नजीब की ही माँ, क्यों?
महत्वपूर्ण नजीब की माँ नहीं,
वोट का है,
मुसलमानों के वोट का है.

माँ नजीब की भी है, रोहित वेमुला की भी है,
माँ भगत सिंह की भी थी,
सीवान के शहीद चंद्रशेखर की भी थी,
और माँ ब्रह्मेश्वर मुखिया की भी होगी.

बेगूसराय में दो माँयों की बात हो रही है,
दोनों का साथ-साथ फोटो भी दिखा.

ललाट पर टीका लगाये,
एक माँ का बेटा,
चुनाव की लड़ाई में जा रहा है,
एक माँ घर में ही रह जाती है,
और दूसरी माँ जुलूस का हिस्सा बनती है.

कई माँओं और पत्नियों की तस्वीर ढ़ूंढ़ता हूं,
उन माँओं और उन पत्नियों,
या कहिए उन माँओं को जिनके बच्चों का बाप छिन गया है.

तमाम माँ, पत्नियों की पीड़ा है,
संघर्ष है,
सबको ढूंढ रहा हूँ.

कन्हैया कुमार, चुनाव प्रचार में नजीब की माँ के साथ. Kanhaiya Kumar with Mother of Nazeeb, in Election campaign. Photo: Sonam Kumar

बेगूसराय से,
जब नजीब की माँ की तस्वीर आती है,
तो उन माँओं और पत्नियों की तस्वीर तलाशता हूँ,
जिसे दिखाई पड़ना चाहिए,
मैंने देखा नहीं.

उन माँओं और पत्नियों की तस्वीर आने चाहिए,
जिसने हाल के दिनों में,
लेनिनग्राद कहे जाने वाले बेगूसराय की धरती पर,
गरिमापूर्ण जीवन की बुनियादी मांग,
जमीन के अधिकार की मांग,
और संघर्ष में अपने बेटों को खोया है.

बेगूसराय में लहराते लाल झंडों के बीच,
वे तस्वीरें गायब हैं,
उनकी पीड़ा और संघर्ष,
सुनाई नहीं पड़ता.

माँ की पीड़ा और संघर्ष यहीं खत्म नहीं होती,
उन 13 माँओं की पीड़ा और संघर्ष भी महत्वपूर्ण है,
जिसने अपने बेटों को 2 अप्रैल, 2018 को,
एससी-एसटी एक्ट को प्रभावहीन बनाने के खिलाफ,
ऐतिहासिक भारत बंद में खोया है.
जो पुलिस की गोलियों,
और मनुवादी सवर्णों के हमले में मारे गये हैं.

वे माँऐं भी,
जिनके बेटे गटर में मरे हैं,
डेल्टा मेघवाल की माँ भी होगी.

यह चुनाव न होता,
उस माँ के बेटे का,
उर्दू नाम नजीब न होता,
तो क्या,
उस माँ  की तस्वीर जुलूस से सामने आ पाती?

हाँ,
सारी माँ,
चुनाव में वोट बटोरने की हैसियत नहीं रखती.

मामला केवल वोट का नहीं होता,
तो सबसे पहले बेगूसराय के शहीद भूमिहीन दलितों की माँ दिखती.

हाल के दिनों में,
नरेन्द्र मोदी की माँ,
कैमरे की रौशनी दिखाई पड़ रही है,
पिछले दिनों नोटबंदी के बाद,
बैंक में लाइन में लगी उनकी तस्वीर भी सामने आई थी,
हाँ, वही नोटबंदी,
जिसने कई माँओं से बेटे छीन लिए हैं.

बेगूसराय से एक माँ,
कैमरे की रौशनी में आ रही हैं,
आंगनबाड़ी सेविका के बतौर,
मात्र 3500 रूपये प्रति माह आमदनी की चर्चा है.

लाखों माँ,
उससे कम आमदनी पर गुजारा कर रही हैं,
आशा और रसोइया माँओं की मजदूरी,
सबको पता ही होगा.

खैर चलिए,
जिग्नेश मेवानी,
आंगनबाड़ी वाली माँ के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए,
वोट मांग ही लिया है.

उसने आते ही,
अपनी बात मनाने के लिए माँ की कसम,
खा ही लिया है.

इन सबके बीच,
मुझे चंद्रशेखर की माँ भी याद आ रही हैं,
जिसने,
अपने बेटे की शहादत के बाद संघर्ष किया,
अपने बेटे की शहादत की कीमत लगाने के लिए,
तात्कालीन गृहमंत्री,
सीपीआई के इंद्रजीत गुप्ता को,
लानतें भेजी,
मुआवजा राशि वापस भेजा.

हर आम माँ की पीड़ा है,
संघर्ष है.

बिहार में रणवीरों (रणवीर सेना) द्वारा,
नरसंहार में मारे गये बेटों की भी माँये होंगी.

उन माँओं के संघर्ष की आवाज,
इंसाफ के इंतजार में,
दम तोड़ती उम्मीद है.

मैक्सिम गोर्की (रुसी क्रन्तिकारी) की माँ,
और उसका बेटा पावेल भी याद आ रहा है,
… पावेल,
बेगूसराय, लेनिनग्राद, पावेल.

1084वें की माँ,
हाँ, चंद्रशेखर को शहादत से पहले,
माँ ने टीका नहीं लगाया होगा,
हाँ, चंद्रशेखर के माथे पर टीका नहीं लगता होगा,
माँ, से टीका लगवाकर संसद की ओर ही जाया जा सकता है.

नेता नहीं, बेटा,
माँ, वोट तो चाहिए.

माँओं की चर्चा निकली है,
तो ‘गौ’ माता की भी चर्चा होगी, ही,
गौ माता हमारे लिए दूध देती है,
एक राजनीतिक गिरोह के लिए वोट,
वोट के लिए उस गिरोह ने,
गौ माता के नाम पर,
दर्जनों माँओं से उसके बेटों (बेटी) को छीन लिया है.

माँ महान शब्द है,
लेकिन “महान” बेटों,
माँ वोट के लिए नहीं है.

[नोट: (1) 1084वें की माँ, महेष्वेता देवी की उपन्यास है, जिसके पात्र असल जिंदगी के क्रन्तिकारी हैं. (2) कविता में प्रवाह लाने के लिए मामूली बदलाव किए गएँ हैं, लेकिन कविता के मूल भाव को बरकरार रखा गया है. – संपादक]