बहुजनों का मॉडल देश: रूस, चीन नहीं, दक्षिण अफ्रीका!

वैसे तो जिन हालातों में सारी दुनिया में क्रांतियां हुईं: स्वाधीनता आन्दोलन संगठित हुए, भारत में वे सारे हालात विगत चार सालों में बड़ी तेजी से पूंजीभूत हुए. किन्तु प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के शेष वर्ष अर्थात जनवरी – फ़रवरी, 2019 के मध्य जिस तरह सवर्ण और विभागवार आरक्षण के साथ करोड़ के करीब आदिवासियोंको जंगल से खदेड़ने जैसे चरम मानवता विरोधी निर्णय लिए गए, उससे बहुजनों को देश के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के खिलाफ गुलामी से मुक्ति की लड़ाई में उतरने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रह गया है.

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि बहुजन अपनी मुक्ति के लिए किस देश को मॉडल बनायें? कभी इस देश में वंचितों की लड़ाई लड़ने वाले संगठन रूस और चाइना को मॉडल बनाते रहे. ऐसे लोगों की संख्या में आज भारी कमी जरुर आई है, किन्तु रूस और चाइना की खूनी क्रांतियों से प्रेरणा लेकर बन्दूक के बल पर सत्ता कब्जाने का सपना देखने वालों से यह देश आज भी पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है. लिहाजा खूनी क्रांति के जरिये शोषकों से पार पाने का सपना देखने वाले आज भी मौजूद हैं.

किन्तु मोदी राज में जिनको जन्मजात शोषकों के खिलाफ संगठित होने के लिए विवश होना पड़ रहा है, उनकी मानसिकता फुले, शाहू जी, पेरियार, डॉ.आंबेडकर, कांशीराम, जगदेव प्रसाद, रामस्वरुप वर्मा इत्यादि के समतावादी विचारों से पुष्ट है.

लोकतंत्र और भारतीय संविधान में अपार आस्था रखने वाले ये लोग ईवीएम में क्रांति के जरिये सत्ता दखल कर अपनी वंचना से मुक्ति पाना चाहते हैं. लिहाजा इनके लिए चीन और रूस जैसे देश मॉडल नहीं बन सकते.

ऐसे में सवाल पैदा होता है अगर रूस और चीन नहीं तो फिर किस देश को मॉडल बनाकर भारत के जन्मजात वंचित अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ें. मेरा जवाब है दक्षिण अफ्रीका और सिर्फ दक्षिण अफ्रीका! हालाँकि विविधतामय अमेरिका भी बहुजनों के लिए मॉडल के रूप में चिन्हित हो सकता है, जिससे प्रेरणा लेकर वे वोट के जरिये क्रांति घटित कर अपनी समस्यायों का हल ढूंढ सकते हैं. किन्तु इस मामले में दक्षिण अफ्रीका का कोई जोड़ नहीं है.

भारत और दक्षिण अफ्रीका में कितनी समानता!

स्मरण रहे दक्षिण अफ्रीका विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी भारत से सर्वाधिक साम्यताएं हैं. दक्षिण अफ्रीका में 9-10  प्रतिशत अल्पजन गोरों, प्रायः 79 प्रतिशत मूलनिवासी कालों और 10-11 प्रतिशत कलर्ड (एशियाई उपमहाद्वीप के लोगों) की आबादी है. वहां का समाज तीन विभिन्न नस्लीय समूहों से उसी तरह निर्मित है जैसे विविधतामय भारत समाज अल्पजन सवर्णों, मूलनिवासी बहुजनों और धार्मिक अल्पसंख्यकों से. जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में विदेशागत गोरों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा है, ठीक उसी तरह भारत में 15 प्रतिशत सवर्णों का 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा कायम है.

जिस तरह दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासी बहुसंख्य हो कर भी शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत रहे, प्रायः वैसे ही भारत के मूलनिवासी दलित, आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित तबके भी हैं.

जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में सभी स्कूल, कॉलेज, होटल , क्लब, पॉश कालोनियां, रास्ते मूलनिवासी कालों के लिए मुक्त नहीं रहे, प्रायः वही स्थिति भारत के मूलनिवासियों की रही. जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में सभी सुख-सुविधाएं गोरों के लिए सुलभ रही, उससे भिन्न स्थिति भारत के सवर्णों की भी नहीं रही.

जिस तरह दक्षिण अफ्रीका का सम्पूर्ण शासन तंत्र गोरों द्वारा गोरों के हित में क्रियाशील रहा, ठीक उसी तरह भारत में शासन तंत्र हजारों साल से सवर्णों द्वारा सवर्णों के हित में क्रियाशील रहा है और आज भी है.

इन दोनों ही देशों में मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में बस एक ही कारण प्रमुख रूप से क्रियाशील रहा और वह है शासक वर्गों की शासितों के प्रति अनात्मीयता. इसके पीछे शासकों की उपनिवेशवादी सोच की क्रियाशीलता रही.

दक्षिण अफ्रीका के गोरों ने जहां दो सौ साल पहले उपनिवेश कायम किया, वहीं भारत के आर्यों ने साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व. दक्षिण अफ्रीका के विदेशागत गोरे शासकों ने जहां बन्दूक की नाल पर पुष्ट कानून के जरिये मूलनिवासियों को जानवरों जैसी स्थिति में पड़े रहने के लिए विवश किया, वहीं भारत के मूलनिवासियों को मानवेतर प्राणी में तब्दील व अधिकारविहीन करने के लिए प्रयुक्त हुआ धर्माधारित कानून, जिसमें  मोक्ष को जीवन का चरम लक्ष्य घोषित करते हुए ऐसे –ऐसे प्रावधान तय किये गए, जिससे मूलनिवासी चिरकाल के लिए शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत होने के साथ ही निःशुल्क-दास में परिणत होने के लिए अभिशप्त हुए. किन्तु अब भारत और दक्षिण अफ्रीका में पहले वाली साम्यताएं नहीं रही. आज दक्षिण अफ्रीका के शासक और शासित वर्ग उलट चुके हैं, जबकि भारत में स्थिति पूर्ववत है.

भेदभाव से मुक्त हुए दक्षिण अफ़्रीकी मूलनिवासी

वर्ष 1996  में एक गणतंत्र के रूप में स्वयं को पुनर्गठित करने के बाद दक्षिण अफ्रीका ने दो ऐसे विधान बनाये जो कोई अन्य देश नहीं बना सका. वे हैं- पहला, समानता और अनुचित भेदभाव का रोकथाम अधिनयम 2000 और दूसरा, रोजगार समानता अधिनियम 1998. इन कानूनों ने वहा चमत्कार कर डाला.

विस्तृत जानकारी लिए मूल अधिनियम यहाँ पढ़ें-
क्लिक करें > मानता और अनुचित भेदभाव का रोकथाम अधिनयम, 2000
क्लिक करें > रोजगार समानता अधिनियम, 1998

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अनुचित भेदभाव रोकथाम अधिनियम 2000 में गोरे शासन में मूलनिवासी कालों और महिलाओं पर सदियों से चले आ रहे भेदभावकारी कानूनों का सम्पूर्ण रूप से उच्छेद कर ऐसे कानून बनाये गए हैं, जिनसे अनुचित भेदभाव और प्रताड़ना रुके, समानता को बढ़ावा मिले, अनुचित भेदभाव समाप्त हो,घृणा उत्पन्न करने वाले संभाषण पर रोक लगे.

भेदभाव पर रोक लगाने वाले कानून इतने कठोर हैं जिस तरह भारतीय संविधान में अस्पृश्यता के उन्मूलन की घोषणा किये जाने और दलित उत्पीडन अधिनियम 1989 लागू होने के बावजूद आये दिन दलित उत्पीड़न से जुड़ी सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं, वैसा अब दक्षिण अफ्रीका में नहीं होता. जबकि गोरों के राज में वहां के मूलनिवासी कालों की हैसियत भारत के दलितों की भांति ही नर-पशु जैसी रही. पर, अब वह अतीत का विषय बन चुका है.

