डॉ.आंबेडकर के समतुल्य: मान्यवर कांशीराम

आज 15 मार्च है. आज ही के दिन 1934 में पंजाब के रोपड़ जिले के खवासपुर गाँव में एक ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ था, जिसे वंचित बहुजन समाज के लोग डॉ.आंबेडकर के बाद सबसे बड़ी शख्सियत के रूप में आदर देते हैं: जिनका नाम बाबा साहेब की भांति दल और देश की सीमाओं को पार करते हुए देश-देशांतर तक फैलते जा रहा है. अतः एक ऐसे समय में जबकि आम चुनाव की घोषणा हो चुकी है, आज भागीदारी दर्शन के महानायक साहेब कांशीराम की जयंती मनाने में जुटा पूरा का पूरा बहुजन समाज उनके भागीदारी दर्शन को जरुर याद करेगा. याद नहीं करेंगी तो शायद मायावती, जिनकी देश में विशिष्ट छवि है तो साहब कांशीराम द्वारा स्थापित बसपा के कारण, जिसका मूल आर्थिक दर्शन ही है जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी.

यह संशय यह लेखक इसलिए जाहिर कर रहा हैं, क्योंकि बसपा संस्थापक कांशीराम के भागीदारी दर्शन की निरंतर अनदेखी करते हुए मायावती, उनके द्वारा स्थापित राजनीतिक पार्टी बसपा को इतनी करुणतर दशा में पहुंचा दी है कि कांशीराम के सच्चे अनुयायियों को भविष्य में बसपा के वजूद को कायम रहने को लेकर संशय पैदा हो गया है,इसे समझने के लिए पिछले लोकसभा चुनावों में बसपा की उपलब्धियों तथा खासतौर से मोदी से उठी सुनामी का सिंहावलोकन कर लेना होगा.

मोदी की सुनामी में सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त: कांशीराम की बसपा

2014 में मोदी की सफलता से अभिभूत एक बड़े नेता ने दावा किया था कि मोदी से मुकाबले के लिए विपक्ष को 2019 की बात भूलकर,2024 की तैयारियों में जुट जाना चाहिए. हालाँकि ऐसा दावा करने वाले वह नेता आज खुद 2019 में मोदी की विदाई के प्रति आशावादी हो चुके हैं.पर, 2014 में वास्तव में मोदी वैसे दिख रहे थे कि 2019 में उनकी विदाई की कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था.सोलहवीं लोकसभा चुनाव में मोदी की विस्मयकारी सफलता ने स्वाधीन भारत के चुनावी इतिहास में कई नए अध्याय जोड़े दिए थे, जिनमें सुनामी में तब्दील हुई उनकी आंधी में क्षत्रपों का सफाया एक खास अध्याय रहा.

वैसे तो उनकी सुनामी में वाम मोर्चा के साथ महाराष्ट्र में शरद यादव, तमिलनाडु में करूणानिधि, बिहार में लालू -नीतीश जैसे अन्य कई क्षेत्रीय दलों और क्षत्रपों का कमोबेश सफाया हो गया, किन्तु जिस यूपी से होकर सत्ता का रास्ता दिल्ली की तख़्त की ओर जाता है, वहां मुलायम सिंह यादव, अजित सिंह और मायावती जैसे सामाजिक न्याय के नायक/नायिकाओं की अभूतपूर्व हार चर्चा का खास विषय बन गयी. यूपी में जो काम भाजपा राम नाम के सहारे नहीं कर पाई, वह काम 2014 में ‘नमो जाप’ से हो गया था. वर्ष 1977 की ‘जनता पार्टी’की लहर और वर्ष 1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु से उठी सहानुभूति की लहर को छोड़ दिया जाय तो पहली बार यूपी में किसी पार्टी को 71 सीटें मिलीं.इनमें ‘अपना दल’ की दो सीटें जोड़ दी जाएं तो उस बार भाजपा की सीटें 73 हो गयीं थीं. इसके पहले पार्टी को 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में क्रमशः 51, 52, 57, 29, 10 और 10 सीटें मिलीं थीं.

