इस लेख को लिखे जाने के दौरान प्रथम चरण का चुनाव प्रचार ख़त्म हो चुका है. इस दरम्यान भारतीय जनता पार्टी  (भाजपा/ BJP) के विरुद्ध चली हवा धीरे-धीरे आंधी का शक्ल लेने लगी है. देश के वंचित तबके, लेखक, कलाकार इत्यादि चुनाव के महापर्व को BJP-मुक्त भारत निर्माण के एक बड़े अवसर के रूप में लेते हुए केंद्र की BJP सरकार को उखाड़ फेंकने में सर्वशक्ति लगा रहे हैं. इस विषय में थियेटर और आर्ट से जुड़े नसीरुद्दीन शाह और अमोल पालेकर जैसी 600 हस्तियों द्वारा बीजेपी को सत्ता से उखड फेंकने की अपील अपील राष्ट्र को काफी प्रभावित कर रही है. इनसे पहले 200 लेखकों ने भी BJPसरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की थी.

लेखक, कलाकारों द्वारा किसी दल विशेष को सत्ता से बाहर करने की ऐसी पुरजोर कोशिश आजाद भारत में कभी नहीं हुई. बहरहाल एक ऐसे समय में जबकि लेखन, फिल्म, थियेटर इत्यादि से जुड़े लोग BJP को सत्ता से बाहर करने के लिए सडकों पर उतर रहे हैं, अपील  कर रहे है, वहीँ दलित पिछड़ों के कुछ बड़े राजनीतिक दल BJPऔर कांग्रेस से समान दूरी बरतते हुए कांग्रेस को बहुजनों का सबसे बड़ा दुश्मन प्रमाणित करने में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं.

वे इसके लिए बार –बार स्वाधीन भारत के 1952 के उस पहले लोकसभा चुनाव का हवाला दे रहे हैं, जब कांग्रेस ने दूध का छोटा-मोटा कारोबार करने वाले कजरोलकर नामक एक नौसिखिये नेता को चुनाव में उतारकर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के हरा दिया था. इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस का वह काम निंदनीय था, किन्तु 1952 से लेकर अबतक गंगा-जमुना में पानी बहुत बह चुका है: आज की कांग्रेस तब वाली कांग्रेस नहीं है.

बहरहाल जो लोग 1952 का हवाला देकर आज कांग्रेस को बहुजनों का सबसे बड़ा शत्रु प्रमाणित करने का अभियान चला रहा हैं, उनके विषय में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने इतिहास को ठीक से समझा ही नहीं है. खासकर इतिहास की सर्वोत्तम व्याख्या करने वाले कार्ल मार्क्स (1818-1883) के नजरिये से इतिहास को देखा ही नहीं है. अगर देखते तो इस चुनाव में वे कोई और राग अलापते.

आरक्षण के खात्मे में सबसे ज्यादा मुस्तैद रहे: संघी वाजपेयी और मोदी!

महान समाज विज्ञानी मार्क्स ने कहा है अब तक के विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात जिसका शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक – पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित: ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता.

नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है.

प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है. जहाँ तक भारत में वर्ग संघर्ष का प्रश्न है, यह वर्ण-व्यवस्था रूपी आरक्षण –व्यवस्था में क्रियाशील रहा, जिसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपर्ट प्रकाशित होते ही एक नया मोड़ आ गया. क्योंकि इससे सदियों से शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमाये विशेषाधिकारयुक्त तबकों का वर्चस्व टूटने की स्थिति पैदा हो गयी.

मंडल ने जहां सुविधाभोगी सवर्णों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित कर दिया, वहीँ इससे दलित, आदिवासी, पिछड़ों की जाति चेतना का ऐसा लम्बवत विकास हुआ कि सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील हो गए. कुल मिलकर मंडल से एक ऐसी स्थिति का उद्भव हुआ जिससे वंचित वर्गों की स्थिति अभूतपूर्व रूप से बेहतर होने की सम्भावना उजागर हो गयी और ऐसा होते ही सुविधाभोगी सवर्ण वर्ग के बुद्धिजीवी, मीडिया, साधु -संत, छात्र और उनके अभिभावक तथा राजनीतिक दल अपना कर्तव्य स्थिर कर लिए.