मूलनिवासी कालों को मिला सर्वव्यापी आरक्षण

अनुचित भेदभाव रोकथाम अधिनियम 2000 की भांति रोजगार समानता अधिनियम 1998 एक ऐसा कठोर अधिनियम है, जिसमें कहा गया है –

रंगभेद के परिणामस्वरुप और अन्य भेदभाव कानूनों, व्यवहारों के कारण राष्ट्रीय श्रम बाजार में रोजगार– धंधे आय में असमानताएं हैं. ये असमानताएं कुछ निश्चित श्रेणीयों के लोगों के लिए ऐसी कठिनाइयां उत्पन्न करती हैं, जिन्हें मात्र भेदभाव पूर्ण कानूनों को समाप्त कर दूर नहीं किया जा सकता. इसलिए समानता के संवैधानिक अधिकार को बढ़ावा देने और वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना के लिए रोजगार के अनुचित भेदभाव को ख़त्म करना होगा, भेदभाव के प्रभावों को समाप्त करने के लिए रोजगार समानता सुनिश्चित करनी होगी और हमारे लोगों के प्रतिनिधित्व वाले विविध कार्यबल का निर्माण करना होगा, कार्यबल में क्षमता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना होगा और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सदस्य के रूप में गणतंत्र की अनिवार्यताओं को प्रभावशाली करना होगा.

बहरहाल रंगभेदी शासन से मुक्ति पाने  के मूलनिवासी काले शासकों ने अनुचित भेदभाव रोकथाम अधिनियम 2000 और रोजगार समानता अधिनियम 1998 जैसे अन्य कई प्रावधान किया, जिससे नस्लीय भेदभाव तो अतीत का विषय बना ही, इससे भी बढ़कर धनार्जन के समस्त स्रोतों सहित तमाम क्षेत्रों में ही विविध नस्लीय समूहों की संख्यानुपात में भागीदारी सुनिश्चित हो गयी. इससे जिन गोरों का तमाम क्षेत्रों में 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा, वे अपने संख्यानुपात 9-10 प्रतिशत पर सिमटने लगे तथा उनका वर्चस्व टूटने लगा. वर्चस्व उनका कायम था तो भूमि पर. किन्तु अब मूलनिवासियों की तानाशाही सत्ता के जोर से 27 फरवरी 2018 को उनके हिस्से की कुल 72 प्रतिशत जमीन भी छीन कर मूलनिवासियों में बांटने का प्रावधान कर दिया गया है.

तानाशाही सत्ता से भारत के मूलनिवासियों का कायम हो सकता है: सर्वत्र दबदबा

दक्षिण अफ्रीका में सदियों के दास मूलनिवासी कालों ने अगर अपने मालिक गोरों को देश छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया तो उसमें सबसे बड़ा योगदान उनकी तानाशाही सत्ता का रहा. अगर मूलनिवासी कालों का पशुवत इस्तेमाल हुआ तो वह काम गोरों ने अपनी तानाशाही सत्ता के जरिये अंजाम दिया.

भारत में विगत चार सालों में मूलनिवासी एससी,एसटी,ओबीसी और इनसे धर्मान्तरित तबके अगर गुलामों की स्थिति में पहुंचे हैं तो वह काम राष्ट्रवादियों की तानाशाही सत्ता के जोर से ही अंजाम दिया गया है.इस तानाशाही सत्ता के जोर से राष्ट्रवादियों ने मूलनिवासियों को बर्बादी के शेष कगार पर पहुंचा दिया है.

दक्षिण अफ्रीका का अनुभव बताता है कि अगर भारत के मूलनिवासी भी बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित करके अपनी तानाशाही सत्ता कायम कर लें तो वे इसके जोर से वंचितों को धनार्जन के समस्त स्रोतों सहित तमाम क्षेत्रों में हिस्सेदारी सुनिश्चित करवाने के साथ और अल्पजन सवर्णों को नियंत्रित भी कर सकते हैं.