मोदी की सुनामी से यदि सबसे अधिक किसी को नुकसान पहुंचा था तो वह दलित राजनीति की पर्याय बनी बसपा थी, जिसकी नुमांदगी के लिए एक भी व्यक्ति संसद में नहीं पहुंच सका था. इससे पूर्व संसद में 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में उसके क्रमशः 02, 01, 06, 04, 14, 19, और 20 सदस्य रहे. सांसदों की संख्या शून्य छूने के साथ ही 2014 में उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी थी. 2009 के 27.42 के मुकाबले उस बार उसका वोट प्रतिशत 20 के लगभग रह गया था . ज़ाहिर है मोदी की सुनामी ने उसे 18 वर्ष पूर्व की स्थिति में धकेल दिया, जब 1996 में उसे 20.61 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2009  में अनुष्ठित 15 वीं लोकसभा तक लगातार बढ़ता रहा. उसकी सबसे शर्मनाक हार तो उत्तर प्रदेश की 17 आरक्षित सीटों पर हुई जो सभी भाजपा की झोली में चली गयी थीं.

जातिमुक्त दिखने की होड़ लगाये : सामाजिक न्यायवादी नेता

बसपा की करारी शिकस्त से जहाँ जातिवाद से त्रस्त बुद्धिजीवी भारतीय राजनीति में जातिवाद के अंत की शुरुआत मानकर आह्लादित हुए, वहीँ सामाजिक न्याय के पक्षधर काफी सदमा पाए थे. कारण,यही वह पार्टी है जिसने जातिवाद का ऐसा गेम खेला जो भारत में सामाजिक बदलाव का बड़ा कारण बन सकता था. स्मरण रहे वर्ण-व्यवस्था के अर्थशास्त्र के तहत शक्ति के स्रोतों – आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक- से बहिष्कृत कर अशक्त बनाई गयी जातियों की बेहतरी के लिए कुछ करना/कहना भारत के मुख्यधारा के लोगों द्वारा जातिवाद के रूप में निन्दित रहा है.

दूसरे शब्दों में शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर सामाजिक अन्याय का शिकार बनाये गए सामाजिक समूहों को न्याय दिलाने का प्रयास जातिवाद के रूप में चिन्हित होता रहा है. वर्ण-व्यवस्था के वंचितों के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत 19 वीं सदी में शूद्र समाज में जन्मे फुले ने की जो परवर्तीकाल में शाहूजी महाराज,पेरियार इत्यादि से होते हुए बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर के प्रयत्नों से बुलंदी की ओर पहुंची. आंबेडकर के बाद लोहिया ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए राजनीति,व्यापार ,पलटन और ऊँची सरकारी नौकरियों में 90 प्रतिशत शोषितों के लिए 60 सैकड़ा स्थान सुरक्षित करने की मांग उठाया.पर, बिहार के जगदेव प्रसाद ने लोहिया से भी आगे बढ़कर सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में 90 प्रतिशत शोषितों के लिए 90 प्रतिशत स्थान सुरक्षित करने का अभियान चलाया.

किन्तु बाद में कांशीराम ने सामाजिक न्याय का भिन्न दर्शन प्रस्तुत किया.वह था जिसकी ‘जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी’.वास्तव में बामसेफ,डीएस-4 के बाद सभी सामाजिक समूहों के मध्य शासन-प्रशासन तथा देश के कारोबार का वाजिब बंटवारा कराने के लिए ही कांशीराम ने ‘बीएसपी’की स्थापना की थी.

बहरहाल परवर्तीकाल में लोहिया,जगदेव प्रसाद,कांशीराम जैसे सामाजिक न्याय के महानायकों का योग्य अनुसरणकारी बनकर राम विलास पासवान,नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और मायावती इत्यादि ने हिंदी पट्टी में अपनी जबरदस्त उपस्थित दर्ज कराया. किन्तु इस लड़ाई को लम्बे समय तक जारी न रख सके. 2009  का चुनाव आते-आते वे जाति-मुक्त दिखने का प्रयास करने लगे. परिणामस्वरूप 2009 में ही गहरी पराजय मिली और वे पतन के कगार पर पहुँच गए,पर, उस हार से कोई सबक नहीं लिए. अंततः सोलहवी लोकसभा में उनका, खासकर बसपा का प्रायः निर्णायक तौर पर पतन हो गया.

