजा अर्चना किया करती थी. कयाधु का विष्णु को पूजना हिरणकश्यप को कदापि पसंद नहीं था. फिर भी वो अपने परिवार व पति के खिलाफ जाकर विष्णु भक्ति में लीन रही, इसी बीच वो गर्भवती हुई, और कुछ समय पश्चात उसने एक पुत्र को जन्म दिया जिसके नाम रखा गया प्रहलाद.

हिरण्यकश्यप की एक बहन भी थी, जिसका नाम होलिका था. होलिका को यह वरदान था कि कोई भी अग्नि, किसी भी प्रकार की अग्नि, उस पर कोई भी असर या नुकसान नहीं कर सकती है.

बात अगर होलिका के वरदान की करूँ तो मुझे समझ में नही आया और न ही जानकारी है कि आखिर होलिका को अग्नि से बेअसर होने का वरदान किसने दिया?

इसी वरदान के साथ एक दिन भरी सभा मे हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद को मारने हेतु जब असफल रहा तो उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, ताकि प्रह्लाद अग्नि में जल कर मर जाये.

परन्तु जब होलिका प्रह्लाद को अपनी गोदी में लेकर बैठी और जैसे ही आग लगाईं गई, अग्नि की लपटें उस पर हावी हो गयी और होलिका वहीँ जलकर मर गयी, और प्रहलाद सही सलामत बच गया.

तब से आज तक होलिका दहन नामक प्रथा चली आ रही है.

(एडिटर का नोट: यह भी विचारणीय है कि पूरी कोशिश प्रह्लाद को मारने की थी तो, त्यौहार के रूप में होलिका दहन क्यों किया जाता है? प्रह्लाद दहन क्यों नहीं? इससे इस विचार को बल मिलता है कि सारी साजिश केवल होलिका को जलाकर मारने की थी.)

दूसरी कथा

दूसरी कथा भगवान शिव व माँ पार्वती की है. अपनी साधना में लीन भगवान शिव का ध्यान जब माँ पार्वती अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाई तो प्रेम के देवता काम व उनकी पत्नी रति को पार्वती ने बुलाया.

पार्वती के कहे अनुसार ही काम ने प्रेम रूपी बाण भगवान शिव पर चलाया ताकि बसंत ऋतु में वे भी माँ पार्वती के साथ समय बिता सके.  जैसे ही भगवान शिव की तपस्या टूटी तो गुस्से में आकर उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था.

मैं यहाँ पूछना चाहूँगी कि पहली कथा और यह दूसरी कथा भी पौराणिक ही है, तो क्या कामदेव के भस्म होने का त्यौहार भी कहीं मनाया जाता है?

क्या कामदेव ने परम पूज्य भगवान शिव का ध्यान भंग नहीं किया था? भगवान का तपस्या भंग करना अपराध है, पाप है तो क्यों नहीं हर साल, हर जगह काम देव को जलाया जाता है?

तीसरी कथा

तीसरी कथा भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम पर आधारित है, जहाँ पूरे बृजवासी राधे कृष्ण के प्रेम सौहार्द को हर्षोल्लास से 15-16 दिनों तक बनाते हैं. अबीर गुलाल व फूलों से आपस मे प्रेम से खेलते हैं.

मेरी जानकारी में यह तीनो कथाएँ, मुख्य पौराणिक कथाएँ हैं.

पुराणों के बाद, अब अगर इतिहास की बात की जाए तो किसी भी औरत जो जलाने का इतिहास हमारे सामने मौजूद है. इतिहास हमें कई चीजें दिखाता, सिखाता, और समझाता है. इतिहास को अंग्रेजी में हिस्ट्री (History) भी कहा जाता है. क्या इतिहास या History में महिलाओं को बराबर का ही दर्जा दिया गया? है? क्या यह History न बनकर “he story” या “his story” नहीं बन गया है? जहाँ केवल पुरुषो के ही गुणगान के अलावा हमें लड़कियों/ महिलाओं/ स्त्रियों के बारे में कुछ (ज्यादा) नहीं मिलता है.

खैर, इतिहास में भी हमारे समक्ष यह बिंदु हैं-

पहला, सती प्रथा

सती प्रथा, जिसमें विवाहित हिन्दू महिला अपने पति की मृत्यु उपरांत उसकी चिता में जिंदा बैठ कर खुद को काल के मुख में समर्पित कर देती है. लगभग आज़ादी तक यह प्रथा चली थी, और कई राज्यो में आज भी एक दो जगह यह प्रथा निभाई जा रही है. क्या पुरुषों को ऐसी किसी प्रथा का हिस्सा कभी भी बनाया गया? क्या वो कभी विदुर नही हुए?

