अवसरवादी-समर्पणकारी बूढ़ा वाम बेगूसराय में अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है!

हिंदी पट्टी में अच्छी-खासी ताकत व संसदीय उपलब्धियां रखने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Comunist Party of India/ CPI/ सीपीआई) आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है. इस चुनाव में बेगूसराय में अपने युवा सितारे के कंधे पर सवार होकर वह अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है. हिंदी पट्टी में खास कैटेगरी के वामपंथी के लिए फासीवाद विरोधी लड़ाई बेगूसराय में सिमट गयी है. बेगूसराय कुछ समय के लिए जीवन दे भी सकता है, जिसकी संभावना कम है. लेकिन जीवन न दे सका तो लेनिनग्राद अंतिम कब्रगाह साबित होगा!

CPI के उम्मीद के अंतिम सितारे, कन्हैया कुमार के वैचारिक-राजनीति दृष्टि व व्यवहार को CPI की विचारधारा व राजनीति से अलग कर नहीं ही देखा जाना चाहिए! बुनियादी तौर पर वामपंथी राजनीति के दायरे में वह CPI की समर्पणकारी-दक्षिणपंथी व संसदीय अवसरवादी राजनीति का ही नया चेहरा है. इसी किस्म की राजनीति को नये दौर में आगे ले जाने और कहिए तो विकसित करने की क्षमता व संभावना को उसमें देखा जा रहा है.

लेकिन बहुतेरे लोग उसे CPI  से अलग-थलग कर वाम राजनीति के उद्धारक के बतौर देखते हैं. वाम राजनीति के पुनर्जीवन/ नवजीवन की उम्मीद और नई संभावनाओं का सितारा मान बैठे हैं. वे भूल रहे हैं कि वाम लोकतांत्रिक राजनीति/ जन राजनीति का केन्दीय तत्व जन एजेंडा व जनदावेदारी होता है. चेहरा के बल पर नहीं। जनपहलकदमी के बल पर वह आगे बढ़ता है! नेतृत्व की सार्थकता व विकास यहीं से सामने आता है.

Kanhaiya Kumar Press Conference 24.03.2019, Credit Facebook Kanhaiya Kumar

वाम कतार का किसी लड़के की पारम्परिक शादी के बराती व बैंड पार्टी के स्तर तक गिरना खतरनाक है. यहां से वाम राजनीति के पुनर्जीवन का रास्ता नहीं खुलता है.पतन का नया दौर शुरु होता है.

वाम लोकतांत्रिक विचारधारा व राजनीति की न्यूनतम समझ रखने वाले भी यह जानते हैं कि कुछ सितारों नायकों के बल पर वाम राजनीति का ठहराव व गतिरोध नहीं टूटना है. वह भी वैसे सितारे-नायक के जरिए जिसके निर्माण में संघर्ष कम, मीडिया की हिस्सेदारी ज्यादा हो.वही मीडिया जो मनुवादी है,कॉरपोरेट दलाल है!

जो संघर्ष की लंबी प्रक्रिया में सितारे के रूप में निर्मित नहीं हुआ हो, बल्कि एक आंदोलन से आकस्मिक तौर पर चर्चा व चमक में आ गया हो.

वाम राजनीति की नई जमीन तोड़ने में विफलता,ठहराव-गतिरोध की स्थिति और निराशाजनक राजनीतिक माहौल में वाम लोकतांत्रिक दायरे में चमकते सितारे से उम्मीद करने वालों की नजरें जमीन के बजाय ऊपर की ओर देख रही है. खास तौर पर स्वप्न लोक में जीने वाले भावुक किताबी कम्युनिस्ट और सास प्रजाति के वामपंथी ‘जय कन्हैया’ कर रहे हैं.

स्वतंत्र दावेदारी की स्पिरिट के साथ संसदीय चुनाव में कन्हैया और सीपीआई दांव लगाने के लिए तैयार नहीं थे.

कन्हैया की गढ़ी गयी छवि और ऊंचाई पर खड़ी की गयी उसकी लोकप्रियता व अपील की असलियत व खोखलापन बिखर कर पहले ही सामने आ चुकी है.

कन्हैया और CPI  की जद्दोजहद महागठबंधन के समीकरण में फिट बैठकर आगे की राजनीतिक यात्रा करने की थी. CPI के साथ कन्हैया की राजनीति का सार पहले ही सामने आ चुका है. जो लोग अभी कन्हैया के पक्ष में खड़ा होकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद/ RJD) की आलोचना कर रहे हैं उन्हें पीछे लौटकर भी याद करना चाहिए!

हां, जरूर ही महागठबंधन ने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ने के लिए रास्ता दिखा दिया! लेकिन, नयी स्थिति में कन्हैया और CPI की राजनीति पप्पु यादव से लेकर कृष्णा यादव  तक पहुंच गयी. कृष्णा यादव निजी कारणों से CPI की उम्मीदवार नहीं हो सकी.

यह नया चेहरा, चमकता सितारा भी कुछ नया नहीं करने जा रहा है.CPI की पुरानी राजनीति का नया चैंपियन बनने की कोशिश में है. वामपंथी लोकतांत्रिक राजनीति को पुनर्जीवित/ नया जीवन देने और जुझारु छात्र-युवा आंदोलन के प्रतिनिधि के बतौर मुख्य धारा की राजनीति में दावेदारी जतलाने व लोकतांत्रिक मूल्यों को विस्तार देने की हिम्मत के साथ खड़ा होने की संभावना व उम्मीद पर पहले ही सवाल खड़ा कर चुका है!

चलिए,कन्हैया की राजनीतिक यात्रा को पीछे लौटकर देखते हैं.