जिसकी जितनी संख्या भारी की जगह, जिसकी जितनी तैयारी , उसकी उतनी भागीदारी!

15 वीं लोकसभा चुनाव में जातिवादी कहलाने से बचने के लिए लोहिया और कांशीराम के अनुसरणकारियों ने भारी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में कदम रखा था. इसीलिए उन्होंने ‘भूराबाल साफ…और तिलक ,तराजू…’जैसे नारों से पल्ला झाड़ लिया. इसीलिए राम विलास पासवान,लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे सामाजिक न्याय के सूरमाओं ने न तो एक बार भी सामाजिक न्याय शब्द का उल्लेख किया और न ही 90 प्रतिशत पिछड़े वर्गों के लिए 90 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग ही उठाई. हालाँकि इन तीन लोहियावादियों से आंबेडकरवादी कभी कोई विशेष उम्मीद नहीं पाले.

किन्तु आंबेडकरवादी ही नहीं लोहियावादी और दूसरे समाज परिवर्तनकामी जिनसे बड़ी उम्मीद पाल रखे थे, वह  मायावती अपनी जातिवादी छवि मिटाने के लिए कुछ ज्यादे ही प्रयासरत रहीं. इसके लिए उन्होंने दो-तीन वर्ष पूर्व से ही अपनी पार्टी को बहुजन से सर्वजनवादी में तब्दील करने का जबरदस्त प्रयास शुरू कर दिया. इस दौरान दलित बुद्धिजीवियों के प्रयास से वर्ण-व्यवस्था के वंचितों में नौकरयों से आगे बढ़कर सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों,पार्किंग,परिवहन,फिल्म-टीवी इत्यादि हर क्षेत्र में ही संख्यानुपात में भागीदारी की चाह बढ़ने लगी. किन्तु बसपा सुप्रीमो ने उनकी चाह की उपेक्षा करने के साथ ही कांशीराम के भागीदारी दर्शन को इस कदर जमींदोज कर दिया कि 2009 में चुनाव प्रचार के दौरान बसपा महासचिव सतीश चन्द्र मिश्र को यह कहने में झिझक ही नहीं हुई-‘बसपा अब पहले वाली बसपा नहीं रही.

अब उसने नारा बदल दिया है . अब वह जिसकी जितनी सख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी की जगह, जिसकी जितनी तैयारी, उसकी उतनी भागीदारी’में विश्वास करती है’. मिश्रा की उस बात का मायावती या किसी अन्य बसपाई ने खंडन नहीं किया. इसका मतलब साफ़ है 15 वीं लोकसभा चुनाव में बदली हुई मायावती ने शिरकत किया था, जिसने जातिवाद को पीछे छोड़ने के साथ ही कांशीराम के भागीदारी दर्शन को सिर के बल खड़ा कर दिया था. उनकी चिंता के दायरे में बहुजनों की सर्वत्र भागीदारी नहीं,गरीब सवर्णों का आरक्षण आ गया था.इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जब 9जनवरी,2019 को सवर्ण आरक्षण बिल पास हुआ, लोगों को मायावती की सबसे पहले याद आई, जिन्होंने बहुजनों की ओर से सबसे पहले सामाजिक न्याय विरोधी यह मांग उठाई थी.

कांशीराम के भागीदारी दर्शन से विचलन का 15 वीं लोकसभा चुनाव में फल यह मिला कि मायावती का प्रधानमंत्री बनने का सपना ऐसे दुस्वप्न में परिणत हो गया कि उन्हें 2014 में अपने समर्थकों को प्रधानमंत्री का नारा बुलंद करने से मना करने के लिए बाध्य होना पड़ा. किन्तु 2009 में सपना टूटने से उन्होंने जरा भी सबक नहीं लिया और 2014 में भी अपना चुनावी एजेंडा पुराने ढर्रे पर कायम रखा,जिसके फलस्वरूप सोलहवीं लोकसभा चुनाव में उन्हें शून्य पर आ जाना पड़ा था .