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दूसरा, जौहर प्रथा

जौहर प्रथा में, तथाकथित उच्च हिन्दू जाति की विवाहित राजपूत महिलाएं एक समूह में खतरा देख खुद को अग्नि को समर्पित कर देती थी. इसके अलावा जब उनके पति कोई भी युद्ध मे या कहीं पर भी हार जाते थे, या उनकी शहादत हो जाती थी तो वे महिलाएँ अपनी इज़्ज़त-आबरू बचाने के लिए, समूह में खुद को अग्नि में जला कर मार देती थी.

तीसरा, बाल विवाह प्रथा

यह प्रथा जलाने की नहीं, वरन बाल विवाह की रही है. इसमें भी यह था कि एक छोटी सी बच्ची का भी विवाह बचपन मे ही कर दिया जाता था.

ऊपर कही तीनों ही प्रथाएँ हमारे समाज का हिस्सा रही है. राजा राम मोहन राय के अथक प्रयासों से ये कुप्रथाएँ हमारे समाज से समाप्त हो सकी है. वह भी ढेर सारी मुसीबतों के बाद.

इन तीनों प्रथाओँ में महिलाओं का कितना शोषण हुआ है, हम और आप सोच भी नही सकते.  

ऊपर वर्णित चाहे पौराणिक कथाएँ हों या ज़मीनी हकीकत, दोनो ही जगह महिलाओं का स्थान आप और हम सोच सकते हैं.

अगर हम होली की बात करें तो, कई जगह यह त्यौहार फसल कटने और फसल पकने के नाम से भी बनाया जाता है. जहाँ किसान अपने परिवार समेत ढेर खुशियों के बीच अपनी मेहनत स्वरूप लहराती फसल पकने की खुशी में नए कपडे, पकवान आदि बना कर हर्षोल्लास से यह त्यौहार मानते हैं. फसल पकने के इस त्यौहार में किसी को जलाने का कोई भी प्रावधान नहीं है.

अब अगर हम आज के परिप्रेक्ष्य देखते हैं तो पाएंगे कि इस “होलिका पूजन” के नाम पर आज भी खुद महिलाएँ ही खुद को सुसज्जित कर नए वस्त्र ओढ़-पहन कर, पकवान बनाती हैं, चूडियों को पहना जाता है, मेहंदी और ढेर-ढेर तरीके से श्रृंगार कर होलिका को पूजने जाती हैं. वहाँ पूजन सामग्री में भी होलिका के पुतले को हल्दी लगाती हैं, चूडियों, सिंदूर आदि से पूजा-अर्चना करती हैं.

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात यह है कि, किसी भी लड़की/ महिला को हल्दी कब लगायी जाती है? ध्यान दीजिए, चौराहों पर, सड़को के बीचों बीच होलिका पूजन को जाती हैं. होलिका को हल्दी लगाई जाती है. चूड़ियाँ, सिंदूर चढ़ाया जाता है.

एक बात और सोची जा सकती है कि अगर होलिका एक असुर राजा की बहन थी. स्वाभाविक तौर पर एक राजा की बहन होने के नाते, क्या वह कहीँ भी, अपनी सेवीकाओ के साथ मिलती है?

दूसरी ओर, हर असुर राजा के पास मंदिर, मढ़ व निजी स्थल जरूर रहा था. आखिर होलिका एक राजा की बहन थी. उसके लिए रास्ते, मोहल्ले, गली, सड़क… की चौराहे ही क्यों? वह भी अकेले! दिन भर औरते उसे सजाती सवारती, पूजा आदि करती हैं, हल्दी लगाती है, वह भी चौराहे पर! होलिका के लिए एक मंदिर छोड़िए, क्या एक चारदीवारी भी मुमकिन नहीं है? क्या किसी भी महिला को चौराहे पर खड़ा करना किसी भी दृष्टिकोण से शोभनीय है?

अगली बात कि, दिन भर महिलाओं के द्वारा होलिका को पूजा जाता है और देर रात्रि में कोई भी पुरूष उसके पुतले में आग लगा कर चला जाता है. और अगले दिन हमारे सामने केवल होलिका की जली हुई राख ही रह जाती है.

यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि दिन को महिलाएँ, होलिका को हल्दी, चूड़ी, सिंदूर नए वस्त्र से सजाया सवाँरा जाता है और रात में पुरुष उसमें आग लगा देता है.

यह भी ध्यान दीजिए कि हिन्दू सामाजिक पद्धति में लाश या सती जलाने के स्थल पर महिलाओँ को जाने की अनुमति नहीं थी.

अब अगर यह बात पुराणों पर लागू करे तो मेरा सवाल है, कि जो भी पुरुष होलिका को जलाया होगा, इस बात के क्या साक्ष्य है कि वो उसके साथ किसी भी तरह का कोई  व्यवहारहीनता न किया होगा? जब चौराहों के बीचों बीच सजा सांवरा कर उसे खड़ा किया गया होगा तो क्या किसी पुरुष की नज़रो से वो बच पायी होगी?

अकेली होलिका को ढेर पुरुषों को सौंपने के बाद हम क्या सोच सकते हैं कि रात को उन्होंने उसके साथ क्या कुछ गलत न किया होगा?

Ambience Mall Vasant Kunj, New Delhi, Photo: The National Press. 16.03.2019. All Rights Reserved

होलिका एक असुर राजा हिरण्यकश्यप की बहन थी. क्या एक राजा की बहन के पास एक भी सेविका, आदि क्यों नही थी? ध्यान दीजिए, रावण का पुतला भी अकेले खड़ा नहीं किया जाता है. क्या यह जान बूझकर किया गया कार्य नहीं था, कि एक राजा की बहन को दिन भर सजा कर रात में चौराहे पर पुरुषों के लिए यूँ ही खड़ा कर दिया गया?

यहाँ यह भी सोचना प्रासंगिक होगा कि किसी भी महिला को अधिकांशतः कब सजाया जाता है फूलों से? या हल्दी आदि लगाई जाती है?

दूसरे आज तक ज़्यादातर महिलाओं को श्रृंगार या उसके सुसज्जित रूप, पुरूष के समक्ष पेश करने के लिए या उसे रिझाने के किये किया जाता है.

ऐसे में, विवाह में हल्दी लगाकर खूबसूरत से भी ज़्यादा खूबसूरत दुल्हन बनने/ बनाने का मतलब की क्या रह जाता है? दुल्हन बन, खूबसूरत बन अपने पति के समक्ष महिलाओं को जो लाया जाता है, उसका क्या तात्पर्य है?

अगर हम बात करे दूसरे परिपेक्ष में, तो होलिका को राजा की बहन होने के साथ ही अग्नि को विजयी करने या अग्नि से नुकसान नहीं होने का वरदान था.

क्या वो वरदान उसे झूठा नही दिया गया था?

उत्तर प्रदेश में होलिका दहन, फोटो: द नेशनल प्रेस, 20.03.2019, सर्वाधिकार सुरक्षित

वो कौन थे, जिन्होंने होलिका को वो वरदान भी दिया, और वो झूठ भी निकला, या झूठा वरदान दिया. क्या यह होलिका के साथ कोई धोखा नहीं हुआ?

आज तक देव से लेकर दानव तक को मिले हुए कोई भी वरदान झूठे नही रहे, फिर होलिका का वरदान कैसे झूठा हो गया? कैसे उसके साथ धोखा हुआ?

यहाँ मैं यह सवाल भी पूछ्ना चाहूंगी कि आज तक जितनी भी महिलाओं को सच्चाई या पुराणों में जो भी वरदान मिले हैं, उनमें से कितनी ऐसी रही जो उन वरदानों को अपने लिए, खुद की आबरु बचाने, खुद के अस्तित्व बचाने के किये इस्तेमाल की???

हाँ यदि वो वरदान किसी भी पुरुष के लिए इस्तेमाल में लायी तो ऐसा कोई भी वरदान हम झूठा या धोखा नही पाते हैं.

अगली बात यह कि आज तक कही भी मेरी जानकारी में, होलिका के पति का अस्तित्व नहीं मिल पता हैं, न ही उसपर बहस हुई, न ही कोई गोष्ठी आदि भी रखी गई. क्या होलिका किसी की पत्नी थी?