देशद्रोह के फर्जी मुकदमे में जेल जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू/ JNU) और JNU से बाहर के प्रतिरोध ने कन्हैया को  राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना दिया. शुरुआती दौर में मीडिया के बड़े हिस्से ने नकारात्मक प्रचार किया. लेकिन जेल से आने के बाद मीडिया के बड़े हिस्से ने हीरो के रूप में पेश करना शुरु किया.कुल मिलाकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन और मीडिया के नकारात्मक-सकारात्मक प्रचार ने राष्ट्रीय चेहरा बना दिया. JNU कैम्पस के दायरे का राजनीतिक चेहरा और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (JNUS) का अध्यक्ष अकस्मात राष्ट्रीय राजनीति का युवा चेहरा हो गया.सामान्य तौर पर इस ऊंचाई तक पहुंचना इतने कम समय व संघर्ष के छोटे अंतराल में संभव नहीं होता है.

जेल से बाहर आने के बाद छात्र युवा आंदोलन व राजनीति से बाहर निकलते हुए मुख्य धारा की राजनीति की ओर उसने कदम बढ़ा दिया.

पहले अपने कुछ साथियों के साथ राहुल गांधी से मुलाकात की. बिहार पहुंचे तो लालू यादव, नीतीश कुमार और अन्य पार्टियों के नेताओं से मुलाकात की. अंत में वामपंथी पार्टियों के नेताओं से मिले.जनता दल यूनाइटेड (JDU) नीरज सिंह की अगवानी और सरकारी मेहमाननबाजी चर्चा में रही. सरकारी अतिथि के बतौर वह दीखे तो JDU के खास नेता की यात्रा में विशेष भूमिका चर्चा में रही. लालू यादव से मुलाकात तो पैर छूने के कारण खासा चर्चित हुआ.साथ शराब माफिया की मौजूदगी की भी चर्चा हुई.

लालू यादव से मिलने के बाद कन्हैया का बयान आया कि मनुवादी-जातिवादी ताकतों से लड़कर लालू यादव ने समाजवाद को एक मुकाम तक पहुंचाया है. उसने सामाजिक न्याय की लड़ाई में लालू यादव से सहयोग मांगने का उल्लेख किया. इस दरम्यान श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल के कार्यक्रम और उसके प्रचार-प्रसार ने भी उसके सरकारी पार्टी द्वारा प्रायोजित होने पर चर्चा को जन्म दिया.

जेल से निकलने के बाद बिहार तक पहुंचते हुए पहले ही कन्हैया ने अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा और दिशा का इजहार कर दिया था.

दरहकीकत, ‘आजादी’ और ‘जय भीम-लाल सलाम’ के नारे के साथ वामपंथी राजनीति को नये दौर में नये सिरे से गढ़ने की जद्दोजहद में उतरने के बजाय वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा/ BJP)  विरोधी राजनीति में जगह बनाने और आगे बढ़ने के लिए परदे के पीछे पॉलिटिकल लॉबीईंग का मास्टर बनने की कोशिश में रहा है. उसके नारों-भाषणों और राजनीतिक व्यवहार में बड़ा गैप रहा है! यह गैप तो चर्चित होने के बाद JNU में ही खुलकर सामने आ गया था.

छात्र संघ चुनाव में वादे व दावे के अनुरूप अध्यक्ष के बतौर उसकी भूमिका सवालों के घेरे में रही है. लिंगदोह कमिटी की सिफारिशों का सवाल हो या फिर सामाजिक न्याय का सवाल हो, अनिवार्य अटेंडेंस विरोधी आंदोलन हो.वह अपनी जुबां से बुलंद करने वाले नारों से दूर खड़ा रहा है.

जेल से निकलने के बाद JNU से बिहार तक पहुंचते हुए कन्हैया ने साफ तौर पर संकेत दे दिया था. उसकी पीठ वाम लोकतांत्रिक आंदोलन व राजनीति की ओर है और चेहरा भाजपा विरोधी शासक वर्गीय विपक्षी राजनीति की ओर! वह लेफ्ट-राईट की सीमा रेखा पर है.लेकिन लेफ्ट के विस्तार के लिए नहीं है!

कन्हैया की राजनीतिक यात्रा पर नजर दौड़ाइए, एक छात्र नेता फिर अचानक राजनेता की हैसियत में आने के बाद का सफर देखिए तो अवसरवादी राजनीतिक व्यवहार साफ दीखता है.वाम-लोकतांत्रिक आंदोलन को पुनर्जीवित/ नया जीवन देने और जन राजनीति को बुलंद करने-गढ़ने की प्रतिबद्धता के बजाय भाजपा विरोधी राजनीति के दायरे में बड़ा चेहरा हो जाने की तीव्र राजनीतिक महात्वाकांक्षा ही सामने आती है.जिसके लिए जेएनयू शुरुआती दौर में एक प्लेटफॉर्म होता है और फरवरी आंदोलन एक मौका/ अवसर! उसके बाद प्रवचनकर्ता के बतौर उसकी भूमिका सामने आती है.

अभी बिहार का बेगूसराय चुनावी प्लेटफॉर्म है, CPI की अवसरवादी राजनीति की सवारी है.संसद में छलांग लगाने की जद्दोजहद है. मनुवादी मीडिया और जनेऊ छिपाये वाम बुद्धिजीवियों की कतार चेहरा चमकाने में लगी हुई है. वाम लोकतांत्रिक राजनीति के भविष्य के लिए बेगूसराय से बहुत कुछ नहीं निकलना है! लेकिन CPI के लिए जिस तरह से लड़ाई बेगूसराय में ही सिमट गई है तो उसके लिए अस्तित्व की अंतिम लड़ाई का केन्द्र बन जा सकता है!