मायावती का एक ही अच्छा काम: ठेकों में आरक्षण

बहरहाल बसपा सुप्रीमो ने 2009 की हार से सबक लेकर एक ही खास काम किया, वह यह कि दलित बुद्धिजिवियों ने पारम्परिक आरक्षण(सरकारी नौकरयों)से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार इत्यादि में वर्ण-व्यवस्था के वंचितों को शेयर दिलाने के लिए राजनीतिक दलों पर जो दबाव बनाना शुरू किया था, उसका सम्मान करते हुए उन्होंने 25 जून 2009 को हर प्रकार के सरकारी ठेकों में दलित-आदिवासियों के लिए 23 प्रतिशत हिस्सेदारी सुनिश्चित कर दिया.किन्तु इससे बहुजन समाज के बाकी अंश,पिछड़े और अल्पसंख्यकों को वंचित रखा.

यदि वह ठेकों सहित सप्लाई,डीलरशिप,पार्किंग,परिवहन ,मीडिया इत्यादि अन्य सभी आर्थिक गतिविधियों में दलितों के साथ पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की वाजिब हिस्सेदारी दिलाने का मुद्दा लेकर चुनाव में उतरतीं,शर्तिया तौर पर मोदी को चुनावी सफलता का इतिहास रचने से रोक देतीं.

इस ऐतिहासिक भूल का खामियाजा उन्हें ऐतिहासिक हार के रूप में भुगतना में पड़ा है. किन्तु सोलहवीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा गंवाने के बावजूद बसपा के साथ सुखद बात थी कि उसे कुल राष्ट्रीय वोट का 4.1 प्रतिशत पाने के कारण भाजपा और काग्रेस के बाद देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उसकी मौजूदगी बनी रही.ऐसे में दलित बुद्धिजीवियों को उम्मीद थी कि मायावती उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव -2017 में सर्वजन से बहुजन की ओर लौटते हुए कांशीराम के भागीदारी दर्शन के जरिये अपनी खोई जमीन फिर पाने का नया उपक्रम चलाएंगी. किन्तु कांशीराम के भागीदारी दर्हन से दूरी बनाये रखीं. फलस्वरूप 2007  में 200 से अधिक सीटों का आंकड़ा छूने वाली बसपा को 2017  में 19  सीटों से संतोष करना पड़ा.

कांशीराम के भागीदारी दर्शन के प्रति पैदा हुआ अभूतपूर्व जूनून !

बहरहाल कांशीराम के भागीदारी दर्शन ने निरंतर दूरी बनाकर सवर्णपरस्ती के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करने वाली मायावती के समक्ष इतिहास ने 2019 में कांशीराम की बसपा का वजूद बरकरार रखने का शायद बेहतरीन मौका सुलभ करा दिया है.बेहतरीन इसलिए कि उन्होंने अतीत की भूलों से सबक लेते हुए अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने का मन बनाया है.

विगत एक दशक से चरम निष्क्रियता और दिशाहीनता का परिचय देने वाली मायावती का यह शायद सबसे अहम् फैसला है, जो पार्टी के लिए जीवनदायी  साबित हो सकता है. अवश्य ही इसके लिए ज्यादा श्रेय अखिलेश यादव को जाता है, जिन्होंने बसपा के साथ गठबंधन के लिए अतिरिक्त उत्साह के साथ अतिरिक्त त्याग का भी प्रदर्शन किया है. बहरहाल सपा के साथ गठबंधन के बाद यह तय सा हो गया है कि बसपा जीरों से आगे निकल कर कुछ सांसद लोकसभा में भेजने में कामयाब जरुर हो जाएगी.

लेकिन बसपा से गठबंधन के बाद मायावती यदि उग्रता के साथ कांशीराम के भागीदारी दर्शन की और लौतती  हैं तो ढेरों कमियों और सवालों के बावजूद सपा-बसपा गठबंधन उत्तर प्रदेश में चमत्कार घटित कर सकता है. ऐसा इसलिए कि सवर्ण आरक्षण का बिल पास होने की प्रतिक्रिया में आम से लेकर खास बहुजनों के बीच कांशीराम के भागीदारी दर्शन के प्रति अभूतपूर्व जूनून पैदा हुआ है.  