अगर बात की जाए उसके कंवारेपेन की तो आज भी हम उसके पुतले पर भारतीय हिन्दू विवाहित महिला द्वारा धारण किये गए आभूषण व श्रृंगार की चीज़ें ही ज़्यादा मिलती है- सिंदूर, कांच की चूड़ियां, हल्दी, नथ आदि. यहाँ यह भी देखा जाए कि जो भी महिलाएं होलिका की पूजन करती हैं, ज़्यादातर वो हिन्दू विवाहित, नयी नवेली शादी की हुई होती हैं. आज भी भारतीय हिन्दू समाज में किसी भी शुभ कार्य में विधवा महिला के लिए कोई भी जगह नहीं है. यहाँ तक की उसे किसी भी शुभ कार्य से दूर ही रखा जाता है.  और यदि लड़की/ महिला कंवारेपन में है तो भी उसे लगभग हाशिये पर ही रखा जाता है.

दूसरे यहाँ यह भी देखा जाए कि जितनी भी विवाहित महिलाएं है, वो ज़्यादातर या तो सुहागिन देवी को ही पूजती हैं या फिर विवाहित जोड़े को. अब सवाल यह है कि आखिर होलिका है तो है क्या?

यदि वो कुंवारी है तो फिर उसे सुहागिन वाली चीज़ क्यों दी है? सुहागिनों द्वारा क्यों पूजा की जाती है?

हम क्यों न इन साक्ष्यों के आधार पर मान लेते हैं, कि होलिका एक विवाहित थी. क्या हमारे पास कोई वजह है कि उसे कुंवारी मानी जाए?

अब मूल सवाल आता है, कि यदि होलिका विवाहित ही थी, तो फिर जब उसे भरे दरबार मे जलाकर मरने दिया था तब उसका पति कहाँ था? क्या कर रहा था? क्या वह अपनी पत्नी को बचाने के लिए आया? नहीं आया तो क्यों नहीं आया?

अब हम यहाँ जोड़ते है, कि उसका पति था, और किसी कारण से वह मृत्यु को प्राप्त हो गया होगा, और उसके बाद होलिका की देखभाल न कर पाने की वजह से हिरणकश्यप ने उसे जलाने का जाल ही बुना हो?

धोखे से होलिका को उसके पति की जलती अग्नी में बैठाया गया होगा, और वहीँ वो जल कर मर गई. वरदान का झूठ भी सामने आ गया.

अब यहाँ यह भी सोचा जाए कि सती प्रथा और होलिका दहन में कितनी समानता है?

क्या यह मुमकिन नहीं है, कि सती प्रथा का उदय होलिका दहन से ही हुआ हो?

मेरा यह आंकलन है, कि होलिका को धोखे से, झूठ से, फरेब आदि से, इस पूरे पुरुषों के संसार ने, बेइज़्ज़त कर, जला कर मार डाला, और हर साल उसे त्यौहार के नाम पर नाटक कर चौराहों पर फिर से जलाकर मारने के लिए खड़ा कर दिया जाता है.

भगवान राम ने भी माँ सीता के अपमान का बदला रावण को खत्म कर लिया था. यहाँ यह भी देखा जाए कि राम अपनी पत्नी के साथ थे. यहाँ होलिका अकेली इस पुरूष समाज में है. और अनजाने में हुई विधवा भी है. अजीब विडंबना यह भी है कि होलिका सालों-सदियों पहले जल गई. पर आज भी उसके नाम का पुतला हर साल फूंका जाता है. (यहाँ मैं होलिका दहन के समय वसंत ऋतू का आगमन, नई फूल पत्तियों का उदय, और होलिका के नाम पर अनगिनत लकड़ी पेड़ो के काटने की बात नज़रंदाज़ कर रही हूँ).

पुराणों की भी बात कर ली जाए. होलिका ने ऐसा क्या गलत या गुनाह किया था, कि उसने अपने भतीजे की जान बचा दी, लेकिन उसे खुद जलकर मरना पड़ा. कयाधु (हिरण्यकश्यप की पत्नी) जो उसकी भाभी थी, अपने पति के साथ रहने की बजाए भगवान विष्णु की बात मानती है. पूजा अर्चना करती है. क्या कयाधु विवाह से पहले नही जानती थी कि हिरणकश्यप एक असुर है? (अगर कयाधु असुर नहीं थी. हिरण्कश्यपाय विष्णु को भगवन नहीं मानता था या उसके अधीन रहना उसे पसंद नहीं था, जबकि कयाधु विष्णु को अपना आराध्य मानती थी.) और यदि वह जानते हुए भी उसने हिरण्यकश्यप से विवाह किया तो फिर अपना पत्नी धर्म क्यों नहीं निभाया? पति से शादी के बाद हर हिन्दू माहिला यदि उसकी दुनिया, रीति रिवाजों को अपनाती है तो कयाधु क्यों नहीं अपनाई?