दक्षिण अफ्रीका की भांति भारत में जन्मजात वंचितों की तानाशाही सत्ता कायम होने पर यहां भी गोरों की तरह समस्त क्षेत्रों में सवर्णों को उनके संख्यानुपात पर सीमित किया जा सकता है.

अगर 15 प्रतिशत सवर्णों को उनकी संख्यानुपात पर रोक दिया जाय तो उनके कब्जे के 15 प्रतिशत अवसरों को घटा कर प्रत्येक क्षेत्र में औसतन 70-75 प्रतिशत अतिरक्त (surplus) अवसर बहुजनों के मध्य वितरित करने का प्रावधान किया जा सकता है. अगर तानाशाही सत्ता कायम हो जाय तो सवर्ण आरक्षण के खात्मे से लेकर 13 पॉइंट रोस्टर उलटने सहित ऐसे ढेरों काम किये जा सकते है, जिससे दक्षिण अफ्रीका में मूलनिवासियों की भांति अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग (Scheduled Caste, Scheduled Tribe, and Other Backward CLasses/ SC, ST, OBC/ एससी/ एसटी/ ओबीसी) का भी शक्ति के समस्त स्रोतों पर दबदबा कायम हो जायगा. वे शासित से दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की भांति शासक में तब्दील हो जायेंगे.

पर, सवाल पैदा होता है, जिस तरह वर्तमान में सवर्णों की तानाशाही सत्ता कायम है, उसे ध्वस्त कर क्या दक्षिण अफ्रीका की भांति वंचितों की तानाशाही सत्ता कायम की जा सकती है? क्या टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे बहुजनों के वोट को सुविधाभोगी वर्ग के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है? स्थिति कठिन है,बावजूद इसके वर्तमान भारत में जो हालात हैं, उससे बहुजनों की तानाशाही सत्ता मुमकिन है.

सामाजिक अन्याय की शिकार विश्व की विशालतम आबादी:बहुजन समाज

वैसे भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए भारत में दक्षिण अफ्रीका जैसी मूलनिवासियों की तानाशाही सत्ता की कल्पना करने का दु:साहस विरले ही कोई कर पायेगा. पर, यदि हम इस बात को ध्यान में रखें कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता हासिल करने में संख्याबल सर्वाधिक महत्वपूर्ण फैक्टर का काम करता है और इसी संख्या-बल को अपने अनुकूल करने के लिए पार्टियों को धन-बल, मीडिया-बल, प्रवक्ताओं-कार्यकर्ताओं की भीड़ और कुशल नेतृत्व की जरुरत पड़ती तो पता चलेगा भारत के बहुजनवादी दलों जैसी अनुकूल स्थिति पूरी दुनिया में अन्यत्र दुर्लभ है. और ऐसा इसलिए कि आज की तारीख में सामाजिक अन्याय का शिकार बनाई गयी भारत के बहुजन समाज जैसी विपुल आबादी दुनिया के इतिहास में कहीं भी, कभी भी नहीं रही. और यह आबादी इस समय अन्याय की गुफा से निकलने के लिए बुरी तरह छटपटा रही है.

सामाजिक अन्याय की परिभाषा

वैसे तो सामाजिक अन्याय की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभिन्न समाज विज्ञानियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि नस्ल, जाति , लिंग, धर्म, भाषा , क्षेत्रादि के आधार पर विभाजित विभिन्न सामाजिक समूहों में से कुछेक का शक्ति के स्रोतों से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय कहलाता है. इस लिहाज से दुनिया भर में स्त्री के रूप में विद्यमान आधी आबादी सर्वत्र ही सामाजिक अन्याय का शिकार रही.

सर्वाधिक अन्याय के शिकार तबकों में अमेरिका तथा दक्षिण अफ्रीका के कालों तथा भारत के बहुजनों का कोई जवाब नहीं. इनमें भारत के बहुजनों को ही शीर्ष पर रखा जा सकता है. कारण सामाजिक अन्याय का शिकार बने किसी भी समुदाय को भारत के बहुजनों की भांति आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के साथ धार्मिक और शैक्षिक क्षेत्र से पूरी तरह बहिष्कृत नहीं रखा गया. यही नहीं यहां बहुजनों को अच्छा नाम तक रखने से वंचित किया गया. किन्तु सदियों पूर्व शासकों की बर्बर सोच के तहत अन्याय का शिकार बनाई गयी कौमें इससे काफी हद निजात पा चुकी है, अपवाद हैं तो सिर्फ भारत की मूलनिवासी जातियां.