मोदी ने अपने कार्यकाल के स्लॉग ओवर में सवर्ण आरक्षण का जो छक्का मारा, उससे जहां एक ओर उनकी पार्टी और सवर्ण वर्ग में उत्साह का संचार हुआ, तो वहीं दूसरी ओर वंचित बहुसंख्य वर्ग में उग्र प्रतिक्रिया भी हुई. और वह प्रतिक्रिया ‘जिसकी जितनी संख्या भारी’ उसकी उतनी भागीदारी’ के रूप में सामने आई. 7 जनवरी को मोदी मंत्रिमंडल द्वारा गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत देने की खबर आते ही सोशल मीडिया मीडिया पर जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा उभरने लगा और 9 जनवरी की रात राज्यसभा में सवर्ण आरक्षण का प्रस्ताव पास होते-होते, सोशल मीडिया पर इसका सैलाब पैदा हो गया. यूं तो सवर्ण आरक्षण के विरुद्ध जिसकी जितनी सख्या भारी के रूप अपनी भावना प्रकटीकरण करने के लिए सबसे पहले बहुजन बुद्धिजीवी सामने. किन्तु थोड़े से अन्तराल में ही दलित-पिछड़े समाज के नेता भी होड़ लगाने लगे.

इनमे कुछ सत्ता पक्ष के नेता रहे भी रहे. ऐसे नेताओं में पहला नाम सामाजिक न्याय की प्रखर प्रवक्ता अनुप्रिया पटेल का है. उन्होंने 8 जनवरी को, जिस दिन सवर्ण आरक्षण बिल लोकसभा में पेश हुआ, घोषणा कर दिया कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए.अनुप्रिया पटेल की तरह ही तेज तर्रार राजद के तेजस्वी यादव, सपा के धर्मेन्द्र यादव सहित ने अन्य कई नेताओं ने अपने-अपने अंदाज में पुरजोर तरीके से इसकी मांग उठाया है.

काबिले गौर है कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी..’ बसपा पेटेंट नारा है, जिसका बहुजन बुद्धिजीवी तो गाहे बगाहे इस्तेमाल करते रहे, पर गैर-बसपाई नेता पूरी तरह परहेज करते रहे. किन्तु सवर्ण आरक्षण के बाद बुद्धिजीवियों के साथ विभिन्न बहुजनवादी दलों के नेता भी दलगत बंधन तोड़कर सोत्साह यह मांग उठाने के लिए आगे बढ़े. और जब 22 जनवरी को विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में 13 बिंदु वाले आरक्षण रोस्टर (13 प्वाइंट रोस्टर) का मार्ग प्रशस्त हुआ, पहले से ही सवर्ण आरक्षण से आक्रोशित बहुजन बुद्धिजीवियों और नेताओं में जिसकी जितनी संख्या भारी की मांग और तीव्रतर हुई. बहरहाल विगत 8 जनवरी से 22 जनवरी 2019 के मध्य जिस तरह सामाजिक न्याय को आघात पहुंचा है, उससे लोकसभा चुनाव-2019 में जिसकी जितनी संख्या भारी के चुनावी नारे की शक्ल अख्तियार करने की प्रबल सम्भावना पैदा हो गयी है.

अगर मायावती अपनी पार्टी के पेटेंट नारे के इस्तेमाल के लिए आगे नहीं बढती हैं तो कोई न कोई अन्य दल इसके इस्तेमाल के लिए जरुर आगे आएगा ही आएगा. ऐसे में इससे पहले कि कोई और दल इसे अपना चुनावी एजेडा बना लें, मायावती को बिना देर किये इसके सद्व्यवहार के लिए आगे आना चाहिए. बिना ऐसा किये, यदि महज  गठबंधन के चुनावी गणित पर निर्भर रहती हैं: जिसकी जितनी सख्या भारी के प्रति उपजे सुनहले अवसर के सदव्यवहार से चूक जाएँगी, जो शायद उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल होगी.