क्या उसका यह फर्ज नहीं बनता था, वह अपने पति के साथ रहे.

विष्णु का चरित्र

दूसरी बात यह कि भगवान विष्णु इस संसार को चलाने का सामर्थ्य रखते हैं, पूरे ब्रह्मांड के रचयिता भी है, तो विष्णु ने क्यों अपने और हिरण्यकश्यप के झगड़े में होलिका को आने दिया? क्या विष्णु  वहाँ अपनी कोई माया नहीं चला सकतें थे?

अब इस बात से यह क्यों न सोचा जाए कि विष्णु भगवान ने एक प्रकार से किसी की बहन की ओर देखा, क्या यह इज़्ज़त वाला कार्य था?

यह सोचनीय है कि पहले विष्णु भगवान कयाधु को अपने वश में करते हैं, उसे उसके पति के खिलाफ कर देते है. और फिर वो होलिका को भी अपने वश में करने की कोशिश किये होंगे, होलिका न कह दी होगी और अपने भाई के साथ अपने परिवार के साथ खड़े होने का फैसला की होगी, चाहे तो राक्षसी थी या देवी, वो अपने परिवार के साथ रही, क्या किसी भी महिला का अपने परिवार के साथ खड़ा होना गुनाह है? या गलत है? पुराणों में न तो उसने कभी भगवान विष्णु के लिए कुछ गलत किया, न ही कभी अपने भाई की आज्ञा का भी उलंघन किया, उसने तो अपने भाई की ही बात मानी थी, तो वो कैसे गलत हुई?

दो महिलाएं, एक जो अपने परिवार के साथ रही, और दूसरी जो अपने परिवार के खिलाफ जाकर भगवान विष्णु के साथ खड़ी हुई कौन गलत रही होगी? क्या इस बात का फैसला किया जा सकता है?

आदम और ईव में भी, ईव ही क्यों चुनी गई शैतान द्वारा ज्ञान का फल खाने के लिए? आखिर क्यों ही हर चीज़ में महिलाओं को ही युद्ध, या किसी भी चीज़ के लिए चुना जाता है? महाभारत तक मे भी द्रौपदी चुनी गई थी- अपमान के लिए, और युद्ध हुआ. इधर रावण ने भी सीता माँ को ही चुना. आखिर क्यों महिलाओं को ही एक वस्तु मान कर चुना जाता है? और आज भी ऐसा किया जाता है, जा रहा है. और उसपर भी हर महिला के साथ हुए गलत कार्य के पीछे भी पुरुष, दूसरी ही महिला को चालाकी से चुनता है. कई कारणों में से एक इन्हीं कारणों से, सती और जौहर जैसी कुप्रथाओं ने जन्म लिया और अच्छे से फली फूली भी. क्या ये सब बिना किसी महिला की सहमति के मुमकिन था?

आखिर क्यों नही पुरुषों के द्वारा गलत किये गए किसी भी कार्य में महिला, महिला का ही पक्ष नहीं रखती? कहीं वो कयाधु बन जाती है, तो कही कुंती कहीं कुछ और.

आज भी महिलाओं ने किसी दूसरी महिला को जलाने के त्यौहार अच्छे से फलने-फूलने में सहयोग किया है. क्या होलिका दहन जैसे ही किसी भी पुरुष के दहन को जमीनी स्तर पर भी लाया गया? (मैं पुरुष को भी जलाने का समर्थन नहीं करती हूँ, बस सवाल रहीं हूँ.) पुरुष मरा तो शहीद, महिला मरी तो उसका पुतला गली-मोहल्ले-चौराहों पर लगा दिया गया. और उसे बार-बार जलाकर जश्न मनाया गया.

विधुर पुरुष को तो किसी भी शुभ कार्य मे बैठने से मना नहीं किया जाता, विदुर दोबारा शादी कर तो घर बसाना हुआ, लेकिन विधवा करे तो चरित्रहीन?

मूल सवाल महिलाओं से यह है, कि रंगों के खुशी के त्यौहार को आप किसी दूसरी महिला के जलाने की खुशी को त्यौहार के रूप में कैसे बना सकती हैं? आप भी महिला हैं, इस ओर सोचिये और त्यौहार को त्यौहार के जैसे मनाएं, किसी के जलाने या मारने के उत्सव नहीं.