क्रांति में घी का काम करती: सापेक्षिक वंचना!

भारत में सामाजिक अन्याय की शिकार विश्व की विशालतम आबादी को आज भी जिस तरह विषमता का शिकार होकर जीना पड़ रहा है उससे यहां विशिष्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन (specific social movementt) पनपने की ‘निश्चित दशाएं’ (certain conditions) साफ़ दृष्टिगोचर होने लगीं हैं. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतः सामाजिक असंतोष (social unrest), अन्याय, उत्पादन के साधनों का असमान बंटवारा तथा उच्च व निम्न वर्ग के व्याप्त खाई के फलस्वरूप होता है.

सरल शब्दों में ऐसे आन्दोलन आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की कोख से जन्म लेते हैं और तमाम अध्ययन साबित करते हैं कि भारत जैसी भीषणतम गैर-बराबरी पूरे विश्व में कहीं है ही नहीं. इस क्रान्तिकारी आन्दोलन में बहुसंख्य लोगों में पनपता ‘सापेक्षिक वंचना’ (relative deprivation) का भाव आग में घी का काम करता है, जो वर्तमान भारत में दिख रहा है.

सापेक्षिक वंचना क्या है?

क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़, ’दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें!’

सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा, जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ, जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना. दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना का अहसास ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमे भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाही सत्ता.

मंडलोंत्तर काल में मूलनिवासियों के खिलाफ शत्रु की भूमिका में अवतरित: सवर्ण समाज! जहाँ तक भारत के मूलनिवासियों की वंचना का सवाल है ये हजारों साल से शक्ति के तों (आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक, धार्मिक) से पूरी तरह बहिष्कृत रहे. इन्हें शक्ति के स्रोतों से जुड़ने अवसर आंबेडकर प्रवर्तित आरक्षण से मिला. और  एससी/एसटी के बाद जब अगस्त 1990 में मंडल की संस्तुतियों के जरिये ओबीसी के लिए आरक्षण घोषित हुआ, भारत का जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के लेखक, पत्रकार, कलाकार, साधु-संत-पूँजीपति और राजनीतिक दल मूलनिवासियों के खिलाफ सीधे शत्रु की भूमिका में आ गए. परवर्तीकाल में जिस आरक्षण के सहारे मूलनिवासी राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे थे, उस आरक्षण के खात्मे तथा सवर्णों को और शक्तिशाली बनाने के कुत्सित इरादे से सवर्णवादी शासकों ने 24 जुलाई, 1991  को अख्तियार किया नवउदारवादी अर्थनीति. यूं तो मूलनिवासियों के खिलाफ नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार  बनाने की दिशा में नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह इत्यादि सबने प्रयास किया, किन्तु इस मामले में मोदी अपने पूर्ववर्तियों को छोड़कर मीलों आगे निकल गए.