मंडल से त्रस्त सवर्ण समाज भाग्यवान था जो उसे जल्द ही “नवउदारीकरण” का हथियार मिल गया, जिसे 24 जुलाई, 1991 को नरसिंह राव ने सोत्साह वरण कर लिया. इसी नवउदारवादी अर्थिनीति को हथियार बनाकर नरसिंह राव ने मंडल उत्तरकाल में हजारों साल के सुविधाभोगी वर्ग के वर्चस्व को नए सिरे से स्थापित करने की बुनियाद रखी, जिस पर महल खड़ा करने की जिम्मेवारी परवर्तीकाल में अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी पर आई.

नरसिंह राव के बाद सुविधाभोगी वर्ग को बेहतर हालात में ले जाने की जिम्मेवारी जिनपर आई, उनमे डॉ. मनमोहन सिंह गैर-हिन्दू होने के कारण बहुजन वर्ग के प्रति कुछ सदय रहे, इसलिए उनके राज में उच्च शिक्षा में OBC को आरक्षण मिलने के साथ बहुजनों को उद्यमिता के क्षेत्र में भी कुछ बढ़ावा मिला . किन्तु अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी हिन्दू होने के साथ उस संघ से प्रशिक्षित प्रधानमंत्री रहे, जिस संघ का एकमेव लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सिर्फ सवर्णों का हित-पोषण रहा है. अतः संघ प्रशिक्षित इन दोनों प्रधानमंत्रियों ने सवर्ण वर्चस्व को स्थापित करने में  देश-हित तक की बलि चढ़ा दी.

इन दोनों ने आरक्षण पर निर्भर अपने वर्ग शत्रुओं (बहुजनों) के सफाए के लिए राज्य का भयावह इस्तेमाल किया. इस मामले में वाजपेयी ने नया रास्ता दिखाया : एकाधिक बार प्रधानमंत्री बनकर उन्होंने संघ के गुप्त एजेंडे को लागू करने के अपार तत्परता दिखाया. उन्होंने प्रधानमन्त्री की अपनी 13 दिवसीय पहली पाली में आनन-फानन में एनरान को काउंटर गारंटी दे दिया. संघ का गुप्त एजेंडा पूरा  करके की जूनून में ही उन्होंने दो वर्ष का समय रहते हुए भी फटाफट 1429 वस्तुओं पर से मात्रात्मक प्रतिबंध हटा दिया.

जिन सरकारी उपक्रमों में आरक्षण के जरिये बहुजनों को जॉब मिलता था, उन उपक्रमों को बेचने के लिए उन्होंने अरुण शौरी जैसे चरम आंबेडकर विरोधी की देखरेख में विनिवेश मंत्रालय ही खोल दिया और शौरी ने वाजपेय की इच्छा का आदर करते हुए लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औए-पौने दामों में अंधाधुन बेचने का सिलसिला शुरू किया. सामाजिक न्यायवादी सांसदों की संख्या बाहुल्यता के बावजूद देश को निजीकरण का सैलाब बहा देना, वाजपेयी की सबसे बड़ी कामयाबी रही.

अब जहाँ  तक नरेंद्र मोदी का सवाल है, उन्होंने अपने वर्ग शत्रुओं को तबाह करने के लिए जो गुल खिलाया, उसके फलस्वरूप आज बहुजन विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुँच चुके हैं. कारण, जिस आरक्षण पर बहुजनों की उन्नति व  प्रगति निर्भर है, मोदी राज में वह आरक्षण लगभग कागजों की शोभा बना दिया गया है. बहुजनों के विपरीत जिस जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग (सवर्णों) के हित पर संघ परिवार की सारी गतिविधिया केन्द्रित रहती हैं, मोदी राज में उनका धर्म और ज्ञान – सत्ता के साथ  राज और अर्थ-सत्ता पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो चुका है.

शोषक और शोषितों के मध्य आज मोदी राज जैसे फर्क विश्व में और कहीं नहीं है.