मोदी राज में शिखर पर पहुंची: सापेक्षिक वंचना

चूंकि मोदी एक ऐसे संगठन से प्रशिक्षित रहे,जिसका एकमेव लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों का हित पोषण रहा है, इसलिए उन्होंने मूलनिवासियों के खिलाफ चरम शत्रुता का प्रदर्शन किया. विगत साढ़े चार वर्षों में आरक्षण के खात्मे तथा बहुसंख्य लोगों की खुशिया छीनने की रणनीति के तहत ही मोदी राज में श्रम कानूनों को निरंतर कमजोर करने के साथ ही नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, शक्तिहीन बहुजनों को शोषण-वंचना के दलदल में फंसानें का काम जोर-शोर से हुआ. बहुसंख्य वंचित वर्ग को आरक्षण से महरूम करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों इत्यादि को निजीक्षेत्र में देने की शुरुआत हुई. आरक्षण के खात्मे के योजना के तहत ही सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी दी गयी. आरक्षित वर्ग के लोगों को बदहाल बनाने के लिए ही पांच दर्जन से अधिक  यूनिवर्सिटियों को स्वायतता प्रदान करने के साथ –साथ ऐसी व्यवस्था कर दी गयी जिससे कि आरक्षित वर्ग, खासकर एससी/ एसटी के लोगों का विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्ति पाना एक सपना बन गया. कुल मिलाकर जो सरकारी नौकरियां वंचित वर्गों के धनार्जन का प्रधान आधार थीं, मोदीराज में उसके स्रोत आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया. इस आशय की घोषणा 5 अगस्त, 2018 को खुद मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने कर दिया. उन्होंने उस दिन कहा, “सरकारी नौकरिया ख़त्म हो चुकी है लिहाजा आरक्षण काकोई अर्थ नहीं रह गया है”.

13 पॉइंट रोस्टर का मुद्दा

अपडेट: संपादक
यल लेख 6.3.2019 को लिखा गया था और उसी दिन द नेशनल प्रेस को प्राप्त हुआ था, लेकिन इसे 7.3.2019 को प्रकाशित किया जा सका. लेख प्रकाशन के पूर्व आज दोपहर भारत सरकार ने 13 पॉइंट रिजर्वेशन रोस्टर की जगह 200 पॉइंट रिजर्वेशन रोस्टर का अध्यादेश लेकर इलाहबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया. लेकिन फिर भी लेख में वर्णित 13 पॉइंट रिजर्वेशन रोस्टर की भयावहता सोचनीय है.

बहरहाल जिस मोदी राज में आरक्षण को निरर्थक बना दिया गया, उसी मोदीराज के स्लॉग ओवर में संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए 7-22 जनवरी, 2019 के मध्य सवर्ण और विभागवार: दो ऐसे आरक्षण लागू हुए जो मूलनिवासियों पर सबसे बड़े अघातों  में से एक के रूप में चिन्हित हो गए. इनमें 13 प्वाइंट रोस्टर के जरिये लागू होने वाले विभागवार आरक्षण को तो मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में मानवता के खिलाफ उठाये गये सबसे बड़े अमानवीय फैसलों में दर्ज हो गया है. कारण, इसके जरिये अवसरों पर दुनिया की उस सबसे बड़ी सुविधाभोगी जमात को अवसरों पर पहला हक़ प्रदान कर दिया गया है, जिसका कई हजार साल से शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार रहा और आज के लोकतान्त्रिक युग में भी जिसका राज-सत्ता, धर्म-सत्ता, और ज्ञान-सत्ता के साथ अर्थ-सत्ता पर भी औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है.

मूलनिवासी समझ रहे हैं कि उच्च शिक्षा में लागू 13 प्वाइंट रोस्टर कल समस्त विभागों में लागू हो जायेगा. इसलिए इन समुदायों के जागरूक लोगों के मध्य इसे लेकर अपार रोष है. यह रोष ऐसा-वैसा नहीं: अधिकार खोने के अहसास से उपजा रोष है. ढेरों समाज विज्ञानी मानते हैं कि क्रान्ति गरीबी के जठर से नहीं: अधिकार खोने के अहसास से पैदा होती है. और कहने में अतिश्योक्ति नहीं है कि 13 पॉइंट रोस्टर के खतरे ने मूलनिवासियों में सापेक्षिक वंचना को विस्फोटक बिन्दू पर पहुंचा दिया है.  