वर्ग मित्र की भूमिका में कांग्रेस

बहरहाल यदि वर्ग संघर्ष के लिहाज से BJPकी भूमिका घोर निंदनीय रही है, तो कांग्रेस भी कम नहीं रही रही, ऐसा तर्क खड़ा किया जा सकता है, जो गलत भी नहीं है. क्योंकि जिस आरक्षण पर बहुजनों की उन्नति-प्रगति निर्भर है, उसे ख़त्म करने में कांग्रेस ने नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाया. यह सत्य है कांग्रेस के नरसिंह राव ने ही 1991 में न सिर्फ नवउदारवादी अर्थनीति ग्रहण किया, बल्कि मनमोहन सिंह के साथ मिलकर बढाया भी. नवउदारवादी अर्थनीति के जनक डॉ.मनमोहन सिंह जब वाजपेयी के बाद खुद 2004 में सत्ता में आये तो नरसिंह राव द्वारा शुरू की गयी नीति को आगे बढाने में गुरेज नहीं किया.

किन्तु उन्होंने कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी या आज के मोदी की भांति इस हथियार का निर्ममता से इस्तेमाल नहीं किया: वह बराबर इसे मानवीय चेहरा देने के लिए प्रयासरत रहे. उन्होंने अपने कार्यकाल में नवउदारवादी अर्थनीति से हुए विकास में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों इत्यादि को वाजिब भागीदारी न मिलने को लेकर समय-समय पर चिंता ही जाहिर नहीं किया, बल्कि विकास में वंचितों को वाजिब शेयर मिले इसके लिए अर्थशास्त्रियों के समक्ष रचनात्मक सोच का परिचय देने की अपील तक किया.

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही 2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में पिछड़ों को आरक्षण मिला, जिससे उच्च शिक्षा में उनके लिए सम्भावना के नए द्वार खुले, जिसे आज मोदी सरकार ने अदालतों का सहारा लेकर बंद करने में सर्व-शक्ति लगा दी. उच्च शिक्षा में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के बाद ही डॉ. मनमोहन सिंह ने प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण लागू करवाने का जो प्रयास किया वैसा, अन्य कोई न कर सका. उन्ही के कार्यकाल में मंनरेगा शुरू हुआ.

यह निश्चय ही कोई क्रातिकारी कदम नहीं था, किन्तु इससे वंचित वर्गों को कुछ राहत जरुर मिली. मंनरेगा इस बात का सूचक था कि भारत के शासक वर्ग में वंचितों के प्रति मन के किसी कोने में करुणा है. चूँकि भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है, इस लिहाज से यदि BJPसे कांग्रेस की तुलना करें तो मात्रात्मक फर्क नजर आएगा.

संघी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल तक आरक्षण पर यदि कुछ हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ इसका खात्मा हुआ है: जोड़ा कुछ भी नहीं गया है. इस मामले में कांग्रेस चाहे तो गर्व कर कर सकती है. कांग्रेस के नेतृत्व में लड़े गए स्वाधीनता संग्राम के बाद जब देश आजाद हुआ तो उसके संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया.

इसी कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के कथित कुख्यात इमरजेंसी काल में SC/ ST के लिए मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढाई के प्रवेश में आरक्षण लागू हुआ.

बाद में नवउदारवादी अर्थनीति के दौर मनमोहन सिंह के पहले दिग्विजय सिंह डाइवर्सिटी केन्द्रित भोपाल घोषणापत्र के जरिये सर्वव्यापी आरक्षण का एक ऐसा नया दरवाजा खोला जिसके कारण बहुजनों में नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों इत्यादि समस्त क्षेत्रों में आरक्षण की चाह पनपी, जिसके क्रांतिकारी परिणाम आने के लक्षण अब दिखने लगे हैं. कुल मिलाकर मंडल उत्तरकाल में BJP से तुलना करने पर कांग्रेस की भूमिका बहुजनों के वर्ग मित्र के रूप में स्पष्ट नजर आती है. जिन्हें कांग्रेस के वर्ग मित्र की भूमिका में अवतरित होने पर  संदेह है, वे एक बार लोकसभा चुनाव 2019  के लिए जारी कांग्रेस के घोषणापत्र और BJP के संकल्पपत्र से मिलान कर लें!