इस बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा 27 फ़रवरी को केंद्र की याचिका पुनः ख़ारिज करने के बाद जिस तरह आनन-फानन में विभिन्न विश्वविद्यालयों में पदों के विज्ञापन निकाले गए हैं और जिस तरह उनमें मूलनिवासियों की वंचना का चित्र उभरा है उससे उनमें सापेक्षिक वंचना का अहसास एवरेस्ट से मुकाबला करने लगा है. विश्वविद्यालयों में जो धड़ाधड़ रिक्तियां निकल रही हैं,उनमें देखा जा रहा है कि प्रायः सारे अवसर सवर्णों को जा रहे हैं; इक्का-दुक्का ओबीसी को छोड़कर एससी/एसटी के लिए लिए कोई अवसर ही नहीं रहा गया है. उदाहरण के तौर पर बांदा यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल एंड टेक्नोलाजी में 30 पदों का विज्ञापन निकला है जिनमे 28 पद सामान्य और 2 पद ओबीसी के लिए है: एससी और एसटी के हिस्से में शून्य पद हैं. इसी तरह “जननायक चन्द्रशेखर विश्ववद्यालय” बलिया में प्रोफ़ेसर और एसोसियेट प्रोफ़ेसर के क्रमशः 10 और 20 पदों का विज्ञापन निकला है और यह सारा सिर्फ सामान्य वर्ग को को गया है: एक भी पद एससी, एसटी और ओबीसी के लिए नहीं है. यह तो बानगी मात्र है.

अन्य कई विश्वविद्यालयों में जो विज्ञापन निकले हैं, प्रायः हर जगह मूलनिवासी बहिष्कृत हैं. ये विज्ञापन आँख में अंगुली डालकर बता रहे हैं हैं, कि जिन सरकारी नौकरियों से मूलनिवासियों के जीवन में कुछ बदलाव आया, अब वह शासक जातियों की साजिश से सपना बनाने जा रही हैं. इस कारण भारत की जन्मजात आबादी में सापेक्षिक वंचना का जो अहसास जन्मा है,उससे वोट के जरिये लोकतान्त्रिक क्रांति के जो हालत आज भारत में पैदा हुए हैं, वैसे हालत विश्व इतिहा में कभी किसी देश में उपलब्ध नहीं रहे.    

 इस हालात में परस्पर शत्रुता से लबरेज मूलनिवासी समुदायों में क्रांति के लिए जरुरी “हम भावना” (we feeling) का तीव्र विकास का तीव्र विकास हुआ.

कॉमन वंचना के परिणाम

कॉमन वंचना ने बहुजनों को शक्तिसंपन्न वर्गों के विरुद्ध ‘हम भावना’ से लैस करना शुरू कर दिया है. इस भयावह विषमता का सदव्यवहार कर बहुजन साहित्यकार वोट के जरिये क्रांति घटित करने लायक हालात बनाने में जुट गए हैं. तो कुल मिलाकर दावे से कहा जा सकता है कि 2019 में मूलनिवासियों को अशक्त और सवर्णों को और सशक्त बनाने के लिए जो कई अप्रत्याशित निर्णय लिए गए हैं, उससे मूलनिवासियों में सापेक्षिक वंचना का जितना लम्बवत विकास हुआ है, उससे दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की भांति भारत के मूलनिवासियों की तानाशाही सत्ता कायम होने की संभावना उज्ज्वलतर हो गयी है.

बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने जोर गले से कहा है –

गुलामों को गुलामी का अहसास करा दो, वे गुलामी की बेडियां तोड़ डालेंगे

विगत दो-तीन वर्षो में आई विभिन्न रिपोर्टों से यह तय हो गया है कि भारत के दलित, आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मातरित तबके, विशेषकर दलित विशुद्ध गुलाम में परिणत होने जा रहे हैं. ऐसे में इन रिपोर्टों में आये आंकड़ों के सहारे यदि बहुजनों को गुलामी और उनकी सापेक्षिक वंचना से अवगत कराने में सर्वशक्ति लगाया जाय तो उनकी तानाशाही सत्ता कायम होना कोई बड़ी बात नहीं होगी.

किन्तु इन स्थितियों और परिस्थितियों का सद्व्यहार करने के लिए चाहिए योग्य नेतृत्व. भारी अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि मूलनिवासी समुदायों में कुछ हद तेजस्वी यादव को छोड़कर ऐसा कोई दिख नहीं रहा है जो बहुजनों की तानाशाही सत्ता के लिए पनपे हालात का सदव्यवहार कर सके!